आत्म साक्षात्कार करते आलेख
डॉ. चित्तरंजन कर
समय
की गणना करने की स्थूल पध्दति से मनुष्य-जाति का इतिहास संभवत: नहीं बना है।
क्योंकि वह तो सर्वसामान्य है,
परंतु एक ही भाग में प्रत्येक व्यक्ति समाज,
या देश जिस परिस्थिति या घटना का साक्षात्कार करता है,
वह विशिष्ट होता है- अतिविशिष्ट और यही विशिष्टता या
अतिविशिष्टता उस व्यक्ति, समाज या देश को रूपायित करती
है। समय के शब्दचित्र के भागों की अनुभूतियों के साक्षी हैं,
जिन्हें बसंत कुमार तिवारी ने संस्मरण संज्ञा दी है। हमारी
स्मृति ही हमें दूसरे से जोड़ती है, यह स्थान को दूसरे
स्थान के समीप ले जाती है, और एक कालखंड को दूसरे काल
खंडों से अभिन्न प्रतिपादित करती है, और इस प्रक्रिया
में शब्दों की भूमिका अद्वितीय होती है। सीताकांत महापात्र ने इसी दृष्टि से
शब्दों को सामाजिक स्मृति कहा है, सच ही है जब तक
स्मृति है तब तक सारे संबंध सार्थक हैं, स्मृति भंग
मनुष्य ही नहीं, मनुष्य के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है,
इस खतरे से सावधान करना और बचाना साहित्य का दायित्व है और इसी
श्रृंखला में बसंत कुमार तिवारी की लेखनी से प्रसूत समय के शब्द चित्र का
स्वागत है।
इस पुस्तक में
विषय वस्तु की वैसी ही विविधता है जैसी विविधता मनुष्य की प्रवृत्ति,
रूचि आदि में होती है। मूलत: पत्रकार होने के कारण भी तिवारी
जी की सर्वसमावेशी दृष्टि में यथासंभव-यथा समय भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से चित्र
स्वयमेव आरेखित होते रहे हैं, जिनकी मंजूषा यह
प्रस्तुत पुस्तक है। आग जलती भी है, जलाती भी है,
जिससे जो जैसा काम ले सके उस पर निर्भर है,
लेखन विशेषत: मीडिया एक ओर नर्मदा जल आंदोलन या छत्तीसगढ़ राज्य
गठन आंदोलन जैसे सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बनता है,
तो दूसरी ओर उसकी बहुत कुछ अवांछित या नकारात्मक भूमिका कभी- कभी चिंतनीय बन
जाती है, लेखक का कहना है कि मीडिया की सामाजिक
सरोकारों में सकारात्मक भूमिका होती है, पर लगता है कि
वह नकारात्मक भूमिका अदा करने लगा है और वह इस से अनभिज्ञ भी नहीं है। दरअसल
लोकप्रिय दर्शक और पाठक संख्या बढ़ाने की अंधी दौड़ में वह अपने सामाजिक दायित्व
अनुशासन और संतुलन से विमुख होकर काफी कुछ बिगाड़ कर रहा है। प्रिंट मीडिया यह
भूल गया है कि उसने सदैव ही समाज को शिक्षित किया और दिशा निर्देश भी दिए।
इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ प्रतिस्पर्धा करने की दौड़ में शामिल होकर वह अपनी
विश्वसनीय खोता जा रहा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के पूर्व तक प्रिंट
मीडिया पूरी तरह अनुशासित और दायित्वपूर्ण था। समाज में विसंगतियां पैदा करने
वाली शक्तियों के प्रति वह सजग और सचेत था। बसंत कुमार तिवारी अन्य बातों की
तरह भाषा के प्रति भी सदैव सर्वत्र सजग सचेत रहे हैं। हिंदी उन की दृष्टि में
भारत ही नहीं, समूचे विश्व में प्रेम और भ्रातृत्व का
सेतू है। देश-विदेश में विभिन्न क्षेत्रों व स्थानों का समय-समय पर भ्रमण करते
हुए लेखक ने अपने अनुभवों को लिपिबध्द किया, जिस का
निहितार्थ यह है कि यह किताब किसी निर्धारित लक्ष्य की परिणति नहीं वरन विभिन्न
क्षण चित्रों का संकुल है। इस प्रकार इस प्रयास में कृत्रिमताजन्य एक एक रसता
नहीं, स्वाभाविकताजन्य सरसता है,
विषय वस्तु की विविधता को पत्रकार की हैसियत से बसंत कुमार
जैसे पुरानी पीढ़ी के व्यक्ति को अकेले ही करना पड़ता था,
इसलिए राजनीति, अर्थनीति,
शिक्षा, अपराध कला, संस्कृति,
खेलकूद, संगीत आदि सभी की रिपोर्टिंग
में साहित्यिक छटा तात्कालिक घटनाओं, समाचारों,
या प्रतिक्रियाओं को एक व्यापक संदर्भ से जोड़ती प्रतीत होती है,
जिस का प्रमाण है विवेच्य पुस्तक का प्रकाशन लेखक ने इस पुस्तक
के लेखों को संस्मरण निरूपित करते हुए लिखा है कि संस्मरण सहज लेखन है लेखों को
पढ़ने से यह सहजता पढ़े-पढ़े महसूस होती है, क्योंकि
उन्होंने कहीं भी कोई बात अपने अनुभव पर आरोपित होने नहीं दी है,
जैसे दिखा, वैसा लिखा,
इस यथातथ्यता के निर्वहन में स्मृति सम्यक रूप से सजग बनी रही
है, सर्वत्र सद्भावना, समृध्द
सुख-शांति का आग्रह है। राजनीति में जय-पराजय की तथा-कथा का सामाजिक उल्लेख तो
होना आवययक है परंतु वह लेखक का मंतव्य या गंतव्य न हो कर किसी गंभीर और समर्थन
निसूर्षका हेतु ही बनता है, और वह निसूस है। जनकल्याण
का लेखक के ही शब्दों में भारतीय लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए राजनैतिक
धु्रवीकरण एक अनिवार्यता है। इस शब्द चित्रों से गुजरते हुए स्पष्ट कहा जा सकता
है कि न लिखना समय के साथ न केवल बीत जाना है, अपितु
एक बहुत बड़ी धरोहर से आगामी पीढ़ी को वंचित कर देना भी है और जैसा कि महादेवी
वर्मा ने कहीं लिखा है, 'लिखना आत्मस्थ होना है',
इन लेखों में बसंत तिवारी का आत्म साक्षात्कार है- एक ऐसा
दर्पण, जिसमें उनका संसार भी प्रतिबंबित होना है और उस
संसार में लेखक भी अपने को सुरक्षित महसूस करता है,
क्योंकि श्रीकांत वर्मा के शब्दों में जो रचे, सो बचे।
पुस्तक -
समय के शब्दचित्र
लेखक -
बसंत कुमार तिवारी
प्रकाशक -
वैभव प्रकाशन, अमीनपारा, पुरानीबस्ती, रायपुर, छग
मूल्य - 100 रुपये
पृष्ठ - 104


