Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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पुस्तक समीक्षा

 

 

शब्दशक्ति का सार्थक हस्तक्षेप


रणविजय सिंह सत्यकेतु

 

क सहज, संवेदनशील और चिंतनशील व्यक्ति अपने समय और समाज के घटित और फलित से कभी असंपृक्त नहीं रह सकता। उसकी चेतना के तार तुरंत झंकृत हो उठते हैं, जब कुछ असामान्य घटता है, कुछ हटकर दिखता है या फिर आसपास बिलकुल सन्नाटा पसर जाता है। उसका मस्तिष्क किन्तु-परन्तु का हल थाम, घटनाओं की परतें उधेड़ कर अंतर्निहित सच पकड़ लेता है। फिर उन घटनाओं का रेशा-रेशा अलग कर उसकी सकारात्मकता और नकारात्मकता को बेपर्दा कर देता है। यदि वह व्यक्ति संयोग से पत्रकार हो तो इस काम को और भी बेहतर अंजाम दे सकता है क्योंकि घटनाओं और सूचनाओं के संजाल से वह रोजाना और हर वक्त रूबरू होता है।

'जो दिखा सो लिखा' में समाज, राजनीति, पत्रकारिता, सिनेमा, स्त्री विमर्श के तमाम बिंदुओं की निपुणता और निर्ममता के साथ शल्य चिकित्सा की गई है। एक पत्रकार का किसी विषय पर लिखना एक सामान्य बात हो सकती है, लेकिन जब वह विषयगत विश्लेषण और वस्तुगत वर्णन से किसी खास सत्य को उद्धाटित करता है तो उसकी लेखनी बहस पैदा करती है, अपनी ओर पाठकों का ध्यान खींचती है। अपनी लेखमाला में युवा पत्रकार प्रमोद भारद्वाज ने समाज के बदलते स्वरूप, बाजारवाद के प्रभाव, भूमंडलीकरण के खतरों, राजनीति की गिरती साख और डूबते-उतरते वैयक्तिक व्यवहार पर न केवल साधिकार लिखा है, बल्कि छोटे-छोटे और लयात्मक वाक्यों से उसे संवारा भी है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते कई बार एक सदय किंतु विह्वल कवि विचरता और विचारता दिखाई देता है जो बेचैन है सामाजिक बिखराव पर, जो कुपित है राजनेताओं की कथनी-करनी में अंतर पर, जो मुट्ठी भींचे हुए है विकृतियों को बेचकर अपना घर सजाने वालों पर, जो चिंतित है स्त्रियों की उत्तरोत्तर दुर्दशा पर। एक सक्रिय पत्रकार शब्द-शब्द सजाता दिखता है ताकि बची रहे व्यक्ति की स्वाभाविकता, कायम रहे आधी दुनिया की अस्मिता। ताकि सतर्क हो जाए समाज, किन्हीं खूंखार इरादों से बचा ले जाए बचपन को अदृश्य खतरों से, संवार ले उम्रदराज अनुभव को आत्मघाती तिरस्कार से।

'महारानी की माफी' के बहाने लेखक ने भारतीय राजनीति के उस चरित्र को उजागर किया है जो अपनी पुरानी-नई गलतियों को बेशर्मी के साथ ग्लोरीफाई करता है। बिना इसकी परवाह किए कि नागरिकों पर उसका क्या असर पड़ेगा। हमारे राजनीतिज्ञ आजादी के पहले और बाद से गलतियां करते चले आ रहे हैं और मजे से उसका रसास्वादन भी कर रहे हैं। समाज को जाति-उपजाति, धर्म और भाषा के आधार पर बांटकर राजनीतिक विद्रूपता का नंगा नाच करते रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि जनता फिर-फिर उन्हीं चेहरों को अपने ऊपर थोप लेती रही है। लेखक इस 'खतरनाक पहचान' की ओर शिद्दत से इशारा करते हैं। कहते हैं 'राजनीति में मनुष्य नहीं रहा। अगड़े-पिछड़े, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, हिन्दू-मुसलमान, भाषा-उपभाषा, बोली, जाति, उपजाति के अनिवार्य और आखिरकार तत्व हो गए। ऐसा संकोच, ऐसे घेरे, ऐसे दायरे खड़े होने लगे कि सारा देश, इनमें कैद होकर रह गया।' देश का भविष्य तय करने वाली संसद में जब आपराधिक और असामाजिक पृष्ठभूमि के माननीय बैठते हों तो वहां तय की गईं नीतियां जाहिर तौर पर धुली-पुछी नहीं होती। नायकविहीन समाज और नेतृत्वविहीन राजनीति में ऐसे-ऐसे लोग अचानक जगह पा जाते हैं जो आवेश में कुछ अलग कर जाते हैं पर धीरे-धीरे, वास्तव में सत्ता का स्वाद लेने से खुद को बचा नहीं पाते। और तब उनका चारित्रिक बौनापन और वैचारिक दरिद्रता हमारे मुंह पर जोरदार तमाचे की तरह उभर आती है। कमतर और विद्रूप सोच के नेताओं-अफसरों के नकारापन का नतीजा ही है कि पग-पग पर आम जनता को आतंक-अपराध के ठेकेदारों के हाथों लुटना-पिटना-उधड़ना और फिर खुद ही संभलना पड़ता है। कोई थाना-पुलिस, कोई कोर्ट-कचहरी, कोई राजनैतिक-प्रशासनिक रहनुमा आम लोगों का दुख-दर्द नहीं बांटता, क्योंकि वह अपने ही लिजलिजे मसायलों में मस्त और पस्त रहता है। लेखक तमतमाया हुआ है, अपने तूणीर से एक से एक व्यंग्य बाण चलाता है। कहता है 'हमारी आजादी की राजनीति के बाद, आजाद राजनीति में शोक और उल्लास का, विखंडन का, उपकेन्द्रण का, यही सच छाता गया। फासिज्म का सच। अवसरवाद का सच। गठबंधन का सच। सिरविहीन मुद्दों का सच। यह सच, किसी भी नैतिकता की चिंता से मुक्त था और अपने क्लोन-दर-क्लोन दोहरा रहा था।' अपने लेखों के जरिए लेखक ने राष्ट्रीय-क्षेत्रीय किसी पार्टी को नहीं बख्शा है। कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टियां, सपा-बसपा सबको फटकार लगाई है। देश की सुरक्षा, संरक्षा और समरसता से खिलवाड़ करने के लिए उन्हें धिक्कारा है।

पुस्तक में भारतीय स्त्री की दुर्दशा को कई-कई शीर्षकों और संदर्भों में करीने से उकेरा गया है। स्त्री आज भी पुरुषवादी समाज में दोयम दर्जे की नागरिक है। ग्रामीण और कस्बाई स्त्रियां ही नहीं पढ़ी-लिखी और उच्च वर्ग की सुविधाभोगी औरतें भी मर्द और रिश्तों की श्रृंखला से निजात नहीं पा सकी है। बल्कि मर्दवादी सोच अपने परिष्कृत किंतु घृणित चालों में उसे फांसने की हरसंभव कोशिश कर रही है। महिला आरक्षण मुद्दे पर जिस तरह पुरुष वर्ग का अंतस तिलमिलाया हुआ है, वह कतई छिपा नहीं रह गया है। 'दो चेहरों का सच' में शरद यादव के वक्तव्य का जिक्र कर लेखक ने बड़ी हैसियत वाले और माननीय स्तर के मर्दों की कुंठा का खुलासा किया है। इसी तरह 'रिश्तों का धागा', 'कैद में लक्ष्मी', 'हर सांस पर मौत', 'ईंट-ईंट स्त्री', 'मुक्ति की कीमत', 'स्त्री खड़ी बाजार में' आदि लेख के जरिए लेखक ने स्त्रियों पर हो रहे चौतरफा और महीन जुल्मों, यातनाओं का बारीक खुलासा किया है। साथ ही जाने-अनजाने और परंपरा और आधुनिकता के नाम पर हो रही लगातार गलतियों के प्रति सोचने-समझने वालों को खबरदार किया है। लेखक की सजग आंखें देख रही हैं कि किस तरह स्त्री को बाजार में देह की तरह पेश किया जा रहा है, उसे बेचकर अंधाधुंध पैसा बटोरा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि आज की स्त्री चैतन्य नहीं हुई है लेकिन उसके आर्थिक आधार इतने कमजोर और रेतीले हैं कि चाहकर भी वह दोनों पैर धरती पर रोप नहीं पा रही है। ऊपर से अपनी सत्ता कायम रखने को आतुर-व्याकुल मर्दवादी समाज तमाम जहरीले और कंटीले तरीके अपना रहा है। 'हर सांस पर मौत' में लेखक लिखते हैं 'यह समाज, शुरू से ही, स्त्री को प्रणति देने से बचता भागता रहा है, क्योंकि उसे सर्वाधिक खतरा, स्त्री और उसके अनगमन से ही रहा है। इसलिए उसने स्त्री को कुछ बेड़ियां पहनाई हैं। एक बेड़ी टूटी तो दूसरी हाजिर है।' इस सोच के लोग हर क्षेत्र में फैले और पीठासीन हैं। चाहे वह राजनीति और या नौकरी, पत्रकारिता हो या सामाजिक संगठन, विश्वविद्यालय हो या रिसर्च सेंटर, हर कहीं स्त्री शोषित है। उसकी देह ही उसकी दुश्मन हो गई है, उसकी ममता उसके लिए आत्मघाती हथियार हो गई है, उसकी संवेदना उसके पैरों की बेड़ी बन गई है। प्रमोद भारद्वाज के भीतर रचयिता तिलमिलाया हुआ है, एक नैसर्गिक कृतिकार की दुर्दशा पर वह अपनी कलम से लोगों को झकझोरता है, ललकारता है और सोचने पर विवश करता है।

सिनेमा खंड में लेखक ने भारतीय सिनेमा के दुहराव, बासीपन और अतिरंजित कथानक के साथ ही हौवा खड़ा करने वाले विषयों को चुनने की प्रवृत्ति पर टोकाटाकी की है। 'विवाद बेचने की कला', 'देह की मृदा से मुद्रा', 'देह यात्राओं का सच', 'बाजार का गदर' आदि लेखों के जरिए बताते हैं कि सिनेमा उद्योग के रहनुमाओं का बाजार के प्रति बेतरह झुकाव, समाज के प्रति एकांकी सोच और स्त्री देह के प्रति उधाड़ू नजरिया, न शुध्द कलात्मकता है न पूरी तरह सोशल एप्रोच वाला। हां, अनावश्यक बहस जरूर पैदा करता रहा है। 'रचा और बसा हुआ भ्रम' में वह लिखते हैं, 'सौ साल का भारतीय सिनेमा, वस्तुत: रचे हुए भ्रम का ही सिनेमा है। इसमें समाज, उसके जातीय तत्व, परिवेश और काल को इस गति से दोहराया गया है कि हमारे सिनेमा का सांस्कृतिक व्यवहार, बेहूदा सा लगने लगता है। और अब, जब समाज पीछे पलटता है और देखता है तो उसे स्क्रीन पर अपनी इतनी रिक्तियां और इतने अभाव मिलते हैं कि सिनेमा, बस एक थूका हुआ सृजन लगता है।' 'देह यात्राओं का सच' में वह लिखते हैं, 'हमें अपने समाज जीवन की जड़ों पर भयंकर भरोसा हो, तो भी अब हमें दृश्य खतरों से खबरदार हो जाना चाहिए। क्योंकि ये खतरे बहुत मासूम मुद्रा में आ रहे हैं। ये भंजक नहीं हैं, पर चीजें जहां हैं, उन्हें बड़ी बारीकी से कुरूप कर देते हैं।'

पुस्तक में कुछ व्यक्ति आधारित लेख भी शामिल हैं। जिन प्रमुख व्यक्ति चरित्रों को उनकी खामियों-खूबियों के साथ इसमें शामिल किया गया है, उनमें पत्रकार राजेन्द्र माथुर और एसपी सिंह, लेखिका अरुंधती राय, कवि लीलाधर मंडलोई, अभिनेत्री राखी सावंत, पूर्व आईपीएस अयोध्यानाथ पाठक और रेवती चरण पटेल, नेता सुंदरलाल पटवा शामिल हैं। 'शेम शेम', 'विचार कहां', 'ये वासनाकाल' आदि लेखों में पत्रकारिता की बिवाइयों और पत्रकारों के दोहरे चरित्र को विभिन्न संदर्भों में उद्धाटित किया गया है। इसके अलावा शिक्षा, संस्कृति, सुरक्षा, युवा वर्ग, पर्यावरण और वन्य जनित विषयों को भी शामिल किया गया है। लेखक मानते हैं कि रफ्ता-रफ्ता कटता नई सदी का समय स्वयं बीतता जाएगा, लेकिन उनके भीतर की जिजीविषा इस स्थिति को चुपचाप देखते रहना नहीं चाहती, बल्कि अपनी शब्द शक्ति से सार्थक हस्तक्षेप करना चाहती है। अपनी सघन-विरल बुनावट में 'जो दिखा सो लिखा' के तमाम लेख डेढ़ दशक से भी अधिक पत्रकारिता को अनुभूत कर चुके प्रमोद भारद्वाज की जागरुकता और सजगता का नतीजा है।

 

पुस्तक - जो दिखा सो लिखा

लेखक - प्रमोद भारद्वाज

प्रकाशक - साहित्य संगम, नया-100, लूकरगंज, इलाहाबाद-1

मूल्य - 300 रुपये

पृष्ठ - 199

 

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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