स्वाधीन उजास के लिए....
अशोक कुमार चौहान
सन्
1857
में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के
उपलक्ष्य में जब सत्ता-प्रतिष्ठान क्रांतिकारियों के बलिदान की उस महान घटना को
उत्सव के रूप में मना रहे हैं तो इसे एक सुखद संयोग ही कहा जा सकता है कि संतोष
भदौरिया की नवीन पुस्तक 'शब्द-प्रतिबन्ध'
स्वाधीनता आंदोलन के उन पन्नों को फिर से पलटने को विवश कर
देती है जिसमें साम्राज्यवादी अंग्रेज हुकूमत के अत्याचारों के विरुध्द हुए
विद्रोह की वो संघर्ष-गाथा लिखी है, जिसका पुर्नपाठ
करने और उससे आजादी का मूल्यांकन करने की देश को सख्त जरूरत है। पत्रकारिता जगत
के लिए भी पुस्तक एक सबक के रूप में सामने आई है क्योंकि आज अभिव्यक्ति का यह
चौथा खंभा हमने बहुलांश में बाजारवाद के शिकंजे में है। अभिव्यक्ति की पूरी छूट
मिलने के बाद भी जब पत्रकारिता की पैनी धार कुंद पड़ रही हो और जनता की तकलीफों
को दरकिनार करते हुए पूंजीवादी समूहों का गुणानुवाद करने में उसका समय बीत रहा
हो, तब पुस्तक की विषयवस्तु उस ओर ले जाती है जहां इस
पेशे का मतलब बुराई से संघर्ष और समाज की बेहतरी के लिए होता था।
स्वाधीनता का
अर्थ क्या है?
और उसकी जरूरत क्यों होती है? तथा
पत्रकारिता के दायित्व क्या हैं? पुस्तक में ऐसे सभी
प्रश्ों पर बड़ी गहराई से विचार किया गया है। स्वाधीनता की जरूरत इसलिए होती है
क्योंकि साम्राज्यवाद के अधीन देश या समाज का आर्थिक,
राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास अवरुध्द हो जाता है। लेखक की यह मान्यता तर्कसंगत
है कि आर्थिक संघर्ष के बिना राजनीतिक संघर्ष को पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती।
समाज के लिए आर्थिक स्वावलंबन दूसरी मान्यताओं से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता
है क्योंकि अकर्मण्यता और गरीबी, गुलामी की ओर ले जाने
वाली अंधी गली के समान है। वैश्वीकरण छत्रछाया तले आज विश्व-समाज जिस प्रकार
धर्म, जाति, वंश,
नस्ल, के आधार पर फिर से विभाजित हो
रहा है, तो ऐसे माहौल में इन रुकावटों का क्रियात्मक
एवं विचारमूलक समाधान प्रस्तुत करने का भार पत्रकारिता के सिर पर ही जाता है।
यह सच है कि पत्रकारिता के सहयोग के बिना किसी भी सामाजिक आंदोलन की सफलता
संदिग्ध हो जाती है।
पुस्तक के
प्रथम अध्याय 'संघर्ष
और बंधन' में स्वाधीनता आंदोलन का संक्षिप्त किन्तु
सारगर्भित एवं रोचक वर्णन देने के साथ पत्रकारिता के अर्थ,
स्वरूप और उद्देश्य पर प्रकाश डाला गया वस्तुत: राष्ट्रवादी
चेतना और पत्रकारिता का उदय अंग्रेजी राज के विरोध की प्रतिक्रियात्मक शक्ति के
रूप में साथ-साथ हुआ था। लेखक का मानना है कि पत्रकारिता ही वह माध्यम है जिसकी
मदद से हम राष्ट्र-जीवन से जुड़ सकते हैं। यहां सृजनात्मक क्रांति के लिए जनता
का आह्वान करते हुए पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में विश्व-बंधुत्व की जो
पारिवारिक अवधारणा पेश की गई है, वह अपने आप में
विचारणीय है। पत्रकारिता आधुनिक सभ्यता की खास उपलब्धि मानी जाती है,
साहित्य के साथ उसका अटूट रिश्ता रहा है। साहित्य में
पत्रकारिता के महत्व पर बनार्ड शॉ ने लिखा है कि ''ऐसा
कुछ भी साहित्य के रूप में बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकता जो पत्रकारिता भी
न हो। जो व्यक्ति अपने और अपने समय के बारे में लिखता है,
केवल वही सचमुच समस्त मनुष्यता और सभी युगों के लिए लिख सकता
है।'' पत्रकारिता के उद्भव के साथ ही दमन की प्रक्रिया
भी शुरू हो गई थी। प्रेस की आजादी पर पहला हमला अंग्रेज संपादक जेम्स आगस्टक
हिक्की के ब्रिटिश कंपनी विरोधी पत्र पर हुआ था,
परिणामत: उन्हें जेल की सजा मिली। पहले हिन्दी समाचारपत्र की पड़ताल करने पर
'उदन्त मार्तण्ड' (1826) ही इस
परीक्षा में खरा उतरता है। यह पत्र केवल एक खबरनामा नहीं था बल्कि उसने आधुनिक
हिन्दी गद्य साहित्यिक ओजस्विता का युगारंभ किया। 'पयामे-आजादी'
(1857) के खून में उबाल पैदा करते विचारों से चिढ़कर अंग्रेजों
ने उसके प्रकाशक केदार बख्त के साथ-साथ बहुतेरे पाठकों भी फांसी पर चढ़ा दिया
था। सन 1799 में पास किया गया प्रेस-एक्ट पहले तो
समाचारपत्रों पर वक्री हुआ और उसी ने 1807 में पुस्तकों
एवं पत्रिकाओं आजादी पर ग्रहण लगा दिया था। लेखक ने वारेन हेस्टिग्ज,
लार्ड बैंटिंग, मेटकापऊ जैसे प्रेस के
प्रति उदार शासकों के साथ 'वर्नाक्यूलर प्रेस-एक्ट'
जैसे दमघोंटू प्रतिबंध को समाप्त करने वाले लार्ड रिपन का
उल्लेख भी बिना हिचकिचाहट के साथ किया है। विदेशी हुकूमत के दमनचक्र में भी
संपादकों के हौसले कितने बुलंद थे, इसका उदाहरण
'गदर' के प्रथमांक में क्रांतिकारी
करतार सिंह का यह उत्सर्ग गीत है-
जो पूछे कि
कौन हो तुम,
तुम कह दो बागी है नाम अपना।
जुल्म मिटाना
हमारा पेशा,
गदर करना है काम अपना॥
इसके बरअक्स
वर्तमान पत्रकारिता से जुड़े बुध्दिजीवियों की आदर्शहीन विचारधारा तथा सुविधाएं
पाने के लिए की जाने वाली सत्तापक्ष की चाटुकारिता बड़ी घिनौनी लगती है। वर्तमान
पत्रकारिता उस दौर की पत्रकारिता के साथ थोड़ा हमकदम होकर देखे और उसके लहूलुहान
इतिहास से अपने वर्तमान की तुलना तो करे,
पता चल जाएगा कि पत्रकारिता का दायित्व कितना खरा और कसक भरा
होना चाहिए। तब ऐसे प्रचार-प्रसार की भूख नहीं थी और जरा लिप्सा भी नहीं थी,
सत्ता का वरदहस्त पाने की। आज वर्तमान मीडिया की नजर देश के
बदहाल आदमी पर नहीं है बल्कि राजनीतिक भ्रष्टाचार की दलदल में फंसे सियासत के
रहनुमा और पूंजीवादी साहबजादे उसके प्रेरणास्रोत बन गए हैं।
पत्रकारिता के
सामने आज पहले से कहीं ज्यादा कठिन हालात और चुनौतियां उपस्थित हैं। आजाद
आबो-हवा में जीने की खुमारी में जब लोकतंत्र को अपरिमित लालसाओं को पूरा करने
और मनचाही वस्तुओं को बटोरने का जरिया बना दिया गया हो,
उन्मादी नारेबाजी के साथ देश के तथाकथित रहनुमा,
काल्पनिक आंकड़ों से विकास की तस्वीर बनाकर एक-दूसरे की पीठ
थपथपा रहे हों तथा नैतिक मूल्यों में भयावह पतन के बाद भी जब रंग-बिरंगे मंचों
सांस्कृतिक उत्थान का लिप्त प्रहसन बड़े जोशो-खरोश से अभिनीत किया जा रहा हो,
तो पत्रकारिता का दायित्व है कि
वह समाज में वर्तमान के प्रति कर्त्तव्यबोध पैदा करे। रुतबे और फतवों की
सीनाजोरी में पिसते हुए गरीबों को उबारने तथा सिनेमाई भांडों एवं नृतकों की
जलसेबाजी में सुध-बुध खोए बैठे शहरी बर्जुआ वर्ग को जीवन की सच्चाई बताते रहना
पत्रकारिता का अहम लक्ष्य होना चाहिए।
जेल,
कुर्क और फांसी जैसी सख्त सजा से बेपरवाह रहते हुए जन-जन के
बीच आजादी की लहर फैलाने वाली स्वदेशी पत्रकारिता किन परिस्थितियों में आगे बढ़ी,
इसका विस्तृत वर्णन 'जेल-जब्ती-जुर्माना'
अध्याय में किया गया है। यहां हम 'वर्तमान',
'अभ्युदय', 'प्रताप', 'सैनिक',
'शंखनाद', 'स्वदेश'
और 'बुंदेलखंड केसरी'
जैसे प्रमुख पत्रों के प्रतिबंधन के साथ जेल और जब्ती जैसे
शस्त्रों द्वारा अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने की संहारक नीति से हमराज होते हैं।
इन पत्रों ने दमन नीति से जूझते हुए भी अपने राष्ट्रीय मिशन से समझौता न करते
देखकर जहां हम गर्व से सीना फुला सकते हैं, वहीं
संपादकों के साहस से हतप्रभ हो जाते हैं। सदाशयता के साथ जातिभेद और अनैतिकता
जैसी बुराइयों पर आघात करने वाली आध्यात्मिक पत्रिका 'कल्याण'
का विवरण देना सराहनीय है।
इसी पुस्तक के
'देश-दुनिया'
नामक अध्याय में समाज और व्यक्ति पर पत्रकारिता के प्रभावों का
लेखा-जोखा मिलता है। पत्र-पत्रिकाएं सामाजिक निर्माण में योगदान करने के साथ
स्वस्थ लोक-मानस की संवाहक बनती हैं तथा समाज के ताने-बाने को सुसंगत बनाती है।
समाज को देश-दुनिया से जोड़ने के संदर्भ पर विचार करते हुए हम देखें कि यदि
अबीसीनिया द्वारा इटली की पराजय, रूस में जारशाही का
अंत, जापान द्वारा रूस को हराने तथा इंग्लैंड में मजदूर
संगठन की राजनीतिक जीत जैसी युगांतरकारी खबरें जन-जन तक नहीं पहुंचती तो क्या
तीसरी दुनिया के लोग अंधकूप से निकलकर अपनी ताकत पर एतबार कर पाते। 'वर्तमान',
'अभ्युदय', 'हलधर', 'सुधा',
'सैनिक', 'विप्लव'
और 'नया हिन्दुस्तान'
जैसी पत्रिकाओं ने सामाजिक, सांस्कृतिक
और साहित्यिक प्रगति के लिए सराहनीय भूमिका निभाई। समाज सुधार के लिए प्रतिबध्द
'स्वदेश', 'बंगभूमि'
और 'क्रांति'
जैसे साप्ताहिक पत्रों ने समाज में स्त्री की भूमिका,
उसके अधिकारों एवं स्वावलंबन के लिए आंदोलन चलाए थे। इसी क्रम में 'पग-पग
प्रतिवाद' अध्याय से हमें पता चलता है कि आखिर प्रेस और
साहित्य की स्वतंत्रता और स्वायत्तता जरूरी क्यों होती है। पुस्तक में एक
विशिष्ट पहलू पर नजर जाती है कि राजनीतिक शासन के व्यामोह एवं कांग्रेस के
उदारवादी नेतृत्व के बौध्दिक अतिवाद के चलते आर्थिक क्षेत्र में क्रांति करके
सत्ता और समानता लाने का संकल्प अधूरा ही छोड़ दिया गया था और उस अधूरी अर्ध्द
क्रांति के दुष्परिणाम आज उभर रहे हैं। विचार पर हावी होती विवेकहीनता के इस
संकट-काल में 'शब्द-प्रतिबंध'
जैसी पुस्तक अंग्रेजी राज में छपने वाली पत्र-पत्रिकाओं के उस संघर्षमय इतिहास
को सामने लाती है, जिसने आम आदमी के हक में लड़ाई लड़ी
थी।
लेखक ने
देशभक्ति के आधारस्तंभ यानी राष्ट्र-भाषा के सवाल को भी ओझल नहीं होने दिया है।
भू-मण्डलीकरण से बदहवास होती जिंदगी के बीच जब हमारी अपनी मातृभाषा रोमन लिपि
में हकलाने पर मजबूर हो,
जब पढ़े-लिखे लोग आत्मीय संबोधनों में व्याप्त मिठास खत्म करके
पराई भाषा के बनावटी मुखौटे लगाकर इतराते फिर रहे हों,
तब इस पुस्तक के 'कहन-विस्तार'
नामक अध्याय में देखा जा सकता है कि संस्कार और विस्तार देने के साथ भाषा की
जड़ों को मजबूत बनाने का दायित्व भी उस दौर के संपादकों और पत्रकारों ने बखूबी
निभाया था। हिन्दी भाषा की मिठास और तहजीब को दरकिनार करते हुए अपनी जड़ों से
नाता तोड़कर भाषा विस्तार की जो वकालत की जा रही है,
निश्चित तौर पर वह हमारी राष्ट्रीय पहचान के संकट को और गहरा ही करेगी। जनवादी
पत्रकारिता के लक्ष्यों में भाषा और राष्ट्रीयता के सवाल को जोड़कर इस पुस्तक का
विषय- परिवेश विस्तृत हो गया है जो इस दिशा में शोध के नए आयाम पेश करती है।
प्रतिबंधित दौर में पत्रकारिता जैसी गंभीर विवेचना को सरस,
सुबोध और प्रवाही भाषा तथा ओजस्वी शैली में प्रस्तुत करना लेखक
की उपलब्धि कही जा सकती है। वर्तमान आपा-धापी भरे दौर में जब हमारा संस्कृति और
सद्भावना से नाता टूट रहा हो, तब 'शब्द-प्रतिबंध'
जैसी पुस्तक हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए ही नहीं,
बल्कि आमजन के लिए भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करती है।
पुस्तक - शब्द प्रतिबंध
लेखक - संतोष
भदौरिया
प्रकाशक -
मेधा बुक्स, एक्स-11, नवीन शाहदरा, नई दिल्ली-02
मूल्य -
200 रुपये
पृष्ठ - 182


