इलेक्ट्रानिक मीडिया का अनुपम दस्तावेज
डॉ. शाहिद अली
नये
दौर की पत्रकारिता में इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रवेश भारतीय समाचार पत्रों के
लिए जितना विस्मयकारी और अबूझ बना हुआ है,
उतना ही हैरान भारतीय जनमानस भी है। भारतीय इलेक्ट्रानिक
मीडिया को लेकर आखिर इतनी हैरानी की बात क्या है?
जनमाध्यम का सर्वाधिक सशक्त माध्यम आखिर इतने संशय के बादलों में क्यों घिरा है,
इसकी विश्वसनीयता और जिम्मेदारियों को लेकर इतने सवाल क्यों
खड़े हैं? टीवी स्क्रीन से चिपके रहने वाले दर्शक आखिर
इलेक्ट्र्रानिक मीडिया के इतिहास से अनजान क्यों हैं?
भारत जैसे गरीब देश में प्रसारण का यह ताना-बाना कैसे विस्तार ले रहा है?
ऐसे कई सवाल संभवत: लाखों लोगों के दिमागों में खलबली पैदा
करते हैं। डा. देवव्रत सिंह की हालिया प्रकाशित पुस्तक भारतीय इलेक्ट्रानिक
मीडिया इन सवालों से पर्दा उठाने का पहला गंभीर प्रयास है।
हरियाणा के
कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के रीडर डॉ.
देवव्रत सिंह पिछले कई सालों से इलेक्ट्रानिक मीडिया के विकास क्रम और उसकी
प्रासंगिकता को लेकर शोध में जुटे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया की बढ़ती धमक ने इस
ओर कई लोगों का ध्यान आकर्षित किया है और इस पर बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है।
आंग्ल भाषा में इलेक्ट्रानिक मीडिया की कई पुस्तकें पिछले एक दशक में देखी जा
सकती हैं। किंतु भारतीय भाषा में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर विस्तृत अध्ययन और
उसके बाद प्रामाणिक ग्रंथ प्रस्तुत करने का यह पहला कदम देवव्रत सिंह ने उठाया
है। पं. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की
शोध परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित इस पुस्तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया का
तथ्यपूर्ण अन्वेषण है। रेडियो,
टीवी, वेब पत्रकारिता की दुनिया के
इतिहास को खंगालना प्रिंट मीडिया से कहीं ज्यादा दुष्कर कार्य है। प्रिंट
मीडिया की घटनाएं अपने पात्रों को समाज के बीच सदैव जीवित रखती हैं किंतु
इलेक्ट्रनिक मीडिया की घटनाएं जिस तेजी से लोकप्रिय होती हैं,
उतनी ही तेजी से भुला दी जाती हैं। शायद इसका बड़ा कारण है कि
प्रिंट मीडिया का जो भरोसा और लिखित शब्दों की जो अस्मिता जनमानस पर अंकित है
वह अभी इलेक्ट्रानिक मीडिया में नहीं बन पाई है। ऐसे में इलेक्ट्रानिक मीडिया
की पड़ताल बेहद कठिन ही नहीं अपितु असंभव जैसी ही है। इन सबके बीच देवव्रत सिंह
का मानना है कि भारत में रेडियो, टेलीविजन और वेब
मीडिया का उद्भव एवं विकास राजनीतिक, आर्थिक,
सामाजिक एवं सांस्कृतिक उथल-पुथल से जुड़ा है। इलेक्ट्रानिक
मीडिया ने विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को न केवल बचाए रखा बल्कि अनेक
झंझावतों के बीच पहले से प्रखर और बुलंद होकर निरंतर अग्रसर होता रहा।
इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका को लेकर देश में कई तरह के मतभेद कायम हैं।
खासकर प्रिंट मीडिया के पैरोकार इसे फिजूल की कवायद मानते हैं। पत्रकारों का एक
वर्ग तो इलेक्ट्रानिक मीडिया की उछलकूद को पत्रकारिता का दर्जा ही देना नहीं
चाहता। कुछ इसे ग्रेट मैलाडी मानते हैं। पत्रकार अरविंद सिंह की टिप्पणी
चैनलों को लेकर काफी सख्त है। मसलन भारतीय टेलीविजन चैनल घटनाओं को सनसनीखेज
बनाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने के नाम पर जो कुछ रह रहे हैं उससे गणेश शंकर
विद्यार्थी की विचारधारा वाला पत्रकार जगत आश्चर्यचकित है। वाराणसी में
सनसनीखेज वीडियो क्लिप बनाने के लिए खुद चैनलों के पत्रकारों ने विकलांगों को
जहर खाने के लिए उकसाया।
दूरदर्शन ने
एक समय जब देर रात व्यस्क फिल्मों का प्रसारण शुरू किया था तो पूरे देश में इस
प्रसारण को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और संसद में सरकार को जवाब देना पड़ा
था लेकिन आज निजी चैनलों के भद्दे प्रसारण पर कोई हो- हल्ला किसी कोने से भी
नजर नहीं आता। सेक्स स्कैंडल को उजागर करने के नाम पर चल रहे स्टिंग आपरेशन,कास्टिंग
काउच को कुछ निजी चैनलों का प्रायोजित कार्यक्रम माना जाता है। पत्रकारिता की
आड़ में इलेक्ट्रानिक मीडिया का कथित व्यवहार बुध्दिजीवियों की चिंता का प्रमुख
कारण है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के गंभीर अध्येता देवव्रत सिंह की पुस्तक
इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास को समेटने और वर्तमान परिदृश्य में नये मीडिया
की उपस्थिति से अवगत कराने का बेहतर अध्ययन है।
पं. माखनलाल
चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति एवं
जाने माने पत्रकार श्री अच्युतानंद मिश्र ने पुस्तक को इतिहास संरक्षण का
विनम्र प्रयास माना है। श्री मिश्र के अनुसार इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े
तथ्यों,
घटनाओं, व्यक्तियों और वैचारिक
विमर्शों को इस पुस्तक में संतुलित एवं क्रमबध्द ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया के विश्व इतिहास की झलक के साथ भारतीय टेलीविजन
उद्योग की भरपूर जानकारी है। पुस्तक नौ अध्यायों में विभक्त है पहले और दूसरे
अध्याय में क्रमश: आकाशवाणी की विकास यात्रा के साथ निजी रेडियो चैनलों के
विकास को रेखांकित किया गया है जबकि तीसरे से लेकर आठवें अध्याय तक टेलीविजन के
वैश्विक विकासक्रम का भारत के विशेष संदर्भ में सिलसिलेवार वर्णन है। जिसमें
प्रमुख विषय विश्व में टेलीविजन का विकास, टेलीविजन
धारावाहिकों का इतिहास दूरदर्शन की विकास यात्रा निजी टेलीविजन चैनलों का विकास
भारतीय टेलीविजन उद्योग तथा भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता का इतिहास आदि सामग्री
समादृत है। इसके अंतिम अध्याय में वेब मीडिया के विकास पर चर्चा की गई है।
प्रारंभिक अध्याय में चर्चा करते हुए रेडियो प्रसारण की प्रमुख हस्तियों में
लियोनल फिल्डेन, प्रो. अहमद शाह बुखारी,
मेलविल डी मेलो, देवकीनंदन पांडेय,
अमीन सयानी, जसदेव सिंह और मधु मालती
सहित कई नामों का जिक्र रेडियो के स्वर्णिम इतिहास की गाथा कहता है वहीं
रेडियो प्रसारण की प्रमुख घटनाओं को रेखांकित करता है। टेलीविजन की सशक्त
उपस्थिति में निजी रेडियो चैनल की दस्तक की पतासाजी भी पुस्तक में है। गौरतलब
है कि इस समय देश में प्रसार भारती, टाइम्स समूह,
स्टार समूह, मिड डे,
रिलायंस समूह, एनडीटीवी,
इंडिया टुडे, पत्रिका समूह,जागरण
समूह और भास्कर समूह के एफएम चैनल काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।
टेलीविजन के
विकास को उल्लेखित करते हुए लेखक की राय है कि विकसित राष्ट्रों ने मीडिया को
हमेशा शीतयुध्द के एक सशक्त हथियार के रूप में उपयोग किया है। हालांकि एशियाई
और अफ्रीकी देश मीडिया को कूटनीतिक औजार के रूप में अधिक प्रभावी ढंग से प्रयोग
नहीं कर पाए। विकासशील देशों में बनने वाले ढेरों टेलीविजन कार्यक्रम या तो
अमेरिकी या ब्रिटिश कार्यक्रमों की सीधी नकल होते हैं अथवा उनसे आइडिया चुराया
गया होता है। दुनिया में जिस प्रकार तेजी से मीडिया कंपनियों के बड़े समूह आपस
में हाथ मिला रहे हैं,
उससे प्रतीत होता है कि आने वाले दशकों में टेलीविजन जगत की
दिशा दुनिया की कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही तय करेगी। देवव्रत सिंह ने
ब्रिटेन, अमेरिका, आस्टे्रलिया,
रूस, चीन,
जापान, ब्राजील तथा दक्षिण एशियाई देशों के
परिप्रेक्ष्य में टेलीविजन दुनिया की समूची तस्वीर पेश की है,
साथ ही हम लोग धारावाहिक की चर्चा करते हुए उदारीकरण और
बाजारवाद के प्रभावों पर नजर डाली है। दूरदर्शन की विकास यात्रा का आरंभिक काल
जितना खलबली पैदा करने वाला रहा उससे कहीं ज्यादा उसकी विकासयात्रा मध्दिम रही
है। सरकारी प्रयोगों ने दूरदर्शन जैसे प्रभावशाली माध्यम को इतना क्षीण कर दिया
कि उसमें अब सुधार की कोई गुजांइश भी बाकी नहीं रह गई है। रेडियो की वापसी तो
संभव हो रही है लेकिन दूरदर्शन के आरंभिक दौर को उसका स्वर्णिम काल तो कहा ही
जाएगा जब समाचार, सोप ओपेरा सहित अनेक मनोरंजनपूर्ण
कार्यक्रमों ने देशवासियों के दिलों में एक खास जगह बनाई। दूरदर्शन के विस्तार
को स्पष्ट करते हुए पुस्तक में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को
दूरदर्शन के तीव्र विकास का नायक माना है। दूरदर्शन के इतिहास की प्रमुख
तिथियों का उल्लेख करते हुए लेखक ने जोशी और वर्धन समिति की सिफारिशों को सामने
रखा है, वहीं स्वायतत्ता के सफर को रेखांकित किया है।
इसके अगले अध्याय में भारत में निजी टेलीविजन चैनलों के विकास पर चर्चा की गई
है जिसमें जी स्टार, एनडीटीवी,
आजतक, सन, सहारा,
इटीवी, इंडिया टीवी,
जनमत, सीएनएन,
टाईम्स नाऊ आदि चैनलों का सफरनामा है। निजी चैनलों की सफलता के उन्नयकों
सर्वश्री सुभाष गोयल, रूपर्ट मर्डोक,
डा. प्रणव राय, सुरेंद्र प्रताप सिंह,
जी कृष्णन, कलानिधि मारन,
सुब्रत राय, रामोजी राव,
रजत शर्मा, अधिकारी ब्रदर्स,
राजदीप सरदेसाई का जिक्र करके इलेक्ट्रानिक मीडिया की
हस्तियाेंं से लेखक ने सीधा साक्षात्कार कराया है।
टेलीविजन को
दूर -दूर तक पहुंचाने में केबल उद्योग की अति महत्वपूर्ण भूमिका है। अमेरिका
में इसका प्रयोग सबसे पहले हुआ। भारत में इसकी शुरूआत काफी बाद में हुई। लेखक
ने केबल उद्योग के फैलते जाल का बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन किया है और भारत में
केबल उद्योग के बढ़ते बाजार को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। पत्रकारिता
को चौथे खंभे का गौरव दिलाने वाले प्रिंट मीडिया के समर्पित पत्रकारों के लिए
सर्वाधिक शोक का विषय है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पत्रकारिता के अति गौरवशाली
इतिहास का बेड़ा गर्क कर दिया है। बहरहाल लेखक ने ऐसे किसी विवाद में न पड़ते हुए
टेलीविजन पत्रकारिता के प्रेरक प्रसंगों के दस्तावेज को सही तस्वीर के साथ रखा
है। लेखक की मानें तो दर्शकों को दूरदर्शन समाचारों का यह मोंटाज और सिग्ेचर
टयून आज भी याद है जो उन्हें अपने टेलीविजन सेटों के नजदीक खिंचे चले आने के
लिए मजबूर कर देता था। राष्ट्र की विविधता को दर्शाता दूरदर्शन समाचारों का
मोंटाज राष्ट्रीय एकता का संदेश देता था। समाचारों की विश्वसनीयता को लेकर
संदेह जरूर था लेकिन आम लोग दूरदर्शन समाचारों के प्रति काफी उत्साहित थे।
टेलीविजन पत्रकारिता का आगाज करने वाले सुप्रसिध्द पत्रकारों एम जे अकबर,
कमलेश्वर, विनोद दुआ,
प्रणव राय, सुरेंद्र प्रताप सिंह,
बरखा दत्त, तरूण तेजपाल,
रजत शर्मा के योगदान पर भी प्रकाश डाला गया है।
इसी के साथ
टेलीविजन पत्रकारिता के ऐतिहासिक घटनाक्रम को दर्शाने का सफल प्रयास लेखक ने
किया है। देवव्रत सिंह ने इलेक्ट्रानिक मीडिया की पत्रकारिता को संस्कार देने
वाली नामचीन हस्तियों का परिचय भी सिलेसिलेवार रखा है,
उनमें सुभाषचंद्र, कलानिधि मारन,
रामोजी राव, मनोहर श्याम जोशी,
कमलेश्वर,सुरेंद्र प्रताप सिंह,
विनोद दुआ, प्रणव राय,
राजदीप सरदेसाई, रजत शर्मा,
राहु देव, दिबांग,
बरखा दत्त, मनोज रघुवंशी,
उदय शंकर, अलका सक्सेना,
दीपक चौरसिया, अजीत अंजुम,
आशुतोष, राजेश बादल,
विजय विद्रोही, मुकेश कुमार के अलावा
टेलीविजन धारावाहिकों के चर्चित नाम एकता कपूर, शेखर
सुमन और अन्नु कपूर का उल्लेख समीचीन है। पुस्तक के अंतिम अध्याय में वेब
पत्रकारिता के विकास को केंद्रित किया गया है। भारत में कम्प्यूटर क्रांति के
प्रेरक पुरूष अर्जुन मल्होत्रा, शिव नाडार,
अजीम प्रेमजी, नारायण मूर्ति की चर्चा
के साथ साथ सिलीकान वैली का परिदृश्य भी पुस्तक में शामिल हैं। सूचना
प्रौद्योगिकी के प्रमुख घटकों तथा संभावनाओं की तलाश में लेखक ने उन सभी
बिंदुओं को इस पुस्तक में शामिल करने का प्रयास किया है जो मीडिया में रूचि ले
रहे लोगों के लिए अनिवार्य है। सारत: पुस्तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया के विकास
को बदलती राष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में समझने और रेखांकित करने की
कोशिश की गई है।
पुस्तक - भारतीय इलेक्ट्रानिक
मीडिया
लेखक - डॉ. देवव्रत सिंह
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19,
आसफ अली रोड, नई दिल्ली-02
मूल्य - 350 रुपये


