Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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भाषा

 

 

माननीकरण और साहित्यिक पत्रकारिता


डॉ. अवधेश नारायण सिंह

 

भाषा की संरचना, भाषा की प्रकृति, व्याकरण की समस्या, भाषा की समस्या, पारिभाषिक शब्दावली, भाषा का मानकीकरण या परिनिष्ठीकरण जैसे विषयों के प्रति साहित्यिक-पत्रकारिता की गहरी चिन्ता रही है। इस चिन्ता के मूल में भाषा पर विशिष्ट-विचार की एक पृष्ठभूमि तैयार करना, उसे एक अनुशासन का रूप देना रहा है। क्योंकि भाषा को विषय की हैसियत दिए बिना साहित्य और पत्रकारिता दोनों का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए भाषा-चिन्ता साहित्यिक पत्रकारिता का प्रकृत विषय बना हुआ है और यह इसकी प्रकृति और प्रकार्य दोनों से अनिवार्यत: सम्बध्द है। खड़ी बोली और हिन्दी की समकालीन प्रवृत्ति के दो सौ वर्षों को साक्षी मानकर कहें तो साहित्यिक पत्रकारिता ने भाषा-चिन्तन की एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार की है और भाषा को सतत् परिवर्तनशील सामाजिक सत्ता के रूप में परिभाषित किया है।

भाषा की गतिकी और उसके विकास के नियमों के अध्ययन-क्रम में साहित्यिक पत्रकारिता की सर्जनात्मक भूमिका का महत्व अन्य माध्यमों की अपेक्षा इसलिए अधिक है कि इसने सदा ही इसे अपने साध्य से जोड़ा है और इसके लिए बहुत अधिक समय और स्थान दिया है। कवि वचन सुधा, सदादर्श, हिन्दी प्रदीप, आनन्द कादम्बिनी, ब्राम्हण हिन्द दीप्ति प्रकाश, हिन्दी बंगवासी आदि आरंभिक साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका पर विचार करें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि इनके उदय के मूल में भाषा चिन्ता प्रमुख है। ये पत्रिकाएं भाषा चिन्तन की एक ऐसी धारा की विद्यमानता का आभास कराती हैं जिसे सामने रखकर भाषा की विशिष्ट संरचनाओं और स्वयं उसकी प्राविधिक संरचना को समझा जा सकता है। बेशक इस पत्रकारिता ने हिन्दी में न केवल मानक भाषा के रूप में विकसित होने की संभावना के सूत्र खोजे, अपितु इस प्रक्रिया का स्वरूप भी तय किया जिसमें भाषागत मेल-जोल, जातीयता, सजीवता, अनुरंजकता आदि तत्वों की केन्द्रीय व्यवस्था विद्यमान थी। इस प्रकार राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द और राजा लक्ष्मण सिंह के प्रस्तावित भाषा प्रारूपों को सामने रखकर इस पत्रकारिता ने आदर्श भाषा की खोज का प्रथम चरण पूरा किया।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार जब भारतेन्दु अपनी मंजी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाये तब हिन्दी बोलने वाली जनता को गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा के स्वरूप का प्रश्न न रह गया। प्रस्ताव काल समाप्त हुआ और भाषा का स्वरूप स्थिर हुआ। निज भाषा उन्नति अहै, का मंत्र देकर भारतेन्दु ने हिन्दी को जातीयता के अक्ष पर ला खड़ा किया और उसकी प्रकृति की पहचान कराई। भाषा का जातीय रूप उभरकर सामने आया। भारतेन्दु ने हिन्दी को भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में जांचा और उसकी व्यवहारिक शक्ति का आकलन किया। यह सब एकाएक नहीं हुआ। इसके पीछे 19वीं सदी के आरम्भ से लेकर 1873 तक का संघर्ष था जिसमें साहित्यिक-पत्रकारिता की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका थी कि कतिपय विद्वान इस युग के समूचे साहित्य को पत्र-साहित्य कहने में संकोच नहीं करते। कवि वचन सुधा (1868) का उद्देश्य ही था-तजि ग्राम कविता सुकवि जन को अमृत बानी सब कहैं।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि सन 1873 में हरिश्चन्द्र मैगजीन का प्रकाशन हुआ जिसके प्रथम अंक में हिन्दी भाषा पर एक लेख अंग्रेजी में भी छापा। पत्र का उद्देश्य विचारों को सर्वजन-हिताय प्रकृत और सरल ढंग से प्रकट करना ही है। ऐसा भी एक निरपेक्ष सामंजस्य है जो मनमानी भरती के अरबी-फारसी प्रयोगों और शब्दों से उतना ही विचार वैमनस्य रखता है, जितना संस्कृत की तत्सम शब्दावली से। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारतेन्दु शब्दावली की समस्या पर कितने गम्भीर थे। उनकी सम्पादन-शैली से पता चलता है कि भाषा के पक्ष में वे अंग्रेजी में भी लेखों का प्रकाशन करने में संकोच नहीं करते थे। अंग्रेजी पत्रों से मौलिक लेख निकालना या भाषा के पक्षधर अंशों का अनुवाद उध्दृत करना उनके सम्पादन कौशल की विशेषता थी।

भारतेन्दु ने हिन्दी भाषा का व्यापक सर्वेक्षण किया और अपने सर्वेक्षण में प्राप्त भाषारूपों को ग्यारह निम्नांकित प्रकारों में रखा-1 संस्कृत शब्द-बाहुल्य रूप, 2. अल्प संस्कृत शब्दयुक्त, 3. शुध्द हिन्दी, 4. जिसमें भाषा के शब्द मिलने का नाम नहीं, 5 जिसमें फारसी शब्द विशेष हैं, 6. जिसमें अंग्रेजी शब्द हिन्दी हो के मिल गए हैं, 7. जिसमें पुरबियों की बोली व काशी की देशभाषा है, 8. जो काशी के अर्ध्दशिक्षित बोलते हैं, 9. दक्षिणी लोगों की हिन्दी, 10. बंगालियों की हिन्दी और 11. अंग्रेजों की हिन्दी। हिन्दी भाषा को उन्होंने अपनी पुस्तक हिन्दी भाषा में (अ) घर में बोलने की भाषा (ब) कविता की भाषा और (स) लिखने की भाषा के क्रम में विभाजित किया। उपरोक्त भाषा-रूपों को उन्होंने लिखने की भाषा या गद्य भाषा के प्रारूपों के रूप में संकलित किया था और अल्प संस्कृत शब्द युक्त रूप तथा शुध्द हिन्दी रूप को स्वीकृति दी। भारतेन्दु ने भाषा को जिस रूप में स्थिर किया, उसका नमूना इस प्रकार है-कोई कहता था आपसे सुन्दर संसार में नहीं, कोई कसमें खाता था आप-सा पंडित मैंने नहीं देखा, कोई पैगाम देता था चमेली जान आप पर मरती हैं, आपको देखे बिना तडप रही है, कोई बोला हाय। आपका फलाना कवित्त पढ़कर रातभर रोते रहे,... चौथा बोला आपकी अंगूठी का पन्ना क्या है कांच का टुकड़ा है या बोई ताजी तोड़ी हुई पत्ती है।

खड़ी बोली के विद्वान अध्येता डॉ. शितिकंठ मिश्र के शब्दों में ''हिन्दी गद्य शैली का नूतन निर्माण एवं सम्यक प्रचार हरिश्चन्द्र मैगजीन या हरिश्चन्द चन्द्रिका द्वारा ही हुआ।''(1) डॉ. मिश्र अपने निष्कर्ष की पुष्टि करते हुए आगे लिखते हैं, उस विषम स्थिति में भी हरिश्चन्द्र, हिन्दी प्रदीप, हिन्दोस्तान, भारत मित्र आदि पत्रों ने दीर्घकाल तक अनेक कष्ट सहकर हिन्दी का पोषण किया। इन पत्रों ने हिन्दी गद्य के विविध रूपों और व्यक्तिगत विशेषताओं से युक्त अनेक शैलियों के विकास में आशातीत योग दिया। ये सभी शैलियां भारतेन्दु द्वारा निर्धारित गद्यशैली पर आधारित थी। (2)

भाषा का मानकीकरण एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में लिपि का मानकीकरण भी समाहित है। भारतेन्दु के समय लिपि के चुनाव का विवाद भी तीव्रतर था। हिन्दी को फारसी लिपि में लिखने की मांग हो रही थी। भारतेन्दु मण्डल के एक महत्वपूर्ण लेखक श्री बालकृष्ण भट्ट के उध्दरण से इस विवाद की गम्भीरता और साहित्यिक पत्रकारिता की भूमिका का पता चलता है, ''यदि देश का अभिमान हमको है तो ऐसा उपाय शीघ्र ही करना चाहिए जिससे हमारी एक जातीय भाषा हो जाए। यहां पर इतना हमें अवश्य कहना चाहिए था कि यद्यपि जातीय भाषा हम लोगों की कोई नहीं, परन्तु जातीय अक्षर है... और जो कोई हमारी जातीय भाषा कभी होवेगी, इसके अक्षर भी वे ही अक्षर होने चाहिए जिनमें कि इस समय जातीयता है। वे अक्षर देवनागरी हैं और भारतवर्ष की भाषाओं में एक भाषा भी ऐसी है जो इन उक्त अक्षरों में लिखी जाती है, और वह भाषा ईश्वर की कृपा से हिन्दी है।''(3) इस प्रकार स्प्ष्ट हो जाता है कि लिपि को जातीयता से जोड़कर देवनागरी लिपि के चुनाव के लिए साहित्यिक पत्रों ने दबाव बताया।

भाषा और लिपि दोनों की समस्याओं को साहित्यिक पत्रकारिता ने प्रत्यक्ष किया। एक लिपि विस्तार परिषद द्वारा वर्ष 1907 में प्रकाशित पत्र देवनागर ने देवनागरी के प्रचार का बीड़ा उठाया था। पत्र के प्रथम अंक की घोषणा के अनुसार, ''इस पत्र का मुख्य उद्देश्य है भारत में एक लिपि का प्रचार बढ़ाना और वह लिपि देवनागराक्षर है।''(4) इस पत्र के सिध्दान्तकारों ने यह तर्क दिया कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है और वह देवनागरी में लिखी जाती है इसलिए यह लिपि सर्वमान्य होगी। भारतेन्दु ने देवनागरी को तो लिपि के रूप में स्वीकार किया था किन्तु हिन्दी को एक स्वतंत्र भाषा माना था। उनका यह दृष्टिकोण मौलिक था। हिन्दी शब्दानुशासन की भूमिका में आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ने लिखा है, ''हिन्दी की उत्पत्ति उस संस्कृत भाषा से नहीं है जो कि वेदों में, उपनिषदों में तथा वाल्मीकि या कालिदास के काव्यग्रंथों में हमें उपलब्ध है।''(5) हिन्दी और संस्कृत के संबंधों को परिभाषित करते हुए वे आगे लिखते हैं कि ''संस्कृत और हिन्दी दोनों का पृथक और स्वतंत्र पध्दति पर विकास हुआ है।'' (6)

भारतेन्दु ने हिन्दी की यह प्रकृति पहले ही पहचान ली थी। डॉ. शितिकंठ मिश्र के सर्वेक्षण से तत्कालीन साहित्यिक पत्रकारिता की प्रवृत्तियों और भारतेन्दु के दृष्टिकोण का पता चलता है। ''कलकत्ता के पत्रों में कलकतियापन और बंगला उच्चारण है तो विहार बन्धु और उर्दूपन, सदादर्श और पीयूष प्रवाह में संस्कृत शब्द अधिक हैं तो प्रताप नारायण मिश्र के ब्राह्मण में कनौजिया प्रयोगों की अधिकता है। भारतेन्दु ने ही सर्वप्रथम एक सामान्य शिष्ट भाषा का नमूना अपने पत्रों के द्वारा लोगों के सामने रखा।'' (7) अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतेन्दु ने किस प्रकार हिन्दी को क्षेत्रीय प्रभावों से मुक्त किया और संस्कृत के आंतक से बचाकर उसे परिनिष्ठित रूप में खड़ा किया। भारतेन्दु मण्डल के बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, श्रीनिवास दास, डॉ. जगमोहन सिंह, चौधरी प्रेमधन, दुर्गाप्रसाद मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बालमुकुन्द गुप्त, काशीनाथ खत्री, कार्तिक प्रसाद खत्री, रमाशंकर व्यास, राधाकृष्ण दास आदि ने इसी परिनिष्ठित गद्य का विकास किया और नायक, कविता, प्रहसन, उपन्यास, निबंध, अनुवार आदि की रचना कर आधुनिक हिन्दी साहित्य का ढांचा खड़ा किया और प्राय: सभी ने पत्रों का प्रकाशन-सम्पादन भी किया।

भारतेन्दु के पश्चात आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और सरस्वती की भूमिका को भाषा के परिनिष्ठीकरण के क्रम में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। भारतेन्दु मण्डल ने हिन्दी भाषी को जो स्वरूप दिया वह प्रविधि और सर्जना के स्तरों पर लोकतात्विक था, जिसमें जनपदीय भाषा-तत्वों को प्रमुखता देकर हिन्दी का ठाठ तैयार किया गया था। आचार्य द्विवेदी ने प्रचलित भाषा में एकरूपता का अभाव पाया। इसे उन्होंने अपने सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में लिया। उनका मानना था कि गद्य को खड़ी बोली में और कविता को ब्रजभाषा में लिखने से भाषा में एकरूपता नहीं आ सकती। मानकीकरण की सतत् प्रक्रिया में भाषागत एकरूपता को भाषा का आदर्श माना जाता है। आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा ने लिखा है कि सामाजिक दृष्टि से भाषा की अपेक्षित एकरूपता ही भाषा के परिनिष्ठित या मानक होने का अभिलक्षण है।

भाषा -द्वैत भाषा के परिनिष्ठिकरण से जुड़ा हुआ प्रश्न है जिसे पूंजीवाही भाषाशास्त्र ने अपने चिन्तन का एक प्रधान विषय माना है। फर्गुसन (1959) मानते हैं कि भाषा-द्वैत में हर व्यक्ति के सामने दो भाषिक-कूट होते हैं जिन्हें वे उच्च कोड और निम्न कोड का नाम देते हैं। ये नाम निरर्थक नहीं हैं। उच्चकोड सुसंस्कारित कोड है जिसे शिक्षित और उच्चवर्ग प्रयोग में लाता है। साहित्य भाषा का उच्चकोड है। यह उच्च कोड औपचारिक शिक्षा द्वारा अर्जित कोड होता है। मातृभाषा भाषा का निम्न कोड है। मानकीकरण प्राय: भाषा का उच्च कोड होता है। शिक्षण में इसी कोड का प्रयोग किया जाता है। यह भाषा -द्वैत कई शताब्दियों तक बना रहता है। व्याकरण की दृष्टि से शब्द-चयन तथा उच्चारण के सन्दर्भ में दोनों कोडों में अधिक अन्तर मिलता है। उच्च कोड का व्याकरण जटिल और निम्नकोड का सरल होता है। यह भाषा-द्वैत उच्चारण में अधिक स्पष्ट हो जाता है किन्तु दोनों कोडों की शब्दावली का बहुत बड़ा अंश समान होता है। लैगुएज फैक्टर इन नेशनल डेवलपमेंट (1962) में फर्गुसन ने मानकीकरण पर पुन: विचार किया है और 0,1,2 के आधार पर इसके विकास को नापने का प्रयत्न किया है। इस प्रयत्न की दिशा भाषा के प्रसार और प्रयोग के जिस आधार पर निर्देशित है उसका सीधा अर्थ है कि मानक भाषा का अन्तिम लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान की अभिव्यक्ति का माध्यम बनना है।

हिन्दी के परिनिष्ठिकरण के उद्यम में आचार्य द्विवेदी उसके व्याकरण चिन्ता करते है। उन्हें लगता है कि व्याकरण ही अनेकरूपता और अस्थिरता की समस्या का हल है। सरस्वती (नव., 1905) में आचार्य द्विवेदी लिखते हैं, आहार और विहार के परिणाम को परिमित रखने और आरोग्य शास्त्र के नियमों का उल्लंघन न करने से आदमी अधिक समय तक जीता रहता है, अल्पायु नहीं होता। इसी तरह व्याकरण के नियमों से भाषा के कलेवर को दृढ़ करने से उसका भी आयुर्बल बढ़ जाता है। इसी लेख में आचार्य द्विवेदी ने भारतेन्दु आदि लेखकों की त्रुटियां दिखाई और अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए हिन्दी की दशा को अनस्थिर बताया। बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने अनस्थिरता शब्द की शुध्दता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए इसका प्रतिवाद किया जिसका प्रकाशन भारत मित्र में हुआ। द्विवेदी जी के सामने भाषा के स्वरूप को लेकर प्रमुख समस्याएं थी - (1) भाषा का संस्कृतनिष्ठ रूप, (2) हिन्दी-उर्दू संबंध, (3) खड़ी बोली बनाम ब्रजभाषा। द्विवेदी जी ने एक बड़ा काम यह किया कि ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया। वे भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया में कैसे रमे थे, इसका उदाहरण देखिए, ''ये अरबी फारसी और उर्दू के दास सत्य को सत, पति को पती, अनुभूति को अनुभूति, लक्ष्मी को लक्शमी, स्त्री को इस्त्री, पांच सौ को पान्सौ, मेषराशि को मेस (खूंटा) राशि और सदिच्छा को सदेच्छा लिखकर अपनी जुबादानी साबित करते हैं।'' (8)

इस प्रकार द्विवेदी जी ने भाषा-सुधार का ठोस काम किया। वे बड़े से बड़े लेखक की भाषा सुधार देते और जरूरत पड़ने पर आलोचना भी करते। आचार्य द्विवेदी ने ध्वनि, संज्ञा, सर्वनाम, विशेष्य-विशेषण, क्रिया, अव्यय, लिंग, वचन, कारक, संधि, समास, उपसर्ग, आकांक्षा, योग्यता, वाच्य, सन्निधि, प्रत्यक्ष-परोक्ष कथन, आदि की दृष्टि से सरस्वती के लिए प्रकाशनार्थ प्राप्त सामग्री का संशोधन किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी कविता क्या है (1909) शीर्षक निबंध की भाषा को भी उन्होंने जगह-जगह सुधारा, इस क्रम में उन्होंने अस्थि पिंजर को बदलकर अस्थिपंजर, समझी जानी लगी है के बदले में समझी जाने लगी है, की सामर्थ्य के स्थान पर का सामर्थ्य लालच या धमकी ऐसी है जिनसे के लिए लालच या धमकी ऐसी है, जिससे कविता के बदले कविता द्वारा, चैतन्यता की जगह चेतना, दोनों में मानव हृदय पर किसका, के लिए मानव हृदय दोनों में से किसका, कार्योत्पत्ति की जगह कार्य प्रवृत्ति आदि ऐसे ही शब्द हैं के स्थान पर आदि शब्द ऐसे ही हैं, दुष्टों का मारना देखकर के स्थान पर दुष्टों को मारा जाना देखकर सृष्टि के बीच को हटाकर सृष्टि में द्रव्यगत सौन्दर्य के बदले पार्थिक सौन्दर्य किया। द्विवेदी जी ने भाषा में आए मुहावरों का संशोधन किया, कठिन संस्कृत शब्दों की जगह सरल शब्द ढूंढे और अरबी-फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों के स्थानापन्न शब्द खोज निकाले। भाषा के मानकीकरण के लिए द्विवेदी जी के ये उद्यम अविस्मरणीय है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और आचार्य महावीर द्विवेदी दोनों ने भाषा को प्राविधिक-संरचना से आगे अर्थ के स्तर पर जाकर देखा, किन्तु दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर था। आचार्य द्विवेदी पद्य-भाषा को गद्य भाषा की सीध में ले आए। उन्होंने आह्वान किया कि ''क्रम-क्रम से वे (कविगण) गद्य की भाषा में भी कविता करना प्रारंभ करें। द्विवेदी जी बोल-चाल की भाषा और गद्यभाषा में अन्तर नहीं मानते थे। आचार्य शुक्ल के शब्दों में इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी भाषा अधिक गद्यवत हो गई... उनकी अधिकतर कविता इतिवृत्तात्मक (रूड्डह्लह्लद्गह्म शद्ध स्नड्डष्ह्ल) हुई...।''(9) सरस्वती मण्डल के कवियों में यही प्रवृत्ति संक्रमित हुई। यह संदर्भ यहां इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे द्विवेदी जी और उनकी मानकीकरण की दृष्टि का पता चलता है और यह भी कि वे भाषा को तराशने में कहां तक सफल रहे और कहां चूके। भाषा की विशिष्ट संरचनाओं को समझने में उन्होंने क्या भूल की। सरस्वती की समर्थ भूमिका भाषा के मानकीकरण की दिशा में उल्लेखनीय है, किन्तु कोरी बौध्दिकता के दबाव में इसका महत्व भाषा की प्राविधिक संरचना या व्याकरणिक सुधार तक सीमित हो जाता है। इस युग की भाषा सरदार पूर्ण सिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, बालमुकुन्द गुप्ता, गुलाब राय, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि की विकसित भाषा से तो भिन्न है ही, भारतेन्दु युग की बोलचाल और व्यंग्य-मिश्रित भाषा से भी कट गई है। साहित्यिक पत्रकारिता आरोपित हो जाती है जब वह भाषा को उसकी विशिष्ट संरचनाओं के साथ देखना भूल जाती है या भाषा के यांत्रिक व्यापार तक सीमित हो जाती है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भाषा संबंधी मुद्दों पर गम्भीरता से विचार-विमर्श कर मानक रूप के निर्धारण का सुझाव देने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा ने बाबू श्याम सुन्दर दास, श्री किशोरी लाल गोस्वामी, श्री राधाकृष्ण दास, इन्द्र नारायण सिंह, इडविन ग्रीव्स, सुधाकर द्विवेदी, कार्तिक प्रसाद, हनुवन्त सिंह, लक्ष्मीशंकर मिश्र, जगन्नाथ दास की सदस्यता वाली उपसमिति गठित की थी जिसने उस समय उठाए गए सभी मुद्दों पर विचार कर 24 नवम्बर 1899 को अपनी रपट प्रस्तुत की। यह रपट 8 जनवरी 1900 ई. को साधारण सभा के छठें प्रस्ताव पर अनुमोदित होकर प्रकाशित हुई।

इस प्रस्ताव से स्पष्ट था कि काव्यभाषा की संरचना गद्यभाषा से पृथक मानकर कवियों को भाषा प्रयोग की स्वतंत्रता देने पर बल दिया गया था। पांचवे प्रस्ताव पर विचार करते हुए स्पष्ट लिखा गया है कि कवि लोग निरंकुश है अतएव उनको नियमबध्द करना सर्वथा अनुचित है। इस बात का निर्णय उनके रस-गत-भाव और योजना पर निर्भर है। ध्यातव्य है कि आचार्य द्विवेदी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इस प्रस्ताव से यह भी पता चलता है कि हिन्दी अपने मानकीकरण के लिए किन सवालों से जूझ रही थी। इस प्रस्ताव का पहला प्रश्न है कि हिन्दी किस प्रणाली की लिखी जानी चाहिए अर्थात संस्कृत मिश्रित या ठेठ हिन्दी या फारसी मिश्रित और यदि भिन्न भिन्न प्रकार की हिन्दी होनी उचित है तो किन-किन विषयों के लिए कैसी भाषा उपयुक्त होगी? दूसरा प्रश्न है कि विभक्ति अलग लिखनी चाहिए या मिलाकर तथा संज्ञा और सर्वनाम में एक ही नियम होना चाहिए या अलग-अलग और समस्यमान शब्दों को मिलाकर लिखना चाहिए या अलग-अलग? इस प्रस्ताव में प्रस्तावकों की चिन्ता लेखन में एकरूपता स्थापित करने की ओर अधिक है।

आचार्य द्विवेदी के विचारों में जो अन्तर्विरोध है उन्हें बालमुकुन्द गुप्त जैसे लेखकों ने जगह-जगह उभारा है। श्री गुप्त के शब्दों में ''बातें आपने एक साथ इतनी कह डाली हैं कि किसी का किसी से मेल नहीं। जैसे कैलाश में बाघ और हरन एक ही साथ विचरते है, किसी को किसी से कुछ कष्ट नहीं उसी प्रकार द्विवेदी जी की बातें भी अलग-अलग अपना काम करतीं हैं। एक बात से दूसरी को सरोकार नहीं।''(10) गुप्त जी ने ऐसा तब लिखा जब आचार्य द्विवेदी ने भाषा के लिए एक ओर तो व्याकरण को जरूरी बताया तो दूसरी ओर यह लिख दिया कि ''व्याकरण भाषा की वृध्दि का अवरोधक है। वह भाषा की सजीवता का नाश करने वाला है।''(11) ''भारत मित्र में प्रकाशित भाषा की अनस्थिरता शीर्षक लेखमाला के प्रत्युत्तर में पं. गोविन्द नारायण मिश्र ने हिन्दी बंगवासी में आत्माराम की टें टें शीर्षक लेखमाला लिखकर श्री गुप्त से पूछा, हिन्दी में अनरीति, अनरस, अनहोनी, अनमिल, अनमोल, अनपढ़, अनहित, अनगणित, अनसुनी, अनहुई आदि अनेक शब्द विशुध्द ही माने जाते हैं। ऐसी व्यवस्था में द्विवेदी जी ने अनस्थिरता लिख ही दी तो अनर्थ क्या किया?''(12) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पत्रों की भूमिका पर विचार करते हुए लिखा है, ''व्याकरण की ओर इस प्रकार ध्यान जाने पर कुछ दिनों व्याकरण संबंधिनी बातों की चर्चा भी पत्रों में अच्छी चली। विभक्तियां शब्दों में मिलाकर लिखी जानी चाहिए या अलग, इसी प्रश्न को लेकर कुछ काल तक खण्डन-मण्डन के खेल जोर शोर से निकले।''(13) आगे शुक्ल जी इस काल के लेखकों पर टिप्पणी करते हुए लिखते है, ''भारतेन्दु के सहयोगी लेखक स्थायी विषयों के साथ-साथ समाज की जीवनचर्या, ऋतुचर्या, पर्व, त्यौहार आदि पर भी साहित्यिक निबंध लिखते आ रहे थे। उनके लिखे प्रबंधों में जनता के जीवन का रंग पूरा-पूरा रहता था। यह सामाजिक सजीवता भी द्वितीय उत्थान के लेखकों में वैसी न रही। मासिक पत्रिकाएं इस द्वितीय उत्थान के भीतर बहुत-सी निकली पर उनमें अधिकतर लेख बातों के संग्रह के रूप में ही करते थे, लेखकों के अन्त: प्रयास से निकली विचारधारा के रूप में नहीं।''(14) इस प्रकार शुक्ल जी ने आ. द्विवेदी की भूमिका को भाषा की शुध्दता तक सीमित कर दिया। इस काल में सरस्वती के अतिरिक्त समालोचक इन्दु, मर्यादा, प्रभा, मतवाला, प्रतिभा, श्री शारदा आदि पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्यिक पत्रकारिता के दायत्वि का निर्वहन किया।

अब साहित्य के क्षेत्र में मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, पंत आए तो भाषा व्याकरण के क्षेत्र में कोशकार रामचन्द्र वर्मा तथा वैद्याकरण कामता प्रसाद गुरू का उदय हुआ। यही समय इतिहासकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का भी है। यहां आकर हिन्दी को अपने साहित्यिक स्वरूप का परिचय मिला और भाषा के मानकीकरण का द्वितीय चरण पूरा हुआ। हिन्दी एक समृध्द साहित्यिक भाषा हो गई। उसकी प्राविधिक-संरचना का निश्चयन हो गया। इस संरचना का पूरा विस्तार कामता प्रसाद गुरू  के हिन्दी व्याकरण में देखा जा सकता है। यह ग्रंथ सन 1920 ई. में प्रकाशित हो गया था जिसे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं. रामावतार शर्मा, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, लज्जा शंकर झा, जगन्नाथ दास रत्नाकर, श्यामसुन्दर दास एवं रामचन्द्र शुक्ल की समिति ने संशोधित किया था। शब्दावली के लिए हिन्दी शब्द सागर का प्रकाशन इस कड़ी का उल्लेखनीय प्रयास है।

यहां यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि मानकीकरण का लक्ष्य ले &