नई चुनौतियां और नई प्रणाली
डॉ.
सुशील त्रिवेदी
पिछले कुछ
दशकों में विश्व में बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव आये हैं। इसके अतिरिक्त,
सूचना तकनीक में क्रांतिकारी उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं।
सूचना तकनीक ने पूरे विश्व को एक सामूहिक व्यवस्था बनाने में अभूतपूर्व भूमिका
निबाही है और एक धारणा प्रचलित हो गयी है कि अब पृथ्वी एक ग्लोबल विलेज बन गई
है।
बहरहाल,
मैंने सबसे पहले बात की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की।
दुनिया के बड़े देशों के बीच राजनीतिक तनाव, जो युध्द की
स्थितियां निर्मित कर देते थे, बेहद कम हो गए हैं,
और इस वजह से दुनिया के देशों के बीच आर्थिक संपर्क बहुत बढ़ गए
हैं। जहां पहले आर्थिक संबंध केवल राजनीतिक घेरेबंदी के अंदर होते थे,
वहां अब आयात-निर्यात और उत्पादन की प्रक्रिया में सहभागिता
बहुत बढ़ गई है जिससे औद्योगिक, व्यावसायिक और सेवाओं के
मामलों में संपर्क क्षेत्र बढ़ गए हैं। ऐसी स्थिति में लौह आवरण या फिर बर्लिन
की दीवार जैसे शब्द अविधा तथा व्यंजना दोनों रूप में अप्रासंगिक हो गए हैं।
यद्यपि दुनिया अब भी अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई है,
तथापि इन अलग-अलग हिस्सों के बीच संचार बहुत सुगम और वृहदाकार हो गया है। इस
वजह से आपसी समझ का स्तर ऊंचा हुआ है और अपरिचय के विध्यांचल घट गए हैं। लेकिन
इसका यह अर्थ नहीं है कि पूरी दुनिया में संचार एक समान हो गया है।
हम अपनी
सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक विशेषताओं से कभी भी अपने से पूर्णरूप से विलग नहीं
होते हैं,
और इस वजह से आत्म-संचार, परस्पर संचार
और जन संचार की अलग-अलग प्रणालियां प्रासंगिक बनी रहती हैं। भारत के संदर्भ में
गौर करें तो हम पाते हैं कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली पिछले साठ वर्षों में
परिपक्व हो गई है। शासन के सूत्र अब किसी एक दल के पास नहीं रहते हैं। बहुदलीय
शासन-प्रणाली तथा एक के बाद दूसरे दल द्वारा शासन करने जैसे कारक सामने आये हैं,
जिनसे अर्थ-व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ रहा है। भारतीय
अर्थव्यवस्था में इधर के वर्षों में भारी बदलाव आया है। देश के भीतर
औद्योगिकीकरण बहुत तेजी से बढ़ा है। पूरे विश्व में भारत के कंप्यूटर विशेषज्ञों
ने अपनी धाक जमाई है। भारत के कुछ उद्योगपति आज विश्व के शीर्षस्थ उद्योगपतियों
में शामिल हैं। औद्योगिकीकरण बढ़ने के साथ ही व्यवसाय तथा सेवा के क्षेत्र भी
काफी विकसित हुए हैं। अर्थव्यवस्था में तेजी आने से भारत में मध्यम वर्ग की
संख्या बहुत बढ़ गयी है। इस वृहदाकार होते मध्यम वर्ग को,
उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाला
माना जाता है। जो मध्यम वर्ग केवल शहरी इलाकों तक सीमित था अब वह कस्बों में भी
फैल चुका है। गांव में अब सादा जीवन उच्च विचार के मुहावरे को हम आदर्श रूप में
नहीं पाते हैं और वहां भी उपभोक्ता संस्कृति के प्रसार के चिन्ह उभर आये हैं।
गांवों में अब इलेक्ट्रानिक्स सामग्रियों का उपयोग बहुत बढ़ गया है। इस
पृष्ठभूमि में जो ग्रामीण क्षेत्र पहले कारपोरेट जगत,
शीर्षस्थ व्यावसायिक तथा सेवा संस्थाओं की दृष्टि से ओझल रहते थे,
वे ही ग्रामीण क्षेत्र इन संस्थाओं की गतिविधियों के एक
महत्वपूर्ण केंद्र बिन्दु बन रहे हैं।
बात यदि
उद्योग और व्यवसाय तक सीमित होती तो और कुछ कहने की जरूरत नहीं होती। हम पाते
हैं कि बैंकिंग तथा नान बैंकिंग संस्थान भी गांव की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था मूलत: कृषि आधारित है। यहां अधिकांश कृषि भी अत्यंत छोटे
क्षेत्रफल वाली है। खेतों में खेतिहर मजदूर,
छोटे और सीमांत किसान काम करते हैं जिनकी आमदनी अत्यंत सीमित
है। इस वजह से गांव में संपत्ति का स्वरूप मूलत: लघुता-मूलक है। इस तथ्य को
ध्यान में रखते हुए बैकिंग व नान बैकिंग संस्थाओं ने अपने व्यावसायिक नियमों को
सरल और लचीला भी बना दिया है जिससे ग्रामवासी नई अर्थव्यवस्था का लाभ ले रहे
हैं। इस तरह हमारे सामने तीन अलग-अलग क्षेत्र उभर कर सामने आ रहे हैं -
महानगरों, नगरों और गांवों के और इन तीनों में ही
उपभोक्तावाद ने अपने पैर जमा लिए हैं। यदि महानगरों में सर्वत्र उपभोक्ता
संस्कृति छायी हुई है, वहां नगरों में इस संस्कृति का
प्रसार तेजी से हो रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी उसकी छवि दिखाई दे रही
है।
मैंने ऊपर जो
पृष्ठभूमि बताई वह इसलिए कि यह स्पष्ट हो जाए कि कारपोरेट जगत की क्रियाशीलता
अब केवल महानगरों,
केंद्रीय शासन और शेयर होल्डरों और शहरी उपभोक्ताओं तक सीमित
नहीं रह गई है। अब कारपोरेट जगत को दिल्ली जैसे महानगरों से लेकर जगदलपुर जैसे
कस्बाई नगर तथा इसके आगे जंगल में बसे गांवों तक भी अपनी बात पहुंचाने का कार्य
करना पड़ रहा है।
और यही वह
बहुविध,
बहुदिशा तथा बहुआयाम वाला परिदृश्य है,
जिसमें कारपोरेट जगत को अपना काम करना पड़ रहा है। इस वजह से कारपोरेट संचार के
स्वरूप में भी भारी परिवर्तन आना लाजिमी है। अब कारपोरेट जगत के संचार
विशेषज्ञों का लक्ष्य जनता शहरी क्षेत्र तक सीमित न होकर अति विशाल हो गयी है।
उसका संबंध केवल केंद्रीय शासन से नहीं बल्कि राज्य शासन,
नगर निगम, नगर पालिकाओं और पंचायतों तक
से हो गया है। गौर करें, बस्तर में स्टील प्लांट लगाने
के लिए कारपोरेट जगत को किस स्तर पर संचार स्थापित करना पड़ा रहा है और रायगढ़
में स्टील तथा पावर प्लांट के विस्तार कार्यक्रमोंमें जो बधाएं आ रही हैं उसे
दूर करने के लिए किस तरह कार्य करना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम तो
कारपोरेट जगत के संचार के लिए सबसे बड़ी चुनौती का एक अंशात्मक-प्रतीत है। अब
कारपोरेट जगत को अपने उद्योग की स्थापना के समय से ही विभिन्न शासन संस्थाओं से
लेकर नगरवासियों, ग्रामवासियों और जन जातियों से सही
तालमेल बैठाने के लिए उपयुक्त स्तर का संचार करना पड़ता है। सही तालमेल बैठाने
के लिए पुरानी सीमित कारपोरेट संचार प्रक्रिया अब अप्रासिंगक हो गई है,
उसे नई कठिन परिस्थितियों को स्वीकार करना होगा। इस संचार
प्रणाली में कहीं भी कोई असहजता आती है तो कारपोरेट जगत की छवि धूमिल हो जाती
है। अंग्रेजी का 'कारपोरेट'
शब्द लैटिन शब्द से आया है जिसका अर्थ है 'बॉडी'।
इस लिहाज से कारपोरेशन ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक बॉडी के रूप में कार्य
करते हैं। ऐसी कारपोरेट संस्थाओं का वरिष्ठ प्रबंधन अपनी कारपोरेट रणनीति तैयार
करता है जो कारपोरेट गतिविधियों के विस्तार से संबंधित होती है। कारपोरेट
प्रबंधन यह भी निर्धारित करता है कि दीर्घकाल में उसे किन लक्ष्यों को पाना है
तथा अपने कारपोरेट लक्ष्यों को पाने के लिए अपने साधनों का वह किस प्रकार और
किस प्राथमिकता से उपयोग करना चाहता है। जब हम कारपोरेट संचार की बात करते हैं
तो कारपोरेट संचार शब्द में वे सारी गतिविधियां शामिल हो जाती है जो उक्त
संस्था एक कारपोरेट संस्था के रूप में संचालित करती है। और जब मैं यह कहता हूं
कि कारपोरेट संचार में सभी कुछ शामिल है तब यह मानकर चलिए कि कारपोरेट आफिस से
निकलने वाला हर संदेश इसमें शामिल हैं चाहे वह संदेश शासकीय संस्था के लिए हो
अथवा सहयोगी या प्रतिस्पर्धी कारपोरेट जगत के लिए या अपने स्टाफ के लिए हो अथवा
अपने शेयर होल्डर के लिए हो या अपने उपभोक्ताओं के लिए हो या उन लोगों के लिए
हो जो समाज में अभिमत निर्मित करते हैं। हर अलग वक्त में हर अलग लक्ष्य के साथ
संचार में स्थिति समान रूप से महत्वपूर्ण बनी रहती है। कारपोरेट जगत की आज की
सबसे बड़ी चुनौती है अपनी छवि और अपनी पहचान को कायम करना और एक बार कायम की गई
छवि तथा पहचान को बनाएं रखना। लोकतांत्रिक प्रणाली,
खुली अर्थव्यवस्था, जबरदस्त गलाकाट औद्योगिक और
व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपने ब्रांड को बनाए रखना सबसे बड़ा संचार
लक्ष्य है। अगर मोटे तौर पर कुछ बुनियादी सिध्दांतों की बात करूं तो मैं यह
कहना चाहूंगा कि कारपोरेट संचार में सामान्य संचार की जितनी भी प्रणालियां हैं
उन सबका प्रयोग करना होता है।
किसी भी
कारपोरेट संस्था के लिए अपनी छवि व पहचान को बनाए रखना सबसे बड़ा लक्ष्य है
क्योंकि प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक बढ़ गई है। अब मोनोपली नहीं चल सकती।
लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई भी कारपोरेट संस्था अपने सामाजिक दायित्वों से
विमुख नहीं हो सकती,
बल्कि यह कहना उचित होगा कि व्यावसायिक लक्ष्यों को सामने रखकर
आप तभी सफल हो सकेंगे जब आप सामाजिक और लोकतांत्रिक दायित्वों को ध्यान में
रखते हैं। कारपोरेट संस्था को अपने गतिविधि क्षेत्र में जनसेवा तथा पर्यावरण के
प्रति जागरूकता प्रदर्शित करने की संचार प्रणाली विकसित करनी होगी। यूनियन
कार्बाइड फट्टरी के आस-पास की जनता को खतरों और खतरों से बचने के तरीकों के
प्रति शिक्षित न कर सकी, और न समय रहते दुर्घटना होने
पर, आगाह कर सकी। इन मामलों में यूनियन कार्बाइड अपने
स्टाफ के साथ भी सही संचार नहीं कर सकी थी। बाकी की कहानी तो विश्व विख्यात है।
एक अन्य उदाहरण यूटीआई का है जिसे लगभग 10 वर्ष पहले
ऐसी बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा था। यूटीआई ने भी कमजोर संचार प्रणाली के
कारण बहुत नुकसान उठाया।
मैं कुछ
बुनियादी मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जिससे कारपोरेट संचार को
बेहतर बनाया जा सकता है :
1. जनता के बीच विश्वास को बढ़ाएं।
2. कारपोरेट नियामक नियमों का पालन।
3. आंतरिक संचार को पुख्ता बनाएं।
4. संकट की घड़ी में किसी भी प्रकार के अनैतिक व्यवहार से बचें।
और इस लिहाज
से
1. कारपोरेट पहचान को बनाए रखें।
2. समाज, पर्यावरण और शासन को ध्यान
में रखकर विज्ञापन जारी करें।
3. निवेशकों से अच्छे संबंध बनाएं।
4. अपने स्टाफ के साथ बेहतर संबंध बनाएं।
5. सामुदायिक संबंधों को पुख्ता बनाएं और
6. सभी कारपोरेट संस्थाओं से संपर्क बनाये।
सी-12
शासकीय आवास, देवेन्द्र नगर,
रायपुर (छत्तीसगढ़)