पब्लिक रिलेशन का नया वर्जन
डॉ. पवित्र श्रीवास्तव
समाज
मनुष्य के सामाजिक संबंधों का जाल है और सामाजिक संगठन इन संबंधों का आधार होता
है। यह सामाजिक संगठन संप्रेषण की एक कड़ी से जुड़ा होता है। इस तरह सामाजिक
प्रक्रिया और संप्र्रेषण का घनिष्ठ संबंध होता है। विशेषकर उस देश में जहां
शासन लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा संचालित होती है। आज के औद्योगिक युग में
बुध्दिमतापूर्ण सूचनाओं को विभिन्न तकनीकों द्वारा जनता तथा विशिष्ट जनता तक
पहुंचाना ही संप्रेषण का प्रमुख कार्य है। इसी उद्देश्य से विभिन्न संस्थानों
द्वारा 'सूचना
एवं जनसंपर्क विभाग' स्थापित किए गए। औद्योगिक क्रांति
के दौरान सूचना प्रबंधन के उद्देश्य से स्थापित ये विभाग आज कारपोरेट
कम्युनिकेशन विभाग में परिवर्तित हो गए हैं। सूचना प्रबंधन का प्रारंभिक दौर
प्रोपेगेण्डा तथा प्रचार आधारित था जो एकपक्षीय संप्रेषण था। औद्योगिक
संस्थानों ने इसके महत्व को समझा एवं इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए
जनसंपर्क में तब्दील किया। इक्कीसवीं शताब्दी में जनसंपर्क अब कारपोरेट
कम्युनिकेशन जैसे बहुआयामी विधा में परिवर्तित हो गया है जिसमें सूचना प्रबंधन,
छवि निर्माण, विपणन सहयोग,
मीडिया संबंध और जनसंपर्क जैसे अन्य बहुत से कार्य शामिल हैं।
अनेक विद्वान आधुनिक जनसंपर्क को ही कारपोरेट कम्युनिकेशन की संज्ञा दे रहे
हैं।
आधुनिक
जनसंपर्क की शुरुआत अमेरिका में हुई और सरकारी तौर पर जनसंपर्क पर विशेष ध्यान
दिया गया। राष्ट्रपति विल्सन ने अपनी सरकार के लिए अप्रैल
1917
में एक कमेटी गठित की जिसका कार्य था जनसंपर्क अर्थात पब्लिक इनफॉरमेशन को सुलभ
बनाना। परंतु वास्तव में यह कार्य राष्ट्रपति विल्सन की नीतियों और कार्यों को
योजनाबध्द तरीके से प्रचारित करने के उद्देश्य से किया गया था। इस समिति के
अध्यक्ष अमेरिका के प्रख्यात पत्रकार जार्ज क्रील थे। यह कमेटी जनसंपर्क के
इतिहास में क्रील कमेटी के नाम से प्रसिध्द हुई। इस कमेटी ने सरकारी तौर पर एक
विभाग के रूप में जनसंपर्क के महत्व को स्थापित किया। इस कमेटी का एक सदस्य
प्रसिध्द मनोवैज्ञनिक सिग्मंड फ्राइड का भतीजा एडवर्ड एल वर्नेस था जिसने
1923 में दुनिया में जनसंपर्क के पक्ष को मुखरित करने
वाली पुस्तक 'क्रिस्टलाइजिंग पब्लिक ओपीनियन'
लिखी जो बड़ी लोकप्रिय हुई। जनसंपर्ककर्ताओं को इससे सैध्दांतिक
एवं व्यवहारिक दिशा मिली। जनमत की आवश्यकता और उसे प्राप्त करने की तकनीक और
माध्यमों पर इस पुस्तक में अच्छा प्रकाश डाला गया। औद्योगिक घरानों में
जनसंपर्क को स्थापित करने में आईवीली का योगदान महत्वपूर्ण है। उसे आधुनिक
जनसंपर्क का जनक भी माना जाता है। आईवीली ने पार्कर एंड ली फर्म में कार्य करते
हुए अपने व्यवहार, वाकपटुता और कार्यकुशलता से अमेरिकी
उद्योगपतियों से अपनी जबर्दस्त साख पैदा की। उसने व्यापारिक जगत को यह संदेश
दिया कि जनता की अपेक्षा के स्थान पर जनता को बताया जाए कि नीति पर चलकर ही
व्यावसायिक सफलता हासिल की जा सकती है। 1919 में जॉन सी
राकफैलर (जूनियर) ने उसे अपना जनसंपर्क अधिकारी एवं परामर्शदाता नियुक्त किया।
उसके जनसंपर्क प्रभाव के चलते जॉन सी रॉकफेलर का व्यक्तित्व लोगों की नजरों में
बदला। इस तरह आईवीली जनसंपर्क के महत्व को स्थापित करने वाला पहला व्यक्ति बना।
अमेरिका की
प्रसिध्द व्यापारिक पत्रिका
'फार्च्यून'
ने 1938 में पहली बार जनसंपर्क की
आवश्यकता की वकालत की तथा 1949 में जनसंपर्क क्षेत्र
में व्यापक सर्वेक्षण कराया। मई 1949 के अंक में
प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में पत्रिका ने विश्लेषित किया कि अमेरीका का व्यापार
जगत मुसीबतों में है और इसके
उज्ज्वल भविष्य को स्थापित करने का एकमात्र साधन
जनसंपर्क है। 1944 से पब्लिक रिलेशन्स न्यूज एवं
'पी.आर. जर्नल' नामक प्रकाशन अमेरिका
से प्रकाशित होने लगे। 1948 में पूर्व स्थापित अनेक
संगठनों द्वारा मिलकर अमेरिका में 'पब्लिक रिलेशन
सोसायटी आफ अमेरिका' की स्थापना हुई। 1955
में जनसंपर्क व्यवहार के उच्चतम मानक स्थापित करने हेतु एक
विश्वव्यापी व्यावसायिक संगठन 'इंटरनेशनल पब्लिक
रिलेशन्स एसोसिएशन' (आईपीआरए) स्थापित किया गया। आज
दुनिया के अनेक देश इसके सदस्य के रूप में अपने देश में जनसंपर्क को एक
प्रोफेशन के रूप में स्थापित करने एवं उसके उच्चतम व्यावहारिक मानक स्थापित
करने हेतु प्रयत्नशील हैं।
भारत में सन्
1912
में टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी द्वारा प्रारंभ किए गए
सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम से भारत में जनसंपर्क के आधुनिक रूप की नींव पड़ी।
1914 में प्रथम विश्वयुध्द चालू होने पर भारत में
तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने युध्द के समाचारों से जनता को अवगत कराना आवश्यक
समझा। इस हेतु 'टाइम्स आफ इंडिया'
बंबई के संपादक स्टेनली रीड की अध्यक्षता में केंद्रीय प्रचार
मंडल का गठन किया गया जिसमें भारत सरकार ने सेना, विदेश
व राजनीतिक विभागों के प्रतिनिधि सम्मिलित किए। महायुध्द की समाप्ति के पश्चात
इस बोर्ड को भंग कर 1921 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के
प्रोफेसर रूशब्रुक विलियम्स के निर्देशन में केंद्रीय सूचना ब्यूरो का गठन
किया। 1923 में इसका नाम बदलकर इसे सूचना निदेशालय कहा
जाने लगा। स्वतंत्रता पश्चात यह मंत्रालय में परिवर्तित हो गया। जनसंपर्क का
निजी क्षेत्र में प्रथम प्रयास वर्ष 1943 में बंबई
स्थित टाटा उद्योग समूह के कार्यालय में एक स्वतंत्र विभाग की स्थापना से हुआ।
इस विभाग ने 1944 में मासिक न्यूज बुलेटिन का प्रकाशन
प्रारंभ किया। पचास के दशक के पूर्वाध में भारत में तेजी से सार्वजनिक
क्षेत्रों का विस्तार हुआ। सार्वजनिक उपक्रमों ने जनसंपर्क की आवश्यकता को
समझते हुए अपने यहां जनसंपर्क विभाग की स्थापित किए। 1958
में विभिन्न उपक्रमों में कार्यरत जनसंपर्ककर्ताओं ने मिलकर
व्यावसायिक जनसंपर्क संघ की स्थापना का प्रयास किया। इस समूह के शीर्षस्थ फारूख
मुएला, काली मोदी एवं कुछ अन्य सदस्यों ने मिलकर
1966 में आईपीआरए संबध्द 'पब्लिक
रिलेशन्स सोसायटी आफ इंडिया' (पीआरएसआई) की स्थापना
भारत में की। पीआरएसआई ने दिल्ली में प्रथम अखिल भारतीय जनसंपर्क सम्मेलन का
आयोजन 1968 में किया तथा जनसंपर्क की अंतर्राष्ट्रीय
आचार संहिता को अंगीकृत किया। इस तरह भारत में शासकीय,
सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों में जनसंपर्क प्रोफेशन के रूप में स्थापित हुआ।
बीसवीं
शताब्दी के अंतिम दो दशकों में भारत में आर्थिक उदारीकरण के दौर के
परिणामस्वरूप जनसंपर्क को एक नई पहचान मिली।
1990 के
पश्चात उदारीकरण की नीति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत आगमन का न्यौता
दिया। इन कंपनियों ने भारत में अपने पांव जमाने के लिए सशक्त जनसंपर्क का सहारा
लिया। इन संस्थाओं ने पेशेवराना अंदाज में जनसंपर्क को कारपोरेट कम्युनिकेशन
में तब्दील कर दिया। परंपरागत जनसंपर्क का कार्य सिर्फ सामान्य प्रसार-प्रसार
एवं मीडिया संबंध हुआ करता था, परंतु विभिन्न संस्थानों
में नवगठित कारपोरेट कम्युनिकेशन विभाग ने अपनी कार्यशैली को व्यापक बनाते हुए
इसमें मीडिया प्रबंधन, सामुदायिक संबंध,
छवि निर्माण, विपणन सहयोग,
ईवेन्ट मैनेजर जैसे कार्यों को भी शामिल किया। संस्थान के
'आंतरिक जन' तथा 'बाह्य
जन' से संपर्क स्थापना हेतु पृथक-पृथक रणनीति के
निर्माण पर जोर दिया गया। आज भारत के सर्वोत्तम सार्वजनिक उपक्रमों एवं
प्रतिष्ठित निजी क्षेत्रों के प्रचार एवं जनसंपर्क विभाग,
कारपोरेट कम्युनिकेशन विभाग में बदल गए हैं। इन्होंने परपंरागत
संप्रेषण शैली के साथ-साथ ई-कम्युनिकेशन पर अत्याधिक ध्यान देना प्रारंभ किया
है। आज अनेक संस्थाओं के ई-हाऊस जर्नल लोकप्रिय हो चुके हैं। ये सभी संगठन मधुर
मीडिया संबंध स्थापित करने के लिए पारदर्शितापूर्ण कार्यशैली अपनाने पर विश्वास
करने लगे हैं। विज्ञापन एवं प्रचार के लिए भी विभिन्न जनमाध्यमों का प्रयोग
प्रचलन में आ गया है। संस्थान अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ
सामाजिक जिम्मेदारियों को महसूस करने लगे हैं जो कारपोरेट कम्युनिकेशन विभाग के
माध्यम से पूर्ण हो पा रही है।
कुल मिलाकर
'प्रचार
एवं जनसंपर्क' से कारपोरेट कम्युनिकेशन में तब्दील यह
विधा अब प्रबंधन के लिए भी महत्वपूर्ण हो चली है। संस्थान कारपोरेट कम्युनकेशन
को अपनी सफलता का मंत्र मानने लगे हैं इसलिए ही यह विभाग आज उच्च प्रबंधन का
हिस्सा बन गया है। सार्वजनिक एवं औद्योगिक संस्थान ही नहीं,
शासकीय क्षेत्र भी परंपरागत जनसंपर्क के स्थान पर आधुनिक
जनसंपर्क को अपना रहे हैं। जनसंपर्क की बढ़ती महत्ता के चलते ही युवा इस ओर
आकर्षित हो रहे हैं तथा अपना कैरियर इन क्षेत्रों में तलाश रहे हैं। विभिन्न
विश्वविद्यालयों एवं अकादमिक संस्थानों ने पब्लिक रिलेशन्स,
कारपोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया मैनेजमेंट पर पाठयक्रम तैयार
किए हैं जो काफी लोकप्रिय हैं। इन सकारात्मक बदलाव का नतीजा यह है कि आज
कारपोरेट कम्युनिकेशन विभाग अधिक प्रोफेशनल है, सामाजिक
प्रतिबध्द है तथा ग्राहक उन्मुख है।
एफ-3,
अंबर अपार्टमेंट, ई-8219
त्रिलंगा,
भोपाल -462016
(मध्यप्रदेश)