Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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आवरण कथा

 

 

निगम-निकायों के राई और पहाड़


अशोक चतुर्वेदी

 

किसी ने ठीक कहा है - पिछली सदी कंपनियों की थी, यह सदी निगम-निकायों की है। भारत से बेहतर, इस उक्ति की सच्चाई को समझ सकने वाले कम ही देश हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी का जलवा-जलाल भुगतने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनकर हमने अपना बेइंतहा शोषण होते देखा। फिर हम जागे और अनथक कोशिशों से राजनीतिक तौर पर आजाद हुए। एक सार्वभौम गणतंत्र के रूप में हमने दुनिया को दिखा दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी के लिए हम बड़ी से बड़ी कीमत और कुर्बानी दे सकते हैं।

स्वतंत्र भारत में दक्षिण-वाम देशों का जयकारा बोलते हुए हमारे कर्णधारों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता अख्तियार किया। कंपनी बहादुर का हमारा अनुभव अच्छा नहीं था इसलिए सार्वजनिक उपक्रम और सीमित कंपनियों के सहारे हमारे उद्योग- धंधे चलने लगे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जिस तरह व्यापार के नाम पर धोखाधड़ी और अनुचित तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया था, उसे देखते हुए देश के जनमानस में कंपनी शब्द की छवि गर्हित हो गई। आज भी कंपनी को किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के फायदे के लिए गठित गिरोह ही समझा जाता है। जिस तरह की सट्टेबाजी और सार्वजनिक धन की अफरातफरी के प्रकरण, स्वतंत्र भारत में कंपनियों के साथ जुड़े रहे हैं उसे देखते हुए कंपनियों की साख बिगड़ती ही गई। गैर लाभवाली कंपनियों यानी नान प्राफिट कंपनियों के बारे में कानूनी प्रावधान जरूर है, लेकिन उनके कामकाज का तौर-तरीका भी इतना पारदर्शी और विश्वसनीय नहीं बन सका कि कंपनियों को समाज में ऊंची नजर से देखा जाता।

अब थोड़ा सार्वजनिक निगम-निकायों की तरफ नजर दौड़ाएं। इन्होंने बेशक देश की अधोसंरचना निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। हालांकि बदइंतजामी और सार्वजनिक धन की बर्बादी के आरोप इन पर भी लगते रहे, लेकिन उद्योग धंधों के लिए गुंजाइशें निकालकर तथा कोरी मुनाफावसूली से परे रहकर सार्वजनिक उपक्रमों ने अपनी साख बचाए रखी। उदारीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था के मौजूदा दौर में कड़ी प्रतिस्पर्धा और नीतिगत विसंगतियों का सामना करते हुए कुछ उपक्रम आज भी लोगों की तारीफ बटोर रहे हैं। जहां तक बहुराष्ट्रीय निगमों का सवाल है आज उन्हीं का जमाना है। प्रबंधन की नई से नई युक्तियों का इस्तेमाल करते हुए वे तेजी से अपने लिए जगह बना रहे हैं। इंटरनेट की तरह वे सर्वव्यापी होते जा रहे हैं। लगभग अमूर्त-सी मिल्कियत और ऊंचे ब्राण्ड-रसूख के बल पर उन्होंने मायावी शक्तियां हासिल कर ली हैं। कई देशों की सरकारों के सालाना बजट उनके टर्न-ओवर के आगे बौने हैं। वे सरकारी रीति-नीतियों को मनमाने ढंग से नहीं तो काफी कुछ सुविधाजनक तरीके से प्रभावित करने के स्थिति में हैं। अनेक स्वैच्छिक संगठन उनकी जेब में हैं और मीडिया को उन्होंने साध रखा है। वे यदि किसी से खौफ खाते हैं तो वह है बाजार के अंदरूनी बहाव।

पूंजी का प्रवाह जितना ज्यादा और जितना तेज होता है उससे बनने वाले भंवरजाल (इडी करेन्ट) उतने ही तगड़े। इनके फेर में पड़कर छोटे-मोटे निकाय तो साफ (मर्ज) ही हो जाते हैं, बड़े भीमकाय कार्पोरेशनों को भी कभी-कभार खासा नुकसान उठाना पड़ता है। देखते-ही-देखते राई का पहाड़ बन जाता है और पहाड़ से लगने वाले खिलाड़ी, टापू बनकर रह जाते हैं। संवाद (कम्यूनिकेशन) की इसमें जबर्दस्त भूमिका होती है।

जानकारी अजब चीज है। बहुत ज्यादा दबी-छुपी रहे तो मवाद बन जाती है और हद से ज्यादा फैली-बिखरी तो प्रवाद (बेसिर पैर की) हो जाती है। उसे एक अनुकूलतम स्तर पर बनाए रखना हो तो संवाद बनाना जरूरी होता है। कारपोरेट जगत इसी कला को खासी अहमियत देता है। एक ओर अपने निवेशकों, पणधारियों (भागीदारों) आपूर्तिकर्ताओं, कर्मचारियों, विशेषज्ञों और नीति निर्धारकों के साथ जमा-जरूरत का संवाद लगातार बनाए रखा और दूसरी ओर अपने ग्राहकों और आम जनता में पैठ बनाना जरूरी होता है। पहले मोर्चे पर जो संवाद बनता है उसे एक सीमा तक औपचारिक और आंतरिक रणनीति का अंग कह सकते हैं। इसके लिए बहुधा तयशुदा फार्मेट, आकलित किए जा सकने वाले तथ्यों, आंकड़ों, रेखाचित्रणों, फाईलों, घरेलू प्रकाशनों (इन हाउस पब्लिकेशंस) आदि की मदद ली जाती है। इस सारे धतकर्म (कामकाज) में संवाद विशेषज्ञों की भूमिका अक्सर नहीं के बराबर होती है मगर संवाद की व्यवस्था बड़ी माकूल, व्यवस्थित, समयबध्द यथासंभव गोपनीय और पदाभिमुख (रैंक ओरिएंटेड) रखी जाती है।

कारपोरेट जगत के संचार-संजाल का ज्यादा व्यापक, सुनियोजित और रणनीति के अनुकूल हिस्सा होता है वह संवाद जिसमें मीडिया का इस्तेमाल होता है, जो दिखता है, वही बिकता है और जो बिकता है वही टिकता है। इस सूत्रवाक्य के निहितार्थों पर गौर करेंगे तो आसानी से समझ आ जाएगा कि बड़े घराने किस तरह और बड़े बनते जाते हैं। कारोबारी संसार का धुर सत्य है कि आप किसी एक जगह पर लगातार टिके नहीं रह सकते। या तो आपको ऊपर जाना होता है या नीचे। तीसरा कोई चारा नहीं। बाजार की आपसी प्रतिस्पर्धा निष्क्रिय या कम सक्रिय को लील जाती है इसलिए चौकस रहकर लगातार अभियान सा जारी रखना पड़ता है। बस मीडिया यही कारगर साबित होता है।

लाभ कमाने के लिए प्रभावशाली और निर्विकल्प बनते जाना जरूरी होता है। मीडिया के इस्तेमाल से अपनी उपस्थिति को लगातार उन लोगों के बीच रेखांकित करना जो कारपोरेट अभियान के लक्ष्य होते हैं। प्रतिष्ठा और विश्वसनियता को अर्जित करने की पहली शर्त होती है - अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाते रहना। इसके लिए हर उस मौके का लाभ उठाया जाता है जिस दौरान लक्षित समूह के सदस्य एकत्र हों। लोकप्रिय खेल का कोई मैच, किसी कलाकार का प्रदर्शन, मेला-ठेला, हाट-बाजार, भाषण, शादी-ब्याह, अंत्येष्टि या यात्रा जो अवसर मिले उसके लपककर अपने ब्रांड की, उत्पाद की, सेवा की या महज प्रतीक चिन्ह या रंगों को प्रदर्शित किया जाता है। इस सहज मनोवैज्ञानिक कीमिया को अपनाया जाता है कि भरोसा जीतने से पहले दिखना और फिर संपर्क में आना बेहद-बेहद जरूरी होता है। उपभोक्ता की जेब से कुछ निकालने से पहले अपना संजाल (नेटवर्क) बिछाया जाता है। यह काम सुभीते से हो सके इसके लिए माहौल बनाने में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बेशक इसकी वाजिब कीमत उसे दी जाती है। समस्या तब पैदा होती है और हो रही है, जब इस लेन-देन में राष्ट्रीय और स्थानीय हितों को ठेस पहुंचती है।

एकाध उदाहरण देखें। सदी की शुरुआत में प्रचार माध्यमों ने सरसों के तेल को लेकर भटकटैया (अर्जीमोन) के बीज मिल जाने से हुए अपमिश्रण के मामले को सुनियोजित ढंग से उछाला। प्रचारित किया गया कि अपमिश्रित सरसों के तेल को खाने से एलर्जी, लकवा जैसी बीमारियां हो सकती हैं। देखते ही देखते सरसों उगाने वालों से लेकर उसका तेल निकालने वालों और उसे बेचने वालों का धंधा फ्रीज हो गया। दूसरी तरफ उन लोगों की बन आई जिनका पामोलीन तेल औने-पौने भी बिक नहीं पा रहा था। जब तक तथाकथित मिलावटी तेल के सैम्पलों के परिणाम आते (और उसमें से किसी में भी आर्जीमोन नहीं मिला) तब तक खेल हो चुका था। सरसों की खेती और व्यापार को एक ही झटके में जो नुकसान हुआ, उसकी आज तक भरपाई नहीं हुई। इसका दुखद पहलू रहा मीडिया का बरताव।

ठीक है कि सभी कारपोरेट इकाइयां इस तरह के षडयंत्र नहीं करतीं लेकिन उनके और मीडिया के रिश्तों को नियंत्रित या कम से कम विनियमित (रेग्यूलेट) करने के लिए प्रेस परिषद जैसी संस्थाओं ने भी आज तक कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया है। खुले लोकतंत्र में मीडिया पर सरकारी नियंत्रण अक्सर विवादों को जन्म देता है, इसलिए प्रेस परिषद को चाहिए कि वह नए माहौल में कारपोरेट संसार द्वारा मीडिया के उपयोग को लेकर कम से कम एक निष्पक्ष अध्ययन तो कराए।

 

 

ई-9, ई.ए.सी. कालोनी, कचहरी के पीछे, रायपुर, छत्तीसगढ़

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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