Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 2, अंक - 6, दिसंबर.07.- फरवरी, 2008)

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आवरण कथा

 

 

राष्ट्र निर्माण में कारपोरेट की भूमिका


गिरीश मुक्तिबोध

 

ह कथन पूरी तरह सत्य है, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी, भौगोलिक क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से भारत एक विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 32 लाख वर्ग किमी है और आबादी एक अरब का आंकड़ा पार कर चुकी है और इसमें से करीब 75 करोड़ भारतीय कुल मिलाकर 6,00,000 गांवों में बसते हैं। ग्रामीण भारत में निरक्षरता, बेरोजगारी और गरीबी जैसी गंभीर समस्याएं बरसों से बनी हुई है। गरीबी का दानव तो ग्रामीण क्षेत्रों पर पूरा दबाव बनाए हुए है। गरीबी उन्मूलन के लिए पिछले कई दशकों से जारी प्रयासों के बावजूद आजादी के बाद से अब गरीबों की संख्या दोगुनी हो चुकी है।

इस ग्रह पर सबसे ज्यादा गरीब भारत में बसते हैं और करीब 6 करोड़ परिवार भूमिहीन हैं। गरीबी ही निरक्षरता का कारण है। स्कूलों की कमी, शिक्षकों का अभाव या समुचित शिक्षण विधियों की अनुपलब्धता की वजह से ग्रामीणों में सामाजिक आर्थिक पिछड़ापन आता है जो अंतत: बेरोजगारी बढ़ाता है। इन ग्रामीण इलाकों में गरीबी, बेरोजगारी और खस्ताहाल ढांचागत तंत्र के चलते देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असंतुलन बना हुआ है। इसे ध्यान में रखकर ग्रामीण विकास, जिसके तहत आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय, ग्रामीणों के जीवन स्तर में सुधार भी शामिल हैं, आवश्यक हो जाता है।

ग्रामीण विकास की मौजूदा रणनीति के तहत स्वरोजगार और वेतन आदि के आविष्कारी कार्यक्रमों के जरिए गरीबी उन्मूलन, आजीविका के बेहतर अवसर, शिक्षा का प्रावधान, बुनियादी सुविधाएं और ढांचागत तंत्र जुटाने पर ध्यान जमाया जाता है। इन लक्ष्यों को विभिन्न कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के जरिए हासिल किया जाता है। ये कार्यक्रम समुदायों, गैर सरकारी संगठनों, समुदाय आधारित संगठनों, संस्थानों तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों की भागीदारी से चलाए जाते हैं। कई कार्पोरेट घरानों और गैर सरकारी संगठनों ने गांवों को गोद लिया है और इससे उनके हालातों में काफी सुधार हुआ है।

सोसायटी फॉर ह्यूमैन रिसोर्सेस मैनेजमेंट, इंडिया द्वारा कराए गए नवीनतम सर्वेक्षण के मुताबिक भारत उन देशों में से है जहां 5 में से 4 भी अधिक संगठन कार्पोरेट सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं और इसके तहत स्थानीय स्तर पर परोपकारी गतिविधियों के संचालन से लेकर श्रमिक कल्याण, टाउनशिप बनाना, गांवों को गोद लेना जैसी तमाम गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। जहां तक टाउनशिप बनाने का काम है तो भारत में कई कंपनियां इस क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहीं हैं। ये कंपनियां अपने-अपने दायरे में जाने वाले समाज के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए उनके वास्ते शैक्षिक, चिकित्सा और मनोरंजन सुविधाओं को भी जुटाती है। साथ ही इन इलाकों के लिए सड़कों, परिवहन, बिजली आदि की ढांचागत सुविधाएं जुटाते हुए इन्हें आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी भी बनाती हैं। भारत में टाटा स्टील, बीपीसीएल, आईटीसी, सेल सरीखे कुछ कार्पोरेट घराने वाकई ग्रामीण भारत के हालातों में सुधार लाने के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।

टाटा समूह भारत के सबसे बड़े प्रतिष्ठित व्यावसायिक समूहों में से एक है। इसके अंतर्गत सात व्यावसायिक क्षेत्रों में सक्रिय 96 कंपनियां शामिल हैं, ये क्षेत्र हैं - सूचना प्रणालियां और संचार, इंजीनियरिंग, सामग्री, सेवाएं, ऊर्जा, उपभोक्ता उत्पाद तथा रसायन। जमशेदजी टाटा द्वारा 19वीं शताब्दी के मध्य में स्थापित टाटा समूह अपनी स्थापना के बाद से ही कार्पोरेट दायित्वों के मामले में पुरोधा रहा है। टाटा के दर्शन ''आप जो समाज से पाते हैं, उसे समाज को लौटाएं'' को समूचे भारत भर में सक्रिय सभी समूह कंपनियों ने अपनाया है। टाटा समूह की फ्लैगशिप कंपनी टाटा स्टील जो कि एशिया की पहली और भारत की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की स्टील कंपनी है, को सर्वाधिक मानवीय संगठन का दर्जा हासिल है। राष्ट्र निर्माण तथा सामाजिक कल्याण की भावना जैसे टाटा स्टील और इसके कर्मियों को आनुवांशिकीय गुण हैं। उत्तर बिहार को 1934 में झकझोर कर रख देने वाले भूकंप से लेकर 2004 में तमिलनाडु में सुनामी द्वारा सब कुछ तहस नहस कर दिए जाने के बाद, टाटा स्टील के ही कर्मी थे जो पहले पहल सहायता का हाथ बढ़ाने के लिए आगे आए। टाटा स्टील ने 1958 में पहला सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराया और इसके आधार पर सामाजिक कल्याण विभाग स्थापित किया गया।

जमशेदपुर शहर के विकास के लिए टाटा स्टील की वचनबध्दता ने आज इसे भारत के पहले सुनियोजित औद्योगिक शहर का दर्जा दिलाया है। टाटा स्टील की संस्थापना के सम्मान में 1919 में शहर का नाम बदलकर उनके नाम पर किया गया। यह भारत का सबसे साफ सुथरा और सबसे ज्यादा हरा भरा शहर है। इसमें चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध है। दक्षिण पूर्व एशिया का यह एकमात्र ऐसा शहर है जिसे संयुक्त राष्ट्र ने अपने ग्लोबन काम्पैक्ट सिटीज पायलट प्रोग्राम में भागीदारी के लिए चुना है। इसकी साफ-सुथरी और सुनियोजित ढंग से बनी सड़कें, दोनों तरफ हरे भरे लहलहाते पेड़ और पानी बिजली की निरंतर आपूर्ति  24 घंटे कार्यरत हैल्पलाइन कुछ ऐसे प्रमुख कार्य हैं जिनका संचालन जमशेदपुर यूटिलिटीज एंड सर्विसेस कंपनी (जस्को) जमशेदपुर में कुशलतापूर्वक कर रही है। जस्को को 1907 में टाटा स्टील के ही अंग के तौर पर शुरू किया गया और तभी से यह शहर के लिए म्युनिसिपल सेवाएं उपलब्ध करा रही है। टाटा स्टील ने अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य देखभाल की जिम्मेदारी बखूबी निभाने के लिए 850 बिस्तरों वाला एक अस्पताल, दो सुपर डिस्पेंसरियां तथा नौ अन्य डिस्पेंसरियां भी जमशेदपुर में खोली हैं। टाटा स्टील के समुदाय आधारित कार्य इसके व्यावसायिक दायरों से कहीं आगे निकल चुके हैं। इसकी तमाम सामाजिक दायित्व गतिविधियां इसकी तमाम खानों और खदानों समेत अन्य परिचालन गतिविधियों के आसपास संचालित हैं। कम्युनिटी डेवलपमेंट ऐसे कई कार्यक्रमों का संचालन करते हैं जो सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से उपेक्षित वर्गों के जीवन में सुधार के लिए खासतौर पर तैयार किए गए हैं। कंपनी झारखंड और उड़ीसा में अपने परिचालन इलाकों के आसपास इन विकास गतिविधियों का संचालन करती है।

औद्योगिक प्रगति से शहरी समुदायों को काफी लाभ हो रहा है, लेकिन जिस देश में 70 प्रतिशत लोगों की रोजी रोटी खेती पर निर्भर हो, वहां प्रगति सच्चे मायने में तभी हो सकती है जब इसका लाभ ग्रामीण समुदाय तक पहुंचे। इसलिए टाटा स्टील ने अपने संसाधन एवं प्रबंधकीय उपक्रमों को निचले स्तर तक ले जाने की अनूठी अवधारणा विकसित की है और इस क्रम में देश के निर्धतम व्यक्ति से खुद को जोड़ने का सोचा समझा प्रयास किया है। वह मजदूर और आधार झेलने में सक्षम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए सरकारों, जिला प्रशासनों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है।

पच्चीस साल पहले टाटा स्टील रूरल डेवलपमेंट सोसायटी (टीएसआरडीएस) के संगठन के साथ कंपनी ने अपनी क्षमताओं का उपयोग राष्ट्र के प्रगति और विकास के लिए किया। कंपनी की आय सृजन योजना से देश के 700 से अधिक गांवों के लोगों को अपने श्रम का फल पाने में मदद मिली है और उन्हें अपनी जड़ों से भी नहीं कटना पड़ा। पहले प्रत्यक्ष रूप से और फिर (टीएसआरडीएस) के माध्यम से वर्षों से कंपनी ने ग्रामीण समुदाय को खाद्य सुरक्षा देने पानी और खाली हाथों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने, बंजर भूमि का हरा-भरा बनाने तथा खाली पेट को रोटी देने में मदद की है। इस प्रक्रिया में यह देश के ग्रामीण विकास में लगी सबसे बड़ी गैर सरकारी एजेंसियों में शुमार हो गई है।

 

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-श्रीकांत सिंह संपादक मंडल- गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रकाशक-भूमिका द्विवेदी उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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