कार्पोरेट संचार
: नया दौर,
नई चुनौतियां
कृष्णचंद्र मौलि
भारत
में स्वाधीनता के पूर्व लगभग सारा कारपोरेट सेक्टर निजी हाथों में ही था और वह
भी अंग्रेजी सरमायेदारों के हाथों में। यदि कोई भारतीय सरमायेदार को जोड़ा भी
गया था तो केवल भारतीय अभिजात्य वर्ग को यह जताने के लिए कि वे भारत का शोषण
नहीं कर रहे हैं बल्कि भारतीयों के हित में काम करने की प्रबल इच्छा लिए हुए
हैं। लेकिन इतिहास में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता है। स्वाभाविक ही है कि इस
तरह के स्वार्थपरक कारपोरेट क्षेत्र में न जनसंपर्क की आवश्यकता थी और न संचार
की। जहां जनभागीदारी का प्रोत्साहन नहीं होता है और जहां जन आकांक्षाओं की
उपेक्षा करके ही स्वयं को स्थापित किया जाता हो वहां संचार की कोई भूमिका ही
नहीं होती है। स्वाधीनता के पश्चात इस स्थिति में जबरदस्त बदलाव आया।
राष्ट्रप्रेम और अपने देश की उन्नति के लिए कुछ ऐतिहासिक कर गुजरने की दृढ़
इच्छाशक्ति ने टाटा,
बिरला, बजाज,
किर्लोस्कर, गोदरेज आदि ऐसे अनेक घरानों ने कारपोरेट
स्थापित किए जो निस्वार्थ नहीं थे तो पूर्णरूप से स्वार्थपरक भी नहीं थे और देश
की जरूरतों और जनआकांक्षाओं के अनुकूल थे। यही समय था जब इन संस्थानों में
विज्ञापन, प्रचार-प्रसार और कालांतर में जनसंपर्क
इकाइयों की स्थापना हुई। यद्यपि ये इकाइयां अपने लक्ष्य समूहों के साथ संचार
स्थापित करने का कार्य करती थीं तथापि उनका यह कार्य जनसंपर्क के नाम से ही
जाना जाता था।
इस बीच भारत
सरकार और राज्य सरकारों ने व्यापक पैमाने पर सार्वजनिक क्षेत्र में कारपोरेट
उपक्रमों की स्थापना करना आरंभ कर दी। भारत हेवी इलेक्ट्रानिक,
इंडियन आइल, एनटीपीसी और अनेक ऐसे
सार्वजनिक उपक्रम कारपोरेट क्षेत्र में स्थापित होते गए। जिस गति से सार्वजनिक
क्षेत्र में कारपोरेट संस्थाएं स्थापित होती गई, उसी
गति से जनसंपर्क प्रकोष्ठों का सृजन भी होता गया। इन प्रकोष्ठों का नाम तो
जनसंपर्क हुआ करता था परंतु कार्य सूचना तथा प्रचार का हुआ करता था। सरकारी
तंत्र में भी जनसंपर्क विभागों का नामकरण या तो सूचना प्रकाशन या सूचना प्रसारण,
या फिर सूचना प्रकाशन एवं जनसंपर्क विभाग हुआ करता था। काम तब
भी सूचना और प्रचार का ही हुआ करता था।
सत्तर का दशक
आते-आते अचानक सरकार तथा कारपोरेट क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों में समय की
मांग के अनुसार जनसंपर्क कर्म को महत्व दिया जाने लगा। जनसंपर्क कर्म में
प्रोफेशनल प्रशिक्षण के अभाव में आरंभिक दौर में अनेक विकृतियां भी परिलक्षित
होने लगी। संस्थासंगठन का भोंडा प्रचार,
वरिष्ठ प्रशासन तंत्र और मंत्री को मीडिया में स्थान दिलवाकर
उनकी चाटुकारिता, तथाकथित वरिष्ठ मीडिया कर्मियों के
जरिये संस्थासंगठन की उपलब्धियों के बारे में छपवाने,
प्रसारित करवाने के नाम पर अनाप-शनाप व्यय और प्रेस कान्फ्रेंस के बहाने साल
में 2 से लेकर 5 बार तक मीडिया
कर्मियों को महंगे-महंगे तोहफे दिया जाना जनसंपर्क प्रोफेशन माना जाने लगा था।
इस परिप्रेक्ष्य में यह सुखद संयोग ही माना जाना चाहिए कि जल्दी ही यह विकृति
संगठन, प्रोफेशन और मीडिया को समझ में आ गई और जनसंपर्क
को सूचना, शिक्षा, संचार की
शिक्षा की नई परिभाषा दी गई। इस परिभाषा के साथ न केवल कारपोरेट बल्कि शासन
तंत्र भी अपने जनसंपर्क एवं सूचना तथा प्रसार प्रकोष्ठों का नामकरण संचार
अभिमुख करने लगे।अब कारपोरेट क्षेत्र में कारपोरेट कम्युनिकेशन प्रकोष्ठ
अस्तित्व में आ गए हैं तो इधर भारत सरकार ने भी अपने पत्र सूचना कार्यालय
(पीआईबी) प्रमुखों के पदनाम के साथ मीडिया एवं संचार जोड़ दिया। ये सभी प्रकोष्ठ
सूचना, शिक्षा, संचार की
प्रणाली के महत्व को पहचान गए और जान गए जबकि राज्य सरकारों के जनसंपर्क
संगठनों में अभी ऐसा कोई परिवर्तन नहीं आया, हालांकि वे
भी सूचना, शिक्षा संचार के मूलमंत्र को अपने संपर्क
कर्म में अमल में लाने लगे हैं। देर-सबेर राज्य शासकीय तंत्र को भी जनसंपर्क
कर्म में आईईसी प्रणाली को पूर्णरूप से अपनाया ही होगा क्योंकि सूचित,
शिक्षित कर संचार स्थापित किए बगैर जनसंपर्क सफल नहीं होगा।
इस परिवर्तन
से कारपोरेट क्षेत्र में संचार का परिदृश्य तेजी से बदलता जा रहा है और
प्रवृत्तियों में भी बदलाव आ रहा है। आरंभिक दौर में भले ही कारपोरेट संचार
मीडिया के साथ संपर्क और उनके माध्यम से प्रचार -प्रसार की परंपरा से अपने को
तत्काल अलग नहीं कर पाया हो,
लेकिन जैसे-जैसे कारपोरेट क्षेत्र के लक्ष्य समूहों की
अपेक्षाएं और आकांक्षाएं बढ़ती गईं, वैसे-वैसे सूचना,
शिक्षा, संचार प्रणाली को प्रभावकारी
ढंग से और व्यापक पैमाने पर अपनाया जाने लगा।
अब यह महसूस
किया जाने लगा है कि केवल मीडिया के साथ संपर्क मात्र से और सूचना तथा प्रसार
सामग्री वितरण से कारपोरेट संचार प्रक्रिया न संपूर्ण होती है और न संचार
स्थापित करने का उद्देश्य ही पूर्ण होता है। आज प्रत्येक संदेश एवं संचार
(कम्युनिकेशन) के अपने अलग लक्ष्य समूह होते हैं। हर लक्ष्य समूह के साथ संपर्क
के साधन भी अलग होते हैं। अब किसी कारपोरेट के लिए आंतरिक समूह जितना
महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण बाह्य लक्ष्य समूह भी है। जननेताओं और
बुध्दिजीवियों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। कारपोरेट क्षेत्र अपने कार्य
क्षेत्र और लक्ष्य क्षेत्र तक सिमटकर कूप मण्डूक बनकर नहीं रह सकता है। आज
कारपोरेट क्षेत्र के लिए सामाजिक सरोकार और समस्याएं भी उनके लक्ष्य क्षेत्र
में शामिल हो गए हैं।
उदाहरण के लिए
प्रदूषण रोकने के लिए किया जाने वाला वृक्षारोपण,
कम आय वाले कर्मचारियों के लिए शिक्षा,
स्वास्थ्य, आवास, पेयजल जैसे
सुविधाओं के साथ स्कूली फीस, स्कूली किताबें,
ड्रेस आदि की नि:शुल्क या रियायती व्यवस्थाएं भी कारपोरेट
संचार की महत्वपूर्ण गतिविधियां बन गई हैं। पार्क निर्माण,
वृक्षों के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र,
धर्म स्थलों का विकास आदि गतिविधियां भी कारपोरेट उद्देश्यों
में सम्मिलित हो गये हैं। कारपोरेट उपलब्धियों से अधिक महत्वपूर्ण कारपोरेट
परिवारों के कल्याण और उनकी मानवीय संवेदनाओं की पूर्ति और मानवीय सरोकारों से
जुड़ाव संचार के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। कारपोरेट छवि निर्माण और
कारपोरेट विश्वसनीयता अब इस पर निर्भर होने लगी है कि कारपोरेट संचार में कितना
कल्याण और कर्मी सुख सविधा संबंधी सामग्री का प्रसार होता है। हाऊस जर्नल,
कर्मी कल्याण पत्रिकाएं, ट्रेड यूनियन
गतिविधियां, नवाचार, खेलकूद,
साहसिक और सांस्कृतिक कार्य कारपोरेट संचार की महत्वपूर्ण
गतिविधियां हो गई हैं।
ऐसा नहीं है
कि यह बदलता परिदृश्य केवल भारत में ही परिलक्षित हो रहा है। बल्कि भारत में यह
परिवर्तन विलंब से हुआ। विदेशों,
विशेषकर विकसित देशों में तो कई वर्ष पहले से ही कारपोरेट
संचार में परिदृश्य में और प्रवृत्तियों में बदलाव न केवल परिलक्षित हुए बल्कि
अमल में आने लगा था। अब भारतीय मीडिया पाठयक्रम के
विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में कारपोरेट संचार विषय के प्राध्यापकों और
विद्यार्थियों के लिए यह बदलता परिदृश्य और प्रवृत्ति एक उत्सुकता और जिज्ञासा
का विषय तो होगा ही, साथ ही पाठयक्रम को तदनुसार नया
रूप देने की पहल भी करनी होगी। कुल मिलाकर कारपोरेट संचार कर्म में अब केवल
मीडिया को प्रसन्न रखने और मीडिया प्रबंधन करने के जनसंपर्क कौशल का महत्व तभी
मान्य होगा जब कारपोरेट के लक्ष्य समूहों को सूचित,
शिक्षित करने और उनसे संचार स्थापित करने में सफल होंगे। यह एक कठिन कार्य जरूर
है पर असंभव नहीं। जनसंपर्क और जनसंचारकर्मी जितनी जल्दी इस सच्चाई को स्वीकार
कर लेंगे उतनी ही प्रभावी तरीके से वे अपने प्रोफेशन में सफल होंगे और
प्रोफेशन का विश्वास कायम और सुदृढ़ बनायेंगे एवं ख्याति अर्जित करेंगे। इस तरह
वे संचार कर्मियों की भविष्य की पीढ़ी के लिए एक नई दिशा और मार्ग प्रशस्त
करेंगे।


