Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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व्यंग्य

 

 

 

पत्रकार की अभिलाषा

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रोमेश जोशी

 

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं - एक फूल के जीवन लक्ष्य के माध्यम से एक भारतीय आत्मा को अभिव्यक्ति देने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के महापुरूष का सादर स्मरण करते हुए हमेशा एक सहज पहेली चुनौती बनकर सामने है, सीधा सा सवाल है कि आज की पत्रकारिता कहां पर खड़ी है, बल्कि आज का पत्रकार कहां पर खड़ा है ? वह माखनालाल चतुर्वेदी के ज्यादा करीब है या माखनलाल  फोतेदार के ? अजीब पहेली है। उत्तर भी सहज है, स्पष्ट भी है।

 

प्रबुद्धजन चाहे उत्तर के प्रति अनजान बन जाएं पर आम आदमी को जरूर सही उत्तर का एहसास है, लेकिन पत्रकार है कि आभिलाषाविहीन फूल बनकर इसके उत्तर को लगातार नकारता चला आ रहा है। आधुनिक पत्रकारिता की अंधी गलियों में विकास की फूल-टाइप इच्छा के साथ तेज डग भरते हुए पत्रकार को यह सोचने की फुरसत ही नहीं है कि उसके साथ चल रहे कदम किस माखनलाल के हैं ? सुविधा की स्थिति में अगर किसी ने इस बारे में सोचा भी है तो यही अभिलाषा रखी है कि जीवन लक्ष्य निर्धारित करने वाले ये साथ चलते दम माखनलाल फोतेदार के हों, माखनलाल चतुर्वेदी के न हों तो अच्छा। ऐसा क्यों हो गया है ? आज के पत्रकार की अभिलाषा कुछ इस प्रकार क्यों परिभाषित होती है-

 

चाह यही सत्ता बाला के

गहनों में गूंथा जाऊं।

चाह यही कुर्सी पर टिकट

मिले बन्धु को ललचाऊं।

चाह यही सम्राटों के संग

विदेश घूमूं फोटू खिंचवाऊं।

चाह यही नेता का चम्मच

बनूं भाग्य पर इठालाऊं ।।

मुझे लिफ्ट देना मंत्री जी

उस काउन्टर पर देना फेंक।

भ्रष्टाचार को शीश नवाती

जिस पर आए रिश्वत अनेक ।।

 

सच एक महान उद्देश्य वाली कविता की पेरीडी बना कर शर्मिन्दगी महसूस हो रही है, लेकिन यह शर्मिन्दगी उन्हें क्यों नहीं महसूस होती जो एक महान पेशे को रिश्वत, कार, बंगला, शराब, विदेश यात्रा, आयातित सामान, कोटरी की सदस्यता आदी का पर्यायवाची बना रहे हैं। बल्कि इससे भी नीचे उतरकर किसी भी सरकारी भ्रष्ट संस्थान के विमानन यात्रा के लॉलीपॉप निमंत्रण को स्वीकारने के लिए समाज और समय की जरूरत के विरोधी बनने और सरकारी ढाबे के श्वान बनने को तैयार हो जाते हैं। यह सच है कि व्यवसाय की जरूरत पूरी करने के लिए पत्रकार को वेश्या के कोठे पर भी जाना पड़ता है, लेकिन सत्ता के करीब पहुंचने के लिए किसी तस्कर, देशद्रोह या उसके समकक्ष किसी भी संगठन की मेहमान-नवाजी स्वीकार करने को लालायित होना पत्रकार की किस अभिलाषा के अंतर्गत आता है ?

 

मौके बेमौके स्व. माखनलाल चतुर्वेदी को स्मरण करते हुए, कोई भी पत्रकार यह याद क्यों नहीं कर पाता कि चतुर्वेदीजी पत्रकार इसलिए थे कि वे कर्मवीर थे, देशभक्त थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे ? क्यों आज का पत्रकार सत्ता के माखनलालों के करीब खड़ा पल-पल घिघियाता खुद को बेचने पर उतारू है ? मृत मांस भक्षी गिद्धों की परविरिश पर लाखों खर्च करने को तैयार लोगों के दरबार में अखाद्ध-कुखाद्य भक्षी काक बनने को उसकी अ-भारतीय आत्मा क्यों ललचाती है ?

 

और अगर वह इस सब को अन्धी गलियों से भरे आधुनिक युग की आवश्यकता के रूप में सहज स्वीकार कर रहा है, तो पुष्प जैसी पवित्र अभिलाषा रखने वाला उस महान पत्रकार को स्मरण करने का विचार ही क्यों आता है उसके मन में ? यदि यह विचार आ गया है तो एक जरा सा सुझाव है, कम से कम एक बार वह इतना तो तय कर ही ले कि अब और कितना गिरना है उसे ? सीमा तय करने के बाद स्व. दद्दा की इज्जत की खातिर वह ईमानदारी से प्रयास करे कि उस सीमा से ज्यादा न गिरे।

 

इस सुझाव के साथ एक बार फिर दद्दा से क्षमा याचना, जिनकी कविता में तोड़-मरोड़ का दुस्साहस किया । लेकिन विश्वास है, अगर वे आज होते तो वे भी ऐसी ही कोई बात कहते । निश्चय ही भाषा और भाव कुछ ऐसी शैली में प्रवाहित होते कि आज के गुमराह पत्रकारों को चमकीला रास्ता मिलता, उचित अभिलाषा मिलती।

 

 

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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