लोकोन्मुखी है
जनसंचार की भारतीय दृष्टि
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डॉ.
महावीर सिंह
रहिमन बात
अगम्य है, कहन सुनन की नाहीं।
जो जानत नहिं
कहि सकत, कहत सो जानत नाहिं ।।
हर देश में
अपनी परिस्थितियों और सांस्कृतिक चेतना के अनुसार जनसंचार का पृथक एवं विशिष्ट
स्वरूप देखने को मिलता है। जनसंचार एक मशीनी प्रक्रिया नहीं है। यह स्त्रोत एवं
श्रोता की भावनाओं से जुड़ा है। भारतीय संस्कृति प्राचीनता और परंपरागत विरासत
भी जनसंचार की प्रकृति निर्धारित करने में अपनी भूमिका निभाती है। हमारे देश
में जनसंचार-प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन धाराओं धर्म, साहित्य एवं लोक व्यवहार
में समानान्तर रूप से प्रवाहित हो रही है। धर्म और अध्यात्म पर लंबी चर्चाएं
वेद-उपनिषद और पुराणों में उपलब्ध हैं। प्रारंभ में ये चर्चाएं गंभीर दार्शनिक
अभिव्यक्ति का एक भाग थीं लेकिन कालांतर में जनसमुदाय की मांग के अनुसार और
संवाद को आकर्षक बनाने के लिए कथा-कहानियों का रूप दिया गया। साक्षात्कार की
विधा का प्रभावशाली उदाहरण हमें उपनिषदों में मिल जाता है। धर्म, अध्याम और
दर्शन की चर्चा के बिना हमारा जनसंचार अधूरा है। आधुनिक युग के दो संचार
व्यक्तित्व, महात्मा गांधी और विनोबा भावे ने प्राचीन शास्त्रों एवं धार्मिक
मान्यताओं को आधार बनाकर आधुनिक समाज की समस्याओं का समाधान खोजा था। आम आदमी
भी अपने जीवन में धर्म-अध्यात्म की चर्चा हर स्तर पर करता है। उसके जीवन की
आधारशिला धार्मिक संस्कारों पर आधारित है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यत्न और उसके
बाद भी सारे कार्यक्रम धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। जनसंचार
में उन्हीं संस्कारों को प्रतीक के रूप में उपयोग किया जाता है।
धर्म और
अध्यात्म के साथ-साथ संस्कृत-साहित्य भी हमारी संचार विधाओं का मार्गदर्शक रहा
है। यह विशिष्ट पाठकों की पूंजी होते हुए भी जन सामान्य तक को अनुप्राणित करने
में कारगर रहा है। संस्कृत नाटक और काव्य ग्रंथों का प्रचार-प्रसार राजमहलों से
निकलकर ग्रामीण अंचलों में भी हुआ और इन विधाओं का प्रभाव भारतीय भाषाओं की
शब्दावली में देखा जा सकता है। प्राकृत, पालि, अपभ्रंश आदि भाषा रूपों से
संस्कृत का बाहुल्य अरबी-फारस या विदेशी भाषाओं की अपेक्षा अधिक सहज एवं स्पष्ट
रूप से विद्यमान है। साहित्य कथाएं हमारे संचार का न केवल आधार वरन सामाजिक
जीवन का ताना-बाना इन्हीं से बुना हुआ है। पंचतंत्र की कहानियों में संदेश तत्व
अत्यंत रोचक ढंग से समाहित है। आम आदमी उसे सहज ही स्वीकार कर लेता है।
वाल्मीकि, कालीदास, बाणभट्ट, भर्तृहरि आदि अनेक साहित्यकारों ने कथाओं को
साहित्यिक कलेवर में प्रस्तुत कर समान्य जनता को श्रेष्ठ जीवनयापन के लिए
प्रेरित किया । संचार के तत्वों में भाव तत्व, बुद्धि-तत्व, कल्पना-तत्व,
शैली-तत्व आदि की व्याख्या काव्य शास्त्रों में संचार के ध्येय का निरूपण करते
हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मुख्य आधार माना है और धर्म, हित, यश, आयु,
ज्ञान, उपदेश अनिष्ट नाश आदि को संचार के तात्कालिक उद्देश्य निश्चित किए गए
हैं। ‘भामह’
ने काव्यालंकार ग्रंथ में विस्तार से संचार के ध्येय की व्याख्या की है। इस
क्रम में ‘दंडी’
‘वामन’,
‘रूद्रक’,
‘आनंदवर्द्धन’,
‘कुंतक’,
‘भोज’,
‘मम्मट’
आदि सभी आचार्यों ने यश प्राप्ति, आल्हाद, कीर्ति, प्रीति,अनिष्ट-नाश,ज्ञान
प्राप्ति आदि की संचार और संवाद का तात्कालिक ध्येय माना है। इन उद्देश्यों की
प्राप्ति के लिए आचार्यों ने कुछ आवश्यक शर्तें भी निर्धारित की हैं। स्त्रोत
और संदेश की गुणवत्ता के संबंध में विचार करते हुए रचनाकारों ने अनेक सम्पदायों
का उल्लेख भी किया । संदेश तभी प्रभावशाली हो सकता है। जब उसका रचयिता
जनसामान्य में लोकप्रिय भी हो और उसकी रचनाओं में आवश्यक रचना तत्वों का समावेश
भी हो। संदेश की प्रभावशाली प्रस्तुति में निम्नांकित तत्वों की चर्चा अनेक
आचार्यों ने की है जिसे हम इस प्रकार वर्गीकृत कर सकते है :
1.
रस निष्पत्ति
सम्प्रदाय और साधारणीकरण :-
भरत मुनि
ने
नाट्यशास्त्र में इस सम्प्रदाय का विस्तृत विवरण किया है।स्थायी भाव, विभाव,
अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से ही संदेश का सही निरूपण संभव है। संदेश भी नौ
या दस रसों के रूप में श्रोता-पाठक को विषय वस्तु का रसास्वाद कराता है।
आलम्बन की चेष्टाएं विभाव के अंतर्गत आती हैं। और उन्हें अनेक प्रकार से
उद्दीप्त किया जाता सकता है। पाठक-श्रोता रसास्वाद करते समय सभी रसों के स्थायी
भाव का आनंद लेता है और इस प्रभाव की अभिव्यक्ति 33 संचारी भावों के द्वारा
संभव होती है।कहा गया है-विभावनुभाव व्यभिचार संयोगात् रस निष्पत्तिः। यदि यह
रस निष्पत्ति आदर्श रूप में होती है। रचनाकार जब अपनी अनुभूति को अनुभव कर लेता
है तो वहां श्रोता और रचनाकार या स्त्रोत में घनिष्ठ संबंध स्थापित हो जाता है।
यह क्रिया रचना में प्राण-पतिष्ठा करने का उपक्रम है। साधारणीकरण भी स्त्रोत,
श्रोता, और अंतर्वस्तु के एकाकार होने की स्थिति है।
2.
अलंकार
समप्रदाय :
‘भामह’
ने काव्यालंकार ग्रंथ में अलंकारों की महत्ता को निरूपित किया है।
‘रुद्रट’
ने भी 50 से अधिक अलंकारों की सूची बनायी है। अलंकारों द्वारा कथन को रोचक,
प्रभावशाली और आकर्षक बनाया जा सकता है। कहा गया है
‘भूषण
बिनु न विराजई कविता, वनिता, मित्त।’अलंकारों
के दोनों प्रकारों अर्थालंकार और शब्दालंकार, का विवेचन काव्य शास्त्रियों ने
संदेश या सूचना की महत्ता बढ़ाने के लिए किया है।
3.
रीति
सम्प्रदाय :
‘आचार्य
वामन’
ने संदेशों की शैली को संचार का आधार माना है। संचार को प्रभावशाली बनाने के
लिए उन्होंने तीन प्रकार की अभिव्यक्ति शैली का निरूपण किया है। 1. वैदर्भी
अर्थात् माधुर्ययुक्त शैली, 2. गौड़ी शैली अर्थात् ओज गुण संपन्न शैली और 3.
पांचाली शैली अर्थात् प्रसाद गुण संपन्न सहज एवं सरल शैली।
4.
वक्रोक्ति
सम्प्रदाय :-
‘आचार्य
कुंतक’
(क्रोच का अभिव्यंजनावाद) ने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए उक्ति वैचिक या
वाग्विदग्धता को महत्व प्रदान किया है। यह वक्रता पद, वर्ण, वाक्य, प्रबंध आदि
में टेड़ापन या बॉकपन लाने से संभव हो सकती है। अनेक लेखकों ने हास्य-व्यंग्य
रचनाओं में उक्ति वैचिञ्य शैली का उपयोग किया है। कृष्ण-गोपी संवाद में
वाक्-चातुर्य के अनूठे उदाहण मिलते है। राधाकृष्ण की लीलाएं हमारे जनसंचार का
मुख्य आधार है।
5.
ध्वनि
सम्प्रदाय :-
‘आनंदवर्द्धन’
ने अपने ग्रंथ ध्वन्यालोक में शब्दों की शक्ति की व्याख्या की है।
‘अभिनवगुप्त’
ने ध्वन्यालोक की समीक्षा करते हुए शब्द की शक्ति-अभिधा, लक्षणा और व्यंजना की
विस्तृत व्याख्या की है और संदेश या अलेखों में व्यंग्यार्थ की आवश्यकता का
निरूपण किया है।
6.
औचित्य
सम्प्रदायः-
‘आचार्यक्
क्षेमेन्द्र’
ने सभी सम्प्रदायों के सम्यक् अनुपात को समचार-आलेखों के लिए आवश्यक माना है ।
संचार तत्वों
में रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, व्क्रोक्ति आदि के अलावा संवाद शैली को आकर्षक
बनाने के लिए लोकस्वीकृत कताओं को आधार बनाया गया । पुराण-पुरूषों की लंबी सूची
यहां है जिसमें इतिहास के नायक और पुराणों के देवता या ईश्वर के अवतार हमारे
संचार के केंद्र में है । ललित कलाओं में राधाकृष्ण के जीवन-चरित्र पर आधारित
नृत्य, गीत, संगीत, चित्रकला आदि में अभिव्यक्ति का लोक मंगलकारी रूप में मिलता
है । ईश्वर स्वयं गृहस्थों के आंगन में लीलाएं करता है, और दैनिक जीवन में उनके
सुख-दुखः में भागीदारी करता है। यहां ईश्वर मनुष्य से अलग नहीं है। इन चरित्रों
के कारण सूचना-संदेश का कथ्य न केवल प्रामाणित हो जाता है वरन् वह व्यक्ति की
शक्ति को शील और सौंदर्य से ओतप्रोत भी करते हैं। रामायण-महाभारत के उदाहरण और
कताएं जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान करती है और संचार की प्रामाणिकता भी
बढ़ती हैं। भारतीय जनसंचार परंपरा में पौराणिक कतानक, ईश्वर की मानवसुलभ लीलाएं
जनसहमति का आधार होने के कारण अश्लील क्रीड़ाएं भी धर्म और आध्यात्मिक अनुभूति
से ओत-प्रोत हो जाती हैं। पूरे देश में इन कताओं ने एकीकरण की ऐसी लहर पैदा की
है कि भाषा, जाति, क्षेत्र की भिन्नता भी समाप्त हो जाती है । मीर के पद कश्मीर
और कन्याकुमारी में भाषाई जटिलता के बावजूद हर व्यक्ति के लिए सहज गाह्य हैं ।
राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, ब्रम्हा, इंद्र, गणेश कार्तिकेय, उमा, सीता, राधा
आदि धार्मिक पात्र संचार के प्रतीकों के रूप में स्वीकार्य हैं और इन प्रतीकों
के माध्यम से बड़ी से बड़ी सूचनाएं आम आदमी तक सहज रूप में पहुच जाती हैं। यही
कारण है कि विज्ञापनों में इन प्रतीकों का उपयोग व्यापक स्तर पर हो रहा है।
फिल्मों के 50 प्रतिशत से अधिक कथानक पौरणिक कताओं पर आधारित है। भारतीय
जनसंचार पुराकताओं को सशक्त टूल के समान उपयोग में लाता है। यहां निरंक्षर
स्तम्भ है।
महात्मा
गांधी ने इस संचार प्रक्रिया के समझने के लिए पूरे देश का भ्रमण किया था और
अपने संचार संबंधी विचारों को धर्म, अध्यात्म तथा लोक जीवन की शैली से सम्बंद्ध
किया था। पूजा-प्रार्थना से ही उनका दैनिक कार्य प्रारंभ होता था । उनका सक्षम
नेतृत्व इस आधार पर टिका था कि देश के करोड़ों लोग उनमें पूर्ण विश्वास करते
थे। श्रद्धा और विश्वास हमारे जनसंचार के आधार स्तम्भ है - भावनी शंकरौ वंदे
श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
बिना धार्मिक
तत्वों के हमारा जीवन पूर्ण नहीं होता और जनसंचार भी इन तत्वों के बिना अधूरा
है। इस विशेषता का दुरुपयोग कुछ पाखंडी लोग अपने स्वार्थ के लिए भी कर लेते है
और भोले-भाले लोगों को अंधविश्वास की गर्त में डाल हैं। गांधी जी ने
धर्मिनिरपेश्र रूप को बढ़ावा दिया था । उनका ईश्वर किसी सम्प्रदाय विशेष का
ईश्वर नहीं ता। गांधी जी आम आदमी की आत्मा में झांकते थे और इसीलिए उन्हें ही
सम्प्रदाय का विश्वास प्राप्त हुआ।
रघुपति राघव
राजा राम, पतित-पावन सीता राम।
ईश्वर अल्लाह
तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।
वैज्ञानिक युग
में भी धर्म का प्रभाव कम नहीं हुआ है। किसी न किसी रुप में यह आज भी हमारी
संचार साधनों का भाग है। रेडियो कार्यक्रम मंगलध्वनि, स्तुति, वंदना या भक्ति
संगीत से ही प्रारंभ होता है । धर्मनिरपेक्षता के उद्घोष में भी धर्म की पूरी
उपस्थति है । कोई भी राजनैतिक, सामाजिक कार्य धार्मिक अनुष्ठान बिना पूरा नहीं
होता । बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता मठ, मंदिरों, मस्जदों, गुरूद्वारों, चर्चों,
संत-महात्माओं के आश्रमों में श्रद्धा प्रदर्शित करते हैं और ऐसा कभी-कभी
वोटरों का विश्वास प्राप्त करने के लिए भी करते हैं । आज भी प्रवचन-कीर्तन,
उपदेश, धार्मिक कार्यक्रमों के लिए केबल चैनल पर्याप्त समय देते हैं । कुछ चैनल
को 24 घंटे इस प्रकार का प्रसारण करते हैं । समाचार पत्रों में विशिष्ट कालम
निर्धारित है । बिना धार्मिक शब्दावली के कोई कार्य प्रारंभ नहीं होता ।
‘श्री
गणेशाय नमः,’
‘अल्लाह
हो अकबार’,
‘आमीन’
आदि फ्रेज इस बात के प्रतीक हैं ।जनसंचार का आधार भूत तत्व अध्यात्म एवं
साहित्य ही है । संस्कृत-साहित्य फ्रेज की यह परम्परा आधुनिक भाषाओं और उनके
साहित्य में आज भी विद्यमान है । रसवादी लेखन की लोकप्रियता बीसवीं शताब्दी के
उत्तरार्द्ध तक बनती रही थी लेकिन समाजवादी और प्रगतिवादी विचारों ने रसवादी
अभिव्यक्ति के स्थान पर यतार्थवादी दृष्टि को महत्व प्रदान किया। प्रेमचंद ने
रचनाओं में रस की अपेक्षा आम आदमी की पीड़ा और शोषण के उपकरणों को महत्व दिया ।
साहित्य में वामपंथी विचारों की प्रबल प्रस्तुति ने नए आयामों को छुआ और
व्यक्ति को उसके यतार्थ से जोड़ा । मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय की अनुगूंज
ने संचार की प्रकृति को बदल दिया और साहित्य ने अपने आपको मानव समुदाय से
जोड़ने के लिए संचार-चेतना का सहारा लिया । साम्यवादी धारा से प्रभावित आलोचकों
जैसे डॉ. नामवर सिंह, डॉ. रामविलास शर्मा ने समीक्षा के नए उपकरण निर्मित किए ।
जनसंचार के उद्देश्यों ने व्यक्तिवादी दृष्टिकोण छोड़ समूह-संवेदना को संचार का
आधार स्वीकार कर लिया । आज का साहित्य आत्मकेंद्रित और व्यक्तिवादी मनोरंजन की
प्रवृति से मुक्त होकर प्रयोजनधर्मी संवाद का आधार बन गया है । साहित्य में राग
तत्व और कल्पना तत्व की न्यूनता भले ही भावक को खटकती हो लेकिन जीवन की यतार्थ
स्थितियां और वास्तविकताएं संचार साधनों का मुख्य प्रयोजन है । संचार सूत्र
पूरी मानवता के कल्याण के लिए कृत संकल्प है ।
जनसंचार
प्रक्रिया उप-साहित्यिक विधा है । साहित्य संसार की नींव रखता है । साहित्य ही
लोक जीवन और उसकी रचनात्मक शक्ति को निर्देशित करता है । साहित्य ऊर्ध्वमुखी
होकर धर्म-दर्शन के धरातल को छूता है और दूसरी ओर वह लोक कलाओं एवं लोक
संस्कृति को समृद्ध बनाता है । साहित्य व्यक्ति के लिए श्रेय भी है और प्रेय
भी, निवृत्ति मार्गी भी है और प्रवत्ति मार्गी भी । साहित्य की मौलिक शक्ति,
जनसंचार के संदेशों या सूचनाओं को रोचक एवं ग्राहय बनाने में सहयोग करती हैं ।
संचार प्रक्रिया में यथार्थ और कल्पना का अद्भुत संयोग रहता है । जहां यह
अनुपात प्रतिकूल होता है वहीं संचार प्रभावी छाप नहीं छोड़ पाता । हमारा जीवन
दर्शन, साहित्य और लोक व्यवहार का मिला-जुला रुप है अतः जनसंचार के इन्हीं
तत्वों से निर्देशित है ।
जनसंचार, मानव
समूह में भाषिक-संवाद का ऐसा व्यापक आधार निर्मित करता है जिसमें समाज अपने
सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को निर्धारित करता है । इस प्रक्रिया में जनसंचार
साधन एवं साध्य दोनों ही भूमिका अभिनीत करता है । हमारे देश में प्राचीन काल से
ही जनसंचार का मूल ध्येय धर्म, अध्यात्म, दर्शन, साहित्य और लोक कलाओं की ऐसी
समन्वित दृष्टि का विकास करना रहा है, जो व्यक्ति को व्यक्ति और समष्टि के रुप
में आत्मोन्नति की सारी संभावनाओं और उपलब्धियों के अवसर प्रदान करता है ।
व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना हमारे वैदिक साहित्य समें स्पष्ट रुप
से मिलती है । भारतीय दृष्टि में जीवन यापन की भौतिक रुपरेखा के साथ-साथ
व्यक्ति के आध्यात्मिक, चारित्रिक एवं सामाजिक जीवन में वृहत्तर मानव की कल्पना
भी सन्निहित है । ऐसा मनुष्य जो जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र आदि की संकीर्ण
परिधि को लॉघकर पूरे विश्व के कल्याण का सपना साकार कर सके और
‘सर्वे
भवन्तु सुखिनः’
का पर्याय बन सके । हमारी शात्रों में यह उद्घोष किया गया कि
‘एको
सद् विप्राःबहुधा वदन्ति’
अर्थात हम एक ही ईश्वर के विभिन्न रूपों को मान्यता देते हैं । सामाजिक एवं
सांस्कृतिक बहुलतावाद हमारे राष्ट्रीय चिंतन का अंश है । भारतीय संस्कृति
निवृत्तिमार्ग और प्रवृत्ति मार्ग दोनों की पोषक है यह व्यक्ति को श्रेय और
प्रेय दोनों का सम्यक् पाठ पढ़ाती है । इन्हीं तत्वों को ध्यान में रखकर व्यापक
जनसंचार का ताना-बाना बुना गया है । वेद, उपनिषद्, धर्म सूत्र, स्मृतियां
पुराण, महाकाव्य आदि में सूत्रों के माध्यम से और कतानकों के माध्यम से पूरे
समाज को सकारात्मक और जनकल्याण में प्रवृत करने का उपक्रम किया गया । ब्रह्म
विद्या भी व्याख्या अत्यंत रोचक ढंग से प्रश्नोत्तर के रुप में हमें उपनिषदों
में मिलती है । यह गुरु-शिष्य के मध्य चर्चा-वार्ता का उत्तम रुप है । यह संचार
का ऐसा आदर्श रुप है जिसमें अंतर्वस्तु एवं विधा-रुप का आदर्श संयोग मिलता है ।
उपनिषद्, पुराण, महाकाव्य इतने रोचक कथानकों भरे पड़े हैं कि उनके आख्यान
निरक्षर व्यक्तियों को भी कंठस्थ हैं और आत्मोन्नति की सारी संभावनाओं और
उपब्धियों के अवसर प्रदान करते हैं । व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना
हमारे वैदिक साहित्य में स्पष्ट रूप से मिलती है । भारतीय दृष्टि में जीवन-यापन
की भौतिक रुपरेखा के साथ-साथ व्यक्ति के आध्यात्मिक, चारित्रिक एवं सामाजिक
जीवन में वृहत्तर मानव की कल्पना भी सन्निहित है ।
शास्त्रों की
जटिल शिक्षा आम जीवन में कैसे सहजता से परिव्याप्त हुई यह एक आश्चर्यजनक घटना
लगती है । भारतीय दृष्टि में सूचना संदेश के महत्व के अधिक महत्व स्त्रोत का है
। अर्थात् कौन व्यक्ति सूचना या संबोधन दे रहा है । यदि यह स्त्रोत ऋषि-मुनि,
साधु-संत, तपस्वी और ज्ञानी व्यक्ति है तो उसकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता के
कारण संदेश या सूचना को जनमानस तुरंत ग्रहण कर लेता है और उसे व्यवहार में भी
लाने की चेष्टा करता है । कालांतर में अनेक संत कर्मियों-जायसी, सुर, तुलसी,
मीरा, कबीर, नामदेव, नामक आदि ने अपने काव्य द्वारा असंख्य पिछड़े-निरक्षर
लोगों को प्रेरणा दी और उच्चतर जीवन-यापन के लिए अनुप्राणित किया । अनेक
प्रवचनकारों ने कता-कीर्तन-वार्ताओं द्वारा रोचक शैली में धर्म अध्यात्म और
नैतिक आचरण की व्याख्याओं से आम आदमी को सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जागरण की ओर
प्रेरित किया । वैदिक परंपरा के 6 दर्शन तथा जैन-बौद्ध और चार्वाक दर्शन कुल नौ
दर्शन किसी न किसी रुप में पूरे देश में प्रचारित होते रहे । अनेक दार्शनिकों
ने जीवन की नई व्याख्याएं की और जनसंचार की प्रकृति एवं प्रभाव को सुनिश्चित
किया ।
श्रेय और
प्रेय मार्गी प्रवृत्तियों ने आम आदमी को अपन जीवन में सादगी, सहजता, दान-दया,
उदारता, श्रद्धा-भक्ति आदि मूल मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिश्रुत बनाए रखा ।
देश के ग्रामीण अंचलों में यहां के नागरिक बात-बात में संस्कृत ग्रंथों, संत
कवियों महात्माओं के प्रवचन आदि का दृष्टांत देकर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं
। इसी प्रकार लोकोक्तियों, सुक्तियों, मुहावरों कहावतों का व्यापक चलन है । यह
प्रकृति हमारी संचार भाषा को प्राणवान, अर्थवान् और जीवंत बनाए रखती है । जीवन
में सादगी, त्याग, दान, दया और की भावना ने
‘सादा
जीवन, उच्च विचार’
का ऐसा मुल्य रचा है कि इस संस्कृति ने आधुनिक युग में भी विवेकानंद, दयानंद,
महर्षि अरविंद, गांधी, विनोबा जैसे सफल एवं ओजस्वी संचार पुरुष दिए। जनसंचार
मात्र तकनीकी साधन नहीं है । तार, टेलीफोन, उपग्रह, रेडियो, टी.वी., इंटरनेट,
मुद्रण तकनीक आदि केवन विज्ञान और तकनीक के उपकरण भर है । मूल संचार तो व्यक्ति
की आकांक्षाओं और अभिप्रेरणाओं से ही निर्देशित होगा । अध्यात्म हमारे जीवन का
मूलमंत्र है इसी के आसपास, कला-साहित्य-संस्कृति या मानव की भौतिक चेष्टाएं
परिभ्रमण करती हैं
। जनसंचार के
क्षेत्र में धर्म-दर्शन और साहित्य ग्रंथों ने सूचना-संदेशों को जिस सार्थकता
के साथ सम्प्रेषित किया है वह अनूठा उदाहरण है । हर शास्त्र या ग्रंथ मंगलाचरण
से प्रारंभ होता है और फलश्रुति के साथ संपन्न होता है । इन फलश्रुतियों में
श्रोता के कल्याण की कामना की जाती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति
की आकांक्षा व्यक्त की जाती है । ताकि वह तमोगुण को त्याग कर रजोगुण और सतोगुण
को ग्रहण कर सके ।
धार्मिक
उत्सव, तीर्थ-यात्राएं, त्यौहार, यज्ञ, कता, प्रवचन, मेले, कुंभ-आयोजन, धार्मिक
शास्त्रार्थ, भक्ति संगीत, धर्म-सम्मेलन आदि के
परंपरागत साधन असंख्य लोगों को तत्काल सूचना-समाचार प्रेषित करने में आज भी
सक्षम हैं। सूचना और शिक्षा हमारी संस्कृति में आर्शीवाद का प्रतीक है। यह
संचार भी स्त्रोत का आशीर्वाद ही है जिसे तन्मयता से ग्रहण कर लेता है। यह
संचार आत्मा का सहचर है मात्र बौद्धिक कसरत नहीं है जिसे व्यक्ति सुन भले ही
ले लेकिन उन पर व्यवहार नहीं करता । भारतीय दृष्टि में संचार का प्रथम सोपान है
अभिवादन, नमस्कार यास्वस्ति संबोधन। अभिवादन हमारे संप्रेषण का सूत्र जोड़ देता
है और संचार को गतिशील बना देता है । वैदिक ग्रंथों में भी दैनिक जीवन की पूरी
चर्चा दी हुई है। संस्कार, विचार, व्यवहारऔर आचरण के सूक्ष्म नियम बने हुए हैं
जो दैनिक कर्म अर्थात् शौच-स्नानादि से लेकर भक्तियुक्त पूजा-पाठ, अनुष्ठान आदि
तक की सूचना इन ग्रंथों में है। यही नियम लोकगीतों में भी गाए जाते है।
प्राचचीन शास्त्रों मं जनसंचार के उद्देश्य उसके तत्व संचार के पारंपरिक और
कला-साहित्य की वृत्तियों पर अलग से ग्रंथ है। साचार-भाषा को नियमित करने के
लिए व्यापक एवं भाषाशास्त्रीय ग्रंथों की भरमार है। वेदों से संबंधित 6
वेदांगों के अलावा 80 शिक्षा ग्रंथ और 6 प्रतिशांख्य है जो केवल शब्दों के
अर्थों एवं पद रूपों को निर्धारित करते हैं। पाणिनी, पंतजलि, कात्यायन से लेकर
आज तक के वैयाकरणिक उन्हीं के सिद्धों से भाषा-ज्ञान प्राप्त करते है। संचार की
लोक स्वीकृति भाषा विकसित करने के क्रम में लौकिक संस्कृत, पाली,प्राकृत,
अपभ्रंश आदि भाषाओं का स्वरूप निर्धारित हो सका । धर्म और लौकिक जीवन का सुंदर
समन्वय ही संचार की भारतीय दृष्टि है। अध्यात्म-साहित्य और लोक साहित्य इन
तीनों स्तरों पर संसार के समन्वय