Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

संपादकीयआवरण कथादस्तावेजप्रसंगवशबातचीतमेरा समयसक्सेस स्टोरीविमर्शस्मृति-शेषपरदेशअंतरजालसाहित्यइत्यलम्

पत्रिका-जगत्अन्यान्यपाठ्यक्रमगतिविधिसमाचारसंदर्भ-कोशआलेख भेजिएआपके पत्रपुरातन अंकहमारा मिशनप्रकाशनमुख्य-पृष्ठ

 

खास टिप्पणी

 

 

 

एक आग का दरिया और डूब के जाना है

 -------------------------------------------

विभु कुमार

 

 

इस पंक्ति को भारतीय समाज में कितने ही संदर्भों में और कितनी तरह से उपयोग में लाया जा सकता है, इस शेर की अर्धाली के रचयिता को भी शायद न मालूम रहा हो। यही इसके रचनाकार को महत्वपूर्ण और कालजयी बनाती है।

 

-क्या कहा : रचनाकार का नाम

 

- बतना दूंगा, आप नाहक शर्मिंदा होंगे, क्योंकि इन पंक्तियों को तो आप जब तक कोट करते ही होंगे। रचनाकार का नाम भी आपके जेहन में होगा। ऐन वक्त पर भूल गए-क्या कीजिएगा : जान ही ले लेंगे का (बिहारी लहजा)  

 

(व्यक्तिगत)

 

चार वर्ष बाद चौसठ का हो जाऊंगा, सेवानिवृत्त भी, फिर क्या करूंगा, सोचा नहीं। नौकरी तो नहीं ही करूंगा, लेकिन क्यों नहीं करूंगा, यह तो बिलकुल ही नहीं सोचा है।

 

दरअसल, सोचना मेरी आदत में शुमार ही नहीं : इसी सच को एक बार अपनी एक कहानी में लिख गया, करेला और नीम चढ़ा कि बाबूजी ने वह कहानी रेडियो पर सुन ली । चिंतित हो गए थे बाबूजी। कई दिनों तक मुझसे पूछते रहे । जब मैंने कहा कि हां कई बार ऐसा हो जाता है कि मैं बिल्कुल विचार-शून्य हो जाता हूं। बाबूजी चुप लग गए । संभव है सदमा तो लगा ही हो।

 

सच इतना खतनाक होता है, उस दिन पहली बार जाना। निर्णय लिया कि भविष्य में ऐसा हो सकना संभव नहीं था। लेखक अभिशप्त है सच लिखने के लिए। यही उसकी नियति है।

 

मुक्तिबोध ने क्या फोकट में ही लिख दिया- एक सच्चा लेखक अपने खुद का दुश्मन होता है।

 

(सच का सच)

 

लिखना कभी मेरी पहली प्राथमिकता नहीं रही। सच जरूर हमेशा प्राथमिकता में रहा । इस तरह का सच तो लेखक भी नहीं कहते । वे तो लेखन को जीवन-मरण का प्रश्न मानते हैं, अपने लेखन से ज्यादा खुद को ग्लोरीफाई करते हैं।

 

(पुनः सच का सच)

 

सच बोलना (कहना, या देखना) ही सच है। चाहे उसे लिखा जाए, या मीडिया पर दिखाया जाए। सच ही विश्वसनीयता का प्रमाण है। चाहे वह मीडिया का हो या लिखित शब्दों का, मीडिया पर बोले, या दिखाए जा रहे सच की विश्वसनीयता शक के दायरे में आ गयी । इसीलिए कहानी-कविता में व्यक्त शब्द की विश्वसनीयता विगत वर्षों में निरंतर बढ़ रही है और मीडिया की आंख का दिखाया जाने वाला सच झूठा पड़ रहा है। कबीर का मैं कहता आखिन देखी, मीडिया की आंखिन देखी का मखौल उड़ा रहा है।

 

कबीर ऐसे पहले साहित्यकार थे जिन्होंने सर्वप्रथम साहित्य को समाज के लिए मीडिया की तरह इस्तेमाल किया । बाद में भारतेन्दु, प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन, राही मासूम रज़ा, हरिशंकर परसाई, शरद जोसी, कमलेश्वर, श्रीलाल शुक्ल, मुक्तिबोध ने कबीर परंपरा का संवर्धन किया।

 

मैं इस साहित्यकारों को मीडिया परसन ही मानता हूं और आज तक के सभी लेखकों को, जो अपने समय को सच के चश्में से देखते हैं। मीडिया की तरह रंगीन और व्यावसायिक चश्में से नहीं।

 

साक्षात्कार में प्रकाशित मेरी कहानी, पराए घर में अकेले जैसे लिखने में चार वर्ष लगे थे, की सुधिजनों ने काफी प्रशंसा की थी। प्रसिद्ध समीक्षक कनक तिवारी और उनकी कवि उपन्यासकार पत्नी तो अभिभूत थे। पराए घर में अकेले, कहानी में विटवीन दि लाइंस पढ़ना ज्यादा जरूरी है। यही बात इस कहानी को बेजोड़ बनाती है। बहुत कम ऐसी कहानियां मैंने पढ़ी है जो बिटवीन दि लाइंस, पढ़ने को बाध्य करती हैं।

 

पराए घर में अकेले हो या हम मुमताज बोल रहे हैं मीडिया के सच से कहीं ज्यादा गहरे सच को दिखाती हैं। एक हिन्दू और एक मुसलमान के । यह आज के दौर का एक भयावह सच एक ऐसे व्यक्ति का सच है जो समाज-राष्ट्र में रहकर भी अकेला है।

 

दूर्भाग्य है कि मीडिया सामान्य-जन को नहीं जानता । सामान्यजन के नाम पर वह इंदिरा-सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, नरेन्द्र मोदी, लालू-मुलायम सिंह यादव को जानता है। ये और इनके जैसे अनेक को जानता है जो झूठा सच है।

 

सांप्रदायिकता, धर्मांन्धता, भ्रष्टाचार के कितने सच होते हैं - हो सकते हैं, यह एक लेखक ही जान सकता है - मीडिया नहीं।

 

बिहार के प्रोफेसर मटुकनाथ की अपनी ही शिष्या से प्रेमगाथा को मीडिया ने जिस तरह भुनाया वह किसी तरह अश्लीलता से कम नहीं है। इसीलिए उसे बाजारू और चालू बना दिया गया। कभी-कभी स्वयं लेखक भी अपनी प्रेमकथा को बाजारू बना देते हैं। संदर्भ : रामशरण जोशी की हंस के दो अंकों में प्रकाशित रचना-मेरी आत्मस्वीकृतियां, हंस के उन दोनों अंकों को जिन्होंने भी पढ़ा है वे जोशी को घृणित एवं अश्लील व्यक्ति ही कहेंगे। यह एक अपवाद है। कोई सही लेखक दोनों ही प्रेमकथा को लिखता तो संभवतः वह रचना साहित्य की एक श्रेष्ठ रचना में शुमार होती। मीडिया ने प्रोफेसर मुटुकनाथ की सच्ची प्रेमकथा को बाजारू एवं अश्लील बना दिया। विज्ञापन से ढेरों धन पीटा।

 

ऐसी कई घटनाएं हैं जिनका इस्तेमाल मीडिया ने महज अपने व्यावसायिक हितों के लिए, मानवीय करूणा या सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता के तहत नहीं, मसलन : अनंत अपहरण कांड, प्रोफेसर  सभरवाल हत्याकांड और राखी सांवत-मीका चुंबन कांड, इसे चटकारे ले-लेकर दर्शकों को परोसा गया और बेशर्म मीडिया अपनी पीठ ठोकता रहा।

 

-कभी बुद्धू-बाक्स के नाम से व्यंग्य से तथाकथित रूप से सम्मानित किया गया यह बुद्ध बाक्स आज आत्मरति का शिकार है। वह भी इस कदर कि उसे अपनी दुर्गति भी नजर नहीं आ रही है। पूरा बुद्धू बाक्स समाचारों से लेकर सीरियल्स तक इतना नंगा हो गया है कि अब शर्म को भी शर्म नहीं आती और रीमिक्स दिखाने वाले चैनलों ने तो अश्लीलता की आखिरी मुहर लगा दी।

 

साहित्य के लिए पूरे हफ्ते में आदा घंटा भी मयस्सर नहीं। साहित्य के नाम पर फूहड़ हास्य व्यंग्य कवि सम्मेलन ही दूरदर्शन की उपलब्धि हैं। साहित्यिक विमर्श-अच्छी कहानी-कविता पाठ, दूरदर्शन के लिए भूली-बिसरी बातें हैं। मीडिया से जुड़े मीडियाकर्मी भी शर्मिन्दा होते हैं, लेकिन भ्रष्ट एवं अश्लील व्यवस्था के चलते विवश हैं।

 

मीडिया की संस्कृति, झूठा सच की है। सोफा-कम-बेड की तरह झूठ ज्यादा-सच कम, बहुत से लेखक मीडिया (प्रिंट मीडिया) को ध्यान में रखकर लिखते । पिछले दिनों धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान एवं रविवार के लेखक इन पत्रिकाओं के संपादक की रूचियों, आदतों को ध्यान में रखकर रचनाएं लिखते थे । मात्र व्यंग्य लेखन ही थोड़ी छूट ले लेता था क्योंकि हरिशंकर परसाई और शरद जोशी का कद इन पत्रिकाओं से कहीं ज्यादा बड़ा था। इस छूट का लाभ टुटपुंजिए व्यंग्य लेखकों ने लिया । हाशिये पर रहने वाला व्यंग्य साहित्य की मुख्यधारा में शामिल हो गया, लेकिन रंगा सियार कब तक शेर रहता पुनः हाशिए पर चला गया । व्यंग्य की हठधर्मिता देखिए वह साहित्य की एक विधा होने की मांग करने लगा। इस तरह की उपहासास्पद बात साहित्य में आज तक नहीं हुई।

 

व्यंग्य का यह आत्म-रति का दौर था । जब यह भ्रम टूटा तो इन व्यंग्यकारों को प्रिंट मीडिया में फिलर की भूमिका को अपमान के साथ स्वीकारना पड़ी । 

 

-फिल्म भी मीडिया ही है, प्रिंट मीडिया से उसका गहरा रिश्ता होना ही चाहिए न सिर्फ प्रिंट मीडिया से बल्कि दूरदर्शनीय मीडिया से भी। यह दुर्भाग्य की ही बात है कि इन तीनों (दोनों भी कह सकते हैं) मीडिया के बीच आपसी अंडर स्टेंडिंग बहुत खराब है। दोनं के लिए प्रिंट मीडिया अल्पसंख्यक की तरह है। प्रिंट मीडिया आरक्षण पाकर भी सवर्ण मीडिया (दूरदर्शन, चैनल आदि) से कमतर माना जा रहा है।

 

शब्द, अक्षर हैं - यानी जो कभी नहीं मिटते। अक्षर-ब्रह्म है (भारतीय संदर्भ में ) मीडिया आसमान छू सकता है, लेकिन अक्षर जमीन से जुड़ी हकीकत का (अक्षर ब्रह्म होने के बावजूद) एकमात्र वैश्विक सच है।

 

-इस सच का वरण ही एकमात्र सच है-

 


विभू कुमारःदेश के प्रख्यात कथाकार एवं लेखक । कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित । इन दिनों रायपुर में रहकर स्वतंत्र लेखन करते हैं. संपर्क- एच.आई.जी., सी-2/आई, देवेन्द्र नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़


lll

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

Google
WWW www.mediavimarsh.com