राष्ट्र
के विकास में भागीदार हो मीडिया
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सच्चिदानंद जोशी
इसे
हमारे देश का परम सौभाग्य ही समझना चाहिए कि आज इस अत्यंत नाजुक और कठिन दौर
में जबकि चारों ओर अलग-अलग चुनौतियां सिर उठाए खड़ी हैं, में हमारे राष्ट्रपति
के रूप में एक ऐसे विद्वान प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति पद के साथ
जुड़ी बहुत सारी मान्यताओं और दायरों से बाहर निकलते हुए देश के नागरिक से
विभिन्न तबके के लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया है। महामहिम जब संबोधित करते
हैं, तो प्रत्येक उस वर्ग विशेष के लिए वे एक कार्यक्रम, एक मिशन एक वायदा और
एक प्रतिज्ञा लेकर जाते हैं जिसके लिए वह कार्यक्रम आयोजित है। फिर वह चाहे
विद्यार्थियों का समूह हो, कृषकों का समूह हो या वैज्ञानिकों का। वे सभी के लिए
दिशादर्शन देते हैं, जो समयोजित और राष्ट्र के लिए हितकारी होता है। सन् 2020
का अपना विकसित भारत का सपना वे हर उसके साथ बांटना चाहते हैं, जो भारतीय है और
जिसे अपने देश पर गर्व है।
राष्ट्रीय
प्रेम दिवस के अवसर (16 नवंबर) को उन्होंने मीडिया के साथ अपना सपना बांटा है
और मीडिया को राष्ट्र के विकास में भागीदार बनने का आह्वान किया है। उनकी
अंतरात्मा ने इस बार मीडिया के मन के तारों को छुआ है और उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति
और सकारात्मक दृष्टि ने मीडिया को प्रेरित करने का प्रयास किया है। उनका मानना
है कि मीडिया का राष्ट्र के विकास में भागीदार बनना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की है कि मीडिया ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक पहलुओं को
उठाए और कठिन समस्याओं के समाधान खोजने में सहायता प्रदान करे।
श्री कलाम ने
सन् 2020 के बारे में मीडिया को सचेत करते हुए अपेक्षा की है कि मीडिया आने
वाले समय में अपने अंदर ऐसे परिवर्तन अवश्य लायेगा कि वह भारत की एक अऱब की
आबादी का सही प्रतिनिधित्व कर सके। राजनीति के बहुत अधिक कव्हरेज पर चिंता
व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ‘राजनीति
के दो भाग है राजनीति की राजनीति और विकास की राजनीति। लेकिन खेद की बात है आज
राजनीति की राजनीति को ही मीडिया प्रमुखता से उठा रहा है।’
राष्ट्रपति जी
की पीड़ा और आतुरता स्वाभाविक है।2020 का उनका सपना भी अपनी जगह शाश्वत और कायम
है। समय और तकनीक जिस तेजी से बदल रहे हैं, उनके चलते विकास और विचार की दिशा
तय करना भी आवश्यक हो गया है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारे मीडिया में अभी
इस बारे में कोई चिंतन प्रारंभ हुआ है या हम अभी भी बाजार की चकाचौंध के आगे
मजबूर और गुलाम होकर खड़े होकर अपनी नियति को कोस रहे है।
इसमें कोई शक
नहीं कि तकनीक और प्रतिभा में हमारा मीडिया किसी भी विकासशील देशों से चार कदम
आगे ही निकलता दिखाई देता है। लेकिन इन सबके बावजूद कौन सी ऐसी बात है जिसके
कारण हमारा लक्ष्य विकास पर केंद्रित नहीं हो पाता और हम सिर्फ चकाचौंध में ही
उलझकर रह जाते हैं। कौन से कारक हमें समग्र भारत का प्रतिनिधि मीडिया बनने से
रोकते हैं और हम सिर्फ बाजार केंद्रित उपभोक्ता समर्पित उत्पाद बनकर रह जाने
में ही अपने अस्तित्व की परिणिति मान लेते हैं। क्या कभी हमने प्राप्त
परिस्थिति के आगे घुटने टेक देने की मानसिकता से उठकर दृढ़ इच्छाशक्ति से
कारणों को टटोलने की कोशिश की है ?
कब तक मीडिया
की प्राथमिकता के चरम पर श्री अमिताभ बच्चन की विश्वनाथ मंदिर में पूजा या
अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या की शादी बनी रहेगी। कब तक सचिन तेंदुलकर की कोहनी या
सानिया मिर्जा के कपड़े हमारे राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न बने रहेंगे। कब तक हम
अबू सलेम या दाऊद इब्राहिम जैसे अपराधियों के महिमामंडन से अपनी खोजी
पत्रकारिता की खुराक पूरी करते रहेंगे या फिर कब तक हम दोयम दर्जे की राजनीति
में फंसे हमरे कर्णधारों के सुधरने की अपेक्षा से सदाचार का शॉक ट्रीटनेंट देते
रहेंगे। कब तक हम ऐसे महत्वहीन विषयों पर अपनी क्षमता, प्रतिभा और संसाधन जाया
करते रहेंगे यह सोच और चिंतन का विषय है।
हाल के कुछ
वर्षों में तकनीक के सहारे हम रहस्य की गर्त में छिपे बारीक और छोटे से छोटे
विवरण को जानने की स्थिति में पहुंच गये हैं। संसाधनों की भी बाढ़ सी हो गई है।
सुविधायें भी निरंतर बढ़ती जा रही है। भौतिक, आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से आज
मीडिया साधन संपन्न व्यवसायों की श्रेणी में है। ग्लैमर के कारण चहेते
व्यवसायों की भी श्रेणी में मीडिया का शुमार है। लेकिन क्या हमारे भारतीय चिंतन
के प्रति मीडिया की कोई दृष्टि है ?
क्या भारत के विकास के प्रति मीडिया का सकारात्मक रूख है, इसे भी देखना होगा।
किसी तंत्र या
प्रक्रिया पर महज उंगली उठा देना ही पर्याप्त नहीं होता। उसकी तह में जाकर उठाई
गई समस्या के समाधान पर भी प्रकाश डालना जरूरी होता है। राष्ट्रपति जी जब
सकारात्मक पहलू की बात करते हैं तो आशय भी शायद यही है। केवल मूक दर्शक या
पर्यवेक्षक बनकर स्थितियों की समीक्षा करने का समय अब लद चुका है। उस दृष्टि से
देखा जाये तो राष्ट्रपति जी ने मीडिया को विकास में भागीदार बनने का आह्वान कर
एक प्रकार से चुनौती ही दी है।
अब तक मीडिया
ने बहुत सुखद स्थितियों में अपना उत्तरदायित्य निभाया है। टिप्पणी, समीक्षा से
लेकर स्ट्रिंग ऑपरेशन तक सभी कुछ मीडिया ने अपनी सुविधा से अपनी शर्तों पर किया
है। इसमें कही मुख्यधारा में सहभागिता या साझेदारी की बात नहीं थी। उससे फायदा
कितना हुआ है और नुकसान कितना यह अलग खोज का विषय हो सकता है। लेकिन इतना जरूर
है कि मीडिया हर प्रक्रिया या तंत्र में शंकायें पैदा करने में कामयाब हो गया,
खलबली मचाने में कामयाब हो गया। ‘सबसे
तेज’,
‘सबसे
अलग’
‘एक्सक्लूसिव’,
‘सनसनी’,
‘खुलासा’,
‘भण्डाभोड’
आदि जुमलों की नियति भी यही है। हंगामा खोज पत्रकारिता के जरिए मीडिया समाज में
अपना कौतुक भी करवाया रहा और शाबासी भी लूटता रहा। कई-कई दफे तो परंपरागत
मान्यताओं को तोड़कर दो निकायों के बीच टकराहट पैदा करने में भी मीडिया कामयाब
हो गया। सांसद घूसखोरी प्रकरण में जिस प्रकार विधायिका और न्यायपालिका की
टकराहट की स्थिति उत्पन्न हुई वह इसका सशक्त उदाहरण है। लेकिन इस सबसे हासिल
क्या हुआ ?
स्व. दुष्यंत कुमार की पंक्तियां बरबस याद आ जाती है,
‘सिर्फ
हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी
कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिये।’
और सूरत बदलने
के लिए भागीदारी का आह्वान लेकर हमारे राष्ट्र प्रमुख सामने आये है। हो सकता है
इससे मीडिया की खुमारी टूटे और आत्ममुग्धता के इस दौर से उबरकर मीडिया अब अपनी
प्रभावी सकारात्मक भूमिका के बारे में चिंतन प्रारंभ करे।
सबसे अनुकरणीय
बात तो यह है कि राष्ट्रपति जी ने अपनी बात में कोरा आदर्शवाद नहीं दिया है,
बल्कि व्यावहारिक धरातल पर सफलतापूर्वक संचालित ठोस उदाहरणों के माध्यम से
उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट किया है। इतना ही नहीं अपनी बात के अंत में
उन्होंने मीडिया के सामने तत्काल क्रियान्वयन के लिए एक मिशन भी रखा है, जिसके
प्रमुख बिन्दु हैः-
1. सन 2020 के
पूर्व विकसित भारत के लिए मीडिया अभियान।
2. मीडिया
‘पुरा’
परियोजना के विकास में भागीदार बने।
3. मीडिया
भारतीयों की सफलता के सभी उदाहरणों का उत्सव मनाये, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों
के प्रयासों का।
4. मीडिया सन्
2015 तक भ्रष्टाचार मुक्त भारत की रचना के संकल्प में सहभागी बने।
5. मीडिया एक
ऐसे प्रबुद्ध और ज्ञानी समाज, जिसमें मूल्य आधारित शिक्षा, धर्म का आत्मिक
शक्ति के रूप में विकास और आर्थिक उन्नति का पथ प्रशस्त हो, की रचना में
सहभागी बने।
6. प्रिंट और
इलेक्ट्रानिक मीडिया नारी के सम्मान की रक्षा करें।
7. प्रिंट
मीडिया के पुराने संदर्भों का स्केनिंग कर उन्हें डिजिटल रूप में परिवर्तित
करें ताकि वे धरोहर के रूप में सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए
प्रेरणा बने तथा शोध के लिए उपयोगी हो।
8. मीडिया
अपने लिये आचार संहिता तैयार करे और सुनिश्चित करे कि सभी रिपोर्ट, प्रकाशन के
पूर्व अच्छी तरह जांच ली गई है तथा उस पर पर्याप्त शोध हो चुका है। यह देश की
शांति, विकास और सुरक्षा के लिए परम आवश्यक है।
राष्ट्रपति
महोदय के मिशन का यदि कुछ अंश भी मीडिया आत्मसात कर उस पर अमल कर लेता है, तो
निश्चित ही हम सन् 2020 से काफी पहले विकसित भारत का वह लक्ष्य पा लेंगे, जिसका
सपना कलाम साहब ने देखा है और उनकी आंखों से हम सबने देखा है। इसके साथ ही
भारतीय मीडिया को एक विकासशील सकारात्मक मीडिया की वह पहचान भी मिल जायेगी
जिसके लिए हम सभी के मन में छटपटाहट है। इस परिदृश्य पर बरबस ही कुछ पंक्तियां
मन में आ गई।
बन सहयोगी,
करे भागीदारी
भारत को दे,
एक नया आयाम
करे मीडिया
नेतृत्व विकास का
राह दिखाएं
श्री अब्दुल कलाम।
राह दिखाने के
लिए कलाम साहब आपको हजार-हजार सलाम।
सच्चिदानंद
जोशी :
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्ट्रीय पत्रकारिता
विश्वविद्यालय,
भोपाल के संस्थापक
कुलसचिव रहे, इन
दिनों रायपुर स्थित
कुशाभाऊ ठाकरे
पत्रकारिता एवं
जनसंचार विवि में
कुलपति हैं।
संपर्क : ठाकरे
विश्वविद्यालय, कोटा स्टेडियम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
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