कर्त्तव्य प्रधान व्यवस्था की जरूरत
----------------------------------
राजनाथ सिंह 'सूर्य'
हमारे
देश का चिकित्सा शास्त्र (जिसे हम आयुर्वेद के नाम से जानते हैं) रोगों के
उपचार में प्रकृति के अनुरुप औषधि और अनुपात का उपयोग करने का परामर्श देता है
। रोगी की प्रकृति, पित्त, कफ या वात में से जिसकी प्रबलता से प्रभावित रहती
है, उपचार में उसके संज्ञान की मुख्य भूमिका रहती है । वही लाभकारी भी साबित
होती है । जो तथ्य या तत्व व्यक्ति का संज्ञान लेने के लिए आवश्यक है, वही तथ्य
समाज का संज्ञान लेने में भी महत्वपूर्ण होता है । किसी समाज, समुदाय या
वातावरण को स्वस्थ बनाये रखने के लिए जरुरी है कि उसकी प्रकृति को केंद्र
बिन्दु बनाया जाये ।
भारतीय समाज
की आदिकाल से जो प्रकृति रही है, उसका संज्ञान भूलकर या उसकी उपेक्षा कर जितने
भी उपाय किए जा रहे हैं;
उनका विपरीत परिणाम हो रहा है । ऐसा एक उपाय पिछले दिनों
‘सूचना
का अधिकार’
का कानून बनाकर किया गया । 15 अगस्त 1947 के पूर्व हम अपनी समाज रचना और भावी
शासन व्यवस्था की चर्चा अपनी सनातन प्रकृति को केंद्र बिन्दु बनाकर किया करते
थे, लेकिन विदेशियों के हाथ से सत्ता,
‘स्वदेशियों’
के हाथों में आने के उपरांत हमने पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में लिखे गए लघु
उपन्यास
‘एनीयल
फार्म’
के पशु-पात्रों के समान उन्हीं तत्वों को केंद्र बिन्दु बना डाला, जिसका भारतीय
प्रकृति के विपरीत होने का गला फाड़-फाड़ कर प्रचार करते रहे हैं । एनीयल
फार्म के पशुओं ने मनुष्य की दासता से मुक्ति के लिए अपने अभियान का नारा
दिया थाः टू लेग्ज आर बैड, फोर लेग्स आर गुड।
मनुष्य से
मुक्ति के उपरांत पशुओं के जिन प्रतिनिधियों ने
‘व्यवस्था’
संभाली, जब वही चार के बजाय दो पैर पर चलते हुए प्रकट हुए तो पशु समुदाय ने इस
बदलाव का कारण जानना चाहा !
दो पैर पर चलने वाले पशुओं ने उन्हें एक नया नारा दिया
‘फोर
लेग्स आर गुड बट्टू लेग्स आर बेटर ।’
हमारे स्वदेशी शासकों ने भी यही किया । व्यवस्था संभालने के बाद पराधीनता युग
के शासकों के आचरण पर उतर आने के बाद कहा- भारतीय जीवन दर्शन श्लाघनीय है,
व्यवहारिक नहीं । जो व्यावहारिक नहीं, उस पर चलना उचित नहीं है । उन्होंने भी
चार पैरों पर चलने के पशुओं के स्वाभाविक आचरण छोड़ने वाले एनीमल फार्म के पशु
व्यवस्थापकों के समान प्रकृति के विपरीत आचरण पर आरूढ़ होकर आना वैशिष्ट साबित
करने के लिए जो अनेक मुखौटे लगाए हैं, उन्हीं में से एक है
:
सूचना के अधिकार का कानून ।
हमारी समाज
रचना और व्यवस्था का जब से संज्ञान है, वह कर्तव्य पर आधारित रही है । हमारी
प्रकृति धर्मान्तरण अर्थात् कर्तव्य पालन की रही है । प्रत्येक दायित्व का
संपादन धर्म के अनुसार किया जाना हमारी प्रकृति का हिस्सा है । राजा-प्रजा,
पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य, आदि सभी के संदर्भ में हमारे समाज रचनाकारों ने
कर्तव्य को केंद्र में रख कर नियमों का निर्धारण किया है । विश्व की अन्य जितनी
भी मजहबी या दार्शनिक व्यवस्था है, वह अधिकार के अतिरेक से प्रभावित है। नागरिक
का अधिकार क्या है, शासन व्यवस्था चलाने वाले का अधिकार क्या है; यहां तक कि
हमने अपने अपने संसद के लिए ‘अधिकार’
के रूप में वह सब कुछ उसी प्रकार स्वीकार कर लिया है जो अलिखित रूप से
इंग्लैण्ड की संसद के लिए प्रचलित है, फलतः संविधान में कार्यपालिका,
व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के ‘अधिकारों’
पर ही अधिक बल दिया गया। नतीजा यह हुआ कि जो कमजोर पड़ता गया, उसके अधिकार
क्षेत्र में अतिक्रमण की प्रवृत्ति इस कदर हावी होती गई कि आज व्यवस्था के
तीनों अंग अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के लिए जंग में उतर आये हैं। उपरोक्त कथन
का यह अर्थ लगाना सर्वथा अनुचित होगा कि संविधान में सनातन भारतीय प्रकृति
कर्तव्य का समावेश नहीं है। है, लेकिन वह आचरण के अभाव में महज कागजी होकर रह
गयी है। संविधान स्वीकार करने के मात्र 56 वर्ष के भीतर हमने उसमें सवा सौ से
अधिक संशोधन कर दिये हैं और ‘विसंगतियों’
को संगत बनाने के लिए न्यायपालिका के प्रयास को निष्प्रभावी करने के लिए एक और
विनाशकारी प्रभाव वाले संशोधन को अंजाम देने की तैयारी कर चुके है । ऐसा क्यों
हो
रहा है ?
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हम अधिकार के अतिरेक से वशीभूत हैं। इसलिए
व्यवस्थापिका में अराजकता, कार्यपालिका में अनास्था और न्यायपालिका के क्षेत्र
में ऊहापोह की स्थिति बढ़ती जा रही है। तीनों ही पक्ष अपने दायित्व के अनुरूप
काम करने की बजाय अपने-अपने आचरण में स्खलन के लिए दूसरे पर दोषारोपण कर रहे
हैं। सो, यदि यह कहा जाए कि संविधान लागू होने की अर्धशताब्दी बीत जाने के
बावजूद दायित्वबोध के अभाव से उपजी आचरणहीनता के कारण यहां हमारे गण का बोध
नेपथ्य में चला गया है; वही हमारा तंत्र कुत्सितता से पूरी तरह आच्छादित हो गया
है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल, हमने अपने प्रकृति का व्यवस्था बनाने में
संज्ञान नहीं लिया।
हमारे देश में
गोपनीयता का कानून भी लागू है और सूचना के अधिकार का भी। दोनों एक-दूसरे के
विपरीत तो हैं ही, आजकल गोपनीयतावादियों और सूचना के अधिकारिवादियों में जम कर
ठनी है। अधिकारों को व्याख्यायित करने के लिए कानूनों का नित्य नया संक्ल्प
किसी भी विकल्प पर पहुंचने में मददगार साबित नहीं हो रहा । सूचना के अधिकार की
भी यही स्थिति है। काफी अर्से से हमारे देश में विधि विचारक यह कहते आ रहे हैं
कि कानूनों की विविधता को कम किया जाना चाहिए, ताकि आम आदमी को भ्रमित होने से
बचाया जा सके। जितने भी विधि आयोग बने, सबकी यही राय थी कि पर हुआ सब उलट । वजह
साथ है : अधिकार की प्रवृत्ति भारतीय प्रकृति के अनुकूल नहीं है। स्वराज्य के
लिए संघर्ष के समय हमारे अगुओं ने कहा था कि सत्ताधारियों अथवा पथप्रदर्शकों का
जीवन पारदर्शी होने चाहिए। अर्थात् उनकी कथनी और करनी में भेद न हो। लेकिन हमने
अपनी कथनी को करनी में तब्दील करने की कोशिश नहीं की और इसे छिपाने के लिए आचरण
के रूप में प्रयोग का अभ्यास शुरू कर दिया।
‘पारदर्शिता’
के मार्ग पर इतनी बेशर्मी से आगे बढ़ गए कि अपने अपराध पर आवरण डालने की भी
जरूरत नहीं समझी। ‘गब्बर
चोर के समान सेंघ’
में ही गाने में तल्लीन है। ऐसा आचरण या कदाचरण अथवा दुराचरणयुक्त व्यवस्था में
‘अधिकार’
का लाभ तो उन्हें ही मिता है, जो सब प्रकार से बाहुबली हैं तथा जिनमें छीन लेने
की कूवत है। इसी का परिणाम है कि जिनकी आमदनी का कोई ज्ञात स्त्रोत नहीं है, वे
खरबपति बनते जा रहे हैं। जिन्हें जेल में होना चाहिए था, वे व्यवस्था को
संचालित कर रहे हैं। जो अपराध सैकड़ों लोगों के सामने हो रहे हैं, उनके विरूद्ध
साक्ष्य नहीं मिल रहे । जो देशद्रोह पर उतारू हैं, उनकी पैरवी करने वाले
‘मानवाधिकारी’
रोज-ब-रोज पनपते जा रहे हैं।
भारतीय समाज
में जब धर्म के आधार पर आचरण में स्खलन आने लगा तो ब्रह्मा ने मनु महाराज से
राजा का दायित्व संभालने का अनुरोध किया। मनु ने यह कहकर उनका प्रस्ताव
अस्वीकार कर दिया कि ऐसा दायित्व धारण करने पर उन्हें किसी को दंड और किसी को
पुरस्कृत करना पड़ेगा। ब्रह्मा ने कहा कि यदि ऐसा करने में तुम्हारा आचरण
धर्माधारित होगा तो तुम किसी को दंड देने या पुरस्कृत करने में अपने दायित्व के
अनुसार आचरण करने के कारण किसी पाप के भागी नहीं होगे। ऐसी अवधारणा पर सनातन
काल से शासकीय दंड पुरस्कार से निरपेक्ष होकर जो समाज महाभारत के उपरांत
सामाजिक शिष्टाचार में स्खलन और पराधीनकाल के उत्पीड़न के बावजूद धर्माचरण के
प्रति आग्रही बना रहा; वह स्वतंत्रता के उपरांत ठीक विपरीत दिशा की ओर मुड़
जाने के कारण ‘अधिकारों’
(कानूनी अधिकारों) के बोझ से अवाम को तोपता जा रहा है। जो समर्थ हैं, सत्तावान
हैं; वे जब चाहते हैं इस बोझ से अपने हित का तिनका उठाकर अपना उल्लू सीधा कर
लेते हैं । हम चाहें जितने कानून बनाते जायें, दायित्व का निर्वहन जब तक धर्म
(कर्तव्य) आधारित नहीं होगा, उसका लाभ आचरणहीन लोग ही उठाते रहेंगे ।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------
राजनाथ सिंह
‘सूर्य’
:
देश के वरिष्ठ
पत्रकार एवं स्तंभकार ।
राज्यसभा के सदस्य रहे। स्वतंत्र
भारत
के संपादक के रूप में विशिष्ट पहचान बनाई। इन दोनों लखनऊ में रहकर स्वतंत्र
लेखन करते हैं। संपर्कः
3/35, पत्रकारपुरम, गोमती नगर, लखनऊ, उ.प्र.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------
lll