पहल
पारदर्शिता की
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नरेद्र
दत्तात्रय तेलंग
भारत
विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है पर यह विडंबना ही है कि यहां
प्रजातंत्र के नाम पर क्षेत्रीयवाद, परिवारवाद और व्यक्तिवाद सदैव से राजनीति
पर हावी रहा है । आज देश को आजाद हुए 59 साल हो गए पर देश की सत्ता एक ही
परिवार के इर्द-गिर्द मंडराती नजर आती है । त्याग और बलिदान के भ्रामक इतिहास
के नाम पर सत्तासीन परिवारवादी ताकतों ने देश की कितनी प्रगति की है, यह तो
वक्त बताएगा पर इन परिवारों का इतिहास यदि जनता के सामने रखा गया तो इन
परिवारों ने कैसा आर्थिक विकास किया है, यह समझ में किसी को मुश्किल नहीं होगी
। बीते पचास वर्षों की ही बात करें तो इस देश को दो ही प्रधानमंत्री ऐसे मिले,
जिन्होंने परिवारवादी मानसिकता को बदलने का प्रयास करने की पुरजोर कोशिशें की ।
पहला उल्लेखनीय कार्य स्व.पीवी नरसिंह राव ने विदेशी विनिवेश को बढा़वा देने के
लिए आर्थिक नीतियों के उदारीकरण की शुरुआत के साथ किया । यकीनन इस निर्णय के
फायदे तो हुए, पर इस निर्णय से देख की अर्थव्यवस्था के लिए कुछ गंभीर खतरे भी
आए जो भविष्य में देश को लिए गंभीर व घातक परिस्थितियां निर्मित करेंगे । राव
सरकार भारतीय रानजनीति के पांच दशकों में पहली ऐसी सरकार थी जो अल्पमत में होते
हुए भी (बगैर परिवारवादी ताकतों के) अपने पूर्ण कार्यकाल तक बनी रही । साथ ही
कई विविदास्पत मुद्दों के बावजूद देश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकी ।
दूसरा
उल्लेखनीय कार्य अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने किया ।
वाजपेयी ने आर्थिक उदारीकरण की नीतियों में और भी सरलता लाने का प्रयास किया ।
पहली दफे किसी सरकार ने देश में संपर्क स्थापित करने वाले भूमि मार्गों पर कोई
वृहद परियोजना कारगर रुप में लाने का साहस किया । अलावा इसके सूचना और
प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य हुए । देश की जनता को संसदीय
गतिविधियों से रू-ब-रू होने की सुविधा प्रदान करने वाले
‘प्रसार
भारती’
कानून के निर्माण का श्रेय इसी सरकार को जाता है ।
भारतीय
राजनीति के शुरुआती दसेक साल केवल प्रयोगात्मकता पर केंद्रित रहे । संभव है, यह
उस दौर की मांग रही हो, किंतु अब हमें अपने संसाधनों का समुचित उपयोग करने की
क्षमता हासिल हो चुकी है । सो, अब जो भी नीतियां बनाई जायें, या कार्य किये
जायें;
वे निर्धारित लक्ष्यों के रुप में एक निश्चित समयावधि के अंतर्गत करने होंगे ।
ऐसा करने से ही हम विश्व के साथ कदमताल कर सकेंगे । इसके लिए हमारे देश की
राजनीतिक मानसिकता में आमूल बदलाव की जरुरत है। हमें क्षेत्रीयतावाद, परिवारवाद
औरजातिगत संकीर्णता के मापदंडों से बाहर निकलकर मावनता का दृष्टिकोण अपनाते हुए
देश में शिक्षा, उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी में पूर्ण पारदर्शिता लाने की
जरुरत है । ऐसा ही एक प्रयास वर्तमान सरकार की पहल
‘सूचना
का अधिकार-2005’
है । इसका उपयोग देश का कोई भी नागरिक कर सकता है । इसके जरिए सरकार की किसी भी
कार्य योजना की समस्त जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देश के हर नागरिक को है
तथा उसकी कुछ निर्धारित शर्तों के तहत आवेदन कर एक निश्चित समयावधि में वांछित
सूचना प्राप्त की जा सकती है । यह कानून भारतीयों के लिए देश में स्वच्छ
प्रशासन व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सहायक हथियार की तरह हो सकता है । पर
देश की अधिकांश जनता का शैक्षणिक स्तर व विचार क्षमता इस प्रभावशाली हथियार का
उपयोग करने के लिए कितनी सक्षम है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा ।
जनतंत्र में
पारदर्शिता की शुरुआत से कुछ परिवेश बदल सकता है । सूचना के अधिकार के तहत
जानकारी प्रदान करने हेतु विभिन्न स्तरों पर प्रकोष्ठों का निर्माण किया गया है
। केंद्र व राज्य स्तर पर आयुक्तों की नियुक्तियां की गई हैं, जो नागरिकों को
समुचित जानकारी निश्चित समयावधि में उपलब्ध कराने हेतु जिम्मेदार होंगे । इस
कानून के तहत यदि किसी आवेदक को कोई भ्रामक या जाकारी देने में विलंब अथवा
आना-कानी करता है तो उसके खिलाफ खड़ी कार्रवाई करने का भी प्रावधान है ।
वर्तमान में केंद्रीय स्तर पर वजाहत हबीबुल्ला मुख्य केंद्रीय सूचना आयुक्त हैं
।
भारतीय जनमानस
में सूचना का अधिकार कानून की महत्ता समझने के लिए अभी काफी वक्त लगेगा क्योंकि
यह वो देश है, जहां हर दस कोस पर देश की भाषा, संस्कृति में विविधता है । देश
में एक समान नागरिक संहिता का अभाव व एक जैसी शिक्षा पद्धति का अभाव इसे
क्षेत्रीय संकीर्णता में बांटता है । दरअसल परिवारवादी सत्तालोलुप ताकतों ने इस
विषय को जान-बूझकर इतना जटिल बना रखा है और उसे ही राजनीति का आधार स्तंभ बना
रखा है । किसी भी देश की सरकार का काम उस देश के नागरिकों की जीवकोपार्जन से
संबंधित समस्याओं के समुचित निराकरण की व्यवस्था के सुचारु प्रबंधन का है ।
इसके लिए अनुभवी व सुशिक्षित जनता व जनप्रतिनिधियों से संबंधित समस्याओं के
समुचित निराकरण की व्यवस्था के सुचारू प्रबंधन का है । इसके लिए अनुभवी व
सुशिक्षित जनता व जनप्रतिनिधियों की जरुरत है । वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जो
अधः पतन निजी स्वार्थों के तुष्टिकरण के लिए हो रहा है, उसके देश की विकास की
राह कठिन हो रही है । ‘आरक्षण’,
‘प्रांतीयवाद’
और ‘आतंकवाद’
का जन्म निजी स्वार्थों की राजनीति का ही तो परिणाम है ।
शिक्षा को
रुचि के आधार पर एवं सभी खर्चों से मुक्त यानी
‘मुफ्त
शिक्षा, वह भी रुचि के आधार पर’
करने से हम लोगों को बेहतर सुशिक्षित बना पाएंगे । जो खर्च आरक्षण पर किया जा
रहा है, उससे कहीं कम खर्च में हम लोगों का बौद्धिक स्तर सुधार कर उन्हें देश
की मुख्यधारा से जोड़ सकेंगे । देश में दोहरी नागरिक विचारधारा है, दोहरी
नागरिक संहिता भी है । इस वजह से सूचना का अधिकार कानून पारदर्शिता ला पाएगा,
कह पाना मुश्किल है । यकीनन यह कानून भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक
वैकल्पिक हथियार है पर भारतीय जनमानस के बौद्धिक स्तर को उठाने में अभी काफी
कार्य करने की जरुरत है । जनता को तो पता चले कि उसके अधिकार क्या हैं
? इस
विषय पर सरकार ने कोई व्यापक कार्यक्रम नहीं बनाया । दरअसल नागरिकों में अपने
देश के प्रति प्रेम का अभाव होने का सबसे बड़ा कारण देश की न्यायपालिकाएं भी
हैं । जिस देश में न्याय प्राप्त करने के लिए लोगों को पीढ़ियों तक लड़ाई
लड़नी पड़े और इंतजार करना पड़े,
उस देश
में किसी भी कानून की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह सहजता से लगता है ।
संपर्क
:
32/8,
टिकरापारा, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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