जिंदगी के कैनवास पर उभरते हैं कई
चित्र
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बबन प्रसाद मिश्र
हर
बुढ़ौती कहलवाती है कि हमारा समय ऐस था, वैसा था, वे दिन भी क्या दिन थे।
स्वर्णिम अतीत और संघर्षपूर्ण वर्तमान । भागदौड़ की आज इन दिनों । मेरे समय पर
जब मैं विचार करता हूं तो जिंदगी के केनवास पर कई चित्र उभरते हैं । सुकूनों के
स्वप्नों में ढलती शाम को जब देखता हूं तो आशा-निराश के हिंडोले सें डोलती
जिंदगी के कई तेवर उभरते हैं । पहले कभी तालाब-सरोवर में हंसों के दर्शन की
अभीलाषा पाले मन को जब बगुलों की बारात से अटा पटा देखता हूं तब लगता है जिंदगी
किसी अंदेरी घाटी में धंस रही है । इतना बिगड़ा दौर आजादी के पांच-छह दशकों तक
उभर कर जिंदादिल देश को यदि केक्टस के काटें भरे बाग में ढकेलेगा तो लगता है कि
अभी और कैसे दृश्य उभरेंगे ।
मेरा जन्म
कस्बाई चरित्र ओढ़े शहर बालाघाट में हुआ और कुछ थोड़ी शिक्षा के बाद मुझे
वारासिवनी जैसे उससे छोटे शहर में मैट्रिक तक की शिक्षा पूरी करनी पड़ी ।
पिताजी पूज्य पं. राधाकिसन मिश्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। लंबी जेल अवधि
काटी थी और मां शांता देवी भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ते-जुड़ते स्वर्ग सिधार
गईं थीं। अतः राजनैतिक माहौल में हुई परवरिश का असर मन पर पड़ा था । कांग्रेस
के ऊंचे या छोटे सभी नेताओं का घर पर जमावड़ा रहता था जिनकी चर्चाएं सुनकर भारत
के तबके तपस्वी जन-नेताओं की अच्छी छाप मेरे युवा मानस पर पड़ रही थी। उसी दौर
में यह देखा कि अचानक राजनीति के मानक और मूल्य बदले और कुछ अवांछित चेहरे
जननेता के छद्मवेष में उभरे । बस यहीं से मन में खटास शुरू हुई और उनके प्रति
वितृष्णा ने मुझे पत्रकारिता की ओर ढकेला।
मैंने मीडिया
में प्रवेश अपनी तरुणाई के गुलाबी माहौल में किया था । युवा था । मन उमंगों से
लबालब था । बड़े सपने संजोये थे, देखे थे अपनी कलनम के जौहर दिखलाने के और
गुनगुनाता भी था, हम मस्तों में आन मिले कोई मस्तीवाला रे। साठ के दशक में
पत्रकारिता का जुनून कुछ ऐसा सिर पर चढ़ा कि आज के विभ्रांत दौर के बावजूद सिर
से नीचे नहीं उतर रहा है।
मेरे अपने मन
में एक छवि बनी थी मेरे आग्रज श्री राधेश्याम शर्मा की जो आजीवन पत्रकारिता
करते
रहे । कालान्तर में वे मध्यप्रदेश के ही नहीं संपूर्ण राष्कट्र के लिए
पत्रकारिता
की शिक्षा के
सबसे बड़े केंद्र माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता
एवं
जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति (तब महानिदेशक कहलाते थे) बने। उन्हें नागपुर
से प्रकाशित युगधर्म में पत्रकारिता
करते
देखकर मन ललचाया कि मैं भी पत्रकार बनूं और रोज कुछ ऐसा लिखूं कि लोग कहें वाह!
यहीं भाव जिंदगी के उस मोड़ पर ले गया यहां से युगधर्म जबलपुर में पत्रकारिता
करने का रास्ता मिला। पत्रकारिता
के
गुरु भी मिले तो पंडित भगवतीधर वाजपेयी जैसे जिनका शिष्यत्व मेरे जीवन की
सर्वाधिक मूल्यवान थाती है। खूब मनमौजी पत्रकारिता
का
अक्सर उन्होंने दिया सिखाया और आज जो कुछ भी हूं, उनकी चरणरज का प्रताप। जबलपुर
को विनोबा जी ने संस्कारधानी कहा था और नेहरू जी ने गुंडों का शहर । यह 1962 की
बात है जब वहां सांप्रदायिक दंगा हुआ था । दंगा शांत होते–होते
मेरा प्रवेश युगधर्म में हुआ। मेरे साथ वरिष्ठ सहयोगियों मे श्री सुरेश खरे जो
बाद में दिल्ली में बड़े पत्रकार बने, श्री शिवनारायण खरे जो बाद में मध्य
एशिया में किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन से प्रकाशित पत्रिका के संपादक रहे, स्व.
श्री रामकुमार भ्रमर जो राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार पत्रिका एवं उपन्यासकार रहे,
मेरे मार्गदर्शक थे। उनके सानिध्य में मेरा लेखन-कौशल उभरा।
इसके पूर्व
नागपुर से प्रकाशित श्री कृष्णानंद सोख्ता के नया खून, हि्दू महासभा के
मन्वन्तर, आर.के. करंजिया के बम्बई से प्रकाशित बिलट्ज और उसी के टक्कर के करंट
जैसे साप्ताहिकों का शब्द-संसार मेरे लेखन एवं प्रस्तुतिकरण को प्रभावित करने
वाला था । पत्रकार निरोमणियों की श्रुंखला जबलपुर में जबरदस्त थी जो शब्दों को
जीते थेऔर पत्रकारिता
के प्रकाश
स्तंभ थे। पं. कालिकाप्रसाद दीक्षित, श्री नित्यगोपाल तिवारी, श्री मायाराम
सुरजन, श्री जीवनलाल गुप्ता, श्री विनोद खस्ता, श्री हीरालाल गुप्त, श्री
हरिशंकर त्रिपाठी, श्री गोविंद प्रसाद पाठक, श्री कुंजबिहारी पाठक, श्री नर्मदा
मिश्र, श्री भवानी तिवारी, श्री रामेश्वर प्रसाद गुरू और श्री हुकुमचंद नारद
एवं श्री खन्ना साहब की पत्रकारिता
के
महान संदर्भों से भी सुपरिचित हो चुका था । सारथी, प्रहरी और एटम जैसे
साप्ताहिक आदि अखबारों को जानते-समझते जब कुछ खबरें युगधर्म में बनानी शुरू की
तो मेरे वरिश्ठों को लगा कि मैं पत्रकारिता
को
समझ रहा हूं और तेजी से अपने कर्मश्रेत्र में आगे बढ़ रहा हूं। हाथ को
कम्पोजिंग, प्रूफरीडिंग, प्रतिपक्ष के अखबार में कार्य करते हुए सत्तापक्ष में
शब्दों के तीर बरसाने की कला बड़े मनोयोग से सीखने की ललक मैंने बरकरार रखी थी।
खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो की
बन्दगी से पत्रकारिता
की जिंदगी
जीने की कला मैं रोज सीख रहा ता। वहां के नगर पालिक निगम पर समाजवादी पार्टी का
कब्जा था और राज्यसत्ता कांग्रेस की रहती थी। इनके भी नये उभरे राष्ट्रीय
चिंतनधारा के राजनैतिक दल जनसंघ के लिए कसीदे काढ़ने में कोई कसर न छोड़ते हुए
तब ऐसी कोई खबर नहीं छूटती थी, जिसमें राज्य या निगम के सत्तापक्ष की फजीहत न
होती हो।
जबलपुर नगर
निगम की बैठकों की रिपोर्टिंग मेरी पत्रकारिता
की
रिपोर्टिंग की प्राथमिक शिक्षा का दौर रहा। पत्रकारिता में शालीनता, ईमनदारी,
निषअपक्षता और साहस के गुण मुझे नगर निगम की बैठकों की रिपोर्टिंग से मिले ।
यही नहीं जबलपुर में दीर्घकाल से जारी साहित्यिक एवं सास्कृतिक आयोजनों की
रिपोर्टिंग के साथ जबलपबुर में घटित रोज की आपराधिक घटनाएं और उनके कानूनी
विवादों की रिपोर्टिंग ने मुझे लेखन-कौशल बढ़ाने बाध्य किया। कानून की शिक्षा
ने न्याय क्षेत्र की रिपोर्टिंग में इतनी महारत दी कि न्यायाधीश फैसला
सुनाते-सुनाते परे पूरा प्रकरण की फाइल निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए मुझे देने
लगा। यह विश्वास मुझे राजनीतिक क्षेत्र में भी मिला । मैं जनसंघ के नेताओं का
लाडला रिपोर्टर था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय क,क्षी जनन्नाथ राव जोशी और अटल जी,
बलराज मधोकजी, यज्ञदत्त शर्मा सहित प्रायः सभी तत्कालीन जनसंघ नेताओं के प्रवास
में मैं साथ रहता था । यह शायद मेरी निष्पश्र रिपोर्टिंग का सर्टिफइकेट रहा हो
कि तात्कलीन मुख्यमंत्री जो कांग्रेस के लौह पुरूष कहलाते थे ऐसे पं. द्वारिका
प्रसाद मिश्र भी अपनी सभाओं के लिए मुझे साथ ले जाते थे। श्री सेठ गोविंददास ने
हिन्दी के उनके लगाव को दर्शाने वाले कार्यक्रमों के लिए जबलपुर में जो टीम
बनाई थी उसमें भी कम आयु के रहते उन्होंने मुझे शामिल किया ता। समाजवादी
वामपंथी चिंतक पं. रामेश्वर गुरू और मायाराम जी का स्नेह भी मुझ मिला और वैसा
ही सम्मान घोर कामरेड श्री सृष्टिधर मुखर्जी देते थे जो देर तक प्रेस में आकर
बैठते थे। इसे मैं इसलिए रेखांकित कर रहा हूं कि कलम अपनी जगह और व्यवहार अपना
दोनों दो भुजाओं की तरह शरीर और व्यवहार अपना, दोनों दो भुजाओं की तरह शरीर और
मन के साथी रहे।
अखबार में खेल
के पृष्ठ, व्यापार के पृष्ठ और वैचारिक पृष्ठ के अतिरिक्त मुझे सिनेमा के
पृष्ठों के संपादन का दायित्व लंबे अरसे तक तब मिला जब मैं सह संपादक था। एक
दिन में चार-चार फिल्में देखना और फिल्मी दुनिया का ग्लेमर पृष्ठों पर शालीनता
से देना कम महत्वपूर्ण काम नहीं रहता था, पर इससे पाठकों की रूचि का बनाना या
बनाए रखना जरूर दुष्कर रहता था । अखबार चार पृष्ठ, छह पृष्ठ, आठ पृष्ठ और फिर
12 पृष्ठों के हो गये। मेरी रिपोर्टिंग का असर पंडित द्वारिका प्रसाद मिक्ष की
एवं पं. श्यामाचरण शुक्ल की सरकारोंके पतन के दौर में पाठकों पर खूब पड़ा। इसके
पूर्व जब डॉ.कैलाशनाथ काटजू मुख्यमंत्री थे और वे जावरा से चुनाव हारकर
इलाहाबाद लौट रहे थे तब जबलपुर के सारे समाचार पत्रों के संपादकीय सहयोगियों
में केवल मैं ऐसा भाग्यशाली था जिसे तब उन्होंने अपना इंटरव्यू दिया था । उस
दौर की एक घटना है कि जब चुनाव घोषित ही हुए थे तब एक बड़े नेता ने डॉ. काटजू
से कहा था कि भले आप मुख्यमंत्री हों पर आपको हरवाने के लिए कांग्रेस के कुछ
बड़े नेता काफी सक्रियता दिखला रहे हैं तब उन्होंने बहुत ही बुरी तरह डांटकर उन
नेता को सबके सामने फटकारा कि वे कांग्रेसजनों पर ऐसे भद्दे आरोप न लगाएं।
कांग्रेसजन गांधीवादी होते हैं, वे ऐसी हरकर नही करेंगे।
डॉ. काटजू के
जमाने का यह कांग्रेसी विश्वास आज उस पार्टी के तिरंगे झंडे के नीचे दबकर कराह
रहा है। कहां गया वह विश्वास । जब डाक्टर काटजू हारे तब ही लगा कि कांग्रेस में
विश्वास की राजनीति खत्म हो गई है। श्री बलराम मधोक के जनसंघ से हटते यही कुछ
दृश्य जनसंघ में देखा गया था । राजनीति में कोई किसी का नहीं, यह बात अब
सूर्यसत्य है। पत्रकारिता में विश्वास की एक घटना और उल्लेखनीय है कि जब जबलपुर
में एक हत्या के अपराधी की फांसी रुकवाने कलेक्टर और एसपी सहित जेल अधिकारियों
का फोन नहीं लगा तो भोपाल से तत्कालीन विधि सचिव ने मुझे फोन कर उनसे तुरंत बात
करवाने का काम सौंपा था । उस रात मेरे प्रयत्नों में जरा ढील होती या वह
विश्वास की पूंजी जो विधि सचिव ने मुझमें देखी मेरे पास न होती और वह हत्या का
आरोपी फांसी पर चढ़ा दिया गया होता। उसका नाम भोला था और विधि सचिव थे । स्व.
नवीन चंद्र द्विवेदी जो बाद में उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहे। इसके बाद
मुझे जबलपुर से रायपुर में युगधर्म का संपादक बनाकर भेजा गया जहां मेरा मनोबल
गिराने की भूमिका मेरे अपनो के भीतर पहले दिन से बन चुकी थी। यहां मुझे सफलता
नहीं मिली। हालांकि मेरे सहयोगियों ने समाचार पत्र में मेरे साथ बड़ी मेहनत और
निष्ठा से कार्य किया किंतु इसे मैं अपना दुर्भाग्य ही मानता हूं कि आपातकाल के
लगते ही श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्देश पर युगधर्म का प्रकाशन तीन महीने के
लिए रोक दिया गया और उसके बाद वह समाचार पत्र कभी खड़ा नहीं हो सका । फिर कुछ
समय पश्चात बंद हो गया ।उसके यशकाल का सुख भोगने वालों ने अपयश ठीकरा मेरे सिर
पर फोड़ा । मेरे जीवन का वह एक दुःखद और कभी न भूली जाने वाली घटना है ।
युगधर्म से नाता टूटने के पश्चात कुछ समय के लिए मैं स्वदेश-भोपाल में रहा ।
वहां मुझे मेरे शस्वी मित्र व स्वदेश के स्थानीय संपादक श्री सूरज पोद्दार के
अस्वस्थ हो जाने के कारण मेरे अत्यंत स्नेही तथा स्वदेश के प्रधान संपादक श्री
राजेन्द्र शर्मा द्वारा भोपाल बुलाया गया था । भोपाल, गैस त्रासदी का शहर था ।
उसी क्रूरकाल रात्रि के पहले वर्ष की वर्षगांठ पर मैं वहीं था । उस रात मैंने
अपने सहयोगी भोपाल के यशस्वी पत्रकार श्री रामभुवन सिंह कुशवाह के साथ उस
क्ट्री को देखा । ठीक गैस रिसाव के समय मध्यरात्रि में उस फैक्ट्री के दरवाजे
पर खड़े होकर मैंने उस मौत के खेल के मंजर और उस खौफनाक रात का शाब्दिक वर्णन
लिखा । वह उस रात हुए मृत्यु के तांडव का शब्दचित्र था । उस वर्णन ने मेरी
भोपाल में उपस्थिति का अहसास परिचितों के अलावा कुछ अपरिचितों को कराया । कुछ
को वह वर्णन पसंद आया तो कुछ ने उसकी आलोचना की । पत्रकारिता में यह चलता है ।
जिस दौर में पत्रकार की प्रशंसा ज्यादा होने लगे तब समझो वह अनजाने अंधकूप की
ओर बढ़ रहा है । पारिवारिक विवशता ने मुझे एक साल के भीतर ही रायपुर लौटाया ।
मैं पहले नवभारत के प्रबंधन और बाद में संपादन से जुड़ गया । नवभारत का
कार्यकाल मेरे सामर्थ्य और कार्यकुशलता की सफलता का रहा, किंतु नवभारत से विदाई
का क्षण पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा का रहा । नवभारत की रिपोर्टिंग ने
कांग्रेस के लिए कुछ समर्थन का भाव रहता था, किंतु गाहे-बगाहे उसकी आलोचना भी
होती थी । यह आलोचना उसे निष्पक्षता से जुड़े जनविश्वास की ताकत भी देती थी ।
नवभारत में अहर्निश कार्य करने का अवसर मेरी पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर
रहा । हर वर्ग की खबरों को लेना, घटनाओ की तथ्यपरक रिपोर्टिंग व जनविश्वास को
जीतने की ललक मेरे मन में सदैव रही ।
जीवन की
जरुरतों से जुड़ा मध्यमवर्गीय पत्रकार होने के कारण मैं नवभारत से हटते ही
दैनिक भास्कर में सलाहकार हो गया । इन दिनों भास्कर से हटकर स्वतंत्र लेखन कर
रहा हूं । राज्य सरकार की व्यवस्था से जुड़ी साहित्यिक संस्था बख्शी सृजनपीठ से
जुड़ा हुआ हूं । पहले साहित्य व भाषा का अच्छा ज्ञान पत्रकारिता की अनिवार्यता
हुआ करती थी । 90 के दशक से ये मानदंड बदल गए । अब पत्रकारिता का स्थान शातिर
व्यवसायिकता ने ले लिया है । अब अखबार समाज में सनसनी फैलाने के और मालिकों के
धन उगाऊ उपकरण हैं । गंदा है पर धंधा है जैसे विश्लेषण इससे जुड़ने लगे हैं ।
मीडिया के दूसरे अंग टेलीविजन यानी बुद्धू बक्से ने जैसे भारतीय जीवन शैली एवं
सोच की सारी मर्यादाओं की सारी धज्जियां उड़ाने का संकल्प ले रखा है । पूरा
मीडिया आज का जीवन जीना चाहता है । कल का भविष्य, कल समाज व कल का मानव उससे
लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। यद्यपि जीवन के हर क्षेत्र को छूता हुआ मीडिया
समाज को पल-पल की घटनाओं की सूचना दे रहा है, वह खोजी और जुझारू है पर उसकी
पहली प्राणशक्ति उसकी विश्वसनीयता वह खो चुका है । पेपर वाले कुछ भी छापते हैं,
और टीवी सामाजिक गंदगी को बढ़ा रहा है, चाहे अनचाहे सर्टिफिकेट उसे मिल रहे
हैं। नई पत्रकार पीढ़ी को तकनीकी ज्ञान खूब मिला है वह इंटरनेट पर सारी दुनिया
की खबरों को डाऊनलोड कर रहा है, पर थोड़ी सी सारयुक्त बातों को छोड़ दें तो
मीडिया के पाठक या दर्शक के लिए वह अपनी महत्ता व उपयोगिता को खोता नजर आ रहा
है।
मीडिया पर
कटाक्ष कम नहीं हो रहे विशेषकर इलेक्ट्रानिक पर । मीडिया की बात को बकवास कहा
अपने सौंदर्य के लिए सुख्यार अभिनेत्री ऐश्वर्य राय ने। ठीक किया। फिल्मी गॉसिप
के भरोसे जीने-मरने वाले मीडिया के सहधर्मियों के लिए इससे ज्यादा कटु बात और
कुछ नहीं हो सकती। उसकी लेखनी की सत्ता को आहत करने वाली ऐश्वर्या का यह बयान
अन्य मीडिया कर्मियों के लिए भी एक सबक है। मीडिया दैत्य बन रहा है यह टिप्पणी
कभी अभिनेता आमिर खान ने की थी। अभी कुछ अरसे से अदालती कार्यवाहियों या
अपराधों पर पुलिस की जारी छान भी न पर बुद्ध बक्शे के अलमबरदार मीडिया मित्र,
दर्शकों को जो कुछ परोस रहे हैं, उस पर न्याय क्षेत्र की बड़ी न्यायपीठें अब यह
कह रहीं है कि मीडिया समानान्तर न्यायपीठ चलाने लगा है। मीडिया से कमाई हेतु
उसके उपयोग को उसके मालिक भली भांति जान चुके हैं। उसे वे अपने कारोबार का अंग
बना चुके हैं।
भारत की एक
स्वनामध्न्य साप्ताहिक पत्रिका ने सेक्स रिपोर्ट छापने के नाम पर पुराने जमाने
के उस कलाकार प्यारेलाल की याद दिला दी है जब वे यौन संबंधों का घृणित वर्णन
करते थे। इस पत्रिका के इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के प्रभु बने
कर्ता-धर्ताओं ने पहले यानी इसी सप्ताह रात के 12 बजे अपने दर्शकों को बताया कि
किस उम्र के लोग महिलाओं से किस तरह यौन संबंध बनाते हैं। फिर इसी सप्ताह उसे
अपनी पत्रिका में उतारा । सेक्स बेचने में अब केवल बेश्याओं को नहीं, अपितु कुछ
लोग मीडिया जैसे भारत के प्रभावी स्तंभ को भी भागीदार बनाना चाहते हैं।
मीडिया हर
पाठक की अथवा दर्शक की जिज्ञासा पूरी करे, यह अपेक्षा रहती है। वह केवल
सूचनादाता या खबरदाता न रहे । अपितु ज्ञानदाता रहे इस सिद्धांत को सर्वोपरि रखा
जाता है। उसे उस दाय्त्व को तिलांजलि देते हुए नहीं देखा जा सकता। वह समाज का
सच्चा हितरक्षक है। उसे समाज को कामसूत्र पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं बनाया जा
सकता। नारी जीवन कोई बाजार की विकाऊ चीज नहीं है, इसे क्या मीडिया को बताना
पड़ेगा। यह कम खेदजनक नहीं है कि हिन्दी की श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में
स्वच्छन्द लेखन करने वाले या नारी के कामोत्तेजक फोटो छापकर धन कमाने वालों की
भीड़ इन दिनों बढ़ी है। उनमें प्रतिस्पर्धा है कि कौन किस सीमा तक मानवता को या
नारी के बदन को उघाड़ सकता है। ब्लू-फिल्म शैली पर इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या
वैसी पत्र-पत्रिकाएं यदि निकाली जाती है तो उनका युवा पीढ़ी पर कैसा असर पड़ेगा
इसकी चिंता उन्हें नहीं है। वे फ्रायड के मनोविज्ञान और वात्स्यायन के कामसूत्र
की ओट लेकर अश्लीलता के झंडाबरदार बन रहे हैं। ऐश्वर्य शादी करें या न करें यह
उनका निजी मामला है, पर ऐश्वर्य का यह कथन उचित है कि शादी की चर्चा में बच्चन
परिवार की वयोवृद्ध भद्र महिला यानी अमिताभ बच्चन की मां श्रीमती तेजी बच्चन को
घसीटा गया । यह किसी भी मिडिया का गैर जिम्मेदारी पूर्ण एवं अत्याचारी आचरण है।
मिडिया मालिक
इन दिनों द्वंद में है। वह देख रहा कि उसकी रेटिंग या प्रसार कैसे बढ़े। इसलिए
वह अच्छे सुरूचिपूर्ण एवं नई पीढ़ी में प्रतिस्पर्द्धत्मक अच्छे जीवन की ललक
पैदा करने के बदले विपाशा बसु कौन से कपड़े पहनकर दिखलाई दे रहीं है। इसे छापने
जा रहा है। समाज में विद्रूपता के प्रसारण का ठेका इन दिनों मीडिया ने स्वयं
वरण कर लिया है, और उसके इस ठेके की सड़ांध से समाज का हर वर्ग आतंकित है। हाल
में छत्तीसगढ़ के प्रवास पर एक चर्चित अभिनेत्री आई । उनका प्रवास राजकीय था और
वे राजनीति में हैं। उनका संकेत था कि वे बच्चियों में प्रगल्भता चाहती हैं,
अपनी बात बेबाकी से कहने का हौसला बच्चियों में देखना चाहती हैं। यह एक अच्छा
संदेश कहा जायेगा जो वे आज की अघनातन पीढ़ी विशेषकर लड़कियों को देना चाहती
हैं। किंतु उनकी निकटता तांकने-झांकने बनठन कर पहुंचे नेता और स्वयं मीडिया ने
परंपरा से श्रेष्ठ छत्तीसगढ़ की महिला संस्कृति को क्या संदेश दिलवाया
?
जिस बसन्ती की चर्चा हुई उसके संदर्भ को पूरा जानकर शालीन जीवन की आकांक्षी
बच्चियां किस दिशा की ओर मुडेंगी, यह विचारणीय विषय हो सकता ता।
अंचर्राष्ट्रीय स्तर की विशेषकर पाश्चात्य देशों की चर्चा करें, तो वहां लंबे
अरसे से मांसलवाद ने गहरी जड़ जमाई है। किंतु भारत में मुट्ठी भर नवधनिक एवं
गरीब वर्ग के भीतर बढ़ी खाई ने एक बड़ा खतरा पैदा किया है। भारतीय जीवन का 70
से 80 प्रतिशत वर्ग अशिक्षा और गरीबी से जुझ रहा है। मीडिया पर उसे एक भरोसा
रहा है कि वह कम से कम संसार की वास्तविकता के साथ उसके जीवन में मददगार होगा।
पर मांसलवादी पूंजी सत्ता का प्रतीक वर्ग इस गरीब वर्ग को विकल्प में क्या दे
रहा है। शराब और समाज की गंदगी को यह एक विशिष्ट पहचान वाला वर्ग प्रसारित और
प्रचारित कर रहा है। वह ऐसी अवांछनीय गंध को ढूंढता है और उसमें आनंदित होता
है। दूसरा वर्ग विपन्न है जिसे भी लालसा रहती है कि वह सुकून के दो क्षण पाए और
आनंदित हो। इस हेतु वह मड़ई और मेले आदि में जाकर मनोरंजन कर लेता है,
छत्तीसगढ़ एक गरीब राज्य है। यहां की प्राथमिकता गरीबी उन्मूलन और तद्जन्य
समस्याओं का निराकरण है। इसे राज्य का एकमेव लक्ष्य बनाकर जनकल्याणकारी नीतियों
से छोटे एवं गरीब तबके को जोड़ा जाना उचित होगा।


