समकालीन
संदर्भों की पहचान
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समीक्षकःश्रीकांत
सिंह
लोकतंत्र में
पत्रकारिता का उत्तरदायित्व किसी देश के शासन के प्रति नहीं वरन देश के लोगों
के प्रति होता है। लोकतंत्र में संसद जनता के मतों से निर्मित होती है। आज
संसदीय लोकतंत्र में हमारे जनप्रतिनिधि किस प्रकार का आचरण प्रदर्शित कर रहे
हैं इस पर यह पुस्तक काफी हद तक प्रकाश डालने में सफल है। संसदीय लोकतंत्र और
पत्रकारिता पुस्तक के लेखक श्री अशोक चतुर्वेदी न केवल लेखक हैं बल्कि वे एक
चिंतक, अध्येता और विश्लेषक हैं। इस पुस्तक
‘संसदीय
लोकतंत्र और पत्रकारिता’
में उनके द्वारा लिखे गये 40 लेखों का संग्रह है। राजनीति में चुनावी हिंसा,
प्रत्याशियों को चुनावी खर्च, लोक संस्कृति में लोकतांत्रिक मूल्य, सामाजिक
न्याय की कसौटी पर संविधान, पंचायतों का बदलता चेहरा, संस्दीय शिष्टाचार और
मर्यादा जैसे विषयों पर लेखक ने बड़े ही प्रभावपूर्ण ढंग से अपने विचारों को
व्यक्त किया है। इस प्रकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया गांवों से शहरों तक का सफर इस
पुस्तक में परोसा गया है।
कहां जा रही
है पत्रकारिता, दूरदर्शन पर संसद, मीडिया और विधान मंडलों के बदलते रिश्ते जहां
पाठकों का ज्ञानवर्धन करते हैं वहीं ‘छत्तीसगढ़’
प्रांत किस प्रकार बना इसका भी ऐतिहासिक विवरण पाठकों को पढ़ने को मिलता है।
अनेक विषयों पर लेखक ने बेबाक ढंग से प्रकाश डाला है। श्री चतुर्वेदी का
विश्वास है कि उपनिषदों, बौद्ध ग्रंथों जैसे ग्रंथों जैसे ग्रंथों का अध्ययन
यदि वैज्ञानिक ढंग से किया जाये तो लोकतंत्र का बेहतर एवं युक्तिसंगत स्वरूप
विकसित किया जा सकता है। पुस्तक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें जिन विषयों
पर प्रकाश डाला है, वे सभी समकालीन हैं । रेडियो, दूरदर्शन, इंटरनेट एवं
पत्र-पत्रिकाओं की तो संक्षिप्त चर्चा पुस्तक में है ही । साथ ही साथ इसमें
मीडिया की भाषा पर भी हल्का प्रकाश डाला गया है। निश्चय ही पुस्तक पाठकों के
लिए रोचक ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी होगी।
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