समय
को जानने की कोशिश
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समीक्षकःअनिल
पुरोहित
पत्रकारिता
का क्षेत्र बहुत-से लोगों को आकर्षित तो करता है, पर उससे जुड़ी जटिल चुनौतियों
से वाकिफ बहुत कम लोग ही हीते हैं । हर पल चौकस रहकर एक-एक घटना पर नजर रखना और
सामाजिक हितों से जोड़कर उसका विश्लेषण करना, यह दायित्व-बोध इस क्षेत्र में
काम करने वालों को सतत बना रहता है ।यह दायित्व-बोध ही एक पत्रकार को अकिंचन
भाव से राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन की प्रेरणा देता है,
ऊर्जा देता है । हर घटना अपने समय का प्रतिबिंब होती है, और उस प्रतिबिंब को
पुस्तक का स्वरुप देकर वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह ने एक सार्थक उपक्रम किया
है समाज को ‘समय
के चेहरे’
पढ़ाने का ।
विभिन्न
अखबारों, पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए उन्होंने विभिन्न
विषयों पर जो लेख लिखे, उन्हीं पर आधारित है पुस्तक
‘समय
के चेहरे’।
पुस्तक में संगृहीत लेख अवश्य तत्कालीन संदर्भों व परिवेशों से जुड़े नजर आ रहे
हैं, लेकिन इससे विचारों का शाश्वत आलोक मद्धिम पड़ता नहीं दिखता । इस नजरिए से
बकौल श्री सिंह यह विश्वास किया जाना चाहिए कि
“समकालीन
चेहरों चेहरों के माध्यम से समय को जानने-पहचानने की कोशिश का परिणाम यह पुस्तक
उपयोगी होने के साथ-साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को जीवन-परिचय लेखन की एक
नई शैली से भी परिचित कराएगी ।”
फिल्म जगत में अर्धशती का रोमांच
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समीक्षकःअनिल
पुरोहित
जीवन
के सफर में कई ऐसा पड़ाव और मुकाम आते हैं, जो न केवल रोचक-रोमांचक अनुभव देते
हैं बल्कि कभी-कभी तो वे ऐतिहासिक दस्तावेज बनकर आने वाली पीढ़ियों को ऊर्जा भी
देते हैं, रास्ता भी दिखाते हैं और गुदगुदाते भी हैं । और अगर, ये अनुभव फिल्मी
पर्दों से लोगों के दिलों में घऱ कर जाने वाले सितारों से जुडे़ हों, तो उनकी
दिलचस्पी और पठनीयता में शक की कोई गुंजाइश ही कहां रह जाती है
?
ऐसे ही अपने अनुभवों को आत्मकथा की शैली में पिरोकर एक सतरंगी छटाओं वाला हार
गूंथा है पत्रकार रामकृष्ण ने ‘फिल्मी
जगत में अर्द्धशती का रोमांच’
शीर्षक से लिखी अपनी किताब में ।
संप्रति लखनऊ
में रह रहे रामकृष्ण 20 पुस्तकें भी लिख चुके हैं । जाहिर है, लेखन-संपादन का
प्रदीर्घ अनुभव उनकी आत्मकथा-शैली में लिखी गई इस पुस्तक में नजर आना था, और वह
आया भी । वस्तुतः आत्मकथा शैली के लेखन में बहुधा इस बात का भय बना रहता है कि
लेखक कहीं आत्मस्तुति का शिकार तो नहीं हो जाएगा । लेकिन इस पुस्तक में इस दोष
के दर्शन नहीं होते, साथ ही इस पुस्तक में तथ्यों और प्रसंगों को जिस कुशलता से
परोसा गया है, वह उन दिनों में छाई विवादों की धुंध को दूर करने में सहायक ही
है । ऐसा इसलिए भी हो सका है कि प्रस्तुत पुस्तक सिर्फ आत्मकथा ही नहीं, बल्कि
संस्मरण और रिपोर्ताज आदि का भी स्वरुप लिए हुए है । संभवतः यही वजह है कि एक
निराली गद्य-शैली में यह पठनीय ग्रंथ उपलब्ध हो सका है । सुधी समीक्षक एक विधा
से दूसरी विधा में इस तरह के गमन को प्रयोगधर्मिता मान सकते हैं, लेकिन बावजूद
इसके, इस प्रयोग ने हिन्दी रजत-पट जगत और साहित्य की अंतरंग छुअन को बचाए रखा
गया है । फिल्म जगत के तमाम पहलुओं को खंगालकर रामकृष्ण ने साहित्य, फिल्म,
सामाजिकीकरण और आर्थिकी के अंतरसंबंधों पर सटीक और गंभीर टिप्पणियां की हैं ।
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