Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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विमर्श/प्रतिवाद

 

 

 

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कोसने से क्या मिलेगा?

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कमल शर्मा

 

 

अपने गिरेबान में भी  झांकें प्रिंट माध्यम के पत्रकार

मीडिया विमर्श मीडिया जगत की सेहत जानने का सबसे बेहतर प्रयास कहा जा सकता है, लेकिन पत्रिका के पहले अंक में इलेक्ट्रानिक माध्यम को ज्यादातर विद्वानों ने जिस तरह कोसा है वह उचित नहीं है या फिर एकतरफा आलोचना के अलावा कुछ नहीं है। खबरों के सभी माध्यमों जैसे प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब की कुछ विशेषताएं हैं तो कुछ खामियां भी हैं । लेकिन यहां मैं तीन बिन्दुओं न्यूज, सूचना और पारिश्रमिक को लेकर कुछ कहना चाहूंगा ताकि जो लोग इलेक्ट्रानिक माध्यम की आलोचना कर रहे हैं, वे समझ सकें कि इस माध्यम के आगमन से आम जनता को ही नहीं वहां काम करने वाले मीडियाकर्मियों को भी इसका लाभ हुआ है ।

 

न्यूजः समाचारों के मामले में टीवी पत्रकारिता ने समूची दुनिया को एक वैश्विक गांव में बदल दिया है । अपने आसपास और दूरदराज घटने वाली घटनाओं को टीवी माध्यम से जितना जल्दी जाना जा सकता है वह किसी और माध्यम से संभव नहीं है । विजुअल के साथ खबर के हर पहलू का विश्लेषण इसका अहम हिस्सा कहा जा सकता है । आज भी लोग दूरदर्शन के पहले निजी कार्यक्रम वर्ल्ड दिस वीक को याद करते हैं । लेकिन खबरों के क्षेत्र में ज्यादा गर्मी निजी टीवी चैनलों के आने पर आई । इन चैनलों की बढ़ती संख्या से जहां लोगों को समूची दुनिया की खबरों का सीधा प्रसारण देखने को मिला, वहीं खबरों और उनसे जुड़े विशेष कार्यक्रमों ने उनके ज्ञान से आम जनता को अवगत कराया जिसका असर सीधे उनके जीवन पर भी पड़ा है । उदाहरण के लिए क्रूड के भाव बढ़ने या सोने के गिरने अथवा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साप्ताहिक आंकड़े जानकर लोग आर्थिक निवेश का फैसला पहले से कहीं तेजी से करने लगे हैं जिसने उनके लिए आर्थिक उन्नति के दरवाजे खोले हैं । जबकि अखबारों में कई अति महत्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक खबरें इतनी देर से आती हैं कि उनका लाभ उठाने से समाज का एक बड़ा तबका वंचित रह जाता है । अखबार मिलने में जो वक्त लगता है तब तक कई खबरें आज बासी हो जाती हैं । इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पल-पल की खबरें इस तरह देता है कि कई बार हमें अनेक खबरों के मामले में अखबार पढ़ने की जरुरत ही नहीं लगती । या फिर अखबार में जितनी खबर आती है उससे ज्यादा खबर हम पहले ही जान चुके होते हैं । दूर दराज के गांवों में तो अखबारी समाचार इतने लेट पहुंचते हैं कि अनेक खबरें दो-तीन दिन बासी लगती हैं। हालांकि, यह शिकायत जायज है कि कई बार इलेक्ट्रानिक माध्यम के कई युवा पत्रकार खबर मिलते ही हवाई घोड़े पर सवार हो जाते हैं और उस खबर का समाज पर पड़ने वाले असर या उसके गलत-सही का अंदाजा ही नहीं लगा पाते जिनके लिए बाद में कई बार माफी तक मांगनी पड़ती है । यहां मैं प्रिंट माध्यम के महत्व को खारिज नहीं कर रहा हूं बल्कि गहरे विश्लेषण के लिए अखबार बेहतर और सशक्त माध्यम हैं । देश के कई गांवों की चौपालों पर आज भी अखबारों का राज है लेकिन जो लोग टीवी माध्यम की एकतरफा बुराई कर रहे हैं वे यह जान लें कि अखबार भी कई मामलों की पूरी छानबीन नहीं करते । मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं जिन्होंने टीवी माध्यम में प्रवेश के कई प्रयास किए लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो टीवी माध्यम के तगड़े और सशक्त आलोचक जरुर बन बैठे और शाम को प्रेस क्लब में दारू और सिगरेट के साथ टीवी पत्रकारों को जमकर कोसना अपना धर्म समझते हैं । जबकि इलेक्ट्रानिक माध्यम के कर्मी जिस तनाव से गुजरते हैं वह वेब और अखबार के कर्मियों को साल में एक या दो बार ही महसूस होता होगा।

 

सूचनाएं : टीवी माध्यम से रेल या हवाई सेवाओं के देर से चलने, उनके बाधित होने, कार्यक्रम में बदलाव होने, अचानक बड़ी दुर्घटना होने के समय तेजी से सूचनाएं मिलने, परिजनों के बारे में पता लगाने या उन्हें सूचना देने, दुआ करने या बधाई देने के लिए जिस गति से काम होता है वह अखबार के माध्यम से नहीं हो सकता । विशेष महत्व न हो लेकिन आम आदमी के लिए ये बेहद उपयोगी हैं। भूकंप या बड़ी रेल, विमान दुर्घटना के समय ऐसी सूचनाएं सबसे ज्यादा उपयोगी होती हैं। आज इसी समय देश के किसी भी हिस्से में जबरदस्त भूकंप आ जाए तो आप अपने परिजनों को जो सूचना टीवी के माध्यम से दे सकते हैं वह अखबार से नहीं दे सकते । वैसे भी ऐसी आपदाओं के समय अखबारों ने समाचार जरूर दिए हैं लेकिन लोगों को उनके परिजनों तक नहीं पहुंचाया। हो सकता है ऐसा प्रयास कोई अखबार करे, लेकिन वह अगर इच्छित व्यक्ति के घर तक नहीं पहुंचता हो तो ऐसी सूचना का कोई महत्व नहीं है। आज कोई ट्रेन लेट चलेगी या रद्द हो गई अथवा उसके कार्यक्रम में बदलाव हुआ हो तो टीवी और रेडियो ही तत्काल समाचार दे सकता है और लोगों को निर्णय लेने में भूमिका निभा सकता है जबकि अखबार से यह संभव नहीं है। मैं पूछना चाहता हूं कि कितने अखबार ऐसी सूचनाएं दोपहर या शाम को अपना संस्करण निकालकर आमजन तक पहुचाते हैं।

 

पारिश्रमिक : झूठ बोलना हो तो आप कह दीजिए कि सारे अखबार पूरी ईमानदारी से पत्रकारों को सरकारी वेतन आयोग के मुताबिक वेतन देते हैं। देश का एक हिन्दी अखबार समूचे देश में अपने आपको बछावत वेतन आयोग देने का ढिंढोरा पीटता था लेकिन उसी अखबार में मैंने भी काम किया है यहां बाऊचर पर बगैर बछावत का बेहद मामूली वेतन मुझे दिया जाता था और वर्ष 1998 के उन बाऊचरों के जिरोक्स मेरे पास आज भी रखे हैं। बड़े शहर हों या छोटे, आज भी कई अखबारों में खासकर भाषाई अखबारों में पत्रकारों को उनके काम के अनुरूप वेतन नही मिलता । केवल मिशन की घुट्टी पिला-पिलाकर उनका शोषण किया जाता है। अखबारों के मालिकों के लिए मिशन कहां चला जाता है और वे क्यों पत्रकारों को मिशन की याद दिलाते हैं। कैसा मिशन....किसके लिए मिशन....अखबारों के तोंदिल धन्ना सेठ खुद मर्सडीज में घूम रहे हैं और उनके यहां काम कर रहा पत्रकार पैदल है या फिर साइकिल या सार्वजनिक वाहन पर। कई अखबारों में मीडिया कर्मी तो यह भी नहीं जानते कि उनके यहां उन्हें कब नियुक्ति पत्र या नौकरी स्थाई मिलेगी।

 

अखबारों खासकर भाषाई समाचार पत्रों के संपादक खुद दयनीय स्थिति में हैं। बाहर बड़ी-बड़ी बातें करेंगे और जब मालिकों की केबिन में जाते हैं तो वही करते हैं जो मालिक चाहता है। मालिकों की हां में हां मिलाते समय ऐसा बास लोगों का मिशन कहां चला जाता है। टीवी माध्यम ने पत्रकारों की माली हालत को जितना तेजी से कम समय में बदला है, वह प्रशंसनीय है। यदि इसका आधा समय भी प्रिंट माध्यम लगाते तो पत्रकारों के बच्चे बड़ी और अच्छे स्कूलों में बेहतर शिक्षा प्राप्त कर रहे होते। रिटायर्ड पत्रकार मारे-मारे नहीं फिरते बल्कि शान से पेंशन पाकर सुखद बुढ़ापा काट रहे होते । या फिर पत्रकार के मरने के बाद उसकी बीबी तंगहाली में नहीं जी रही होती। मुझे पता है कि कुछ साल पहले आजतक टीवी के एक पत्रकार की मौत माधवराव सिंधिया के साथ उनकी विमान में हुई थी तब आजतक ने जो आर्थिक राहत उस पत्रकार के परिवार को पहुंचाई वैसी राहत शायद ही किसी प्रिंट माध्यम ने अपने पत्रकारों को दी होगी । यह एक उदाहरण है...लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जहां टीवी माध्यम ने अपने पत्रकारों का भरपूर ख्याल रखा है। केवल वे लोग इस माध्यम को कोस रहे हैं जो यहां प्रवेश नहीं पा सके।

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कमल शर्माः देश के अनेक महत्वपूर्ण समाचार पत्रों के साथ-साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया और वेब मीडिया से जुड़े रहे । संप्रति इलेक्ट्रानिक टीवी एट्टीन इंडिया लिमिटेड समूह की कमोडिटीजकंट्रोल डॉट कॉम वेबसाइट के संपादक हैं। संपर्क : बी-502, सांई आशीर्वाद, शांतिपार्क, नालासोपारा (वेस्ट), ठाणे

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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