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साहित्य...
जया जादवानी
की कहानी -
ये लड़कियां
तीन कविताएं -
रघुवीर सहाय
पत्रकार की अभिलाषा
- रोमेश जोशी
  
विशेष टिप्पणी....
एकआग का
दरिया और डूब के जाना है -
विभु कुमार
  
व्याख्यान....-
किताबें मर भी रही हैं और सज भी रही हैं
- ज्ञानरंजन
  
प्रतिवाद....
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कोसने से क्या मिलेगा
- कमल शर्मा
  
समाचार....
प्रिंट
मीडिया की साख इलेक्ट्रॉनिक से ज्यादा
छत्तीसगढ़ में हुआ 781 प्रकरणों का निराकरण
  
दस्तावेज...
स्वाधीनता के असाधरण विंब हैं दद्दा -
डॉ.विजयबहादुर सिंह
आज इस पर
क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए कि माखनलाल जी देश की जिस भट्ठी में तप रहे थे, वह
सत्ता-राजनीति की थी या फिर वहीं जिसका संबंध न केवल गांधी बल्कि भगत सिंह आदि
से भी था। माखनलाल जी पिस्तौल भी रखते थे। वे तिलक के अंगरक्षकों में थे पर
इतने सच्चे और समर्पित किस्म के इंसान थे कि अपने देश वासियों के भावात्मक
मोड़ों और वैचारिक बदलावों के प्रति अत्यन्त सचेत थे। उनके बाद हिन्दी में
दूसरे कोई उस तरह के कवि दिखते हैं तो पहले नागार्जुन और दूसरे भवानी प्रसाद
मिश्र ।
माखनलाल जी की तरह इन्हें भी जन-राजनीति और उसके आन्दोलनों से कभी कोई
परहेज नहीं रहा । भवानी मिश्र तो सन 42 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान साढ़े
तीन बरस नागपुर जेल में रहे । नागार्जुन स्वामी सहजानंद द्वारा प्रवर्तित किसान
आन्दोलन में इससे पहले जेल गये पर 1975 में जब इन्दिरा गांधी ने आपातकाल घोषित
कर दिया तब भी यो दोनों बूढ़े कवि हिन्दी लेखकों और कवियों की लाज रखने को आगे
आए । नागार्जुन तो 18 महीने फिर आजाद भारत की जेलों में रहे । भवानी मिश्र
त्रिकाल संध्या करते आपात काल के खात्मे के अभियान में जुटे रहे ।
तीसरा नाम जो
इसी में होम हो गया, वह थे कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु। बाकी जिसने भी
जाने-पहचनाने छद्म क्रांतिकारी और प्रगतिशील थे, सबके सब इंदिरा और उनके
आपातकाल के समर्थन और वाहवाही में जुट गए । बाद में ये ही लोग प्रतिष्ठान
द्वारा तरह-तरह से नवाजे गए।
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