किताबें मर भी रही हैं और सज भी रही हैं
-------------------------------------------
ज्ञानरंजन
==============================================================
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. राधाकिसन मिश्र की स्मृति में
बारासिवनी में उनके परिजनों ने पुस्तकालय की स्थापना कर एक महत्वपूर्ण पहल की
है । 24 नवंबर को पंडित मिश्र की जयंती पर बारासिवनी में आयोजित समारोह में
प्रख्यात कथाकार और देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका 'पहल'
के संपादक ज्ञानरंजन ने पुस्तकालय के उद्घाटन समारोह में यह वक्तव्य दिया था ।
इसे मीडिया विमर्श के पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रकाशित किया जा रहा है । -
संपादक
==============================================================
मित्रों,
आइए हम अपने समय में किताबों की वास्तविकता के आसपास की संक्षिप्त जानकारी लेने
का प्रयास करें । हम आप सब उसे समय में पहुंच गए हैं जहां किताबों का रोमांस,
किताबों से लगाव और किताबों से प्रेम पहले की तुलना में काफी क्षीण हो रहा है ।
पढ़ने के तरीके, पढ़ने के विषय और उनकी तकनीक बड़ी गहरी करवट ले रही है ।
किताबों को टेबुल पर रखकर, टेबुलटाप के साथ, छतों पर धूप में, बिस्तरों पर
लेटकर, तकियों के नीचे छुपाकर रखते हुए, रेलगाड़ियों के सफर में पढ़ने वाले हाथ
अब विरल हो रहे हैं । यह परिवर्तन है । परिवर्तन सदा होते हैं । पुराने लोग अब
कहकर नहीं रुकते । नए लोगों की यह दुनिया है । किताबें हमारा साथ तब देती हैं
जब हम उन्हें भरपूर समय देते हैं । किताबों के लिए जीना काफी वक्त मांगता है और
यही फुरसतवाला समय आज कटता जा रहा है । किताबें प्रेमियों, प्रेमिकाओं की तरह
हैं उनका कोई विकल्प नहीं है । चंड़ीगढ़ में एक बार मुझे सेक्टर-22 में एक
मिठाई की दुकान का मालिक मिला, उसके पास अपने घर के बेसमेंट में 20 हजार
किताबों का एक बहुत ही खूबसूरत पुस्तकालय था । वे दो घंटे तो रोज के किताबों की
धूल हटाने, साफ-सफाई में लगाते थे । यह पूरी तरह से एक निजी पुस्तकालय था । हर
किताब उनकी टिप्पणियों और नोटस से भरी हुई थी । दुर्लभ किताबें थी, लोकप्रिय
किताबें थी, विविधता थी, भाषाएं थी, इतिहास, गल्प और कविता थी। बिल्कुल
रोमांचित होने वाली अवस्था थी । दूसरी तरफ देश के अधिकांश सार्वजनिक
पुस्तकालयों की हालत खस्ताहाल है । सच्चाई यह है कि हम अगर अच्छी वित्तीय
स्थिति में नहीं हैं तो सार्वजनिक और सरकारी क्या, हमारे निजी पुस्तकालयों का
जीवन भी अंधेरे में है ।
अतीव बेचैन और
मुश्किल दौर में हम हैं । रायल एशियाटिक बंबई का विशाल और भव्य पुस्तकालय
अद्भूत आनंद और विचरण की जगह है । कुछ पागल बूढ़ों ने उसे बचा रखा है । वे वहां
किताब पढ़ने से अधिक आराम करने और समय काटने जाते हैं । यह पुस्कालय कम
म्युजियम अधिक लगता है । रायल एशियाटिक अतीत में डूब रही है । कागज फट रहे हैं,
धूल खाते कोनों की गंदगी बढ़ रही है । गनीमत है कि आबनूस के फर्नीचर कुछ अपनी
आयु के दम के कारण बचे हैं । शांति तो है पर हलचल नहीं है । तनख्वाहें पुरानी
हैं । लोग जीवन की निवृत्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं । पुस्कालय की कीमत अस्त
हो रही है । यही हाल जबलपुर की जैन लाईब्रेरी और गांधी भवन की लाईब्रेरी का है
। पटना के खुदाबख्श लाईब्रेरी के गौरवग्रंथ फजीहत में हैं । रायपुर की
लाईब्रेरी में कभी-कभार के लोगों का ही दमखम बचा है । सब चीजें दिल्ली में
केंद्रित हैं । वहां सब आकर सिमट गए हैं । वहां अपार धनराशि है ।
निजी प्रयासों
में भोपाल में पत्रकारिता के लिए कुछ हुआ है । संग्रह मूल्यवान बनाया गया है ।
छोटी जगहों के जो पुराने पुस्तकालय हैं । वहां नई किताबें कई दशक से नहीं आयी
हैं । नए संस्थनों में भी पुस्तकालय हैं पर उनके संचालन और भविष्य की पर्याप्त
संतोषजनक उम्मीदें नहीं है । हम संस्थाओं को बना नहीं रहे हैं, तोड़ रहे हैं ।
धन के अभाव में कुछ नामी कुछ अकेले लोग हैं जो पुस्तकालयों की रक्षा कर रहे हैं
पर पुस्तकालयों का लालन-पालन करने वाली समर्पित प्रतिभाओं का अभाव है ।
साथियों,
किताबें अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की होती हैं । यूं तो आज किताबें पहली की
तुलना में अधिक चमकीली, सुंदर और दीर्ध आयु वाली हो गयी हैं पर उनका भीतरी तत्व
इससे पहचाना नहीं जा सकात । कितना विचित्र है कि किताबें मर भी रही है,
सज भी
रही हैं। विचारों की विदाई, सभ्यता के संघर्ष, इन्होंने मनुष्यों की हजारों साल
की अर्जित धरोहर को विदा कर दिया । इन्होंने मनुष्य का अपमान किया और विचारों
के खिलाफ अविचार पैदा कर दिए । पर हम इन किताबों को भी नष्ट नहीं करना चाहते
क्योंकि समाज अच्छी-बुरी सभी किताबों का जन्मदाता है। पता नहीं क्या होगा ।
भविष्य के गर्भ में क्या-क्या अजूबे दिए हैं, हम इसके बारे में कोई फतवा या
फब्ती नहीं कस सकते । किताबों का बोझ, किताबों का मूल्य, उनका आकार, उनकी
स्पेस, उभरते चमकते अक्षरों की जगह सपाट कंप्यूटर से निकले निस्तेज अक्षर और हम
सब उसी के आदी होते जा रहे हैं। किताबें इसके बावजूद हमारी हमसफर हैं। उन्हें
पहाड़ की चोटियों तक ले जा सकते हैं। कुछ ही किताबें ऐसी होती हैं जो हमारे
नींव का निर्माण करती हैं। वही जीवन भर साथ रहती हैं। कभी-कभी एक अकेली कविता
हमसे मृत्युपर्यन्त आबद्ध रहती है।किताबों को अगर बचाना है तो उन्हें नई
तकनीकों में प्रस्तुत करना होगा । पर किताबें तो उतनी अनगिनत हैं जितने आसमान
में तारे । उन्हें नई तकनीक में बरतने की मुहिम में भी धन, श्रम, तैयारी और
पक्की नीयत चाहिए । हम चाहते हैं कि कैसे भी हमारी धरोहरें बचायी जाएं और उनको
कूडेदान में नहीं फेंका जाए । भारत जैसे मुल्क में जहां प्रस्तर युग भी बचा हुआ
है और स्पेस युग की शुरूआत भी हो चुकी है अनेक पीढ़ियां हैं जीवन की, अनेक स्तर
हैं जीवन के । यहां तो किताबों की अनिवार्यता बहुत बढ़ी-बढ़ी है। गरीबी और
साक्षरता की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों की वजह से किताबें वजन में हल्की,
आकर्षक, सस्ती और लंबी अवधि तक न नष्ट होने की मजबूती में हों। पुस्तकें
गांव-गांव, कस्बों, तहसीलों और पहुंच के करीब हों । चीन की तरह यहां भी किताबें
आपके दरवाजे पर उपलब्ध हों, किस्तों में उपलब्ध हों, निःशुल्क पुस्तकालयों में
उपलब्ध हों, भारत देश में अभी पुस्तकों का जीवन बचा हुआ है। किताब के साथ हलचल
हो, अखबार हो, पत्रिकाएं हों, लेने-देने वाले लोग हों, जगहें भी शांत हों ।
कहीं भी किताबिंयों और पुस्तक खोजी प्रेमियों का अजीब रिश्ता है। हमारे देश में
अनेक शहरों में कीमती किताबों वाले फुटपाथ चिन्हित हैं। हम तो पढ़-लिखे लोग
हैं, हमें किताबों की नई भूमिकाओं को सोचना चाहिए। उनकी खोज करनी चाहिए ताकि
किताबें सदा प्रकाशित रह सकें । व्यक्तिगत रूप से दस-बीस किताबों को छोड़कर
जिसकी मुझे कई सुबह-शामों में जरूरत रहती है।.....अगर टीवी बदसलूकी कर रहा तो
हम उसकी गिरफ्त में क्यों आ जाते हैं। हमारी भूख-प्यास तो इलेक्ट्रनिक मीडिया
कभी नहीं रहा ।
हमें प्रिंट
मीडिया को बचाने का सभी काम करना चाहिए। कोलकाता में मैंने घूम-घूमकर देखा चलित
पुस्तालय हैं। हर मोहल्ले में दो-तीन पुस्तकालय हैं । गेराजों में छोड़े-छोटे
पुस्तकालय बना रखे हैं। निम्न वर्ग मध्य वर्ग के लोग वहां जाते हैं। बच्चे,
महिलाएं जाती हैं। रिहायशी कमरों में लोगों ने पाठ्य पुस्तकों के पुस्तकालय बना
रखे हैं। इन छोटे-छोटे गरीब पुस्तकालयों से संसार के पुस्तकालयों की भी याद आ
रही है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की लाईब्रेरी, युनाईटेड स्टेट लाईब्रेरी
कांग्रेस और मास्को का पुस्कालय, हमारे यहां इस तरह के पुस्तकालय नहीं है। हमें
छोटे-छोटे जगह-जगह वाले पुस्तकालय चाहिए। वारासिवनी में अगर यह शुरूआतें हो रही
है तो मतलब यह कि अभी आत्माएं बाकी हैं। स्मृतियों के नाम पर सत्कर्म बाकी है।
अभी चीजें सुलग रही हैं । बुझी नहीं हैं। पुराने लोगों को जो करना था वे कर
चुके हैं। अब नए लोगों को करना है। नए लोग इस दुनिया में कम है क्योंकि या तो
कंप्यूटर क्रांति की चपेट में हैं या संवाहक हैं। आने वाले समय में सभ्यताएं,
विकास के नए ढांचों में किताबें कितना साथ देंगी यह एक प्रश्नचिन्ह है। आज
हमारे देश में किताबें जलाई जा रही हैं। दुर्लभ पुस्तकालयों को तोड़ा-फोड़ा जा
रहा है। किताबों को बर्दाश्त करना कठिन है। किताबें हमारे खिलाफ चली जाती हैं।
उनको लोकतांत्रिक समाज ही बर्दाश्त कर सकते हैं। फासिस्टों के लिए किताबों एक
विरूद्ध जीवन हैं। ध्यान रहे मित्रों, जब हम विचारों को प्रवाहमान बनाते हैं तो
अनंत रास्ते खुलते हैं। इसके बिना शिखर पर कैसे पहुंच सकते हैं। फिरदौसी ने कहा
है कि सफलता प्राप्त करने के लिए अपने को कभी भेड़िया बन जाना चाहिए कभी भेड़।
किताबों को जो लोग जला रहे हैं उनके साथ हमें इसी रणनीति का पालन करना चाहिए।
पुस्तकों के
महत्व के सहस्त्र पर पहलू भी हैं। यह जो आईटी तथा प्रबंधन की बिल्कुल नई
जगमगाती, मोहक, चिलबिली, धनाढ्य दुनिया है उसका अंतःकरण बहुत मनहूस और
यांत्रिका है। इसमें प्रचुर संपदा तो है पर प्रफुल्लता और फुरसत नहीं है। इन
संस्थाओं की लाईब्रेरी में किताबें ही एक ऐसी संगी हो सकती हैं जो इन्हें
समृद्ध कर सकती हैं। उनके अपने विषय के अलावा प्रबंधन और आईटी संस्थाओं में
तिलिस्म, इतिहास, कविता, जीवन की किताबें भी रहनी चाहिए। इन्हें योगासन करने की
जगह पुस्तकें पढ़नी चाहिए। तनाव दूर करने का यह कारगर उपाय है। पुस्तकें
डिप्रेशन समाप्त करती हैं। वे परिवेश को संवेदनशील बनाती हैं। यांत्रिक जीवन की
कठोरता से जीवन को मुक्त करती हैं। ज्ञान का अर्थशास्त्र क्रूर न हो संपंदित हो
इसीलिए हिन्दी के सुप्रसिद्ध प्रकाशक अरविंद कुमार ने हाल ही में एक किताब छापी
है। उसका नाम है काबुल का किताबवाला । आप सब इसे जरूर पढ़ें । हम प्रायः कहा
करते हैं कि दीमक और घुन कहीं भी पहुंच सकते हैं। मैं कहता हूं कि संसार के
दुर्लभ भूखंडों में, तिब्बत और काबुल में भी तालिबानों के बावजूद भी किताबें
बची हुई हैं। सेंसर, आगजनी और बंदिशों के बावजूद भी किताबें पढ़ी जा रही हैं।
वारसिवनी में
मिश्र बंधुओं ने जो कल्पना की है, जो त्याग किया है, उड़ान भरी है, यथार्थ से
जो टकराने का काम किया है उसका मैं अभिनंदन करता हूं । स्थानीय लोगों, आसपास के
लोगों को इस पुस्तकालय को संवारने और उपयोग करने का काम करना चाहिए।
lll