Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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परदेश

 

 

ब्रिटिश पत्रकारिता पर एक नजर

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गिरीश पंकज

 

 पिछले दिनों ब्रिटेन (युनाइटेड कंगडम) जाने का सुअवसर मिला। समकालीन साहित्य सम्मेलन द्वारा ब्रिटेन के विविध शहरों में आयोजित किए गए अधिवेशनों में भागीदारी रही । यूके घमना-फिरना भी हुआ, लेकिन पत्रकारिता का विद्यार्थी होने के नाते दर्शनीय स्थलों के भ्रमण के साथ-साथ वहाँ के अखबारों पर भी मेरी नजर रही । एक शॉपिंग मॉल में मेरी नजर संडे टाइम्स पर पड़ी। इस अखबार के बारे में मैंने पहले से ही सुन रखा था। लपक कर उठाया, मगर उसकी कीमत देखकर मैंने चुपचाप उस वापस रख दिया। दो पौड का अखबार था। दो पौंड यानी एक सौ अस्सी रुपए । इतने में तो अपने देश में महीने भर में तीन अखबार आ जाते हैं। संडे टाइंम्स की कीमत ज्यादा थी, लेकिन अखबार बजनदार था। उलट-पलट कर देखा, तो अखबार में ढेर सारी पठनीय सामग्री नजर आई । सोचा, यहाँ की पत्रकारिता को समझने के हिसाब से हिम्मत करके अखबार खरीद ही लिया जाए, सो दिल को कड़ा करके खरीद लिया। अब सोचता हूँ, तो लगता है, वह घाटे में सौदा नहीं था। इस अखबार से गुजरते हुए मैं ब्रिटेन की पत्रकारिता से भी गुजरता हूँ । भारत आकर संडे टाइम्स का वजन कराया । आपको आश्चर्य होगा कि संडे टाइम्स का वजन था एक किलो छप्पन सौ ग्राम और पृष्ठ 124। इसके अलावा द संडे टाइम्स मैगजीन, स्टाइल(औरतों के लिए), संस्कृति पर केंद्रित संग्रहणीय पत्रिका कल्चर, जान लेविस कंपनी के उत्पादों का प्रचार करने वाली एक पुस्तिका, घरेलू सामानों से संबंधित पत्रिका होम चायरेक्ट, और फेमिली ट्री मेकर नाम एक सीडी। अखबार छह परिशिष्टों में बंटा हुआ था। खेल, व्यापार, रोजगार समाचार विश्लेषण, अर्थ-जगत, पर्यटन, घर-गृहस्थी से जुड़ी इतनी सामग्री कि पूरा दिन निकल जाएे। शीतकालीन खेलों पर एक पूरा सुंदर परिशिष्ट- इनगियर। इसमें भारत और अन्य देशों के पर्यटन संबंधी विज्ञापन छपे हुए थे। इस सारी सामग्री को देखकर एक बात समझ में आ जाती है, कि वहाँ के अखबार अगर दो पौंड लेते हैं, तो अपने पाठकों को कितनी प्रचुर सामग्री भी परोसते हैं। मैंने भारतीय भाषा की पत्रकारिता में संडे टाइम्स जैसा अखबार आज तक नहीं देखा। इक्का-दुक्का अखबार ही उस दिशा में बढ़ते नजर आते हैं, लेकिन उतनी आर्थिक हैसियत भी होनी चाहिए। संडे टाइम्स मीडिया मुगल के नाम से मशहूर रुपर्ट मर्डोक के न्यूज कार्पोरेशन का अखबार है। उसी मर्डोक का, जिसके भारत से अखबार निकालने की योजना सुन कर यहां के अखबार मालिकों की हालत पतली हो गई थी।

 

ब्रिटेन में दो-ढाई सौ साल पुराने कुछ अखबारों का अब तक प्रकाशित होते सुखद आश्चर्य है। द न्यूज लेटर 1735 से प्रकाशत हो रहा है। द टाइम्स सन् 1785 से, आब्जर्वर 1799, द गार्जियन 1821, फाइनेंशियल टाइम्स 1888, डेली मेल 1896, डेली एक्सप्रेस 1900, संडे एक्सप्रेस 1918, न्यूज आफ द वर्ल्ड 1884 और डैली मिरर 1903 से प्रकाशित हो रहा है। ये सारे अखबार आज ब्रिटेन की पत्रकारिता के प्रतिनिधि बन चुके  हैं।

 

ब्रिटेन में तीन तरह के आकार वाले अखबार नजर आते हैं। एक तो पूर्ण वैश्विक आकार वाले । दूसरे टेबलाइड और तीसरे टेबलाइड आकार से कुछ ज्यादा लम्बे-चौड़े । इस आकार वाले अखबार अभी भारत में नजर नहीं आते । ब्रिटेन में पूर्णाकार वाले अखबार गंभीर अखबारों की श्रेणी में आते हैं। इन अखबारों में सनसनी नहीं दीखती । अश्लीलता भी नहीं होती। जबकि ज्यादातर टेबलाइट के पेज थ्री के बाद के कुछ पृष्ठ अश्लील चित्रों एवं विज्ञापनों से भरे होते हैं। हालांकि मेरे जैसा नैतिकवादी आम भारतीय पाठक जिसे अश्लीलता कहता है, वह ब्रिटेन के लगभग अधिकांश लोगों के लिए सामान्य बात है। ब्रिटेन की सड़कों के किनारे लगे  नोकिया कंपनी के होर्ड्रिग पर पूरी तरह से नग्न युगल वाले दृश्य आम हैं। इसी से पता चलता है कि नग्नता को वहां सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है। हमारे यहां ऐसे विज्ञापन दिख तो जाएं तो लोग बवाल मचा देंगे। टेम्स नदी के तट पर एक युगल दिन दहाड़े एक-दूसरे की बाहों में भर कर चूम रहा है। भारत में यह अपराध है। तो जहां ऐसा खुलापन हो, वहां के अखबारों के दो-चार पृष्ठ अश्लीलता से भरे पड़े हों, तो आर्श्चय नहीं करना चाहिए। बावजूद इसके गार्जियन, टाइम्स जैसे अखबारों में यह अश्लीलता सिरे से गायब है।  इसका एक मतलब यहा भी है कि अश्लीलता के बीच भी कहीं न कहीं जीवन-मूल्य बचे हुए हैं । 64 पृष्ठों का सांध्य दैनिक स्टैंडर्ड (मूल्य 35 पेन्स) भी साफ-सुथरा लगा।

 

यूके में छोटे आकार के अखबारों का कारोबार अब एक फैशन बन चुका है। आम पाठक ऐसे अखबारों को ज्यादा पसंद करता है शायद इसलिए भी कि ये हाथ में लेने में ज्यादा सुविधाजनक हैं। गार्जियन जैसा पुराना अखबार भी अब टेबलाइट हो गया है। वैसे टेबलाइड से अपने को अलग दिखाने के लिए गार्जियन ने अपना आकार को कुछ सेंटीमीटर लम्बा-चौड़ा कर लिया है। कुछ अखबार तो मैंने लगभग हर जगह देखे। इनमें डेली स्टार, डेली स्टार संडे, दे पीपल, डेली मिमर, द डेली स्पोर्ट, द सन और न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रिटेन के कुछ बेहद पुराने अखबार बंद भी हो चुके हैं लेकिन अधिकांश निकल रहे हैं। ये अखबार अस्सी से सौ पृष्ठों के होते हैं। भारत में इतनी पृष्ठ संख्या वाले अखबारों की हम कल्पना ही कर सकते हैं। सहारा समय साप्ताहिक 48 पृष्ठों का था, लेकिन अब वह इतिहास हो चुका है।

 

पेज थ्री बनाम कूड़ा  पत्राकारिता

 ब्रिटेन में लगभग हर शहर से अखबार प्रकाशित होते हैं। कुछ राष्ट्रीय परिदृश्य वाले तो कुछ ठेठ स्थानीय प्रकृति वाले होते हैं। स्थानीय अखबारों में ज्यादातर टेबुलाइट हैं। इनमें पेज थ्री पर अश्लील चित्रों की भरमार होती है। उसके बाद के भी कुछ पृष्ठ अश्लीलता को समर्पित होते हैं। न केवल चित्र वरन सेक्स विषयक चर्चा, लेख, खबर, और खुले बदन वाली लड़कियों के फोन नंबर वाले लघु विज्ञापन भी खूब होते हैं। ऐसे अखबारों को लोग कूड़ेदान के हवाले भी कर देते हैं । घर ले जाना तक उचित नहीं समझते। एक तरह से डस्टबिन जर्नलिज्म और पेज थ्री जर्नलिज्म वाली पत्रकारिता भी ब्रिटिश पत्राकारिता का एक चेहरा है। भले ही इन अखबारों को गार्जियन, टाइम्स और संडे टाइम्स जैसे प्रथम श्रेणी के अखबारों जैसी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल पाई हो, लेकिन ऐसे अखबार खूब फल-फूल रहे हैं।

 

लंदन लाइट और मैट्रो जैसे 48 और 42 पृष्ठीय अखबार निःशुल्क बंटते हैं। (ओमान में भी मैंने  द वीक नामक साप्ताहिक को फ्री बंटते देखा था। यह प्रति सप्ताह इक्यावन हजार छपता है) अखबार फ्री में मिले, यह आश्चर्यजनक है। भारत में अगर अखबार फ्रि बंटने वाले अखबार भी काउटंर पर पड़े रहते थे। ये फ्री अखबार एयरपोर्ट्र या किसी, शॉपिग जैसे जार्वजनिक स्थलों पर ही रखे जाते हैं। इन फ्री अखबारों में समाचार से कई गुना विज्ञापनों की भरमार होती है, इनमें हीरो-हीरोइनों की चटपटी खबरें, अपराध जगत की चर्चित घटनाएं, खूबसूरत मॉडलों के खुले जिस्म, उनसे जुड़ी खबरें सुंदरता और स्वास्थ्य, टीवी-सिनेमा मसाला, खान- पान, रहन-सहन, वर्ग पहेली, सूदोकू, भविष्य फल, कॉमिक्स आदि सब कुछ होता  हैं, इसलिए ये फ्री में बंटते हैं। हमारे यहां उल्टा है । विज्ञापन ज्यादा मिलने के कारण अगर किसी अखबार ने अपने पृष्ठ बढ़ा दिए उस दिन अपनी कीमत भी बढ़ा देता है। घटाने की तो कल्पाना ही बेमानी है।

 

ब्रिटेन के बड़े अखबार हों या टेबलाइड, सभी में मैंने एक बात समान रुप से पाई। हर अखबार में विज्ञापनों की बहुलता । उपभोक्ता संस्कृति का असर ब्रिटेन में साफ दीखता है। महंगी कारें, सोफा, मोबाइल, टीवी सेट, वीडियो कैमरा, कमान आदि के विज्ञापन ज्यादा नजर आते हैं।

 

सांध्यकालीन अखबारों की सामग्री शाम की मानसिकता के अनुरुप ही थी। हत्या, बलात्कार, सनसनी, दूर्घटना आदि को जरुरत से ज्यादा कवरेज देना। लेकिन वैचारिक सामग्री भी नजर आई । अश्लीलता भी नहीं थी। संपादकीय पृष्ठ पर अग्रलेख और सामयिक लेख भी थे। ईवनिंग स्टैंडर्ड में कहीं से भी हल्कापन नहीं था। इस साफ-सुथरे अखबार को देखकर अच्छा लगा विविधतापूर्ण खबरें और स्तंभों से सजे इस चौसठ पृष्ठ के अखबार को देख कर मैं सोच रहा था, कि हमारे देश में सांध्य दैनिक क्या कभी इस स्तर तक पहुंच पाएंगे ?

 

ब्रिटेन पत्रकारिता की अपनी एक ऊंचाई है। हल्कापन भी है, तो बहुत कम । उन्नत तकनालॉजी से सुसज्जित अखबारों को देख कर लगता है कि भारतीय पत्रकारिता अभी बहुत पीछे है। रुपर्ट मर्डोक के भारत आने की चर्चा मात्र से हमारे यहां के अखबार मालिक कांपने लगे थे। तब मैं सोचा करता था कि इस मीडिया मुगल से इतना आंतकित होने की क्या जरुरत है। ब्रिटेन जाने के बाद ही कारण समझ में आया। वहाँ एक नहीं, अनेक मीडिया मुगल हैं। जो अगर भारत आ गए तो यहां के तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों को निगल जाएंगें । ब्रिटेन के छोटे-छोटे से अखबारों की सज्जा आकर्षक है। ये अखबार पाठक को अपनी ओर खींच लेते हैं। मर्डोक के अखबार को देखकर लगा कि अखबार ऐसे ही होने चाहिए. भारत के नंबर वन कहलाने वाले अखबार अभी ब्रिटेन अखबारों से पहुत पीछें हैं। इक्का-दुक्का अखबार अपनी गुणवत्ता के कारण महत्वपूर्ण जरुर हैं लेकिन तकनालॉजी  के अभाव में ही वहां के अखबारों को इतना भव्य, इतना आकर्षक बनाता है। हम तो बस ले-देकर सोलह-चौबीस पेज तक पहुंच गए तो इतराने लगते हैं।उस पर भी ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन। राजनीति के आगे घुटनाटेक मानसिकता वाली खबरें । अश्लीलता को परोसने के लिए लालायित पृष्ठ। फिर भी प्रसार संख्या बढ़ नहीं पाती। फर्जी आंकड़ों की बात और है।

 

ढाई सौ साल पुराना अखबार

 ब्रिटेन  के लगभग हर शहर से उत्कृष्ट अखबार छपते हैं। भले ही सामग्री की दृष्टि से वे बेहद स्थानीय हों। लेकिन उनका ले-आउट अद्भुत होता  है। उनका प्रस्तुतिकरण अखबार को नयनाभिराम एवं पठनीय बना देता है। यूनाइटेड किंगडम के अन्य क्षेत्रों से निकलने वाले अखबार भी दमदार हैं। स्कॉटिश अखबार द हराल्ड 1783 से निकल रहा है। द प्रेस एंड जर्नल 1748 से। स्कॉटलैंड आन संडे 1988 से प्रकाशित हो रहा है। वेल्स से प्रकाशित होने वेल अखबारों में लीवरपूल डेली पोस्ट, नार्दर्न आयरलैंड से द बेल पोस्ट टेलीग्राफ, द आइरिश न्यूज, द न्यूज लेटर आदि प्रमुख हैं। द न्यूज लेटर तो ढाई सौ साल पुराना अखबार है। यह 1737 से प्रकाशित हो रहा है।

 

ब्रिटेन  के अधिकांश शहरों से सजे-धजे अडतालीस, साठ और अस्सी पेज के अखबार आसानी से मिल जाएंगे । द सन और डैली मिरर टेबलाइट अखबार हैं। इनमें राष्ट्रीय खबरें भी कम नहीं होती। ये दोनों अखबार तीस-चालीस साल पुराने हैं। अपनी आंशिक अश्लीलता मिश्रित पत्रकारिता के कारण अच्छी-खासी प्रसार संख्या है इनकी। हर कहीं ये अखबार दिख जाते हैं। दोनों अखबार 35 पेंस के हैं । इन अखबारों में बड़े-बड़े शीर्षक एवं चित्रों की बहुलता होती है। एक पृष्ठ तो केवल प्रेमी-प्रेयसी से जुड़ी समस्याओं पर ही केंद्रित होता है। ऐसी पत्रकारिता की कुछ-कुछ झलक हमारे यहाँ भी नजर आती रहती है। लेकिन भारतीय संस्कृति की मर्यादा के कारण अभी भी भारतीय पत्रकारिता में इतना खुलापन नहीं आया है।

 

स्थानीय अखबार

 ब्रिटेन में स्थानीय अखबारों का बड़ा महत्व  है। वैसे तो अमरीका के चर्चित अखबार द न्यूयार्क टाइम्स, द वाशिगंटन पोस्ट, द बोस्टन ग्लोब आदि में भी स्थानीय खबरों को महत्व दिया  जाता है, लेकिन ब्रिटेन  में इसके लिए हर शहर से निकलने वाले अखबार हैं, जिसमें स्थानीय महत्व की चीजें महत्व की चीजें प्रकाशित होती रहती हैं। बीबीसी केवल समाचार प्रसारित ही नहीं करता, एरियल नामक एक अखबार भी निकालता है। हालांकि इसकी प्रसार संख्या सीमित है। ब्रिटेन के तीस विश्वविद्यालय भी अपने-अपने अखबार छापते हैं। आक्सफोर्ड वि.वि. से आक्सफोर्ड स्टूडेंट और द चेरवेल वि.वि. से वर्सिटी और द कैम्ब्रिज स्टूडेंट तथा बर्मिधम वि.वि. से रेड ब्रिक्स नामक अखबार के नाम लिए जा सकते हैं।

 

दृश्य-श्रव्य माध्यम

 ब्रिटेन  में अखबारों की बहुलता तो हैं ही, लेकिन-टीवी दर्शक भी कम नहीं है। इनका संजाल भी चारों तरफ फैला हुआ है। बीबीसी नंबर वन है । जन भागीदारी से खड़ा हुआ ब्रिटिश ब्राइकॉस्टग कार्पोरेशन में पूरे यू.के. का पैसा लगा हुआ है। यहां बीबीसी सुनने की फीस भी देनी पड़ती है। जैसे कभी भारत में रेडियो रखने वाले को फीस देनी पड़ती थी। ब्रिटेन में फीस न देने वाले को जुर्माना भरना पड़ता है। पेंशनरों और पैंसठ साल के ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को छूट मिली है। बीबीसी के दो प्रमुख चैनल हैं। इसके अतिरिक्त चैनल फोर भी है। दो फ्रेंचाइजी टेलीविजन कम्पनी भी हैं। एक आइटीवी, दूसका फाइव। चैनल फोर में स्कूलों से जुड़े कार्यक्रम ज्यादा होते है। विज्ञापनों की भरमार भी होती है। इससे इनकी अच्छी कमाई हो जाती है। आइटीवी स्थानीय स्तर के कार्यक्रम पेश करता है। बीबीसी के आठ डिजिटिल चैनल भी हो गए हैं। 1932 में पहला ब्रिटिश टेलीविजन चैनल (द ब्रिटिश टेलीविजन सर्विस) शुरु हुआ था। इस वक्त पूरे यूके में 250 रेडियो स्टेशन हैं।

 

बीबीसी के डिजिटल चैनलों के अलग-अलग रंग हैं। एक पॉप संगीत प्रसारित करता है तो दूसरा पश्चिमी शास्त्रीय संगीत । जॉज और अन्य देशों के शास्त्रीय संगीत इससे सुने जा सकते हैं। एक चैनल करेंट अफेयर्स से जुड़ा है। एक से केवल कॉमेडी और नाटक आते हैं। बीबीसी की चालीस लोकल रेडियो सेवाएं भी हैं। बीबीसी से गुजराती, बाँगला, पंजाबी, हिंदी, टर्किश, पोलिश आदि भाषाओं में भी प्रसारण होता है। लेकिन ब्रिटेन  में पंजाबी और हिंदी सबसे ज्यादा प्रचलित है, क्योंकि वहां हिंदी-पंजाबी भाषा-भाषी सबसे ज्यादा हैं। ब्रिटेन में बस में सफर करते हुए हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी मिश्रित प्रसारण और हिंदी गाने सुनना बेहद यादगार क्षण रहा। हमारी राष्ट्रभाषा और हमारी भारतीय भाषा दोनों लंदन में अपना वर्चस्व बनाए हुए है यही कारण है, कि बीबीसी हिंदी सेवा के साथ-साथ अपने कुछ चैनलों के माध्यम से भी हिंदी के कार्यक्रमों को प्रमुखता के साथ प्रसारित करता रहता है। यह अच्छा संकेत है। ये और बात है कि ब्रिटेन  से अभी कोई हिंदी अखबार शुरु नहीं हो सका है लेकिन कुछ साल पहले पद्मेश गुप्त ने पुरवाई नामक साहित्यिक त्रैमासिक जरुर शुरु किया, जो सफलता के साथ प्रकाशित हो रही है। श्री गुप्त ने एक राजनीति पत्रिका भी हिन्दी में शुरु की है। अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि ब्रिटेन  की समृद्ध पत्रकारिता के बरक्स अभी भारतीय पत्रकारिता को भी लम्बी यात्रा तय करनी है।

 

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गिरीश पंकजः प्रख्यात व्यंग्यकार एवं कथाकार, कई पुस्तकें प्रकाशित । सद्भावना दर्पण नामक साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका के संपादक एवं इंडियन मीडिया कांग्रेस रायपुर चेप्टर के अध्यक्ष हैं । संपर्कः जी-31, नया पंचशील नगर, रायपुर, छत्तीसगढ

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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