विकास की धारा में स्त्रीवादी विभ्रम
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डॉ. कमल
कुमार
स्त्री
की अब तक की सारी लड़ाई उसको देह माने जाने के विरुद्ध थी। उसे सोच विचार
संपन्न इंसान समझे और समझाए जाने की थी लेकिन आज की भौतिक संपन्नता
उपभोक्तावादी संस्कृति, वस्तुवाद और बाजारवादी ताकतों ने सबसे बड़ा संकट स्त्री
के सामने ही खड़ा किया है। वह आज फिर इंसान से देह बनने को उतारू है। पतुरिया
से कार्ल गर्ल, कंफर्ट गर्ल या कैम्पैनियम बनकर संभ्रांत समाज में प्रतिष्ठित
हो रही है। वेश्यावृत्ति को कारोबार का दर्जा दिलवा रही है। अब अपनी मर्जी के
इस देहवाद में देह की जगह डिस्पोजेबल समाज में कहां होती है
?
क्या हमें पता नहीं । पुरूष ने स्त्री की देह को नहीं, उसके दिमाग को बंधक
बनाया है। यानी उसके सोच, विचार और विवेक को। दिन, महीने, वर्ष या सदियां नहीं
सहस्त्राब्दी लगी स्त्री की मानसिकता को बनने में । उसे देह मात्र समझे और समझा
दिए जाने में । इसलिए औरत खुद ही अपने देह को सर्वोपरि मान दुलार-पुचकार,
सहेज- संवार कर प्रस्तुत करती है। देह पर कलुष की छाया मात्र से वह पतित और
विनष्ट मान ली जाती है। घर और देह की पवित्रता होती है, होनी चाहिए। घर और देह
बिना ट्रैफिक लाइट वाला चौराहा तो नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंधों की भी
पवित्रता होती है। पश्चिमी समाजों में भी होती है। विचलन भी होता है। अपनी
मर्जी के देहबाद से अमरीका (र्फ्सट वर्ल्ड कंट्री) में 9 से 13 प्रतिशत मां
बनती हैं। (एक मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट) अमरीका में संसार भर में सबसे ज्यादा
बेटरड वीमन होम है। संसार में सबसे ज्यादा चाइल्ड अब्यूज है। वहां इन बच्ची
मांओं और उनकी बच्चों को स्टेट देखती है।
अपनी मर्जी का
देहवाद भी वैसे ही भयावह संसार के दरवाजे खोलता है। अपने शरीर की अटानमी के
खिलाफ खड़े होने के प्रयासों में औरत कई बार गलत सिद्ध हुई है। इसका एक और पक्ष
भी सामने आ रहा है। पश्चिमी देशों में होता हुआ यह विचार अब यहां पर भी चर्चा
का विषय है। स्त्रियां मांग कर रही हैं कि घरेलू कामकाज के एवज में उसे पैसे
मिले । इसलिए नहीं कि वह गृहस्वामिनी और पत्नी है और पति की आय पर उसका अधिकार
है। पश्चिमी देशों में इस पर खूब बहस हुई है। अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलनों
में बार-बार यह मुद्दा उठाया गया है। यह भी एक तरह से देह परिवारीकरण है।
गर्भधारण के कितने पैसे लोगी औरत?
(जैसे किराए की कोख हो) बच्चे को जन्म देने का क्या लेगी वह
?
फिर दूध
पिलाने, पालने, पोषण करने और अपनी ममता का क्या मोल लगाएगी
?
फिर हर वर्ग की औरत का किराया भी अलग होगा। इसके लिए भी कोई कानून, संविधान
बनना चाहिए। मिनिमम वेजेस निर्धारित होनी चाहिए। देहवाद के चलते अमरीका के समाज
में बढ़ती उम्र के साथ जैसे-जैसे शरीर क्षीण होता है। और 40 की उम्र तक आते 30
प्रतिशत औरतों का तलाक हो जाता है। आदमी नई देह ले आता है। 50-60 वर्ष की उम्र
की 77 प्रतिशत औरतें अकेली रहती हैं। सच यह है कि भौतिक विकास के साथ स्त्री के
जीवन के संमजन में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अनेक स्तरों पर विचलन और
व्यवधान उत्पन्न होते है। नये समीकरण बैठाने इतने आसान नहीं होते । जहां घरेलू
कामों के एवज में स्त्रियों में 95 प्रतिशत स्त्रियों की आय पर पति या परिवार
का हक होता है। कामकाजी स्त्रियों को कुछ सीमा तक आर्थिक निर्भरता तो मिली पर
व्यक्तित्वान स्त्री का घरेलू और सामाजिक संस्करण निकला ही नहीं। जिन घरों में
औरतें कमा कर लाती है वहां भी संपत्ति का क्रय-विक्रय पुत्रों और पतियों के नाम
पर होता है।
गांवों में 59 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले में 54
प्रतिशत स्त्रियां कृषि कामों में लगी है। जो स्त्रियां जमीन पर 10.12 घंटे काम
करती हैं। उसे बोती, सींचती और जोड़ती है। उस पर उनका कोई अधिकार नहीं होता।
जमीन की मिलकियत का, उसे रखने या बेचने का अधिकार, उस पर उत्पादन की बक्री का
हक भी पुरुषों का होता है । राष्ट्रीय आय में दो तिहाई उत्पादन औरतें करती है
परंतु 10 प्रतिशत संपत्ति पर ही उनका अधिकार है। कुल श्रम शक्ति का आधा हिस्सा
औरतें हैं। बहुत से परिवार स्त्रियां अपनी कमाई का शत- प्रतिशत घर और बच्चों पर
खर्च करती है। खुद कुपोषण का शिकार होती हैं। कारण यही कि उनकी देह काम करती है
परंतु औरत व्यक्तित्वान नहीं बन पाती । स्त्रियां विचारवेता नहीं बन पातीं। दी
गई स्थितियां और मान्यताएं औरतों के मस्तिष्क में सदियों तक घुलती गई और उनकी
चेतना उनके कर्म और धर्म को प्रभावित और प्रचलित करती है। स्त्रियां अपने को
दोयम दर्जे का प्राणी मानती है। इस तरह जीना आसान भी है और सुविधाजनक भी। बेकार
में पुरूष वर्ग से पंगा लेने का क्या लाभ। क्योंकि स्त्रियां जानती हैं इस सच
को कि विचारवान, विवेकवान और व्यक्तिवान स्त्रियां, घर या बाहर स्वीकारी या
सराही नहीं जाती । क्योंकि ऐसी स्त्रियों को पुरूषों के लिए तह लगाकर बगल में
दबाकर चलना आसान नहीं होता। इसलिए अपने विचारवान होने की कीमत भी पुरूष समाज
में उन्हें चुकानी पड़ती है। अगर वे पुरूषों के कंधों पर या गोदी में नही बैठती
या उनकी उंगली पकड़कर नहीं चलती तो पैया-पैया चलती हैं। वहां भी पांवों पर आघात
किए जाने का खतरा बना रहता है, लेकिन आज
औरतों की एक नई पौध विकसित हुयी है। ये महत्वाकांक्षी औरतें दोगली हैं। जो घरों
में अपनी देह सुरक्षित सहेजकर, मंच और माइक पर मर्जी के देहवाद का नारा लगाती
है। हमारे यहां तिरिया चरित्र का लम्बा और सुनहरा इतिहास है। इतिहास गवाह है कि
राज्याभिषेक की जगह वनों की राख छनवा देना, राज्यों को ढहाना और बनाना, सत्ता
के गलियारों में इधर का उधर और उधर का इधर कर देना, आदमी का मुर्गा बना देना,
इन्हीं के हाथों हुआ है। तिरिया चरित्र का जादू साहित्य में भी चल रहा है। औरत
होने को औजार की तरह इस्तेमाल किए जाने की नीति-राजनीति खूब फल-फूल रही है।
पश्चिम में जबकि वर्ल्ड सिस्टिर हुड की अवधारण को अल्टीमेट माना जा रहा है।
वहीं यहां पर छीना झपटी का खेल चल रहा है। विकास की धार बड़ी तेज है। सीधे
रास्ते की यह टेढ़ी चाल है। यह भी हो सकता है टेढ़े समय की यही सीधी चाल हो ।
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डॉ. कमल कुमारः हिन्दी की प्रख्यात
कथाकार एवं
कवियत्री कई पुस्तकें प्रकाशित । इन
दिनों
दिल्ली के जीसस एण्ड मेरी
कालेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में
एसोसिएट
प्रोफेसर हैं।
संपर्क : डी-38, प्रस एन्कलेव, साकेत,
नई दिल्ली -17
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