पत्रकार-संघर्ष और संभावनाएं
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माखनलाल
चतुर्वेदी
देश के उपदेशक
संपादक,सज्जनों एवं पत्रकार बंधुओं !
मेरी अपेक्षा ज्ञान-वद्ध वयोवृद्ध औत तपोवृद्ध व्यक्तियों के होते हुए, आपने
मेरे जैसे अनुभवहीन व्यक्ति को, इस संस्था के सभापतित्व का गौरवपूर्ण पद प्रदान
किया, इसके सिए मैं, शिष्टाचार-वश ही, आपको धन्यवाद दे सकता हूं, हृदय से नहीं।
सम्मेलन का यह दूसरा वर्ष है। संस्था सर्वता बाल्यावस्था में है, ऐसे समय
संपादन-कला सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय स्फूर्ति के लालन-पालन में, जिनके हाथ
अधिक अनुभवशील, अधिक सावधान होते उन्हीं को यह कार्य सौंपना उचित ता। एक वर्ष
के शिशु को सजीव, सतेज और सक्षम कर ले जाने के लिए शिशुसंगोप में निपुण हाथों
की जरूरत थी। मेरा तो इस कला में कोई स्थान ही नहीं किन्तु मैं सोचता हूं, आपने
अपने तेज के पानी के बरते हुए हथियारों को इस संस्था के किसी बलवती जिम्मेदारी
के समय संभालने के लिए रख छोड़ा है, और इसलिए मुझ जैसे आदमी को आपने आज्ञा दी
है कि मैं प्रारंभिक समय की परिमित जिम्मेदारियों में आपकी आज्ञा का पालन कर
दूं। यद्यपि मैं सोचता हूं कि ऐसी जिम्मेवारियों गौरव का कारण नहीं होती, वेतो
एक आपदा, एक संकट ही होती हैं जहां अपने व्यक्तियों से अलग बैठकर मनुष्य को
अनुशासन विद्यार्थी, और उन सब सज्जनों के नम्र प्रतिनिधि के नाते कार्य करूंगा,
जिनके ज्ञान, अनुभव औत तप को आज ते सभापतित्व के पाने का मुझसे अधिक अधिकार ता।
सज्जनों,
भारतीय उपवन में कितने ही फूल और फल देते हैं जो इस देश की उपज नहीं, उनका आगमन
अन्य देशों से इस देश में हुआ है। समाचार-पत्रों और समाचार पत्रों का व्यवसाय
भी इसी बात का एक उदाहरण है। इसीलिए समाचार पत्रों से संबंध रखने वाला प्रशस्न
ज्ञान भी हमें उन्हीं देशों के साहित्य से मिलता है और अपने देश की परिस्थिति
के अनुसार हमें उसका उपयोग कर लेना होता है। पाश्चात्व देशों में समाचारपत्र का
कार्य बहुत महत्वपूर्ण है और उसमें कार्य करने वाले लोगों का समाज में बड़ा आदर
है। गत सौ-डेढ़ सौ वर्षों के अंदर, संसार में जो लड़ाइयां, जोमहायुद्ध, जो
संधियां, जो समझौते और जो सामाजिक राजनैकिक एवं औद्योगिक हलचले हुई, उनका महान
यश अधिकतर समाचार पत्राकारों और समाचार पत्रों को ही देना पडे़गा । युद्ध
घोषणा अथवा संधि की चर्चा जैसे कार्य, यद्यपि प्रत्यक्षः राज-संकट का संचालन
करने वाले राजनीतिज्ञ ही किया करते हैं, किंतु युद्ध या संधि की परिस्थितियां
उत्पन्न करने अथवा उन परिस्थितियों को जिंदा रहने देने और भार डालने का कार्य
समाचार-पत्र ही किया करते हैं। इस बात से समाचार-पत्रों और उनके संचालकों की
‘कर्तुम्
अकर्तुम् अन्यताकर्तुम्’
की शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इंग्लैड में साम्राज्य के जो चार
आधार-स्तंभ माने जाते हैं, उनमें एक समाचार पत्र भी है और इसलिए इंग्लैंड में,
और उससे भी अधिक जापान में, समाचार-पत्रों को
‘फोर्थ
स्टेट’
कहा जाता है। इंग्लैड, जापान और अमेरिका-जैसे
‘ममहाशक्ति’
कहे जाने वाले देशों में लॉर्ड नॉथक्लिफ, लॉर्ड बेव्हर ब्रुक और
‘जीजी’
के उत्पादक प्रसिद्ध जापानी फूकूजावा-जैसे व्यक्तियों को यह गौरव प्राप्त है कि
उनके देशों को उसी पथ में चलना होता है जिस पथ में वे चलना चाहते हैं.
बंधुओं, यदि
समाचार-पत्र संसार की के बड़ी ताकत है, तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं। पर्वत की
जो शिखरें हिम से चमकती और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उन्हें
ऊंचची होना पड़ता है। जगत में समाचार-पत्र यदि बड़प्पन पाये हुए हैं, तो उनकी
जिम्मेवारी भी भारी है। बिना जिम्मेवारी के पड़प्पन का मूल्य ही क्या है
?
और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल हो जाते हैं जो अपनी जिम्मेवारी को संभाल नहीं
सकता। समाचार पत्र तो अपनी गैर-जिम्मेदारी से, स्वयं ही मिट्टी के मोल कानहीं
हो जाता है, वरन् वह देश के अनेक महान अनर्थों का उत्पादक और पोषक भी हो जाता
है। इस समय एकाधिकार या अल्पाधिकारी शासनों के सिंहासन डोल रहे हैं और जन-सत्ता
का सूर्य धीरे-धीरे नभ मंजल के मध्य भाग को छूना चाहता है । ऐसे समय जनता के
हृदयय की ध्वनि, उनके संकट के शस्त्र उनके एकांत के चिंतन, उनके जन-समूह के
प्रबोधक समाचार-पत्र का महत्व और भी अधिक हो जाता है, और चूंकि निरंकुशता से
समानता की ओर जाने का जगत का रूख बदलने का सामर्थ्य अब अनपा काम नहीं कर सकेगा,
अतः समचारा पत्रों का प्रभाव उत्तरोत्रर बढ़ता ही जायेगा । इसलिए सामयिक पत्रो
से संबंध समझने, उसे अनुभव करने और उसके बूते परिस्थितियों में परिवर्तन करने
के उपासकों को, अपने गंभीर उत्तरदायित्व को क्षण-क्षण अनुभव करना होगा और आने
वाले परिस्थितियों का सक्रिय जवाब देने के लिए सदैव प्रस्तुत रहना होगा।
सज्जनों,
समाचार-पत्रों का प्रधान काम है : लोक मत का निर्माण । और इसीलिए ,इस व्यवसाय
के व्यक्ति चिंतित रहते हैं कि देश की आवाज के स्पष्ट, अर्थपूर्ण और उन्मुक्त
करने में, देश का आत्माओं को कार्य-शील चिंतन और चरित्र-पूर्ण बनाने में उसका
कार्य अपकर्म का कारण न बन जाये। जो देश स्वतंत्र है, जगह साहस और
महत्वाकांक्षाओं में, शराब और अफिीम जैसे विषयुक्त पदार्थोंकी तरह बंधन नहीं
रखा पाते थे, जिस तरह अपनी गंभीर जिम्मवारियों को विनोद की तरह निपटाते हैं,
उसी तरह आपने और समाज के विनोद और शौक के लिए राष्ट्रीय हित को कभी-कभी गौण बना
सकते हैं। किंतु जो देश भारहत की तरह पराधीन है, उसे देश के संपादकों को, अपने
देश के भाग्य के साथ खिलाड़ी मित्र की तरह बरतने का अवसर नहीं रहता, उन्हें एक
जोखम भरे रोगी आत्मीय की तरह बरतना पड़ता है। वे अपने भी मार देश और उसके कमजोर
भाग्य के साथ मजाक नहीं कर सकते, देश की किसी भी घटना और अपने किसी भी साधन का
उपयोग सामाजिक और व्यक्तिगत विनोद और शोक के लिए नहींकर सकते। पराधीन देश के
पत्र-संपादकों से कहीं अधिक और जोखम से भरी हुई होती है। स्वतंत्र देशों में
पत्र-संपादन प्रोत्साहन का, गौरव का और सुख का साधन होता है।परतत्र देशों का
सचाचा पत्र-संपादन विदेशी राजकर्ताओं से सीधा लोहा लेना, उनके स्वार्थों पर
बिना झिझके पैर रखना होता है। सन् 1780 में कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले
भारत के प्रथम पत्र ‘हिकिज
जर्नल’
से लगाकर, बड़े-बड़े जुर्माने, जब्तियां और पिछले 147 वर्षों से कठोर यंत्रणाएं
इस बात का गहरा सबूत हैं कि किसी पराधीन देश का पत्र-संपादन प्राणों की बाजी
का व्यापार हैं। भारत के समाचार-पत्रों ने तीन बातों को लगातार सामने रखा है :
1. हम इतने
बचकर लिखे कि कानून का दैत्य हमें निगल न जाये।
2. कानून
द्वारा लिखने के साधन, उसकी स्फूर्ति, छिन जाने के बाद भी ऐसी कौन सी बातें
हैं कि जिन्हें लिखकर हम राष्ट्र को खड़ा करने का बल उसमें ला सकें।
3. ऐसी कौनसे
साधन हैं जो व्यवसाय की दृष्टि से समाचार-पत्रों को जिंदा रख सकें।
इसे सिवा
पत्र-संचालन की कला, हारे देश में सर्वधा नयी होने के कारण और जनाता के बल की
लहर देश में अबीत क प्रवेश न कर सकने के कारण, देश की ओर से देश की जनता की ओर
से समर्थन, जो सहायता, जो शक्ति हमें मिलनी चाहिए वह हमें नहीं मिलती। जनता की
सहायता के अभाव में दुर्देव से,एवं कठिनाई से पेश पा रहे हैं। समाचार पत्रों की
उपमा उस स्त्री से दी जा सकती है जिसके गुण और बल पर भयभीत अत्याचारियों के
आक्रमण हो रहे हैं, किंतु जिसके पोषण और प्राणाधार अज्ञान हों। इस तरह, जानकार
शत्रु और अज्ञानी सहायक के भी च, सहायक के स्वार्थों की सतत रक्षा करते जाना
एक कठिन तपस्या है।
ऐसी है
परिस्थिति, जिसमें से समाचार-पत्रोंको गुजरना होता है। किंतु ऐसी अनेक अड़चनों
और विकट परिस्थितियों में भी भारतीय पत्रों और उनके संचालकों ने अपने अस्तित्व
को कायम रखा और पिछले शताब्दी के पचीस वर्षों में समाचार-पत्रों की संख्या
बढ़ायी, यह देख-सुनकर किसे अचंभा न होगा
?
और कौन यह न कह उठेगा कि इस कार्य को कंधे पर लेने वाले लगातातर कष्ट भोगियों
के धैर्य, उनकी लगन उनके दीघोंद्योग का ही यह परिणाम है। कौन नहींकहेगा कि आज
समाचार-पत्रों को जो बल जो अवलस्था प्राप्त है, उसका यश इस देश के स्वर्गीय
लोकमान्य तिलक, स्वर्गीय मोती बाबू, श्रीयुत सुब्रहमण्य् अय्यर जैसे व्यक्तियों
को ही है। मुझे विश्वास है कि यदि हमने अपने देश की अगली पीढ़ी के चित्र को
अपने रक्त बिन्दुओं पर चित्रित हो जाने दिया, यदि हमने भी पहली सी लगन, उसी
त्याग और उसी अध्यवसाय से अपना काम किया, तो हम अपने पीछे आने वाली पीढ़ी के
हाथों एक गर्व करने योग्य परिस्थिति दे जाने में समर्थ हो सकेंगे। स्वतः राज्य
का उपयोग करने वालों की अपेक्षा, उन लोगों की कीर्ति निःसंशय अधिक उज्जवल, उनका
प्रयत्न अधइक वंदनीय उनका पुण्य अधिक है जिन्होंने अपनी भुजाओं के बल से राज्य
कमाया और अपनी आजाद पीढियों के हाथों में धरोहर की तरह सौंप दिया ।
मैंने यह बात
गई जगह पढ़ी और सुनी है कि राष्ट्र की अथवा मानव हृदय की धमनियों को फड़का देने
वाले कवि अपने आप जन्म लेते हैं, वे बनाये नहीं जाते । इस विषय पर निश्चित रूप
से मुझे कुछ पता नहीं, किंतु पत्र-संपादकों के विषय में मैं इस बात को मानता
हूं। मैं पतत्र संपादन के विषय के जानकार अंग्रेजी लेखक मि. जॉन पेण्डलटन के इस
कथन से सर्वता सहमत हूं कि आक्सफोर्ड का गौरव, कैम्ब्रिज की कीर्ति और
बैरिस्टरी का बड़प्पन, पत्र संपादन से अधिक नहीं ठहरता । यहां ते स्वभावजन्य
बैचेनी ही अधिक यशास्वनी हेती है। यह कला अलंकारों वाले सौंदर्य की उपमान नहीं
,इस कला के ब्राह्मांग को क्षण-क्षण बदलने वाली नवीनता की ुपमा दी जा सरती है,
और इस कला की आत्मा की उपमा है वह सौंदर्य जो प्राणों के मूल्य का है, चूंकि वह
भय की गोद में निवास करता है। भय की गोद में निवास करने वाला सौंदर्य सजाये
हुए राजमहलों में नहीं रहता, वह प्रकृति के हाथों निर्माण हुई जोखमि की जगहों
में निवाल करता है। उसी तरह पत्र-संचालन की कला युनिवर्सिटी की पत्थर की
तस्वीरों के बूते जीवित नहीं रह सकती , उसके लिए हृदय की लगन ही आवश्यक है। इस
कला का जीवन सहृदयता, धीरज, लगन, बैचेनी और स्वभिमान का स्वभाव सिद्ध होना ।
शिक्षा और श्रम द्वारा विद्वता और बहुश्रुतथा को जीता जा सकता है, ऊपर लिखे
स्वभाव-सिद्ध गुणों को नहीं. स्वभाव सिद्ध गुण जिनका बना नहीं, किंतु यह भी सच
है कि हर काम हर आदमी नहीं कर सकता । मैं नहीं मानता कि ज्ञान के समान मानव
बहुंच और विशेष मानव-कृति यह भी सच है कि हर काम हर आदमी नहीं कर सकता। मैं
नहीं मानता कि ज्ञान के समान मानव बहुंच और विशेष मानव-कृति, इयत्ता से सर्वता
परे हैं। प्रत्येक बात मानवीय रूचि की स्वाभाविकता पर अवलंबित होती है। अतःमेरी
नम्र सम्मति में तो मनुष्य अपने मन का तौल देखकर ही अपने कार्य के लिए कार्य
ढूढे। समाचार-पत्रों के जोखम भरे धेधों में तो, यदि ऐसे ही स्वभाव-सिद्ध रूचि
वाले लोग आयेंगे तो यह कला अधइक बढ़ेगी और अपेक्षित फल देगी।
सज्जनों
समाचार पत्रों के उदय ने समस्त जगत को पाठशाला बना डाला है।
‘श्ष्यस्तेअहं
शाधि मैं त्वां प्रपन्नम्’
कहकर, धर्माध्यक्षों के चरणों पर मस्तक झुकाने की परंपरा सब देशों में रही है,
आज भी है , किंतु बिना जाने ही समाचार-पत्रों के ज्ञान की उनकी सूचनाओं का,
उत्सुकता से मार्ग, प्रतीक्षा करे वाले शिष्यों की जितनी बड़ी संख्या आज जगत
में है उतनी बड़ी संख्या संसार के सब धर्मों के
‘आतुरों’
के समूचे जोड़ की भी नहीं है। यह सच है कि समाचार-पत्रों को किसी ने शिक्षक
नियुक्त नहीं किया, किंतु यह बात कहकर ये एक शिक्षक के नाते पड़ने वाली
जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । अयाचित और स्वयं-स्वीकृत सेवा अधिक
उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थी अपने शिक्षक के नाते पड़ने वाली
जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । अयाचित और स्वयं-स्वीकृत सेवा अधिक
उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थी अपने शिक्षकों से जो तालीम पाते है,
वह ऐसे ज्ञान के रूप में होती है, जिसे उन्हें भविष्य जीवन में आजमाना होता है,
आज नहीं, और उन्हें अपने ज्ञान के अनेक विद्वानों द्वारा परिमार्जित करने के
लिए काफी अवसर भी रहता है। पत्र-संपादकों के श्रोताओं या पाठकों का यह हाल
नहीं । जिस बात केलिखने में संपादक को थोड़ा ही कष्ट उठाना पड़ता है, केवल जरा
सोचना और कुछ संदर्भ पुस्तकों को देखना पड़ता है, यदि यही बात परिस्थिति को
देखकर, या हानि-लाभ का ख्याल कर न लिखी जाये तो वह पाठकों को तरित्र, धन, गौरव
और ज्ञान के रूप में महान हानि का कारण होती है। इसलिए कि समाचार-पत्र का पाठ्य
जीवन युद्ध में लगा हुआ जीव होताहै, समाचार पत्रों से पाये हुए ज्ञान को
परिमार्जित करने के लिए विद्वान, शिक्षकों और उचित अवकाश का उसके पास अभाव
होता है। यह बात ठीक वैसी ही है इतिहास के लेखक या भविष्यवादी की गलती केवल
पढ़ने में कष्ट देती हैऔर पिछली परंपरा या भावी जीवन की चर्चा करतीह है, अतः
मनुष्य की प्रत्यक्ष हानि नहींकरता, किंतु कानून बनाने वाले की गलती तुरंत
लोगों के धन7जन का नाश करने लगती है। अतः समाचार-पत्रों के सेवक को अपनी कलम
तलवार से कहीं अधिक सावधानी से उठानी पड़तीहै। तलवार की पीड़ा प्रारंभ में ही
होती है, अतः घाव के पूरा होने के पहले ही वार बचाने का यत्न किया जा सकता है।
किंतु पत्र संपादक के प्रहार का अनुभव,नाश और हानि के साथ होता है। इसलिए इस
दिशा मेंकलम उठाने वाले की दृष्टि, परिणाम पर सतत लगी रहनी चाहिए। नियुक्त
शिक्षक केवल अपने की नियुक्त करने वाले के सामने उत्तरदायी है, किंतु पत्र
संपादक समस्त देश के सामने उत्तरदायी होता है क्योंकि उसके हाथ में देश का हित
और अहित होता है।
सम्मान
बंधुगण, स्वभाव-सिद्ध संपादकों की चर्चा करने से मेरा मतलब ज्ञान को गौण स्थान
देने से नहीं । मैं मानता हूं कि संपादक के स्वभाव-सिद्ध गुणों को जिंदा रखने
के लिे ज्ञान ही एक महान साधन है।किंतु हीरा कीमती वस्तु भले ही हो, बाजार में
रखे जेाने से हले उसे करारे संघर्षणों का सामना करना होगा, इसी तरह, संपादक की
जवाबदारी संभावने वाले व्यक्ति के भाग्य में लगातात विश्व को ज्ञान का संघर्षण
बढ़ा होता है। संपादकों या पत्रकारों के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रश्न अभी् विश्व
के कोई भी विद्याफीछ पूर्ण रूप से नहीं सुझा पाये। अमेरिका-इंग्वैंड आदि देशों
में अभी थोड़े वर्षों से पाठ्यक्रम बने हैं किंतु उनमें अभी निश्चिता नहीं आ
पायी है। भारत में हमारे अज्ञात पर जीने वाला शासन होने के कारण, हम सदैव विश्व
के ज्ञान को बहुत देर बाद पाया करते हैं। किंतु संपादन कला के ज्ञान के विषय
में यह विलंब अक्षम्य अपराध होगा। हमें ऐसा उद्योग करना चाहिए जिससे समाचार
पत्रों और संपादन-कला के ज्ञान की जड़ जमें । मैं सोचता हूं कि आप सब सज्जन इस
बात पर अवश्य विचार करेंगे कि वे कौन-कौन से प्रधान उपाय हैं, जो समाचार-पत्र
और संपादन-कला के लिए अधिक उपयोगो सिद्ध हो सकते हैं।
महाशयों,
हमारे देश के समचार पत्र संगठित नहीं हो रहे । श्रीयुत नटराजन के सभापितत्व में
बम्बई में श्रीमान रामस्वामी शास्त्री के सभापतित्व में मद्रास में,
‘फारवर्ड’
के एक भूतपूर्व संपादक महाशय के सभापतित्व में बंगाल में, और इसी प्रकार सिन्ध
में एक-एक पत्रकार संघ स्थापित है। बम्बई के भाग्यशाली संघ के सबापति तो कुछ
समय तक महतामा गांधी भी रह चुके हैंष किंतु खेद है कि सिवा कभी-कभी निंदा और
विरोध के प्रस्तावों को पास कर लिने के इन संघों का कोई विश्ष उपयोग जहां तक
मेरा तुच्छ सूचना ज्ञान पहुंचा है, नहीं हुआ। इन संघों ने म्लकर यह उद्योग नहीं
किया कि एक बार देश के समस्त पत्रकारों के रूप में अपनी राश्ट्रीय पत्र शक्ति
का बल तौलते और पत्रकारों को संगठित करते । हमारे संघठित न होने के कारणों में
दो प्रधान दिखते हैं-एक तो संपादकगण या संचालकगण स्वयं अपने-अपने पत्रों के
जीवन विधाता हैं फिर भला वे किसी के अनुशासन में कैसे रहें
?
दूसरे दिन पूंजीवतियों के हाथ में देश के कुछ प्रभावशील समाचार पत्र हैं शायद
वे इस बात का भय मानते हैं कि यदि साहसी गरीब
‘उपकरण’
पत्रकार संघ में बलवान हो गया तो निरंकुशता की एक गहरी ठोकर लगेगी और उसके ठोकर
लगते ही पूंजावादी इमारत की नींव हिलने लगेगी। इसकगा एक तीसरा कारण भी तो शायद
हो-संगठन का कार्य बिना धन के नहीं चल सकता, और धन तो धनपतियों की जेब में है।
गरीब अपने आपसी ताकत को भीसंग्रहित नहींकरना चाहते, शयद उनका यह ख्याल है कि
केवल समाचार पत्रों का उपदेश ही समाचार-पत्रों को काफी बलशाली बना देगा, इधर
धनपतियों की रुचि पर चलने वाली संस्थाओं में वह साव्रजनिक बल नहीं आता जो किसी
देश की हलचल को यशस्वी कर प्रजा बल के पैरों, को, उसके ध्येय के मंग्राम में
मजबूत बनाता है। तब फिर संगठन कैसे हो
? देश
में यदि बार-बार दमन के कानून जारी किये गये और समाचार-पत्रों को कुचला गया, तो
इसकाकारण समाचार-पत्रों का संगठित ने होना ही है। उन समाचार पत्रों और
समाचार-पत्र संचालकों का तो प्राय) कुछ नहींब्गड़ता, जिन्हें अपने व्यापार या
सरकारी दबाव में शक्ति पानेके लिए पत्रों का संचालन करना होता है, किंतु जिन
समाचार-पत्रों के सम्मुख लोकमत का सबल होना ही उद्देश्य है, उन्हें
समाचार-पत्रकार के नाते नित्य सरकारी नियंत्रण में रहना और आये दिन सरकारी
प्रहारों को सहना पड़तदा है। यद्यपि सब देशों के दरवाजे हमारे देशवासियोंकेलिए
प्रायः बंद से हैं किंतु व्यापार, कला, मजदूरी, विद्याभ्यास तथाअन्यान्य
कामोंसे जो लोग देश से बाहर गये हैं या चले जाते हैं, उन्हें देश में लौटने में
कोई भारी कठिनाई नहीं होती। किंतु जो लोग आंदोलन के नाते समाचार-पत्रों में
लिखने का पाप करेत हैं, या जो समाचार-पत्रों से संबंध रखते हैं, उन
भारतवासियोंको इस देश के शासन की ओर वरदान दिया जाता है कि वे अपनी मातृभूमि का
पुनःमुख ने देखें। लाला लाजपतराय जी पांच वर्षों तक अमेरिका में बंदी जीवन
व्यतीत करते हैं, स्वामी सत्यदेव कठिनाई से पासरोर्ट पाते हैं और कितने ही
साहित्यसेवी पासपोर्ट नहीं पाते, ऐसे व्यक्तयों ही में से होने के कारण,
श्रीयुत शापुरजी सकलातवाला एम.पी. पार्लमेण्ट के सदस्य होकर भी, भारत आने से
रोके जा सकते हैं। क्या हम उन लोगों के देश के लिए सहे हुए कष्टों को भूल सकते
हैं जिन्होंने देश से बाहर समाचार-पत्रों मेंअपार आंदोलन कर संसार के लोकमत की
देश की स्वाधीनता के अनुकूल बनाया है ?
सज्जनों, यदि
आज अमेरिका की आयोवा युनिवर्सिटी के विद्वान प्रोफेसर सुधीन्द्र बोस बार-बार
प्रयत्न करने के पश्चात भी भारत में नहीं आ सकते, और यदि श्रीयुत वसंतकुमार
राय, राजा महेन्द्र प्रताप, श्रीयुत हरिशंकर विद्यालंकार, श्रीयुत एम.एन. राय,
श्री कालिदास नाग, लाला हरदयाल, श्री तारकनाथ दास, श्री रासबिहारी बोस और
श्रीयुत सैयद हसन आज ‘देशनिकाले’
के दण्डनीय अपराधियों की तरह देश से बाह हैं और अपनी मातृभूमि में नहीं आते तो
इसका कारण है : देश के पत्रकारों के संगठन की कमी। उन सज्जनों के भारी अपराध
नहीं, जिनका हमारे देश में शासन है। इस इंग्लैंड में तो उसकी वोलशेविक और
समाजसत्तावादी साम्राज्यनाशक प्रजा रह सकती है, कि्तु उसी इंग्लैड के शासन में
हमारे देश में वे लोग नहीं आ सकते, जिन्होंने समाचार पत्रों द्वारा,
निर्भीकतापूर्वक भारत की दशा पर आंदोलन किये हैं। इसके सिवा कष्ट सहकर या
बिनाकष्ट सहे जो लोग प्रसिद्ध लेखक या संपादक बन गये हैं, और जिन पर थोडी सी
आपदा आते ही लोकमत खूब प्रक्षुब्ध हो उठता है, उनकी बात जाने दीजिए। उन पर
प्रहार करते समय तो सरकार भी दो बार सोच लेती है, किंतु जिन अभागों ने,
प्रसिद्ध लेखन या प्रधान नेता का गौरवपूर्ण पद नहीं पाया, जिन्हें
समाचार-पत्रों के साधारण लेखन, उप संपादक या साधआरम कार्यकर्ता की हैसियत से
अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है यदि उन पर कभी कानून की कृपा हो जाती है, तो
उन्हें जेल में तरह-तरह के कष्कट दिये जाते हैं, साधारम चोर और डाकू से भी बदतर
रखा जाता है और खाने-पीने तथा जीने में इतनी बाधाएं पैदा कर दी जाती है कि वे
बेचारे कब इहलीला संवरम कर गए, इसका उस जनता को पता ही नहीं चलता, जिसकी सेवा
करते-करते उन्होंने ये उपहार पाये। ऐसे अप्रसिद्ध श्रेणी के लोगों के आश्रितों
,माता-पिताओं , भाई-बहनों और बाल-बच्चों की जो दुरवस्था होती है उसकीतो कल्पना
ही बस है। वे भूखों मरते हैं, सरकार के संदेह भाजन होने से प्रभावशील लोग पूछते
ही नहीं। जनता उनसे परिचित न होने के कारण सहायता नहीं करती, परिणाम यह होता है
कि उन परिवारों को भीख भी नहीं मिल पाती। मुझे क्षमा कीजिए उन लोगों की
दुरवस्था का कारण और खुछ नहीं, केवल देश के पत्रकारों का उचित संगठन न होना ही
है। भारत के अंग्रेजी के समाचार पत्रों के विद्वान संपादक और पत्रकार अपना चाहे
जो रूख रखेंमैं आशा करता हूं कि हिन्दी के पत्रकार अपने संगठन का ऐसा स्परूप
देंगे जिससे वह संगठन कष्ट भोगी पत्रकारों के लिए सहायक भी हो सके।
सज्जनों, एक
बार एक अंग्रेजी दैनिक के संपादकीय विभाग में काम करने वाले मित्र सेपूछा,
पत्कार कौन है ?
क्या भारत सरकार के बोर्ड आफ इनफारमेशन के भू.पू. डाईरेक्टर प्रोफेसर रशब्रुक
विलियम्स, और आजकल के उनके उत्तराधिकारी मि. कोटमन पत्रकार हैं
?
यदि देश के प्रधान व्यापारी टाटा या श्रीमान घनश्यामदास जी बिड़ला कल कोई पत्र
प्रकाशित करने लगें तो पत्रकारों की गमना में वे आ जायेंगे । अथवा किसी देशी
रियासत के महाराज अपे राज्य में पत्र प्रकाशित कर उसमें लेख लिखने लगें तो वे
पत्रकार हो जायेंगे। संभव है, इस प्रशनों के मेरे जवाब का लोग मजाक उड़ायें पर
सज्जनों मेरा तो स्पष्ट मत है कि ये सज्जन पत्रकारों की श्रेणी में नहीं गिने
जा सकते। यदि देश में कोई पत्रकार संघ कायम हो और उसमें सरकारी नौकर, धनिकों
सेवक और ऐसे ही लोगों की तादाद अधिक हो जाये, जिनके जीवन पत्रों की आमदनी पर
अवलंबित नहीं, या जिनके पत्र किसी कमाई के विज्ञापन मात्र हैं तो मैं ऐसे संघ
को, ऐसी सबा को, ऐसे सम्मेवन को निहायत अदब के सथ पत्रकार संघ कहने से इंकार
करूंगा। पत्रकार तो केवल वही है जिसका जीवन, पत्र और संपादन-कला पर ही अवलंबित
है, और जिनके सुखों का साधन और दुःखों का सहारा समाचार पत्र ही है, पत्रकार हैं
वेलोग जिनका मुल्य चाहे उनके पत्रों क