नर से
नारायण बनाएगी सूचना टेक्नोलॉजी
---------------------------------------------
प्रो. बी.के.कुठियाला
मानव
के इतिहास की अंतिम सदी के प्रारंभ का समाज वर्तमान समाज से इस प्रकार से भिन्न
है कि आज का व्यक्ति पुराने रुप को देखकर हैरान-परेशान होता है और कभी-कभी यह
मानने से इंकार कर देता है कि केवल मात्र सौ वर्ष पूर्व मानव का जीवन इतना
संकुचित व कम दायरे वाला था । आज का बच्चा तो टेलीफोन और टेलीविजन रहित जीवन की
कल्पना भी नहीं कर सकता । परिवर्तन तो अनेक हुए हैं परंतु सभी परिवर्तनों का
मूल या उनका परिणाम सूचना के प्रसारण की टेक्नोलाजी से है । रूढ़िवादिता का
विनाश हो या उपनिवेशवाद की समाप्ति, वैश्वीकरण हो या उदारीकरण, विश्वग्राम की
रचना हो या नेट समाजों का निर्माण सभी का मूल कारण सूचनाओं का साधारणीकरण व
उनकी व्यापक उपलब्धता है ।
सौ वर्ष के कम
समय पूर्व भी आम मनुष्य के अनुभव और विचार का घेरा अत्यंत सूक्ष्म था । ग्राम
या नगर के आसपास के क्षेत्रों से ही अधिकतर व्यक्ति का सरोकार रहता था ।
दूरदराज की जानकारियां तो कभी-कभार घुमक्कड़ यात्रियों या साधुजनों से ही
प्राप्त होती थी । आज तो आम आदमी भी समुद्रो और पर्वतों के पार की चिंता करता
है व पूरे विश्व में घटित घटनाओं की जानकारी के लिए उत्सुक रहता है । सूचना की
लगातार विकसित हो रही टेक्नोलॉजी के कारण से ही यह सब संभव है । समय के अनुसार
व्यक्ति और समाज के सूचना भण्डार का आकार भी कई गुणा बढ़ गया है । आज की तुलना
में तो 60-70 वर्ष पूर्व का मनुष्य अनजान और निरीह लगता है । आज से 15-20 पूर्व
जोरदार शब्दों में घोषणाएं की गई कि मानव समाज अब सूचनाओं का समाज बन चुका है
और व्यक्ति समाज में क्या स्थान व सम्मान पायेगा उसके निर्धारण का एक मापदंड
होगा कि व्यक्ति के पास कितनी जानकारियां उपलब्ध हैं या वह कितना सूचित है।एक
दशक में ही स्थिति इतनी बदली कि आज पूर्ण सूचित होना असंभव है ।
वर्तमान का
मानव तो सूचनाओं के समुद्र में तैरता है, सूचनाओं के जंगल में रहता है और
सूचनाओं के आसमान से उड़ता है । समुद्र, जंगल व आसमान तीनों ही अनंत हैं ।
वर्तमान में तो सूचनाओं तक पहुंच होना और सूचनाओं की पहुंच में कम से कम क्षणों
का प्रयोग हो यही सामाजिक शक्ति का सूचक है । आज का मनुष्य तो
‘कनैक्टिड’
है । ‘कनैक्टिविटी’
के ताने-बाने में उलझा हुआ दिखने के बावजूद भी वह मानवीय संबंधों और मावन और
प्रकृति के संबंधों को अधिक विस्तार दे रहा है । यह क्रांति नहीं है, यह तो युग
परिवर्तन है । मानो मानव के विकास की प्रक्रिया में एक अति महत्वपूर्ण कदम ले
लिया हो । क्योंकि जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि सृष्टि की रचना में मानव
सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और मावन में विकास की प्रक्रिया अब शारीरिक न होकर
बौद्धिक है । बौद्धिक रुप से मनुष्य ने पिछले दस दशक में जो छलांग लगाई है उतनी
लंबी और चौड़ी छलांग शायद पिछले एक लाख वर्ष में भी नहीं लगाई होगी ।
मनुष्य जाति
के इस बौद्धिक विकास की एक विशेषता यह भी है कि यह परिवर्तन ऐसा है जो
अतिव्यापक है । पूर्व में हुए आविष्कारों और नई प्रणालियों को समाज में सभी को
प्राप्त होने में सदियां लगा करती थी । मानव जाति के कई भाग तो विकसित
प्रणालियों से पूर्ण रुप से वंचित आज तक रहे हैं । पहिए के आविष्कार को
सर्वव्यापी होने में हजारों साल लगे । मुद्रण की टेक्नोलॉजी अभी भी सर्वव्यापक
नहीं हुई है। कैमरा या उससे बने चित्र स्थाई या चलते-फिरते अभी भी बहुत से
समाजों में उपलब्ध नहीं है परंतु टेलीफोन की टेक्नोलॉजी जिस गति से विस्तृत हुई
है यह मानना अनुचित लगता है कि अगले कुछ वर्षों में मानव समाज का कुछ अंग ऐसा
भी होगा जी टेलीफोन से जुड़ा हुआ न हो ।हां, ऐसा तो हो सकता है कि लोग इस
अतिक्रमण से परेशान होकर टेलीफोन स्वयं ही छोड़ना प्रारंभ करें परंतु उपलब्धता
तो रहेगी ही । टेलीफोन और रेडियो के सिग्नल भी सर्वव्यापक होंगे और उनको डी-कोड
करने के लिए सैट भी सहजता से कोने-कोने में उपवब्ध है या हो जाएंगे । विकसित
देशों में कंप्यूटर और इंटरनेट समाज को पूरी तरह से जोड़ ही चुके हैं ।
विकासशील देशों में भी इनकी व्यापकता का वृद्धि दर भारी-भरकम है । कुल मिलाकर
अतिश्योक्ति होगी यदि कहा जाए कि मानव के समाज में बौद्धिक दूरियां मृतप्राय और
व्यक्तियों के संबंधों में टेक्नोलॉजी का महत्वपूर्ण योगदान हो गया है ।
मीडिया और
संचार की यह तकनीक नित्यप्रति नया रुप ले रही है । एक वर्ष पूर्व ही इंटरनेट के
लिए कंप्यूटर को तार से जोड़ना आवश्यक था । आज ब्ल्यू टुथ और वाई-फाई
टेक्नोलॉजी ने तो यह भी आवश्यक नहीं रखा है कि मोबाइल टेलीफोन कान पर रखा जाए
या उससे जुड़ी हुई तार कान में लगाई जाए। लैप-टॉप को कहीं भी ले जाकर आप
इंटरनेट से संबंध बना सकते हैं यदि वाई-फाई टेक्लोलॉजी उपलब्ध है । शीघ्र ऐसी
व्यवस्था भी हो जाएगी कि लैप-टॉप पर कंप्यूटर व इंटरनेट के अतिरिक्त, टेलीफोन,
फैक्स व टेलीविजन की सुविधाएं भी बिना तार के ही हो जाएंगी । जोड़ने के लिए तार
की आवश्यक नहीं है तरंगे ही काफी हैं ।
प्रश्न यह
उठता है कि संचार की नई तकनीकों के आविष्कार और निर्माण के पीछे मनुष्य की
प्रेरणा क्या ?
मानव के इतिहास के प्रारंभ से आज तक की टेक्नोलॉजी विकास पर एक नजर डालें तो एक
प्रक्रिया साफ-साफ सामने आती है । मनुष्य की बुद्धि ने तो मनुष्य को अत्यंत
शक्तिशाली बना दिया परंतु मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों की सीमाएं हैं ।
माना कि हम दो पैरों पर चल सकते हैं परंतु फासले तय करने की सीमाएं है और गति
की भी सीमाएं हैं । हाथ शक्तिशाली हैं परन्तु पत्थर नहीं तोड़ सकते । चट्टान को
उठाना भी संभव नहीं है । इसी तरह से आंख देखती हैं परंतु दूर तक नहीं । दीवार
के उस पार नहीं । कान तो सुनता है परंतु सौ गज दूर बैठी प्रेयसी का गीत सुनने
में अक्षम है । मस्तिष्क सूचनाओं का संग्रहण करता है परंतु उसकी भी सीमा है ।
मनुष्य की बुद्धि ने इन मजबूरियों को मानने से इनकार किया और प्रकृति के नियमों
को ही खोजकर उनका प्रयोग किया और अपनी शक्तियों को विस्तार दिया । पहिए ने
टांगों के काम को संभाला और अधिक कुशलता से संभाला । औजारों, हथियारों और
मशीनों ने हाथों और बाजुओं की क्षमता को कई हजार गुणा बढ़ा दिया । कैमरे ने
चलती-फिरती आंख काम किया और चित्रों को प्राप्त करने में दूरी का संहार किया ।
कैमरे ने तो काल पर भी विजय पाई और वर्षों पूर्व के चित्रों को सुरक्षित कर
उपलब्ध करवाया । मानव ने मस्तिष्क के विस्तार के रुप में कंप्यूटर का निर्माण
किया जो वही काम करता है जो एक मनुष्य का मस्तिष्क करता है । अब तो अपने आप
सोचने वाले और फैसला करने वाले भी कंप्यूटर भी बन चुके हैं । एक कंप्यूटर तो
मस्तिष्क के एक कदम और आगे है । अनचाहे ज्ञान व सूचनाओं को मस्तिष्क भुलाने की
क्षमता नहीं रखता है परंतु कंप्यूटर तो
‘डिलीट’
की ब्रह्मास्त्र से लैस है ।
जब दो या दो
से अधिक मनुष्यों में संचार या संवाद की स्थिति बनती है तो संबंधों का निर्माण
होता है । संबंधों के बनने से संवाद बनता है और इस प्रकार मनुष्य-मनुष्य से
जुड़कर समाज की रचना करता है ।
मनुष्य
के मस्तिष्क का विस्तार कंप्यूटर और जब कंप्यूटर आपस में जुड़े तो क्या हुआ
?
होना क्या है संबंधों का विस्तार हुआ । जो संबंध केवल मात्र आमने-सामने होने से
ही बनते थे वे अब टेक्नोलॉजी के माध्यम से बनने लगे हैं । व्यक्तिगत तौर पर
मानव का शरीर केवल कुछ लोगों से संबंध बना सकता है परंतु संचार के विभिन्न
माध्यमों जैसे मुद्रित कागज, कैमरे का चित्र व चल-चित्र, ध्वनि तरंगों को
संग्रहित रखने वाली और संचारित करे वाली तरंगे, कंप्यूटर की संग्रहण की क्षमता
व इंटरनेट की कनैक्टिविटी की क्षमता ये सभी मनुष्य के शरीर, मन व बुद्धि के
विस्तार हैं । प्राणी जगत के विकास का महत्वपूर्ण अंग है । मनुष्य के इतिहास
में अनेकानेक उदाहरण हैं जब एक ही तरह की टेक्नोलॉजी को मनुष्य ने संहार और
सृजन दोनों के लिए प्रयोग किया है । अणुशक्ति का सदुपयोग और दुरुपयोग सबसे बड़ा
उदारहण है परंतु यह अकेला उदाहरण नहीं है । अग्नि को नियंत्रित व संग्रहित करने
की टेक्नोलॉजी ने मनुष्य को अत्यंत सुख दिया है परंतु मानव ने इसका प्रयोग अन्य
मनुष्यों, प्राणियों व प्रकृति को नष्ट करने में भी किया है । पीड़ा से मुक्ति
पाने के लिए दवाइयां बनाई गई परंतु उनका दुरुपयोग नशे के रुप में भी किया जाने
लगा । डायनामाइट की भी यही कहानी है ।
कभी-कभी ऐसा
आभास होता है कि सूचना और मीडिया की टेक्नोलॉजी के साथ भी यही होने वाला है ।
पूर्ण मानव समाज ने समरसता व प्रेम भाव पर आधारित संबंधों की रचना इस
टेक्नोलॉजी से सुलभ है। मानव को अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान की तरफ ले जाने में
यह भी सक्षम है । ज्ञान-विस्तार के समागम से मानव को महामावन और नर को नारायण
बनाने की भी इसमें शक्ति है परंतु विपरीत दिशा में भी चलने का विकल्प भी है ।
सूचना टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके समाज में आतंक व भय का वातावरण भी बनाया जा
सकता है । वास्तव में, बनाया जा रहा है, भी कहा जा सकता है । इन्हीं माध्यमों
का प्रयोग करके मनुष्य के मन में अवांछनीय और अनुचित इच्छाओं को पैदा करके समाज
में असंतोष व बिखराव भी फैल रहा है । उपभोक्तावाद को इन्हीं माध्यमों का सहारा
मिला तो वह विकराल राक्षस की तरह मानव समाज के सामने आज खड़ा है । मेरा
‘ही’
विचार श्रेष्ठ है- इस बात का प्रचार करने के लिए जनसंचार के माध्यमों का प्रयोग
बढ़ता जा रहा है । ऐसा लोगों को बताना कि मेरा
‘भी’
विचार श्रेष्ठ है बहुत कम हो रहा है । अत्यंत विकट स्थिति तब बनती है जब इन
माध्यमों की प्रकृति के विपरीत इनके व्यापकता और ग्राह्मयता पर अंकुश लगाया
जाता है । ऐसा मान जाता है परंतु उनमें जो विषय-वस्तु है उसकी सृजनकर्ता केवल
तीन ही कंपनियां हैं ।
कहीं न कहीं
मीडिया व संचार की रचनाओं पर एकाधिकृत अधिकार करके ऐसा भी हो रहा है कि समाज
सूचित व असूचित दो भागों में बंट कर रह जाए जो उसी प्रक्रिया के समानांतर है
जिसके कारण संपन्न और विपन्न (हैव्स और हैव्नॉट्स) वर्गों का निर्माण हुआ । जिस
प्रकार विपन्न वर्ग संख्या में अत्यंत विशाल है उसी तरह से असूचित वर्ग भी
अत्यंत विशाल हो सकता है । सूचनाओं के स्त्रोतों तक पहुंच में भी इसी तरह का
असंतुलन बन सकता है । इसको कुछ लोग ‘डिजिटल
डिवाइड’
के नाम से पुकारते हैं । जिस प्रकार गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही
है उसी प्रकार
‘सूचना
संपन्न’
और ‘सूचना
विपन्न’
के बीच की खाई भी बढ़ सकती है ।
मानव
बुद्धिशील व्यक्ति है और बुद्धि अतीतकाल के अनुभवों से शिक्षा लेती है ।
संपत्ति और भूमि के वितरण में तो मानव ने भयंकर गलतियां करके मानव समाज को न
केवल विभाजित किया परंतु वर्गों में इतनी ईर्ष्या और शत्रुता बनाई कि संपत्ति
और भूमि के लोभ में मनुष्य हजारों वर्षों से एक-दूसरे का संहार कर रहे हैं । यह
आसुरी प्रवृत्तियां हैं परंतु प्रकृति तो इसके विपरीत दिशा दिखाती है । प्रकृति
की नियति तो नर से नारायण बनाने की है । यदि मनुष्य वास्तव में बुद्धिशील है तो
सूचना की टेक्नोलॉजी का प्रयोग विकास के अगले कदम को बढ़ाने के लिए करेगा और
यदि मनुष्य में पशुवृत्ति का प्रभाव अधिक है तो फिर सुर नहीं असुर ही भविष्य
होगा । जिन कारणों से मनुष्य ने इस सारी टेक्नोलॉजी का निर्माण किया है उसके
मूल में नारायण की प्रवृतियां हैं परंतु अपने अंदर राक्षस का संहार सूचना
प्रौद्योगिकी द्वारा प्राप्त ज्ञान की मशाल से ही करना होगा ।
लेखक
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में
विभागाध्यक्ष हैं 
lll