Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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बातचीत

 

लोग मांगते हैं एक-एक पिन का हिसाब

छत्तीसगढ़ के मुख्य सूचना आयुक्त ए.के. विजयवर्गीय से राजकुमार सोनी की बातचीत

 

0सूचना के अधिकार की जरुरत क्यों महसूस की गई ?

- मैं किसी भी राज्य के संदर्भ में यह नहीं कहूंगा कि वहां फैले भ्रष्टाचार, आकर्मण्यता और अनियमितथा के चलते इस अधिकार को लागू करने की आवश्यकता महसूस की गई है । मेरा मानना है कि इस अधिकार को प्रशासकीय जवाबदारी बढ़ाने के लिहाज से लागू किया गया है । कहीं की भी सरकारें हों काम तो वह जनता का ही करती हैं । यह अलग बात है कि हर सरकार और प्रशासन में कामकाज के तौर-तरीके को लेकर बातें होती रहती हैं । जनता को यह जानने का हक तो है कि जिस सरकार को उसने चुना है वह कैसा काम कर रही है ।

 

0 क्या आपको नहीं लगता कि सरकारी अमले में फैला भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा है ?

-हां...... यह भी एक मुद्दा हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार ही एकमात्र मुद्दा नहीं है । सूचना के अधिकार से कई दिक्कतें सहूनियत में बदल जाती है । इसके जरिए यह भी जाना जा सकता है कि बजट का कितना पैसा आया और कहां-कहां खर्च हुआ । किस पंचायत में विकास के सर्वाधिक काम हुए और किसमें नहीं । राशन, पानी, शिक्षा, सड़क, बिजली की व्यवस्था तो प्रशासन ही करता है । यह व्यवस्था किस तरह के माकूल वातावरण में काम कर रही है इसे भी जाना जा सकता है । देश की आतंरिक सुरक्षा और कुछेक मामलों को छोड़ दें तो  चुनी गई किसी भी सरकार का कोई भी कागज गोपनीय नहीं होता । अधिनियमों की गूढ़ता का रहस्य आदि नागरिक जानने लगेगा तो वह देश के प्रति जिम्मेदार और जवाबदार बनता है ।

 

0 क्या आपको नहीं लगता कि सरकारी महकमे, आजादी के बाद से ही पारदर्शी रहते तो शायद सूचना के अधिकार को लागू करने की जरुरत ही नहीं रहती ?

-यह एक पक्ष हो सकता है लेकिन जिन्हें जानकारी चाहिए होती थी वे न्यायालय का दराजा खटखटाकर भी दस्तावेज एकत्र कर लिया करते थे । खैर नई प्रक्रिया ने सब कुछ सरलीकृत कर  दिया है । आवेदन लगाइए, फोटोप्रतिक का पैसा जमा करिए और तीस, साठ या नब्बे दिनों के भीतर जानकारी ले लीजिए ।

 

0 अमूमन सभी राज्यों में सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए सेवानिवृत्त अफसरों की सेवाएं ली गई है । ऐसा क्यों ?

- इसका कारण तो मैं नहीं जानता लेकिन इतना जरुर कह सकता हूं कि आयुक्त पद का निर्माण कुछ संवैधानिक स्थितियों को ध्यान में रखकर ही किया गया है । राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल को है । राज्यपाल यह नियुक्ति मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री द्वारा नाम निर्देशित किए जाने वाले मंत्रिमंडल के सदस्य की सिफारिश के आधार पर करते हैं ।

 

0 कहीं-कहीं इस अधिकार को लागू करने के लिए आंदोलन किए गए हैं ?

-हां.... महाराष्ट्र, आंध्र और तमिलनाडु में यह स्थिति बन चुकी है । कई जगह यह शिकायत थी कि मस्टररोल पर मजदूरों के फर्जी हस्ताक्षर कर घालमेल किया जा सरा ता । अनियमितथा की दशा में आंदोलन स्वाभाविक ता ।

 

0 छत्तीसगढ़ में नागरिक किस तरह की जानकारी ज्यादा मांगते हैं ?

- पंचायतों  के कामकाज को लेकर शायद लोग नाराज हैं । यह सूचना सबसे ज्यादा मांगी जाती है । लोकनिर्माण विभाग के द्वारा किए जाने वाले कामों के बारेमें भी जानकारी मांगी जाती है । लोकसेवा आयोग और विश्वविद्यालय के प्रकरणों में भी लोग रुचि दिखाते हैं । राजस्व मामले तथा सहकारिता आधार पर चलने वाली हाऊसिंग सोसायटियों के बारे में भी जानकारियां मांगी जाती है ।

 

0 क्या आपको नहीं लगता कि कई बार मांगी गई जानकारियों के निहित उद्देश्य बदल जाते हैं ?

-हां, कई बार ऐसा हुआ है । जब हम संबंधित सभी जानकारी एकत्र कर लेते हैं तब अचानक पता चलता है कि जिससे जानकारी मांगी थी अब उसे फोटोप्रति नहीं चाहिए । सेवानिवृत्ति अफसर और कर्मचारी भी कुछ  ऐसा तथ्य मांगते  हैं जिससे झलकता है कि कुछ तो ऐसा है जो नितांत व्यक्तिगत है । मैं यह मानता हूं कि सूचनाएं किसी को  सताने के लिहाज से नहीं मांगी  जानी चाहिए । आपको एक उदाहरण देता हूं, बस्तर क्षेत्र से एक आदमी ने राज्य निर्माण के समय से धान खरीदी का विवरण मांगा ता । यह विवरण नहीं ता य़  दावे के साथ कह सकता हूं कई दशकों से लिखे जा रहे महाग्रंथ की मांग की गई थी । कोरबा क्षेत्र के एक मीडिया पर्सन  ने राज्य के सोलह जिले में मौजूद विभागों में  क्या-क्या होता है य जानना चाहा है । कई बार बारीक से बारीक डिटेल की मांग मीनमेख की तरफ इशारा करती  है । कई महानुभाव  सूचनाओं की मांग के साथ-साथ  समस्याओं के निराकरण की मांग भी  कर बैठते हैं ।

 

0 फिर ऐसे लोगों से किस तरह निपटा जाता है ?

-नहीं निपटने जैसीकोई बात नहीं है। हमारा काम ही सूचना मुहैय्या कराना है। जहां यह लगता है् कि जानकारियों को देखकर, पढ़कर नोट करने सेकाम चल सकता है वहां इस तरह का आग्रह कर लिया जाता है।

 

0 क्या जानकारियों को मांगने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है ?

-थोडे़ प्रशिक्षण की जरूरत तो है ही। हमने कुछ सेमीनार आयोजित किए थे, आगे भी  करेंगे । हमने शासन को सुझाव भेजा ता कि ग्राम सभाओं को जानकारी  दी जाए तथा पाठ्यक्रम में सूचना के अधिकार से संबंधित एक लेख हो। हमारा यह सुझाव मान लिया गया है।

 

0 यह बात भी देखने को मिली है कि एनजीओ दीगर जानकारी तो खूब मांगते हैं लेकिन जब....

 

     -मैं समझ गया । आपको बता दूं, सूचना का अधिकार ऐसे एनजीओ पर लागू होता है जिन्हें अनुदान मिलता है। जनता के प्रति जवाबदेह प्रत्येक स्वयंसेवी संगठनों को वैसे भी खुलेपन केसाथ पेश आना चाहिए।

 

0 क्या यह बात सरकारी दफ्तरों पर लागू नहीं होती ?

-सही है। कुछ चीजें यदि डिपार्टमेंट अपने तरीके से बता दे तो दिक्कत ही नहीं होगी। पंचायतों को भी चाहिए कि वह एक नोटिस बोर्ड पर कम से कम यह तो लिखने की व्यवस्था करें कि कहां कितना काम हुआ। निर्माण कार्य की गूणवत्ता कैसी हैं ?

 

0क्या सूचनाओं को देने, नहीं देने के लिए दबाव आता है ?

-अभी तक तो नहीं आया। आगे उम्मीद भी नहीं  है।

ऐसा सुना गया ता कि टाटा-एस्सार के साथ सरकार के अनुबंध को लेकर मांगी गई जानकारी में अड़चन महसूस की  गई थी ? कोई अड़चन नहीं आई । हमने जानकारी दी और अनुबंध को विधानसभा के पटल पर रखा गया। पहले डीपीसी (विभागीय पदोन्नति) की नोटशीट देने का प्रावधान नहीं ता। अब यह व्यवस्था लागू है।  हमने बच्चों  के भविष्य को ध्यान में रखकर उन्हें उत्तर पुस्तिका देखने को अधिकार दिया। आपको पता ही है इस एक फैसले से क्या हुआ ता।

 

0 क्या सूचना के अधिकार के तहत किसी सड़क याभवन निर्माण की सेम्पल लिया जा सकता है?

-बिल्कुल लिया जा सकता है। एक-दो मामलों में शायद लिया भी गया  है।

 

0 यदि कोई न्यायालय का फरमान न माने तो अवमानना का प्रकरण बन जाता है। क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी को जुर्माना देने कहा  गया  हो और उसने इंकार कर दिया ?

-इंकार करने पर अवमानना जैसीकोई बात हमारे यहां लागू नहीं है, लेकिन यह बात अभी तो नहीं भविष्य में किसी संशोधन के जरिए लागू हो सकती है। जो कोई भीसूचना आयोग के निर्देशों की अनदेखी करेगा वह शर्म तो महसूस करेगा ही। वैसे जिस किसी भी अफसर पर फाइन ठोंका जाता है उसके कैरियर पर फर्क तो पड़ता है।

 

0सूचना का अधिकार लागू होने से क्या बदलाव आया है ?

-फर्क तो पड़ा है। अफसरों में सतर्कता और जनता की  जागरूकता से सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। अभी सरकारी वकील एनजीओ से जुड़े लोग ठेकेदार, पत्रकार ही जानकारी मांग रहे हैं। समाज के अन्य तबकों का जुड़ाव बाकी है। हम प्रशिक्षण शिविर, सेमीनारों और प्रचार-प्रचार के जरिए प्रयासरत हैं।

 

0यानी अब भी ठीक-ठाक बदलाव बाकी है ?

-राज्य सूचना आयोग को बने एक साल हो गए हैं । कुछ ही दिनों में वार्षिक प्रतिवेदन तैयार हो जाएगा और फिर बदलाव एक सतत प्रक्रिया का नाम है। बदलाव धीरे-धीरे ही आता है। कुछ अरसा पहले लोग कहते थे जमाना कब बदलेगा। अब कहते हैं जमाना बदल रहा है।

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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