Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

 

जानने का हक : बाधक कौन

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ए.जी.नूरानी

 

सूचना का अधिकार कानून लागू हुए एक साल पूरा हो चुका है और इसे लेकर बहस-मुबाहिसा अभी थमा नहीं। हालांकि सरकार ने इसकी कुछ धाराओं में संशोधन का इरादा जनभावनाओं के मद्देनजर वापस ले लिया, लेकिन यह जानना जरूरी है कि आखिर उसने एक साल के भीतर ही इस पर संशोधन क्यों लाना चाहा ता ? इस अवधि में ऐसा कुछ नहीं हुआ ता जिसके आधार पर सोचा जा सके कि इसमें बदलाव की जरूरत है। केंद्रीय सूचना आयोग आरटीआई एक्ट की धारा 12 के तहत गठित किया गया । प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला अपनी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रशासनिक जगह में जाने जाते हैं। एक वर्ष में उन्होंने अपनी निष्पक्षता और जवाबदेही के कुशलतापूर्वक निर्वाह की वजह से जनता का विश्वास अर्जित किया । आयोग ने कानून की मूल भावना के अनुरूप प्रशंसनीय काम किया।

 

कानून में संशोधन लाने के पीछे वे नौकरशाह थे, जो जनता के सामने झुकना पसंद नहीं करते । जब ऐसी स्थिति में वे खुद को पाते हैं तो अपने खोये आधार को हासिल करने की ताक में रहते हैं। संशोधन में विवाद मुख्य रूप से फाइल नोटिंग को लेकर उभरा । चलिए हम मान लेते हैं कि नोटिंग्स को नहीं दिखाया जा सकता, लेकिन यह मनाही जनहित में होनी चाहिए; न कि उस समय की सरकार व उसके अधिकारियों के हित में, क्योंकि ये दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं। यहां एक प्रश्न यह भी है कि आखिर जनहित है क्या और कौन उसे तय करेगा ?

 

सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों से जुड़ा मसला है। बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में दी गई है। इसके उपबंध (2) में इसकी सीमाए सुनिश्चित की गई हैं। यह स्वतंत्रता सिर्फ कानून के जरिए बाधिक की जा सकती है, न कि किसी कार्यकारी आदेश के द्वारा। दूसरे, प्रतिबंध का पर्याप्त कारण होना चाहिए और यह कारण अदालत तय करेगी, सरकार तो कतई नहीं । उपबंध (2) में कहा गया है कि प्रतिबंध के आधार क्या-क्या हो सकते हैं। ये आधार हैं संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, दूसरे राष्टों से मित्रता, पब्लिक आर्डर, नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध के दुष्प्रेरण।

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह व्यवस्था दी कि जानने का अधिकार बोलने की स्वतंत्रता के साथ जुड़ा है। सो, जानने के अधिकार पर यदि कोई अकारण प्रतिबंध थोपा जाता है तो इससे सूचना का अधिकार अर्थहीन हो जाएगा। किसी जानकारी के प्रकट न करने के औचित्य को सिद्ध करने का दायित्व (बर्डन ऑफ प्रूफ) सरकार का है। जब अमरीका में फ्रीडम ऑफ इफामेंशन एक्ट लागू हुआ, तब वहां के अटार्नी जनरल रेमसे क्लार्क ने इसकी पृष्ठभूमि से जुड़ी नीतियों को स्पष्ट किया कि जानकारी देना सामान्य नियम है, कोई अपवाद नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को जानने का हक बराबर का है। किसी दस्तावेज के रोकने के औचित्य को सिद्ध करने का दायित्व सरकार का है, न कि उस व्यक्ति का जिसने इसके लिए दरख्वास्त दी है। यदि अकारण ही किसी व्यक्ति को जानकारी देने से मना किया जाता है तो वह राहत पाने के लिए अदालत जा सकता है।

 

1997 में एच डी शौरी की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी ने फाइल नोटिंग्स को अलग रखते हुए सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट में कैबिनेट पेपर्स की सूचनाओं को भी अलग हो रखा गया। फ्रीडम ऑफ इंफार्मेशन एक्ट 2002 इसी रिपोर्ट के आधार पर बना था । इस एक्ट में केबिनेट पेपर्स, कैबिनेट के सदस्यों, सचिवों, अधिकारियों के कथन, कार्यवाई के मिनट्स, विधिक राय, अभिमत, सिफारिशें, नीति बनने की पूरी कार्यवाही की जानकारी को इस एक्ट के दायरे से बाहर रखा गया । 2004 में यूपीए सरकार ने इस एक्ट में आमूलचूल परिवर्तन करने का निर्णय लिया। फाइल नोटिंग्स को भी सूचना का हिस्सा मानते हुए आरटीआई एक्ट में शामिल करते हुए परिभाषित किया। यहां तक कि कैविनेट पेपर्स को एक सीमा तक एक्ट के दायरे में रखा गया आरटीआई एक्ट की धारा (2) डी सूचना शब्द को व्यापक अंदाज में परिभाषित करती है। सूचना का आशय किसी भी रूप में ऐसी सामग्री जिसमें रिकार्ड, दस्तावेज, मेमो, ई-मेल्स, अभिमत, सलाह, प्रेस रिलीज, सर्कुलर्स, आर्डर्स, लॉगबुक्स, कांट्रेक्टर, रिपोर्ट्स, पेपर्स, मॉडल्स, सैम्पल्स, इलेक्ट्रानिक फार्म में कोई डाटा मटेरियल्स और निजी क्षेत्र की भी ऐसी सूचनाएं जो विधि सम्मत तरीके से किसी अधिकारण द्वारा तलब की जा सकें, शामिल है, फाइल नोटिंग्स जो कि जनसेवकों के अभिमत और अनुशंसाएं होंगी, दी जाने योग्य मानी जाएंगी।

 

आरटीआई एक्ट की धारा 8 में उन विषयों की सूची है, जिनको देने के लिए सरकार बाध्य नहीं है। इसमें से पहला है ऐसी सूचना जो भारत की संप्रभुता, अखंडता को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करे राष्ट्र की सुरक्षा और सामरिक, वैज्ञानिक व आर्थिक हित, दूसरे राष्टों से संबंधों पर असर डालने व अवराध के लिए दुष्प्रेरित करने वाली जानकारी । यही बातें अनुच्छेद 10 के उपबंध(2) में भी दी गई हैं। सूचना के अधिकार से जुड़े हुए सभी विवादों पर निर्णय देने के लिए केंद्रीय सूचना आयोग गठित किया गया है। इसके फैसलों की समीक्षा के लिए हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट है तो फिर एक साल के भीतर ही कानून के संशोधन की जल्दी क्यों आ गई ? क्या सरकार को जनभावना की प्रतिक्रिया का अंदाजा नहीं था ?

 

कानून कैबिनेट पेपर्स को जाहिर करने से एक सीमा तक रोकने में इजाजत देता है। कानून कहता है कि जिस आधार पर निर्णय लिया गया है, निर्णय लेने के बाद इसे जनता के सामने जाहिर किया जा सकता है। संशोधन में निर्णय लेने के आधार को विलोपित किया गया था। प्रबल विरोध के कारण कानून में संशोधन की कोशिश को दफन करना पड़ा। वांछित सूचना के रूप में फाइल नोटिंग्स उन अधिकारियों के लिए कवच की तरह भी है जो ईमानदार हैं व जिन्हें जनहित की चिंता है हां भ्रष्ट अधिकारियों के लिए अवश्य चिंता की बात हो सकती है क्योंकि फाइल नोटिंग्स उनकी करतूतों का पर्दाफाश जो कर सकती हैं।

 

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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