आजादी की दूसरी लड़ाई
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यशवंत गोहिल
लोकतेर
के मंदिर में आस्था रखने वाले लोगों ने जब यह महसूस किया कि भारत की सैद्धातिक
स्वतंत्रता ने उसे कुछ पीछे धकेलना शुरू कर दिया है तो एक और संघर्ष ने जन्म
लिया। ‘सूचना
के अधिकार’
के रूप में उपजा यह संघर्ष वास्तव में आजादी की दूसरी लड़ाई का शंखनाद था ।
संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसने सीढ़ीया बनाई, सामाजिक-आर्थिक
समानता और नव जनवाद के लिए सूचना के अधिकार के अपनी भूमिका रेखांकित की है।
सूचना के
अधिकार लोकतंत्र का पहला संघर्ष है । राजनीतिक-प्रशासनिक चिंतकों ने इसे
समाजवादी विचारधारा से जोड़कर देखा तो पाया कि दरअसल यह लोककल्याणकारी राज्य की
परिकल्पना को साकार करने का सबसे उत्तम मार्ग है। पुलिस राज्य का जन्म हो रहा
है या इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जब सूचना के अधिकार का उदय हो रहा था तो
लोककल्याणकारी राज्य भी उसके पीछे चला आ रहा था । दुनिया के कई देशों ने इसे
जीवन जीने का अधिकार माना हा, इसके लिए संघर्ष किया है। नई सदी में राजनीतिक
चिंतकों, सिद्धांतकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या लोकतंत्र व सामाजिक समानता
के भीतर संतुलन स्थापित करना है। निश्चित रूप से यह एक बड़ी चुनौती है।
राष्ट्रीय विकास की एक व्यापक प्रक्रिया के रूप में इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का
उद्भव एक मिथक स्थापित कर हुआ है। इसमें परस्पर विरोधाभासी विचारधाराएं
आमने-सामने थी। सिद्धांत अलग थे और व्यवहार अलग। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान
की आत्मा को ही ले लें। संविधान की प्रत्तावना में भारत को धर्मनिरपेक्ष,
समाजवाद, लोकतंत्रात्मक राज्य बनाने की बात कही गई लेकिन कालांतर में जो घटनाएं
हुई, उसने इन उद्देश्यों को दरकिनार कर दिया। नीतियों का निर्माण और उसका
क्रियान्वयन जिन स्तरों पर होने लगा, उससे जनता को कोसों दूर कर दिया गया।
इन्हीं सिद्धांतों और व्यवहारों के भीतर दुरियों को समटने के लिए जिस संघर्ष का
उदय हुआ, वह सूचना के अधिकार का संघर्ष था ।
विचारों का
स्वतंत्र प्रसारण ही इस स्वतंत्रता का मुख्य उद्देश्य है। सूचना के अधिकार
सामान्य हित के विषयों पर विचार और सूचना ग्रहण करने, जानने और प्राप्त करने
कराने का अधिकार एवं चुप रहने का अधिकार भी है। इसके बिना जनता की तार्किक एवं
आलोचनात्मक शक्ति को जो प्रजातांत्रिक सरकार के समुचित संचालक के लिए आवश्यक
है, विकसित करना संभव नहीं है। लोकतांत्रिक सरकार एक खुली सरकार होती है,
जिसमें जनता को जानने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे उसी दिन प्राप्त हो गया
ता जिस दिन लोकतंत्र को ‘जनता
का, जनता के लिए, जनता के द्वारा’
निरुपित किया गया था । जनतंत्र में इसका वही स्थान है जो शरीर में रक्त संचार
का होता है। इसे किसी भी प्रकार से रोकना लोकतंत्र की मृत्यु के समान होता है।
सामान्यः सूचना के अधिकार का अर्थ जानने के अधिकार से लगया जाना चाहिए। चूंकि
सरकार का कुछ कार्य गोपनीय होता है, इसलिए जन कार्यों को जनता के हित में
गोपनीय रखना आवश्यक होता है, उन्हें गोपनीय ही रखा जाना चाहिए । न कि सरकार के
हित को साधने वाली सूचनाओं को।
अन्य देशों
में स्थिति
: सूचना की स्वतंत्रता को विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त है। इसे संयुक्त राष्ट
संघ महासभा द्वारा 10 दिसंबर 1948 की जारी किए गे मानवाधिकारों की विश्व घोषणा
में शामिल किया गया था । इसमें इसे स्पष्ट भी किया गया था । इस घोषणा में
विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत अधिकारों की सूची दी गई थी। यूरोप के कुछ देशों
में सूचना के अधिकार को व्यापक महत्व दिया गया है। जर्मनी के संविधान के
अनुच्छेद पांच में प्रापधान किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को सभी स्त्रोतों
से व सभी स्त्रोंतों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है । किसी भी व्यक्ति
के सूचना के अधिकार के उल्लंधन से संबंधित मामलों का निस्तारण करने के लिए
संवैधानिक न्यायालय के गठन का प्रापधान जर्मनी के संविधान में क्या गया है।
स्वीडन में
1966 में प्रदात्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधीन सूचना के अधिकार को शामिल
किया गया है लेकिन इस देश में व्यक्ति की गोपनीयताकोमान्यता नहीं दी गई है। यही
स्थिति डेनमार्क, नार्वे आदि देशों की है।
अमरीका में
1964 में सूचना की स्वतंत्रता से संबंधित अधिनियम को पारित कर सूचना के अधिकार
को विधिक मान्यता प्रदान की गई है। इस अनिधियम में कहा गया है कि असाधारण
परिस्थितियों को छोड़कर प्रत्येक नागिरक को यह अधिकार है कि वह सरकारी कागजातों
की प्रतिलिपी उचित मूल्य देकर प्राप्त कर सकता है। यदि सरकारी अधिकारी
प्रतिलिपि प्रदान नहीं करता तो इसके लिए शासकीय अपील की जा सकती है।
भारत में
सूचना का अधिकार :
भारत में सूचना के अधिकार का संघर्ष काफी पुराना नहीं है। आपातकाल के बाद इसके
लिए आंदोलन शुरू हुए थे। 19978 में जस्टिस पी.के. गोस्वामी की अध्यक्षता में
द्वितीय प्रेस आयोग का गठन किया गया था । इस आयोग को सूचना के अधिकार के संबंध
में सुझाव देने कहा गया था । सितंबर 1996 में प्रेस परिषद के द्वारा सूचना के
अधिकार माडल विध्यक भारत सरकार को प्रस्तुत किया गया । सरकार ने इस पर विचार
करने के लिए एत. डी. शौरी की अध्यक्षता में कार्यसमिति का गठन किया । इस समिति
में ज्यादा प्रतिनिधित्व नौकरशाही से जुड़े लोगों का था, जिसने इस अधिकार की
मूल भावना को ही बदल दिया जिस अधिकार से नौकरशाहों के अधिकारों या हितों को चोट
पहुंचती, भला वे क्यों चाहते कि ऐसे विध्यक का समर्थन कर सरकार के समक्ष
प्रस्तुत करें ?
अंततः इसे
कमजोर कर समिति ने 1997 में सूचना की स्वतंत्रता के रूप में इसे पेश किया । इस
तरह इसका स्वरूप ही बदल गया। राइट टू इंफारमेशन से फ्रीडम आफ इंफारमेशन का
बदलाव राजनीतिक और प्रशासनिक चिंता को स्पष्ट बता रहा था। इस समिति द्वारा
प्रस्तुत विधेयक में सिर्फ सरकारी अनुदान प्राप्त कंपनियों, संस्थाओं, ट्रस्ट
एवं सहकारी संस्थाओं को ही कानून के दायरे में लाया गया था । इसमें सूचना न
देने वाले अधिकारी को ही कानून के दायरे में लाया गया था। इसमें सूचना न देने
वाले अधिकारी को दंडित करने का कोई भी प्रावधान नहीं ता जबकि प्रेस परिषद
द्वारा संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र को जनहित एवं मानवाधिकार पर विशेष ध्यान देकर
सरकार व प्रशासन को उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया गया था ।
इस दौरान देश
के हालात में जो परिवर्तन आ गए थे, उसने इस ढीले-ढाले तंत्र को स्वीकार करने
में आपत्तियां दर्ज करवाई। भारत इन दिनों तीव्र विकास के पथ पर था। अब भारत को
केवल गांवों का देश कहे जाने पर विरोध दर्ज कराया जा रहा था । सूचना क्रांति
में विश्व से न सिर्फ हमकदम होकर बल्कि उनसे एक कदम आगे चलकर भारत ने अपनी
पहचान बनानी शूरू कर दी थी। ऐसे समय में आम आदमी सूचना के अभाव को बर्दाश्त
नहीं कर पा रहा था । लिहाजा सरकार ने मई 2004 में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के
जरिए सूचना के अधिकार से संबंधित विधेयक संस्द में प्रस्तुत किया । लोकसभा में
एक लंबी सहस के बाद 11 मई 2005 को 146 संशोधनों के साथ इसे मंजूरी दी गई। अगले
दिन इसे राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया। यहां भी इस पर समर्थन प्राप्त हो गया।
लेकिन जब इस पर मुहर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया तोवहां इसे अटका दिया
गया। 120 दिन की मियाद पूरी होने पर 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून पूरे देश में
लागू हो गया। इसका अपवाद केवल जम्मू-काश्मीर है, जहां इस कानून को लागू नहीं
किया जा सकता ।
सर्वोच्च
न्यायालय ने निभाई भूमिका :
भारत में सूचना के अधिकार को लागू करने में सर्वोच्च न्यायलय के निर्णयों ने
भी अहम भूमिका अदा की है। उच्चतम न्यायालय ने एस,पी. गुप्ता और अने्य बनाम भारत
संघ (एआईआर 19332-एससी-14) में यह अभिनिर्धारित किया कि संविधान के अनुच्छेद 19
(1) क में जाननने का अधिकार निहित है। इसमें सरकार के संचालन से संबंधित
सूचनाएं, जानने का अधिकार भी आता है। केवल अपवादित मामलों में जब देश की
सुरक्षा अथवा लोकहित में आवश्यक हो, तब ही उनका प्रगटीकरण नहीं किया जा सकता।
हमदर्द
दवाखाना बनाम भारत संघ(1960 एससीआर 671) में उच्चतम न्यायालय में अवधारित किया
गया था कि जानने का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सामान्य हित के विचार
और सूचनाएं प्राप्त करना शामिल है।
उत्तर प्रदेश
सरकार बनाम राजनारायण के वाद् में 1975 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया ता
कि इस देश की जनता को प्रत्येक सार्वजनिक कार्य के बारे में जानने का अधिकार
है, जो सार्वजनिक पदाधिकारियों दवारा सार्वजनिक रूप से किया जाता है। यद्यपि
सूचना का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है लेकिन यह ऐसा कारक है कि जब किसी ऐसे
मामले में गोपनीयता का दावा किया जाता है, जिनका जन सुरक्षा पर किसी तरह का
प्रभाव पड़ने वाला नहीं है, तब उसे लेकर सतर्क होना स्वाभाविक है।
1981-82 में
भारत सरकार से संबंधित एक वाद में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एन.
भगवती ने स्पष्ट किया कि पारदर्शी सरकार की अवधारणा का सीधा रिश्ता जानने के
अधिकार से है। यह अधिकार संविधान के मूल अधिकार में शामिल है।
(अ)
यह व्यक्ति की
आत्मोन्नति में आवश्यक है ।
(ब) सत्य की
खोज या स्थापना में
।
(स) व्यक्ति
की निर्णयन क्षमता में ।
(द) स्थिरता
और सामाजिक परिवर्तन में सामंजस्य स्तापित करने में हाई कोर्ट के कुछ फैसलों ने
भी सूचना के अधिकार की आवश्यकता या उसके महत्व को प्रतिपादित करने की दिशा में
कदम उठाए हैं। एक ऐतिहासिक निर्णय में निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह
संसदीय या विधानसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के अपराधिक रिकार्ड की
जानकारी मीडिया के माध्यम से उपलब्ध कराए। उम्मीदवारों के लिए यह जरूरी है कि
वह नामांकन पत्र भरने के दौरान नाजकारियां स्पष्ट करें।
न्यायलयों के
अतिरिक्त कुछ प्रदेशों ने भी इस अधिकार के प्रति अपनी रूचि जताई और पहल की।
कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश ऐसे प्रमुख राज्य थे। मध्यप्रदेश ने तो मई 1998
में सूचना का अधिकार विधेयक पारित कर दिया। इसके अंतर्गत शासन के किसी भी
कार्यालय से कोई भी नागरिक एक निश्चित प्रक्रिया के तहत जानकारी हासिल कर सकता
था । राज्य सरकार की इस तत्परता को केंद्र की उदासीनता सहनी पड़ी। जून 1998 में
केंन्द्र सरकार की मंजूरी के लिए इस विधियक को यह कहते हुए नामंजूर कर दिया
गयाकि सूचना का अधिकार राज्य का नहीं, बल्कि केन्द्र का विषय है। इस तरह यहां
सूचना के अधिकार को केंद्र की उपेक्षा का शिकार होना पड़ा।
सूचना के
अधिकार
की जरूरत
क्यों
: देश में भ्रष्टाचार अब समाजिक आतंकवाद का रूप ले चुका है। यह भी
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि शुरू में जब भ्रष्टाचार का कोई मामला प्रकाश में
आता है तो उसे खूब प्रचारित-प्रसारित किया जाता है लेकिन बाद में मामला ठंडे
बस्ते में डाल दिया जाता है या वर्षों न्यायालय में लंबित रहता है। लोकतंत्र
की स्तापना से लेकर अब तक ऐसे अनेक घोटाले या भ्रष्टाचार चर्चा में आए। चाहे
भारत का पहला घोटाला जीप घोटाला हो, मुद्घल प्रकरण, मूंदड़ा कांड, मालवीय
सिराजुद्दीन कारनामा, कैसो प्रकरण, धरम तनेजा प्रकरण, नागरवाला कांड, मारुति
घोटाला, कुओ तेज कांड, अंतुले प्रकरण, बोफोर्स, हवाला कांड, पी.वी. नरसिंह
राव-झामुमो कांड, सुखराम कांड, ताबूत कांड, तहलका कांड, जमीन आबंटन मामला,
एके-47 की खरीद, पेट्रोल पंप के अबंटन का मामला, तेलगी कांड जैसे कई घोटाले इस
सूचना के अधिकार की कब्र पर ही हुए हैं। सूचनाएं स्वतः सार्वजनिक करने का कानून
यदि पहले बना दिया जाता तो कदाचित इस पर कुछ नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है
यह विश्व की सर्वोच्च संस्थाएं मानती हैं कि भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा
सकता, उसे कम किया जा सकता है। इसके लिए सूचनाओं का सार्वजनिकीकरण जरूरी है।
इसे मौलिक अधीकार का दर्जा प्रदान किए जाने की नितांत आवश्यकता है। भ्रष्टाचार
के जितने गड़े मुर्दे उखड़ रहे हैं, उस पर पहले से रोक लगाई जा सकती है। मौजूदा
राजनीतिक व सामाजिक दौर में सूचना के अधिकार से नौकरशाहों, देता है। यही कारण
है कि जब भी इस अधिकार के प्रति सकारात्मकर पहल होती है, उसे निष्क्रिय करने
वाले तत्व पहले खड़े हो उठते हैं।
क्या है
स्थिति :
सूचना के अधिकार का कानून के एक साल बाद इसके क्रियान्वयन की स्थिति पर जब
दिल्ली के एक अध्ययन दल ने प्रकाश डाला तो चौकाने वाले तथ्य सामने आए। इस कानून
के सेक्स 4(1) (ई) में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें सभी
प्राधिकरणों की सूचनाएं स्वतः ही जारी करेंगी । इसके लिए किसी प्रकार के
आवेदनों का इंचजार नहीं किया जाएगा। इस कानून को सूचना प्रखाशन का दायित्व कहा
जा सकता है। इसके अंतर्गत आने वाली सूचनाओं को वेबसाइट में डालने का लक्ष्य रखा
गया था। दिल्ली स्थित विचार एवं अनुसंधान संगठन सेंटर फार सिविल सोसायटी के
शोधकर्मियों रेणु विनोद तथा गौतम ने इसकी स्थिति का जायजा लिया। इसके लिए
उन्होंने भारत के 34 राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेशों को कानून का पालन करने
वाले राज्यों की ओर से घटते हुए क्रम में सजाया।
शोधकर्मियों
की रिपोर्ट बताती है कि सूचना के अधिकार के इस अनुच्छेद को लागू करने वाले
राज्यों में पांडिचेरी प्रथम स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः दिल्ली, मेघालय,
उत्तरांचल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश,
मिजोरम, पंजाब, गुजरात, हिरयाणा, चंडीगढ़, त्रिपुरा, केरल, अरुणाचल प्रदेश,
मिजोरम, पंजाब, गुजरात, हरियाणा, चंडीगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम,
पंजाबप्रथम स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः दिल्ली, मेघालय, उत्तरांचल,
महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब,
गुजरात, हिरयाणा, चंडीगढ़, त्रिपुरा,केरल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब,
गुजरात, हरियाणा, चंडीगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब प्रथम स्थान
पर है। इसके बाद क्रमशः दिल्ली, मेघालय, उत्तरांचल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,
छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब, गुजरात, हिरयाणा, चंडीगढ़,
त्रिपुरा, केरल, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब, गुजरात, हरियाणा, चंडीगढ़,
कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पंजाब,गुजरात, हरियाणा,चंडीगढ़ त्रिपुरा,
केरल, तमिलनाडु, मणिपुर, अंडमान निकोबार, आंध्रप्रदेश,क असम ,बिहार, गोवा,
झारखंड, राजस्थान व सिक्किम का स्थान है। अंतिम सात राज्यों की स्थिति तो शून्य
प्रतिशत ही रही, जबकि अव्वल स्थान पर रहने वाले पांडिचेरी ने सूचना के अधिकार
को 48 प्रतिशत है तो अन्य राज्यों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश
में इस कानून के परिपालन में जो राज्य आगे आगे हैं उनकी शिक्षा का स्तर अन्य
कुछ राज्यों की तुलना में अच्छी है। इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह भी सामने
निकलकर आ रहा है कि जिन राज्यों में साक्षरता या शिक्षा की दर अधिक हैं, वहां
लोग अधिक जागरूक हैं। वहां इन अधिकारों के प्रति लोग संवेदनशील हैं और इसका
प्रयोग कर रहे हैं। जबकि कम साक्षरता दर वाले राज्यों इसका प्रयोग नगण्य है।
(लेखक
हरिभूमि, रायपुर में उप-संपादक हैं।)


