सूचना अधिकार से
समृद्ध हुई पत्रकारिता
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विष्णु
राजगढ़िया
एक
पत्रकार उतना सक्षम कभी नहीं था, जितना आज है, यह ताकत उसे सूचना के अधिकार ने
दी है, निस्संदेह, आज भी कुछ अभागे हों, जो इस दावे की खिल्ली उड़ाएं, लेकिन ये
वैसे लोग होंगे, जिन्हें अभी सूचना के अधिकार का ककहरा भी नहीं सीखा होगा। अपन
के पास तो बीस वर्षों के पत्रकारीय जीवन के सबसे रोमांचक क्षण इस सूचना कानून
के बाद ही आये हैं।
इसका एक
शानदार उदाहरण देखें, झारखंड हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष ने अवैधानिक
फैसले के जरिये ‘मनोरमा
ट्रस्ट’
की लगभग दो अरब की परिसम्पत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया, इसमें देवघर
स्थित बावन बीघा बेशकीमती जमीन के साथ ही कोलकाता के दो मकान भी शामिल थे। इस
प्रापर्टी के मालिक ने 1968 में इस ट्रस्ट बनाया ता, उनके तीन पुत्रों ने इसे
निजी संपत्ति घोषित करे की अपील पटना तथा कोलकताता हाईरोर्ट में की, लेकिन राहत
नहीं मिली।
झारखंड बनने
के बाद हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष राजेंद्रनाथ शाहदेव ने धारा 43के
तहत ट्रस्ट की पूरी परिसंपत्ति को निजी संपत्ति घोषित कर दिया। हिंदू धार्मिक
न्यास अधिनियम कीधारा 43 कहती है कि किसी ट्रस्ट की संपत्ति को लेकर विवाद हो
तो राज्य सरकार इसके निपटारे के लिए किसी प्रशासनिक या न्यायिक सेवा के
पदाधिकारी को अधिसूचित कर सकती है, लेकिन श्री शाहदेव को राज्य सरकार ने इस काम
के लिए अधिसूचित नहीं किया था, उन्होंने खुद ही अदालत लगा ली थी। यह पूर्णतया
अवैधानिक थ। देवधर जिला उपायुक्त ने पत्र लिखकर इस पर आपत्ति दर्ज करायी । फिर
भी परिसंपत्तियों की बंदरबांट होगयी। मामला सरकार तक पहुंचा केबिनेट ने विधि
विभाग को जांच का आदेश दिया गया। लेकिन इस जांच के संबंध में विधि विभाग
रहस्यमय ढंग से खामोश रहा।
प्रभात खबर की
ओर से इन पंक्तियों के लेखक ने 29। 12। 2005 को सूचना अधिकार आवेदन द्वारा विधि
विभाग से जांच रिर्पोट मांगी। लगभग आठ माह बाद मिली रिपोर्ट ने कई गंभीर तथ्यों
का खुलासा किया। पता चला कि कैबिनेट ने विधि विभाग को जांच का निर्देश दिया ता।
लेकिन विधि विभाग ने यह काम देवघर के जिला उपायुक्त के मत्थे सौंप दिया।
उपाययुक्त ने इसे अपर समाहर्त्ता के हवाले कर दिया। अपर, समाहर्ता ने अंचल
अधिकारी ने इसे हलका कर्मचारी के हवाले कर दिय। हलका कर्मचारी ने कुछ बेमतलब
कागज लगाकर भेज दिया । इस तरह हुई ‘जांच’
की रिपोर्ट पर अपनी ‘विधिसमम्त’
टिप्पणी के बिना ही विधि विभाग ने इसे विधि-मंत्री को सौंप दिया । स्पष्ट ता कि
राजनीतिक दबाव में विधि विबाग ने चुप्पी साध रखी थी। इन तथ्यों पर
17
अक्टूबर 2006 को प्रभात खब में रिपोर्ट छपी-
‘हलका
कर्मचारी से करायी भारी मामले की जांच।’
एक बार फिर
विधि विभाग से सूचना मांगी गयी-
राज्य कैबिनेट
ने विधि विभाग को मनोरमा ट्रस्ट मामले की जांच का आदेश दिया था । उक्त आदेश के
बावजूद विधि विभाग द्वारा इस मा मले की वैधानिकता की जांच नहीं करने संबंधी
कारणों की जानकारी देने का कष्ट करें, राज्य में वैधानिक संस्थाओं के कार्यों
में वैधानिकता सुनिश्चित करने का दायित्व किस विभाग का है
?
मनोरमा ट्रस्ट
संबंधी मामले में उक्त विभाग ने कौन से कदम उठाये
?
अपनी गरदन
फंसती देख विभाग ने चुप्पी तोड़ी। 11 अक्टूबर 2006 को पहली बार विधि विभाग ने
इस फाइल पर विचार किया । फैसला सुनायि कि मनोरमा ट्रस्ट को निजी संपत्ति में
बदलने के संबंध में बोर्ड अध्यक्ष का निर्णय अवैध है, उन्हें धारा 43 के तहत
सुनवाई का कोई अधिकार नहीं।
इस तरह, सूचना
के आवेदन के कारण विधि विभाग को पूरे 40 महीनों के बाद यह निर्णय सुनाना पड़ा।
हालांकि इस विधि में ट्रस्ट की परिसंपत्तियों की बंदरबांट हो गयी, कई बड़े
अधिकारियों, नेताओं के लाभान्वित होने की चर्चा है। अलग सूचना आवेदन सारे
तथ्यों के साथ यह बात उजागर कर सकता है कि इस बंदरबांट में किन लोगों को कैसा
लाभा मिला ।
यह प्रकारण
पत्रकारिता मं सूचनाअधिकार के शानदार उपयोग की अनुठी मिसाल बना है, सिर्फ
समाचार हासिल करने के लिहाज से नहीं, बल्कि सम्मानजनक तरीके से सूचना पाने के
हक के बतौर भी। दिसंबर, 2005 में इन पंक्तियों के लेखक को मनोरमा ट्रस्ट मामले
में अवैध निर्णय की जानकारी मिली थई। विधि विभाग ही इस पर प्रामाणिक जानकारी दे
सकता थआ। लेकिन कई बार दूरभाष पर संपर्क के बावजूद विधि विभाग के अधिकारियों ने
कुछ भी बताने से इंकार कर दिया विधि विभाग जाने पर संयुक्त सचिव मुनींद्र
मिश्र ने कहा कि इस पर कोई भी जानकारी सचिव ही दे सकते है। सचिव रामबिलास
गुप्ता से मिलने पर उन्होंने इस प्रकरण पर बात करने में जरा भी दिलचस्पी नहीं
दिखायी। इन पंक्तियों के लेखक को टालने की गरज से उन्होंने अपने सामने खाली
पड़ी कुरसी पर बैठने का आग्रह तक करने की औपचारिकता नहीं विभायी। वह अपनी
फाइलों में उलझे रहे और साफ झूठ कह डाला-‘मुझे
ध्यान में नहीं आ रहा कि क्या मामला है, हमें अब तक जांच का कोई आदेश नहीं आया
है।’
हालांकि विधि
विभग को जांच का आदेश जुलाई 2005 में ही मिल चुका था। लेकिन जब अधिकारी किसी सच
पर परदा डाले, तो उसे सामने लाने के रास्ते पहले बेहद सीमित थे। जब आप किसी
इनियमितता की जांच कर रहे होते हैं तो अधिकारीगण इसी तरह उपेक्षापूर्ण रवैया
अपनाते हैं । लेकिन सूचना के अधिकार को धन्यवाद, जिसनें इस लाचारी और उपेक्षा
को हमेशा के लिए मिटा दिया है। जिस मामले की पूरी पहले अधिकारियों ने एक शब्द
तक बताने से इंकार के लिए मिटा दिया है। जिस मामले की पूरी पहले अधिकारियों ने
एक शब्द तक बताने से इंकार कर दिया ता, अब उसी मामले की पूरी फाइल उसी पत्रकार
के पते पर पहुंचानी पड़ी है। सूचनाधिकार ने पत्रकारिता को किस शानदार तरीके से
समृद्ध किया है, इसे समझने के लिए यह अकेला उदाहरण काफी है।
प्रसंगवश, एक
रोचक संयोग यह भी कि विधि विभाग के वही सचिव रामबिलास गुप्ता अब झारखंड के
सूचना आयुक्तों में एक हैं। उन्हें भी आयोग में सुनावाई के दौरान यह निर्णय
सुनाना पड़ा कि सारी सूचना दे दी जाए।
ऐसा ही एक
अन्य धमाकेदार उदाहरण देखें। झारखंड में नयी उत्पाद नीति लागू होने के बाद अवैध
शराब की बिक्रि तेज होने तथा उत्पाद-कर एवं बिक्री-कर के राजस्व में कमी की
बात सामने आती रही । विभआगीय अधिकारी रहस्यमय कारणों से इस तथ्य को छिपाते रहे
। मीडिया में ऐसी खबरें आने पर अधिकारी उसका खंडन करते रहे। यहां तक कहा गया कि
हमारा राजस्व तो पहले से ज्यादा बढ़ गया है।
यह स्थिति
किसी पत्रकार के लिए निश्चय ही दुविधापूर्ण होती है, जब उसके विश्वसनीय स्त्रोत
और परिस्थितिजन्य साध्य के जरिये कोई सच सामने आ रहा हो और उसे आधिकारिक तौर पर
साफ झुठला दिया जा रहा हो। ऐसे में सच लिखकर भी कई बार उसे प्रमाणित कर पाने की
समस्या रहती है और कोई जरूरी नहीं कि ऐसे हर मौके पर आपका संपादक आपके साथ खड़ा
रहे । अगर आप अपनी खबर की विश्वसनीय पुष्टि नहीं सकते तो विभागीय खंडन के
प्रकाशन की जिल्लत से गुजरना पड़ सकता है। इसी वजह से, इस राजस्व-क्षति पर
छिटपुट खबरें तो आती रहीं,लेकिन वह प्रभावी नहीं हो पाती थी।
इस
राजस्व-क्षति की जानकारी मिलने पर विधायक विनोद सिंह ने दिसंबर 2005 के
विधानसभा सत्र में अल्पसूचित प्रश्न के माध्यम से पूछा-
‘क्या
यह सच है कि अवैध शराब के निर्माण एवं वितरण के कारण उत्पाद- कर एवं बिक्री-कर
के मद में बड़े पैमाने पर राजस्व हानि हो रही है?’
जवाब में
उत्पाद सचिव ने लिखा-‘ऐसी
कोई शिकायत किसी स्त्रोत से प्राप्त नहीं हुई ।’
इस तरह, विधानसभा में जनता के प्रतिनिधि को सच्चाई का एक टुकड़ा भी हासिल नहीं
हो पाया।
इस बंधन में
मिली शिकायतों एवं मीडिया की खबरों के आधार पर वित्तमंत्री रघुवर दास ने उत्पाद
विभाग को पत्र भेजकर जानकारी मांगी, लेकिन उन्हें भी सच्चाई से अवगत कराने की
जरूरत नहीं समझी गयी।
लेकिन प्रभात
खबर की सूचनाधिकार टीम ने एक का आवेदन डालकर सारे आंकड़े निकाल लिये। पता चला
कि वर्ष 2000-01 में राज्यको देशी शराब से उत्पाद-कर के मद में 10.2 करोड़
प्राप्त हुए थे। वर्ष 2001-02 में यह राशि बढ़कर 16 करोड़ तक पहुंच गयी थी।
लेकिन वर्ष 2005-06 में यह राशि घटकर मात्र 1.56 करोड़ ही मिल पायी। राजस्व में
लगभाग नब्बे फीसदी की इतनी बड़ी गिरावट अधिकारियों के लिए चिंता का विषय होनी
चाहिए थी । लेकिन इस पर चुप्पी बनी रही। मीडिया, विधानसभा और वित्तमंत्री तक को
गुमराह किया गया। जबकि सूचना के एक आवेदन ने पूरा सच सामने ला दिया।
झारंखंड में
विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में विभिन्न कंसल्टेंट (परामर्श) की नियुक्ति
तथा भारी लूटखसोट की चर्चा गरम रही है। ऐसे चर्चाओं के आलोक में, झारखंड के
विकास आयुक्त टी. नंदकुमार ने मार्च 2006 में सभी विभागों से जानकारी मांगी कि
कंसल्टेंट पर अब तक कितना खर्च हुआ। उन्होंने यह सूचना एक सप्ताह के भीतर मांगी
थी। जबकि आठ महीने में किसी ने सूचना नहीं दी। अब अगर यही जानकारी सूचनाकानून
के जरिये मांगी जाये तो सभी विभागों के सामने यह विवशता होगी कि आनन-फानन में
ऐसी सूचनाएं तलाशकर आवेदक तक पहुंचाए। स्पष्ट है कि जो सूचनाएं राज्य के विकास
आयुक्त को आठ महीने में नहीं दी गयीं, वही सूचनाएं एक आम नागरिक सामान्यतः एक
माह के भीतर हासिल कर सकता है। यह कानून ऐसे अधिकारियों की उस लापरवाही पर भी
चोट कर रहा है, जो इस किस्म के विभागीय पत्रों को कूड़ेदान में डाल देने के आदी
रहे हैं।
प्रसंगवश,
झारखंड विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति के तात्कालीन सभापति सरयू राय ने
इसी हैरियत से कुछ विभागों के कतिपय सूचनाएं मांगी थीं। उन्हें देने से इंकार
कर दिया गया था। इस पर उनकी टिप्पणी थी-अब तो सूचना कानून लागू है, कोई भी आदमी
दस रुपये देकर सूचना हासिल कर सकता है। फिर विधानसभा की समिति की उससे क्यों
वंचित किया जा रहा है।
दिलचस्प बात
यह कि ऐसी ही नजरिया विधायक विनोद सिंह ने सदन के अंदर भी पेश किया। किसी मामले
में सदन के भीतर समुचित सूचना से वंचित होने पर उनकी टिप्पणी थी-लगता है, अब
सूचना कानून के सहारे ही यह जानकारी लेनी होगी।
जाहिर है कि
सूचना कानून अपने तरह-तरह के रंग दिखा रहा है। पत्रकारों का दायित्व है कि इसकी
ताकत को एक नये तेवर की पत्रकारिता के लिए आजमाकर देखें। अगर इससे उन्हें कुछ
नया संबल मिला, तो यह पूरी पत्रकारिता के लिए आमूल परिवर्तन का दौर साबित होगा।
समाचार संकलन के तरीकों एवं समाचार के स्त्रोतों में अब तक सूचना का अधिकार के
लिए कोई जगह नहीं रही है। कारण कि अब तक न तो ऐसा कानून ता और न ही ऐसी
अवधारणा। अब सूचनाधिकार ने पत्रकारिता को बेहद ताकतवर बनाया है। इसनें खबर और
स्त्रोत के पैमाने को भी बदल दिया है। अब तक रिपोर्टर के लिए वैसे अधिकारी ही
मुख्य स्त्रोत माने जाते रहे हैं, जो वस्तुतः स्वयं खबर हों। यानी जिन
अधिकारियों, मंत्रियों को खबर के निशाने पर होना चाहिए, वे खबर के स्त्रोत बन
जाते हैं। ऐसे स्त्रोंत को बनाने और बचाये रखने के लिए रिपोर्टर को कई बार
खबरों का पैमाना तक बदलना पड़ता है। हर विभाग के आला अधिकारी ही खबरों के मुख्य
स्त्रोंत हों, तो पत्रकारिता करने के लिए बचेगा क्या
?
तब उस विभाग के जनसंपर्क विभाग के पूरक की स्वयंसेवी निभाने के सिवाय शायद ही
कोई गुंजाइश बचे।
सच तो यह है
कि अब तक की पत्रकारिता में अधिकारपूर्वक दस्तावेजों के अध्ययन की कोई गुंजाइश
नहीं होने के कारण हमारा पत्रकार काफी सहमा, उपकृत और एकांगी था। उसे समाचार
हासिल करने के लिए मधुर रिश्ते बनाने पड़ते थे। इसके लिए वह जाने-अनजाने, इस या
उस पक्ष का उपकृत बनता था। मधुर रिश्तों के आधार पर खबरें निकालना एक सामान्य
प्रक्रिया है, लेकिन इसी सीमा यह है कि कई बार संवाददाता को अधिकारियों के
हाथों कठपुतली बनने की विवश होना पड़ता है। जब तक यह जनसंपर्क किस्म की
रिपोर्टिंग करता रहे, तब तक अधइकारी चहकते हुए उनका स्वागत करते हैं, लेकिन
ज्योंही अधिकारियों को यह एहसास हो जाये कि आप कुछ ऐसी सूचनाओं की तलाश कर रहे
हैं, जिनसे विभाग की कोई अनियमितता सामने आ सकती है, त्योंही वह मुंह फेर लेते
हैं। उसके बाद शायद वह आपको पहचानें भी नहीं। जो लोग यह कहते हैं कि सूचनाधिकार
से समाचार नहीं मिलता, बल्कि अच्छे रिस्ते बनाने से मिलता है, वे दरअसल
पत्रकारिता और जनसंपर्क का फर्क मिटा रहे होते हैं। सममाचार है, शेष सब
विज्ञापन । इस परिभाषा का मतवब सूचनाधिकार आने के बाद ज्यादा स्पष्ट हो रहा है।
व्यक्तिगत रिश्तों के आधार पर या तो महिमांडन की खबरें मिलती हैं, या परस्पर
द्वेष के कारण जारी प्रायोजित सूचनाएं। संवाददाता जाने-अनजाने इस या उस पक्ष का
उपकरण ही बन रहा होता है। प्राथमिक एवं पूर्ण तथ्यों के अभाव में कई बार वह
एकांगी, अतिश्योक्तिपूर्णः असत्य, पूर्वाग्रहप्रेरित खबरें लिख रहा होता है ।
मासूमियत के साथ । सूचनाधिकार उसे यह आधार मुहैया करा रहे हैं कि वह सारे
तथ्यों की पड़ताल स्वयं कर सके, अपने विवेक और अपनी विश्लेषण क्षमता का भरपूर
उपयोग कर सके। दिल्ली जलबोर्ड से संबंधित सूचनाओं के सारे पहलुओं की गहन पड़ताल
ने मीडिया को भी रास्ता दिखाया है।
सूचनाधिकार ने
अपनी ताकत हर मोरचे पर दिखायी है। राजस्थान के किसानों ने इसके जरिये मस्टर रोल
निकालकर अपनी मजदूरी और विकास योजनाओं को हिसाब लिया है। दिल्ली के दिहाड़ी
मजदूर नन्नू के लिए यह तीन दिनोंके भीतर राशनकार्ड दिलाने वाला कानून है। प्रेम
शर्मा के अनुसार इस कानून से आपको पासपोर्ट मिल सकता है। मधुबनी का गरीब
रिक्शाचालक मजमून कहता है कि इससे मुझे इंदिरा आवास मिल गया। किसी के यह
बिजली-टेलीफोन का बिल सुधरवाने का रामबाण है तो किसी के लिए यह सरकारी
विभागोंमें फंसा बकाया निकालने का। सरकारी सेवकों के लिए इस कानून के सहारे
स्थानांतरण और पदस्थापन में होने वाली मनमानी को उजागर करना आसान हुआ है।
ठीक इसी तरह,
प्रभात खबर की सूचनाधिकार टीम के लिए यह नयी पत्रकारिता का एक शानदार एवं अचूक
हथियार है। महज एक साल के अनुभव काफी समृद्ध एवं रोमांचक हैं। झारखंड के इन
प्रयोगों की गहनन विवेचना निश्चय ही भारतीय पत्रकारिता को नयी ऊंचाई प्रदान
करने की भरपूर संभावना रखती है।
विष्ण राजगढ़िया
प्रभात
खबर(धनबाद) में स्थानीय संपादक रहे। संप्रति प्रभात खबर
इंस्टीट्यूट, रांची में निदेशक के बतौर कार्यरत। सूचना अधिकार आंदोलन तथा
विकास
पत्रकारिता से गहरा जुड़ाव। संपर्क
: प्रभात खबर इंस्टीट्यूट, कोकर, राची (झारखंड)


