भारतीय संविधान
और सूचना का अधिकार
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डॉ. श्रीकांत
सिंह
भारत
में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए भारतीय
नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं। इस मौलिक अधिकारों
में सूचना का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 19 (1) क में सम्मिलित किया गया
है। यद्यपि सूचना का अधिकार या जानने का अधिकार का संविधान में अलग से कोई
उल्लेख नहीं किया गया है। किंतु विभिन्न न्यायालयीन प्रकरणों में जो निर्णय हुए
हैं उससे यह तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) क में
वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया है।
‘पिछले
दो दशकों में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक से ज्यादा बार फैसला दिया है कि
नागरिकों को जानने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के में दिये गये वाक्
व अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के मूलभूत 1 यदि हम इस तथ्य पर गंभीरता से विचार
करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तथ्य के आगे शासकीय गोपनीयता अधइनियम 1923
का प्रावधान चल ही नहीं सकता । न्यायमूर्ति के.के. मैथ्यू का भी कथन है कि इस
देश के नागारिकों को अधिकार है कि वे हर सार्वजनिक कार्य के बारे, अनियंत्रित
अन्यता बंधनों से सर्वता मुक्त हो सकती है क्योंकि उससे सार्वजनिक कार्य के
बारे, अनियंत्रित अथवा बंधनोंसे सर्वतामुक्त नहीं हो सकती क्योंकि उससे तो
अराजकता और अव्यवस्था हो जायेगी । सभी अधिकारों के प्राप्ति और उनके उपयोग
पर.....ऐसे युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते है जो देश के शासकों द्वरा
समाज की निरापदता, स्वास्थ्य, शांति, साधारण व्यवस्ताऔर नैतिकता केलिए आवश्यक
समझे जायें। प्रत्येक प्रकण में यह व्यक्ति और समाज के परस्पर विरोधी हितों के
समायोजन का प्रश्न होता है। ....सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति को यह छूट है कि वह
अपनी इच्छानुसार व्यापार, आजीविका या कारोबार करे। वह जो भी विधिपूर्ण कार्य
करना चाहता है करे और इसमें कोई भी व्यक्ति बाधा या अड़चन न पहुंचाये । किंतु
इन स्वतंत्रताओं के संरक्षण के लिए समाज को कुछ शक्तियों की आवश्यकता पड़ती
है। इसलिए संविधान जनता के अधिकारों की घोषमा करने में व्यक्ति की स्वतंत्रता
और सामाजिक सुरक्षा के भी च संतुलन करता है। संविधान का अनुच्छेद 19 व्यक्ति की
स्वतंत्रताओं की एक सूची देता है और विभिन्न खण्डों में वे निर्बन्धन दर्शाता
है जो उन पर लगाये जा सकते है जिससे उनका कल्याण या साधारण सदाचार से संघर्ष न
हो।’
भारतीय
लोकतंत्र में इधर भ्रष्टाचार जिस तह से बढ़ा उसे देखते हुए, शासन ने पारदर्शिता
की बात उठने लगी है। देश के कोने-कोने में अनेक बुद्धिजीवियों एवं गैरसरकारी
संगठनों द्वारा पारदर्शिता अथवा सूचना के अधिकार के लिए आंदोलन खड़े किये गये ।
पारिणामस्वरूप देश के विभिन्न राज्यों में 20 वीं शताब्दी के अंतिम दशक में
सूचना के अधिकार संबंधी विधेयक पारित किये गये। केंद्र सरकार ने भी सन् 2002
में एक विध्यक संस्द में पारित कराया किंतु कुछ कमियों के चलते वह मूर्त रूप न
ले सका, अब वर्तमान सरकार ने सूचना का अधिकार विधेयक 2005 संसद द्वारा पारित
करवाया जिस पर माननीय राष्ट्रपति महोदय ने 15 जून 2005 को हस्ताक्षर किए जिससे
भारत यह अधिकार प्राप्त करने वाले पचपन देशों की श्रेणी में आ गया । यह विधेयक
12 अक्टूबर 2005 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू ही गया है। अब हम
इस अधिनियम के कुछ प्रमुख प्रावधानों का वर्षन कर रहे हैं-
इस अधिनियम की
धारा 8 में कुछ विशिष्ट प्रकार की सूचनाओं को अपवाद के रूप में विमुक्ति दी गई
है। जो निम्नलिखित है-
1. इस
अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी नागरिक के प्रति कोई
दायित्व नहीं होगा :-
अ. ऐसी
सूचना और प्रकटीकरण जिससे भारत की प्रभुसत्ता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा,
सामरिक, वैज्ञानिक अथवा आर्थिक हितों पर, विदेशी राज्य के साथ संबंधों या अपराध
के उद्दीपन की ओर बढ़ने के बारे में हानिकर/ प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा।
ब.
ऐसी सूचना
जिसको प्रकाशित किये जाने के लिए स्पष्टतः किसी विधि न्यायालय द्वारा या अधिकरण
द्वारा निषिद्ध किया गया है अथवा जिसका प्रकटीकरण न्यायालय की अवमानना सीपित हो
सकती है।
स. ऐसी सूचना
जिसकी प्रकटीकरम संसद या राज्य विधान मंडल के विशेषाधिकारों को भंग होने का
कारण बनेगा।
ङ
सूचना जिसमें वाणिज्जिक विश्वास, व्यापार की गोपनीयता या बौद्धिक संपदा
सम्मिलित है, का प्रकटीकरण तीसरे/पर/अन्य पक्ष की प्रतियोगी स्थिति पर हानिकर
होगा, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट नहीं हो जाता हैकि विशाल
लोक हित का तकाजा/ अपेक्षा है कि ऐसी जानकारी का प्रकटीकरण किया जाए।
इ.
सूचना व्यक्ति को उसके वैश्वासिक/न्यायी संबंध में प्राप्तनीय है, जतब तक कि
सक्षम प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट नहीं हो जाता है कि विशाल लोकहित देखते है
ऐसी जानकारी का प्रकटन आवश्यक है।
फ.
विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त की गई सूचना । सूचना जिसके प्रकटीकरण से
किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को, खतरा पहुंचेगा, या सूचना के
स्त्रोत की पहचान से या विधि के प्रवर्त्तन/प्रवृत्त किये जाने वाले अथवा
सुरक्षा के प्रयोजनों के लिए खरता पहुंचेगा।
ह.
सूचना, जो कि अपराधियों के अनुसंधान/जांच या गिरफ्तारी में या अअभियोजन के
प्रक्रम में बाधक बनेगी/अवरोधक होगी/अड़चन डालेगी।
ई.
मंत्रीमंडलीय कागजात जिसमें मंत्री परिषद, सचिवों अन्य अधिकारियों के वाचार
विमर्श के अभिलेख सम्मिलित है। परंतु यह कि मंत्री परिषद के विनिश्चय, उस पर
विनिश्चय किये गये, विनिश्चय किये जाने के पश्चात तथा मामला पूर्ण हो जाने या
निपट जाने के पश्चात सार्वजनिक किया जाना अनिवार्य होगा। परंतु यह भी कि वह
मामले जो इस धारा में विनिर्दिष्ट अपवादों/ विमुक्तियों के अधीन आते हैं उन्हें
प्रकट नहीं किया जायेगा।
ज.
सूचना, जो व्यक्तिगत सूचना से संबंध रखती है और उसके प्रकटीकरण से किसी लोक
गतिविधि अथवा लोक हेत का कोई संबंध नहीं है अथवा जो व्यक्तिगत गोपनीयता/एकांतथा
पर अनपेक्षित/अवैध आक्रमण का कारण बनेगी
जब तक
कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी प्राधिकारी, यतास्थिति इस बात से संतुष्ट नहीं
हो जाते हैं या उसका समाधान नहीं हो जाता है कि विशाल लोक हित में सूचना का
प्रकटीकरण न्यायोचित है। परंतु यह कि सूचना जिससे संसद या राज्य विधान मंडल को
इनकार नहीं किया जा सकता, उस सूचना से किसी व्यक्ति को इंकार नहीं किया जायेगा।
इस अधिनियम के
अनुसार आम जनता को सरकरी फाइलों को देखने या निरीक्षण करने का अधिकार भी दिया
गया है। सूचना प्राप्त करने के लिए जहां दस रूपये शुल्क के रूप में जमा करना
होगा वहीं फाइलों के निरीक्षण के लिए पहले घण्टे में कोई शुल्क नहीं लगाया गया
है। एक घंटे बाद प्रत्येक 15 मिनट के लिए पांच रुपये शुल्क के रुप में देय
होगा। इस अधिनियम की यह बहुत बड़ी विशेषता है कि सूचना प्राप्त करने के लिए
आवेदक को इसका उद्धश्य बताना आवश्यक नहीं होगा। आवेदन प्राप्त करने के पश्चात
सूचना 48 घंटे के अंदर लोक सूचना अधिकारी को आवेदक को देना होगा। इसकी अधिकतम
अवधि एक माह रखी गई है। यदि एक माह में भी सूचना प्राप्त नहीं होती तो संबंधित
अधइकारी पर 250 रूपये से लेकर 25000 रूपये जुर्माना का अधिकार सूचना आयुक्त को
दिया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इस कानून का उद्देश्य आम जनता को
सूचना देने का है।
इस अधिनियम की
धारा 12 के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग नामक निकाय के गठन की व्यवस्था हैं। इस
आयोग का सर्वोच्च प्राधिकारी मुखअय सूचना आयुक्त होंगे। इसके अतिरिक्त सरकार
द्वारा निर्धारित की गई संख्या के अनुसार केंद्रिय सूचना आयुक्त होंगे। मुख्य
सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्त के पद की ममहत्ता इसी विधि से जानी जा सकती है
कि वह लोकसभा में विपेक्ष के नेता या यतास्थिति लोक सभा में सबसे बड़े समूह के
एकल विपक्ष के नेता एवं प्रधानमंत्री के चेयरमैन के रूप में कमेटी तथा
प्रधानमंत्री द्वारा निर्देशित केंद्रीय मंत्री परिषद के एक सदस्य की कमेटी की
सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा मु्ख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया जायेगा। इससे
स्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में कितना गौरवशाली,कुशल,दक्ष,
सत्यनिष्, कर्तव्यनिष्ठ, महत्वपूर्ण सेवा में समर्पित एक असाधारण महत्व के
विशाल वियक्तित्व की अपेक्षा धारा 12 में की गई है इस कमेटी द्वारा दूसरे देश
का विश्वास पात्र होगा।
इसी प्रकार
राज्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य
के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित की गई कमेटी में राज्य मूख्यमंत्री
,विधानसभी में विपक्ष का नेता या यतास्थिति सबसे बड़ दले के समूह का अकल विपक्ष
का नेता और मुख्यमंत्री द्वारा मंत्रीपरिषद में से नाम निर्देशित एक मंत्री, इन
सी से गठित कमेटी की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और
राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति की जायेगी । इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता
है कि इसमें धारा 19 (1) के अनुसार वह व्यक्ति जिसे विनिर्दिष्ट समय अवधि के
भीतर सूचनाएं प्राप्त नहीं हो पायी है या वह क्यक्ति जो लोक सूचना अधिकारी के
निर्णय से दुखी है वे तीस दिनों के अंदक केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य
लोक सूचना अधिकारी के यहां अपील कर सकता है।
इस प्रकार
उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि सरकार जनता को सूचना का अधिकार
सौपने के प्रति कृतसंकल्प है। अब सरकारी गोपनीयता कानून के नाम पर जिन रहस्यों
को नौकरशाही फाईलों में दबाना चाहती है, उससे काफी हद तक आम लोगों को राहत
मिलेगी। यद्यपि इस अधिकार से नौकरसाही प्रसन्न नहीं है। यह सच है कि नौकरशाही
पारदर्शिता पर पर्दा डालने के लिए कोई न कोई उपाएं ढंढ ही लेती है जैसा कि
उसमें ‘सूचना
के अधिकार से नौकरशाही मेंव्याप्त भय और अनिच्छा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा
सकता है कि ब्यूरोक्रेसी के नोटशीट की प्रक्रिया को सूचना के अधिकार के दायरे
से बाहर कराने की मुहिम जीत ली। नोटशीट में प्रशासकीय और राजनीतिक सोच क्या
इंगित करता है यह जानने के लिए इसे अधिकार में शामिल करने पर लंबी बहस हुई
लेकिन नौकरशाही ने इस मामले पर लंबी बहस लगाई और नोटशीट को इसके दायरे से बाहर
करा लिया ।’
इससे सूचना के अधिकार विध्यक पर प्रश्नचिन्ह लगता स्वाभाविक है।
इसी तरह सूचना
के अपवाद के संबंध में भी इसकी प्रक्रिया को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो सकता है।
भारतीय संविधान में भी वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त
निर्बन्धन लगाए गए है यहां भी कुछ मामलों में सूचनाएं गोपनीय रखने की बात पर
जोर दिया गया है, मेरे विचार से जिन बिन्दुओं पर जोर दिया गया है वे निश्चित
तौर पर गोपनीयता कीपरिधि में होनी चाहिए। किंतु अब सवाल यह है कि कोई सूचना
सचमुच देशहित को प्रभावित करने वाली है या नहीं, यह कौन तय करेगा और इसके तय
करने के आदार क्या होंगे ?
बेहतर होता अगर इस संदर्भ में स्पष्ट दिशा-निर्देश तय कर दिए जाते । अन्यता मीन
मेख निकालने में माहिर हमारी नौकरशाही इस प्रावधान का उपयोग अपने लिए एक ढाल
की तरह कर डालेंगी । आम आदमी की छोटी से छोटी भूल पर जिस तरह बड़े अपराधों की
धाराएं लगा दी जाती है और खास लोगों के बड़े अपराधों पर परदा डालकर उन्हें जिस
तरह कमतर दर्ज कर दिया जाता है, इस प्रक्रिय से कौन वाकिफ नहीं है।
महाराष्ट्र के
सूचना आयुक्त डॉ. सुरेश जोशी ने यह बात स्वीकार करते हुए कहा कि आफिशियल
सीक्रेट एक्ट के तहत अब तक सरकारी वभागों में फाइलें गुप्त रखी जाती थी। जो कुछ
बताने लायक होता भी ता तो बाबू लोगों को कल आना कह कर टरका देते थे कल आने पर
फिर कुछ बहाना कर कल आने को कहा जाता ता। इस तरह उनका यह कल कभी नहीं आता ता।
किसी तरह काकानूनी अधिकार नहीं होने के कारण पीड़ित व्यक्ति जनाकरी पाने से
वंचित रह जाता ता।
यह एक बहुत
महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है पर इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। भ्रष्टाचार से
लड़ने में यह सहायक जरूर है, पर केवल इसके बल पर भ्रष्टाचार कम हो जाएगी यह
निश्चित नहीं है। भ्रष्टचार की समस्या के कई पक्ष विकट होते गए तो केवल सूचनाका
अधिकार ही भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष को बहुत आगे नहीं ले जा सकेगा। कुछ लोगों
ने इस मुद्दे को इस तरह प्रस्तुत कियाजैसे भ्रष्टचार के विरूद्ध सूचनाके अधिकार
के रूप में एक रामबाम मिल गया है। यह उचित नहीं है। इस तरह की अतिशयोक्तिपूर्ण
अपेक्षाएं उत्पन्न करने से बाद में निराशा की स्थिति उत्पन्न होती है यह कहना
सच्चाई के अधिक नजदीक है कि सूचना का अधिकार मिलने से भ्रष्टाचार दूर करने के
प्रयासों के लिए नई आशाएं उत्पन्न होंगी व उनकी सफलता की संभावना भी बढ़ेगी।
डॉ. श्रीकांत सिंह जनसंचार के गंभीर अध्येता,कई पुस्तकें प्रकाशित । इन दिनों
रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में प्रोफेसर
हैं। संपर्क : कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, कोटा स्टेडियम, रायपुर


