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मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

 

छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार

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एस.पी. त्रिवेदी

 

सूचना अधिकार अधिनियम को प्रभावशील हुए एक वर्ष हो चला है। आइए देखें, इस एक वर्ष में छत्तीसगढ़ के संदर्भ में सूचना का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की क्या दशा और दिशा रही है। हम जानते हैं कि संविधान में देश के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अवसर की समानता व आजीविका की रक्षा केलिए अधिकार मूलभूत अधिकारों के रूप में प्रदान किए हैं। 1956 से संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत यह अनुभव किया गया कि राजनीतिक स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त हो गई है किंतु अभी भी नागरिकों को स्वतंत्रता एवं प्रजातंत्रात्मक व्यवस्थाकी वास्तविक अनुभूति नहीं हो सकी है। किंचित यह वजह रही कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में जनसामान्य की भागीदारी अपेक्षा के अनुपूप नहीं बढ़ सकी। जनसाधारण की बढ़ती कठिनाईयों एवं आशंकाओं के कारण समाज व सरकार के भी च संवादहीनता की स्थिति बढ़ी । यद्यपि लोकतंत्र को जनता द्वारा, जनता केलिए, जनता की सरकार कहा गया हैं, जनहित को ही सर्वोपरि माना गया है पर जनहित के कार्यों में जनसामान्य की सहभागिता एवं प्रशासन की जनआकांक्षाओं की प्रति संवेदनशीलता कहीं दिखी नहीं। प्रजातांत्रिक समाजवादी व्यवस्था में जीवनयापन से संबंधित अनेक जरूरतों की पूर्ति शासन हो करता है । मामला चाहे राशन-पानी-खाद-बिजली का हो या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की, ये तमाम सुविधाएं शासन द्वारा ही प्रदत्त हैं । शासन जनसामान्य के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावशील रूप से उसकी जीवनचर्या को प्रभावित करता है। सरकार के कामकाज का तैर-तरीका, गोपनीयता एवं विभिन्न अधिनियम की गूढ़ता के पर्दे से ढंके होने के कारण जनसामान्य को यह मालूम नहीं होता कि जो सरकार उन्होंने चुन कर दिया है, वह जनता के द्वारा दिए गए कर का जनसामान्य के हित के लिए क्या उपयोग कर रही है।  यही वजह है कि सरकार द्वारा किए गए कार्य किया जा रहा है, इसकी जानकारी सरलता से उपलब्ध हो सके, इस उद्देश्य को लेकर सूचना का अधिकार अधिनियम प्रभावशील किया गया । अधिनियम की परंपरा को त्यागकर पारदर्शिता और जवाबदेही की नई कार्यशाली की बढ़ावा देना है, जिससे लोकतंत्र के कार्यकरण के साथ-साथ भ्रष्टाचार को रोकने तथा सरकार और उनकी संस्थाओं को नागरिकों के प्रति उत्तरदायी बनाने में मदद मिल सके।

 

छत्तीसगढ़ की और लौटें । छत्तीसगढ़ में एक नवंबर 2005 को सूचना आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की गई। दिनांक सात नवंबर 2005 को राज्य के पूर्व मुख्य सचिव ए.के. विजयवर्गीय को को राज्यपाल ने मुख्य सूचना आयुक्त, छतीसगढ़ सूचना आयोग के पद का शपथ दिलाया गया । सूचना आयोग के गठन के पश्चात आयोग ने यद्यपि कार्य को सुचारु रूप से संपादिक करने मं वक्त पर्याप्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के अभाव के कार्य को सुचारू रूप से संपादित करने में वक्त लगा। अधिकारियों एवं कर्मिचारियों के कुछ पदों की पूर्ति होने पर विधिवत कार्य प्रारंभ हुआ।

 

राज्य शासन द्वारा विभिन्न स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की जानकारी एवं क्रियान्वयन की प्रणाली हेतु प्रशिक्षण दिया गया विभिन्न स्तरों पर सेमीनार भी आयोजित किए गए । ग्रामीण अंचल तक इस अधिनियम के अनुसार जनसामान्य जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने अधिकारों से अवगत हो सके, इस हेतु ग्राम सभाओं में भी  इस अधिनियम के बारे में चर्चा करने के लिए निर्देश जारी किए गए। मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा विभिन्न जिलों में जिला स्तर के सूचना अधिकारियों की बैठक ली गई। राज्य स्तर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मीटिंग में भी मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम को संवेदनशील रूप से क्रियान्वित करने के लिए कहा गया।

 

अधिनियम की धारा 4 एवं 5 के अंतर्गत लोक प्राधिकारियों का यह दायित्व है कि वे अपने संगठनों/संस्थाओं के संबंध में अपनी ओर से जनसामान्य की जानकारी के लिए प्रकाशन करें। ग्राम पंचायत स्तर पर जनसामान्य की जानकारी के लिए ग्राम पंचायत को कितनी राशि प्राप्त हुई किन-किन कार्यों के लिए प्राप्त हुई, क्या कार्य किए गए आदि की जानकारी कार्यालय के द्वारा नागरिकों के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसी प्रकार स्थानीय संस्थाओं नगर निगम, नगर पालिका एवं नगर पंचायतों द्वारा भी वह प्रकाशन अभी किया जाना बाकी है। ये संस्थायें आप लोगों से जुड़ी हुई हैं। सो, इनके कार्यों की जानकारी बिना किसी कठिनाई को लोगों को उपलब्ध हो सके, यह ध्येय तय किया गया ।

 

सूचना का अधिकार की जानाकारी आवेदन पत्र प्राप्त होने के 30 दिन के अंदर दिया जाना अनिवार्य है। आयोग के समक्ष प्राप्त शिकायतों एवं अपीलों से यह अनुभव हुआ कि पूर्व में सूचना का अधिकार हेतु दिए गए आवेदन पत्रों के प्रति उदासीनता रही किंतु धीरे-धीरे यह उदासीनता अह समाप्त हो रही है और आवेदकों को जानकारी दी जा रही है। यह भी पाया गया कि अनेक प्रकारणों में जानाकारी आधी-अधूरी दी गई । यद्यपि संबंधित अधिकारी की भावना अपूर्व जानकारी देने की नहीं थी, या उन्होंने अपने उत्तरदायित्व को समझकर जानकारी समय पर देने के लिए तत्पर हो रहे हैं।

 

आवेदकों द्वारा भी सूचना का अधिकार अधिनियम की समझने में त्रुटि हुई है। आवेदक इस प्रकार की जानकारी चाह रहे हैं जो संबंधित विभागीय अधिकारी का अभिमत है। किसी पूर्व अधिकारी द्वारा लिखे गए नोटशीट पर अथवा लिए गए निर्णय के औचित्य पर वर्तमान अधिकारी अभिमत नहीं नहीं दे सकता । वह तो सिर्फ जो आदेश पारित किए गए हैं; उस अभिलेख की नकल ही दे सकता है। आदेश सही है या गलत इस बारे में टिप्पणी दिया जाना सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत वांछित है ही नहीं । सौ, आवेदकों को भी स्पष्ट रूप से आवेदन देने के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं।

 

कभी-कभी आवेदक एक ही आवेदन पत्र में अनेक संस्थाओं से संबंधित जानकारी मांगते हैं जबकि यह संस्थाएं/संगठन/विभाग पृथक-पृथक कार्य करते हैं तथा उनके सूचना अधिकारी भी अलग-अलग है। उचित यह होंगा कि आवेदक एक विभाग से संबंधित जानकारी स्पष्ट रूप से अंकित कर सूचना अधिकारी को आवेदन दें।

 

सूचना का अधिकार का उद्देश्य किसी को परेशान अथवा डराना-धमकाना नहीं है वरन् जनहित में विभागीय क्रिया-कलापों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना है। इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसी संस्थाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं भी हैं जिन्हें शासन द्वारा अनुदान प्राप्त होता है। छत्तीसगढ़ में अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा अपनीसंस्थाओं से संबंधित जानकारी देने के लिए सूचना अधिकारी एवं अपीलीय अधिकारी की नियुक्ति की गई है। यह उनका अधिनियम के अंतर्गत दायित्व है कि वे अपनी संस्थाओं से संबंधित जानकारी के लिए अधिनियम की धारा4,5 के अंतर्गत स्वयं प्रकाशित करें।

 

यह भी अनुभव में आया है कि सूचना प्राप्त न होने पर आवेदक प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील कर रहे हैं किंतु प्रथम अपीलीय अधिकारी के द्वारा विधिवत आदेश पारित न कर संक्षेप में या मौखिक रूप से आदेश दे रहे हैं या निर्धारित अवधि में आदेश ही पारित नहीं कर रहे हैं। अपीलीय अधिकारी को संवेदनशीलता के साथ आवेदक एवं संबंधित सूचना अधिकारी को सुनकर विधिवत आदेश पारित करना चाहिए।

 

छत्तीसगढ़ सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील/ शिकायत प्रस्तुत की जाती है। आयोग के द्वारा प्राप्त शिकायतों पर दोनों पक्षों (सूचना अधिकारी एवं आवेदक) को सूनकर एवं अभिलेखों को देखकर निर्णय दिये जा रहे हैं। आयोग द्वारा दिए गए निर्णय के फलस्वरूप अनेक लोगों को शासकीय अभिलेखों की जानकार प्राप्त हुई है। भ्रष्टाचार से संबंधित अनेक प्रकरण सामने आये हैं। आयोग के समक्ष मुख्य रूप से सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शासकीय सेवकों/अभिभावकों, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं, ठेकेदारों के ही आवेदन पत्र प्रमुख रूप से प्राप्त हुए । जनसामान्य में इस अधिनियम की प्रति जागरूकता पैदा करना जरूरी है। आयोग को इस साल अक्टूबर माह तक 698 शिकायतों मिलीं, जनमें से 528 का निराकरण किया गया । इसके अंतर्गत आवेदकों को निःशुल्क जानकारी प्रदान करने के आदेश दिए गए हैं तथा इस हेतु समयावधि भी निर्धारित की गई। जिन प्रकरणों में अपूर्ण अथवा अधूरी जानकारी दी गई है, उन प्रकरणों में संबंधित अधिकारियों को पूर्व जानकारी देने के लिए निर्देशत किया गया। आयोग द्वारा शिकायतों के जिन प्रकरणों में यह पाया गया कि जानकारी सायास नहीं दी गई, अथवा अधूरी दी गई, ऐसे पांच प्रकरणों में सूचना अधिकारियों पर अर्थदंड भी आरोपित किया गया । अर्थदंड 1500 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक का रहा।

 

आयोग ने पाया कि आवेदकों को जानकारी प्राप्त करने में समय एवं आर्थिक क्षति हुई है, इसको धन में रखते हुए शिकायत के 15 प्रकरणं में 100 रुपये से लेकर 150 रुपये तक का मुआवजा विभागों द्वारा आवेदकों को दिए जाने का आदेश दिए गए। जिन प्रकरणों में मुआवजा देने के आदेश दिए गए हैं, उनमें मुख्य रूप से वाणिज्य कर, संचालक लोक शिक्षण, उच्च शिक्षा विभाग, लोक निर्माण विभाग, कृषि विभाग, गृह निर्माण विभाग एवं विद्युत मंडल उल्लेखनीय है।

 

आयोग ने यह भी पाया कि सूचना अधिकारी द्वारा अभिलेख शुल्क की गणना ठीक से नहीं की गई। ऐसे प्रकरणों में आयोग ने वसूल किए गए अधिक अभिलेख शुल्क वापिस किये जाने के आदेश दिए। जिन प्रकरणों में सूचना अधिकारियों द्वारा समयावधि में किसी कारणवश अभिलेख उपलब्ध न होने के कारण जानकरी पूर्ण रूप से नहीं दी गई, उनमें निःशुल्क जानकारी दिए जाने के निर्देश संबंधित विभागीय सूचना अधिकारी को दिए गए। आयोग के समक्ष कुछ प्रकरण ऐसे भी सामने आए अभिलेख उपलब्ध न होना; गुम हो जाने के कारण जानकारी दिया जाना संभव नहीं होना बतलाया। ऐसे प्रकरण में आयोग ने कड़ा रूख अपनाते हुए अभिलेख गुम हो जाने का दायित्व निर्धारित करने तथा पुनः अभिलेख का पुर्नगठित करने एवं उनकी जानकारी आवेदक को दिए जाने के आदेश पारित किए गए।

 

आयोग को प्रथम अपीलीय अधिकारी के पश्चात द्वितीय अपील के रूप में प्राप्त 457 अपीलों में प्राप्त 457 अपीलों में से 253 अपीलों का निराकरण किया जा चुका है । अपीलीय प्रकरण में भी आयोग ने पाया कि कुछ अपीलीय अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर रहे हैं तथा विधिवत आदेश पारित करने में त्रुटि कर रहे हैं। आयोग को प्राप्त अपीलीय प्रकरणों में से चार प्रकरणों में आयोग के द्वारा अर्थ दंड के आदेश सूचना अधिकारियों के विरूद्ध पारित किए गए । इनमें गृह निर्माण मंडल, सरपंच, ग्राम पंचायत तथा अनुविभआगीय अधिकारी (राजस्व) सम्मिलित हैं। आयोग ने जिन अपीलीय प्रकरणों में पाया कि आवेदक को सूचना प्राप्त करने में आर्थिक एवं मानसिक क्षति हुई है; ऐसे प्रकरणों में आवेदक को मुआवजा भी संबंधित विभाग से उपलब्ध कराया गया । इस प्रकार के 26 प्रकरणों में 200 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक मुआवजा आवेदकों को दिलाया गया । इनमें गृह निर्माण मंडल, लोक निर्माण निभाग, नगर निगम, वन विभाग आदि प्रमुख है।

 

दरअसल, आयोग का मुख्य उद्देश्य लोगों को सूचनाएं सरलता से उपलब्ध कराना है। आयोग ने शासन को यह सुझाव दिया कि जनसामान्य, विशेष कर पंचायत स्तर पर सूचना का अधिकार अधिनियम को प्रभावशील ढंग से क्रियान्वित करने की दृष्टि से प्रचार-प्रसार पर्याप्त रूप से किया जाए। ग्राम पंचायत स्तर पर भी प्रशिक्षण दिया जावे, जनसामान्य को विभाग मूलभूत जानकारी स्वयंमेव उपलब्ध करावे। यह जानकारी विभागीय बेवसाइट के माध्यम से अथवा विभागीय प्रकाशन के माध्यम से उपलब्ध कराई जा सकती है। आयोग द्वारा आयोग को शिकायत एवं अपील प्रस्तुत करने में अनावश्यक आर्थिक व्यय न हो, इस दृष्टि से आयोग जगदलपुर, दंतेवाड़ा, अंबिकापुर, बैकुंठपुर एवं जशपुर जैसे दूरस्थ अंचलों के लिए वीडियो कान्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनावाई करने का  निर्णय लिया गया। यह छह दिसंबर 2996 से प्रारंभ हो रही है। आयोग के प्रयासों के फलस्वरूप विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से अनेक प्रकरण जनसामान्य के समक्ष जानकारी में आ रहे हैं, जिनकी जानकारी उन्हें पूर्व में उपलब्ध होने में कठिलाई थी।

 

(लेखक, छत्तीसगढ़ सूचना आयोग के सचिव हैं)

 

 

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