सूचना कानून के सरोकार
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शताब्दी सुबोध
पाण्डे
रूसो
कहते हैं कि यदि मुझ अपना जन्म स्थान चुनने की स्वतंत्रता होती तो मैं ऐसा समाज
पसंद करता जिसका विस्तार मनुष्य की आंतरिक शक्तियों की सीमाओं के अनुपातनुकुल
होता यानी जिसके सुशसित होने की संभावना होती। यहां प्रत्येक व्यक्ति अपने
व्यवसाय के उपयुक्त होने के कारण, अपने उत्तरदायित्व को दूसरो पर डालने की
कोशिश न करता, एक ऐसा राज्य, जिसमें सब एक दूसरे से ऐसे सुपरिचित होते कि न तो
पाप की गुप्त मंत्रणाएं और न सदाचार की विनम्रता जन साधारण की दृष्टि एवं
निर्णय से छिपी रह सकती और जिसमें एक दूसरे को देखने तथा जानने की रूचिकर रीति,
देशप्रेम को, धरती के मोह से नागरिकों के पारस्परिक प्रेम में परिणित कर देती।
जब हम अधिकार
पाते है तो हमारा व्यवाहार ऐसी ही व्याख्या करे। हमारे आसपास का वातावरण हमें
संबल प्रदान करे। किसी शको-शुबहा में बदला लेने की प्रवृत्ति का विकास न हो।
सदैव उन्नत राज्य और शोषण रहित समाज का अक्स उभारना ही हमारी हसरत हो।
जब घर में
छोटे थे और मां को बिना बात ये कहीं बाहर चले जाया करते थे। खेलने या अपने किसी
स्कूली काम से ही सही, तो मां बहुत नाराज होती थी, कि तुम बताकर क्यों नहीं
गये, तुमने सूचना क्यों नहीं दी कि तुम फलां काम से जा रहे हो, आज बड़े लोग भी
अपनी पत्नी को बिना बताये घर से चले जाते है । घर में पत्नी परेशान रहती है। मन
ही मन बड़बड़ाती है।तो कभी घर में चौके और मुख्य द्वार तक चक्कर लगाते रहती है
कि पति अब तक घर नहीं आये और बताकर भी नहीं गये।
आम आदमी ने
अपनी बदतर स्थितियों से सैकड़ों से सैकड़ों दफे समझौता किया है। इसलिए कि वह
जरूरी मालूमात हासिल नहीं कर पाया। या फिर वह इस बात से अनभिज्ञ रहा कि किसी
मसले से संबंधित जानकारियां हासिल भी की जा सकती है। जरा याद कीजिए पहले कहां
लोग अपनी शादी का रजिस्ट्रेशन कराते थे। अग्नि को साक्षी मान लिया तो मान लिया।
वह अग्नि ही सर्टिफाई करती थी कि फलां जोड़ा पति-पत्नी है। आज मुश्किलें बढ़ीं
है। जब आदमी जरुरतों का गुलाम हो जाता है तो वह पैसे से मोहब्बत करने लगता है।
ऐसा न भी हो तो दुनिया विकास के पायदान हासिल करते जा रही है, आदमी भी संग संग
चलने विवश हो जाता है इन विपरिता परिस्थितियों में वह अपने जायज हकों को हासिल
करने के मामले में भी छला जाने लगा है। सूचना प्राप्त करना तब उसकी मजबूरी बन
गई है। वह सूचना न प्राप्त करें तो क्या छला ही जाता रहे। भले ही वह फिर गरीब
ही क्यों न हो।
गांव के किसान
को यह तो मालूम ही होना चाहिए कि, गांव की एकमात्र राशन दुकान में शक्कर का
क्या भाव है। कोटा लगभग कौन सी तारीख की आता है। मिट्टी का तेल क्यों नहीं ।
ग्राम पंचायत की सभा की तारीख की हांका क्यों नहीं गाड़ा गया या गांव की किसी
विधवा का पेंशन प्रकरण किस अवस्था में है। इन तमाम बातों को जानने का अधिकार है
लोगों को । लेकिन उन्हें एक चीज और जाननी चाहिए कि यदि जानकारियां हासिल नहीं
हो रही है तो वांछित जानकारियां प्राप्त करने के लिए क्या औपचारिकताएं हैं,
आवेदन कहां करना पड़ता है इत्यादि, भारतीय संविधान में दिये गये प्रावधानों के
अनुसार प्रत्येक भारतीय नागिरक को सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। अधिकार के
माने हैं नागरिकों को प्राप्त सुविधाएं । इन सुविधाओं के बूते न केवल लोगों का
व्यक्तित्व विकसित होता है, बल्कि वह समाज में बेहतर जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
दूसरे नजरिए से कहा जा सकता है कि यह अधिकार शासन के लिए चुनौती है। इसकी बेवजह
अड़चनों में यदि संबंधित विभाग फंसना नहीं चाहता है तो जरूरी है कि वह
जानकारियों को उपलब्ध करायें। इस तरह सूचना का अधिकार भारतीय नागरिकों की
सुरक्षा करता है। उन्हें सोचने समझने की शक्ति प्रदान करता है तुलनात्मक रूप से
बेहतर अवसरों को मुहैय्य करता है।
जैसे कि हम
जानते हैं इतनी आवश्यक सुविधा भारत वर्ष में सर्वप्रथम नौ राज्यों में शुरू की
गई। तमिलनाडु, गोवा, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, असम,
जम्मू-काश्मीर सारे मध्यप्रदेश में अब इन राज्यों के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ में भी
यह कानून लागू हो गया है। अब छत्तीसगढ़ में शासकीय विभागों से प्राप्त न होने
वाली सूचनाओं के संबंध में लोग आवेदन कर सकते हैं और आवश्यक जानकारियों की मांग
कर सकते हैं। इस अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है। लेकिन कुछ
जरूरी बातों का भी ध्यान इस कानून में रखा गया है। लोक विभाग अपने कार्य कलापों
की सूचना जारी कर सकते हैं, किन्तु इन सूचनाओं के जारी होने से किसी का हित
प्रभावित हो रहा है, नुकसान पहुंच रहा है तो इस प्रकार की सूचनाएं जारी करना
गैर कानूनी माना गया है।
सार्वजनिक
निर्माण कार्य के निरीक्षण, किसी अधिकारी के पास उपलब्ध अभिलेखों दस्दावेजों
का निरीक्षण, दस्तावजों की टिप्पणीयां या नकल प्राप्त करने, निर्माण कार्य में
लग रही सामग्री के नमूनों की प्राप्ति, डिस्क, फ्लापी, विडियो कैसेट इत्यादि
प्राप्त करने का अधिकार यह कानून देता है। भारतीय संविधान के प्रति हमारी
श्रद्धा होनी चाहिए। हम देश के सर्वोच्च कानून भारतीय संविधान के प्रति
आस्थावान रहे, ऐसा हमारे व्यवहार से ही प्रकट होना चाहिए । संविधान के निर्माता
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि यदि भारतीय संविधान में से मौलिक अधिकारों के
भाग को निकाल दिया जाता है। तो संविधान लगभग शून्य हो जायेगा । भारतीय संविधान
में निहित इन्हीं मौलिक अधिकारों में सूचना के अधिकार हासिल करने की पात्रता
हमको प्राप्त है। सवाल यह उठता है कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों के बावजूद
क्या हमको वह हक हासिल है या क्या हम उस हक को हासिल कर पा रहे है। अक्सर ऐसा
नहीं हो पाता है। कहीं हम बेवजह लालफीताशाही के भंवर में फंस जाते है। कहीं
रिश्वत का सांप गला घोटता हुए। आपने सुना होगा की भर्ती में पैसे चल रहे हैं।
या कोई बूढ़ा बाप अपने बेटे की नौकरी के लिए खेत बेचकर पैसा जुटा लाया है और
बाबूओ के चक्कर काट रहा है।
यह स्थिति
दरअसल हमने ही पैदा की है। हम ही सड़े गले तंत्र का हिस्सा बनने के हिमायती है,
इसलिए ईमानदारी की शोशेबाजी से परहेज करते हैं। शार्टकट का जमाना है साहब,जैसे
जुमले हमारे व्यक्तित्व पर हावी होते जा रहे है। आदमी यदि जागरूक है तो
परेशानियों से काफी कुछ मुकाबला कर सकता है। वैसे इस दिनों लागू होने वाले
कानूनों का सामूदायीकरण हमें अच्छा लगना चाहिए । अभी राज्योत्सव में घरेलू
महिला हिंसा कानून के बैनर का प्रदर्शन अच्छा लगा। वहीं सामाजिक संस्थाओं
द्वारा सूचना के अधिकार पर की जा रहीं कार्यशालाएं और आयोजित किए जाने वाले
वर्ग अच्छे आयोजन कहें जा सकते है, लेकिन मेरा मानता है कि समुदायों में जाकर
इस कानून विशेष की विशेषताओं और प्रक्रियाओं को सरल रूप में लोगों को समझाने की
जरूरत है। हम शहर में कितना भी
ढोल
पीट ले गांव की स्थितियां जस की तस दिख पड़ती है । यदि गांव के आदमी का शोषण
नहीं हो रहा है । वह अपने अधिकारों को प्राप्त कर रहा है । किसी प्रकार के
बहकाने या बरगलाने की स्थियों से वह स्वतंत्र है तो माना जा सकता है कि कानून
के प्रति समझ का विकास हुआ है, सीख बनी है । हम तब ही स्वतंत्र कहाने के हकदार
होंगे जब अपने अधिकारों से लैस होंगे । हमें अपने अधिकारों की छूट नहीं है तो
यह परतंत्रता कही गई यह परतंत्रता ही शोषण और अत्याचार का जाल बुनती है । ऐसी
नीतियां और योजनाएं सरकार द्वारा बनायी जानी चाहिए जिससे न्याय मिले, जो
पारदर्शी हो, जिससे भेदभाव न हो, जो हमें संवेदनशील समाज का हिस्सा बनाये यानी
हमारा सहभाग भी जुड़ा होना चाहिए । योजना आयोग की पंचवर्षीय योजना का मर्म भी
यही है ।
जो शासन अपने
नागरिकों को बेहतरी चाहता है वह संवेदनशील होता है, जागरुक और पारदर्शी होता
है, अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं चुराता रिसपान्सीबल होता है । यदि यह
विशेषताएं है तो वहां के नागरिक किसी भी विवाद से परे होंगे । उनमें सुरक्षा की
भावना होगी । गलत नियम के पक्षधर भी न होंगे । अनर्गल वार्ता से भी बचेंगे ।
सूचना का अधिकार यही कुछ तरह के कानूनों की सरल व्याख्या की जानी चाहिए । आने
वाली पौध को हम पारालीगत की शक्ल में कुछ पाठ और प्रयोग अभ्यासार्थ देते हैं तो
परिणाम किसे प्राप्त है, सूचना के अधिकार का प्रयोग किन बातों के लिए किया जा
सकता है, सूचना किससे मांगी जा सकती है, सूचना कैसे प्राप्त की जा सकती है,
आवेदन कहां देना होता है, आवेदन कैसे किया जा सकता है, सूचना मिलने की समय सीमा
पर ना मिले तो क्या करना होगा, किन सरकारी विभागों और निकायों को कानून के
दायरे से बाहर रखा गया है, विभागों को क्या बाध्यताएं है, सूचना न देने पर
संवंधित अधिकारी के लिए दण्ड का क्या प्रावधान है, सूचना का अधिकार प्राप्त न
होने की स्थिति में क्या होगा आदि-आदि ।
लेकिन जैसे कि
होता है इंडियन पैनल कोड की दफा 299 और 302 में बहुत सी गफलते पैदा कर दी जाती
है । कई बार 299 को 302 बनाने की कोशिशें होती है । ऐसी सूरत सूचना के अधिकार
को लेकर पर्दे पर आनी नहीं चाहिए । जब हकीकतन, जायज कार्यों का नुकसान हो रहा
हो तो हमें इस कानून का सहारा लेना चाहिये, लेकिन नाजायज कार्यों के लिए कतई
नहीं । इस विचार को भी संप्रेषित करने की जिम्मेदारी हमारी ही है, क्योंकि हम
ही समुदाय की बुनियाद है।
शताब्दी सुबोध पांडेः पत्रकारिता से लेखन की शुरूआत की ।
रायपुर महिला मंच नामक स्वयंसेवी संगठन चलाती हैं । संप्रति छत्तीसगढ राज्य
महिला आयोग की सदस्य हैं । संपर्कः गोल चौक के पास, रोहिणीपुरम, रायपुर, छ.ग.


