आम आदमी के हाथ में कानूनी हथियार
...............................................
रमेश वर्ल्यानी
यूपीए
की चेयर परसन श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के
नेतृतत्व वाली केंद्रीय सरकार ने देश के आम आदमी से सरोकार रखने वाले सूचना के
अधिकार कानून -2005 को लागू कर एक क्रांतिकारी कदम उठाया है अंग्रेजी-राज में
जनता को सूचना से वंचित रखने के लिए सन् 1923 में ए आफिसियल सिक्रेट एक्ट बनाया
गया था । इस उपनिवेशवादी कानून की समाप्ति ऐतिहासिर घटना है। लोकतंत्र में जनता
को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ ही यह बताना भी सरकार का दायित्व
होता है कि जनता के सार्वजनिक धन का कहां और किस तरह उपयोग हो रहा है। साथ ही
जनसमस्याओं के निराकरण के लिए सरकार क्या प्रयास कर रही है और जनता को अपनी
रोजमर्रा की समस्याओं के लिए किस एजेंसी से संपर्क करने पर राहत मिल सकेगी । इस
कानून के लागू होने से आम आदमी सरकारी योजनाओं और सुविधाओं के बारे में जानकारी
प्राप्त करने का हकदार बन गया है।
सूचना का
अधिकार कानून लागू होने से अब ‘लोक’
का ‘तंत्र’
पर दबाव निरंतर पढ़ेगा । अभी तक तंत्र, लोक पर हावी रहा है। सरकारी दफ्तरों में
कार्य संस्कृति का आलम यह है कि राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, जन्म प्रमाण
पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे छोटे-छोटे कामों के लिए लोगों को आफिस की
परिक्रमा करनी पड़ती है और बिना ‘सुविधा-शुल्क’
की चढ़ोत्तरी के काम नहीं होते। लेकिन इस कानून के लागू होने से अब आप पूछ सकते
हैं कि जिस सुविधा के लिए आपने आवेदन दिया था, उसका क्या हुआ। जिस
अधिकारी-कर्मी को उक्त कार्य को करना है, उसके बारे में जानकारी ले सकते हैं और
समय सीमा के अंदर काम नहीं होने से, आप उसकी शिकायत ऊपर तक कर सकते हैं। अपने
देश में दफ्तरों की जो कार्य संस्कृति की बनावट है, वह तत्काल नहीं बदली जा
सकती है। इस कानून ने उस बनावट के चक्रव्यूह को तोड़ने का काम किया है। इसके
लिए आम और खास लोगों को आगे आना होगा।
अभी तक का
अनुभव यह बतलाता है कि पैसे वाले लोग अपना काम कराने के लिए शार्टकर्ट का
रास्ता अपनाते है दफ्तरों में ‘सुविधा-शुल्क’
देकर अपना काम जल्द कराना पसंद करते है । वहीं दूसरी ओर समान्य जन भी व्यवस्था
के खिलाफ संघर्ष करने के बजाय समझौतै करने इसलिए मजबूर हो जाते हैं कि उपर कहीं
सुनवाई नहीं होती है। लेकिन अब इस व्यवस्था से लड़ने के लिए सूचना का अधिकार
कानून कारगर हथियार है। इस कानून की ताकत का अंदाजा हाल के केंद्रीय सूचना
अधिकार आयोग के फैसले से मिलता है जिसमें आयोग ने संघ लोक सेवा आयोग से कहा है
कि सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा में वैठे सभी परीक्षार्थियों को प्राप्त
अंक जारी किए जाएँ। साथ ही कट आफ अंक और सवालों के जवाब भी बताए जाएं।
छत्तीसगढ़ में राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षा घोटाला तभी उजागर हो सका, जब
परीक्षार्थियों ने सूचना के अधिकार के तहत उत्तर पुस्तिकाओं की नकल हासिल की।
इसके लगातार इस्तेमाल करते रहने से व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार होता
रहेगा और उसमें क्रमशः सुधार होता जोगा।
सूचना का
अधिकार
कानून के
माध्यम से देश में भ्रष्टाचार को कमतर करते हुए पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था
लाने के लिए जरूरी है कि इसके क्रियान्वयन हेतु केंद्र और राज्य सरकारें निरंतर
प्रयासरत रहें। इस कानून की धारा 4 में यह प्रावधान रखे गए हैं कि शासकीय
प्रतिष्ठान आम जनता से संबंधित सरकारी योजनाओं की जानकारी को वेबसाइट पर अपडेट
करते रहें ताकि लोग कभी भी संबंधित वेबसाइट पर जाकर सूचना हासिल कर सकें ।
केंद्र सरकार के कार्यलयों में इस दिशा में ठोस पहल की है और उसके सुखद परिणाम
भी देखने को मिले है। भारतीय रेल प्रशासन इसकी सबसे अच्छा उदाहरण हैं। अपने शहर
में बैठकर आप इंटरनेट के माध्यम से न केवल रेल यात्रा की टिकट आसानी से प्राप्त
कर सकते है। मेरे एक व्यवसायी मित्र ने एक अन्य केंद्रीय संस्थान
‘डायरेक्टर
जनरल ऑफ पारेन्ट्रेड’
के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इंपोर्ट लायसेंस पहले प्राप्त करना बहुत
ही दुष्कर कार्य था। लेकिन जब से केंद्र सरकार ने इसके निष्पादन के लिए
समय-सीमा निर्धारित कर दी तो यह काफी आसान हो गया है। उन्होंने इंपोर्ट-लायसेंस
के लिए जब पहले आवेदन किया, तो उसमें कुछ कमी रह गई थी। उक्त आवेदन इस हिदायत
के साथ 7 दिनों के अंदर वापस आ गया कि इसमें कुछ खामियां रह गई हैं, जिसे पूरा
कर पुनः भेजे । इन कमियों को पूरा करने के लिए यह भी बताया गया कि फलां वेबसाइट
पर जाने से आपको सारे विवरण मिल जाएंगे जिसके अध्ययन पश्चात आप इन कमियों की
आपूर्ति कर सकेंगे । उन्होंने वैसा कर पुनः आवेदन भेजा और एक सप्ताह में ही
उनका इंपोर्ट लायसेंस स्वीकृत होकर आ गया।
केंद्रीय
दफ्तर की इस त्वरित कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी लेने पर यह मालूम पड़ा कि
तत्संबंध में केंद्रीय विभाग के स्पष्ट निर्देश है कि आवेदन पर कार्यवाही हर
हालत में सात दिनों में की जाए अन्यथा संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय की जाएगी
इस बाध्यता के चलते केंन्द्रीय दफ्तरों के कामों में पारदर्शिता का सिलसिला
शूरू हो गया है। लेकिन राज्यों में ऐसे ठोस प्रयास नहीं होने से जनता को विशेष
राहत नहीं मिल पाई है। इसके पीछे मूल कारण यह है कि इस कानून की
धारा
4 के
अनुपालन में सूचना प्रकाशित करने में राज्य सरकारों की गति काफी सुस्त हैं
दिल्ली स्थित विचार और अनुसंधान संगठन सेंटर फार सिविल सोसायटी
ने 13
जून, 2006 को इस संबंध में रिपोर्ट जारी की है कि किस राज्य ने सूचना जाहिर
करने के निर्देशों का सर्वाधिक पालन किया और कितनें लापरवाही की।
सूचना के
अधिकार कानून के तहत जानकारी प्राप्त करना जितना सरल बनयाया गया है, सरकारी
दफ्तरों की कार्यप्रणाली उसे दुष्कर बनाने में लगी हुई है। तमाम राज्यों में
सूचना आयुक्तों के पास पहुंची शिकायतों की लंबी सूची से स्पष्ट है कि अफसर शाही
अपनी फाइलों में संचित राज जनता में बांटना नहीं चाहती । इस कानून का उपयोग
करने वालों से पड़ताल करने पर मालूम पड़ा कि राज्य शासन के अधिकांश विभाग
सूचनाएं प्रदान करने के बजाए उसे छुपाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य भी इससे अछूता नहीं है। यहां आवेदन करने पर 30 दिनों के भीतर
सूचना प्रदान करने में अधिकारियों को कोई दिलचस्पी नहीं है। सूचना देने के लिए
फोटोकापी व्यय का इतना लंबा चौड़ा बिल भिजवा देंगे कि सूचना लेने वाले के हौसले
ही पस्त हो जाएं या फिर तीसवें दिन आपकी खबर करेंगे कि कानून की फलां धारा के
तहत यह सूचना आपको नहीं दी जा सकती। अब आम आदमी कहां जाकर कानून की बारीकियां
ढूंढेगा कि सही कौन है ?
सूचना नहीं मिलने पर अपील भी उसी विभाग के बड़े अधिकारी के पास किए जाने से
सार्थक परिणाम नहीं आए हैं । राज्य सूचना आयुक्त के पास अपील किए जाने पर अनेक
मामलों में विभागों पर शास्ति आरोपित की गई है। अतएव प्रथम अपील के प्रावधान
हटाने से बहतर परिणाम आ सकते हैं।
इसी प्रकार
राज्य सूचना आयुक्त के पदों पर रिटायर्ड नौकरशाहों के बजाय, हाई कोर्ट के
रिटायर्ड न्यायाधीशों, वरिष्ठ कानूनविद एवं पत्रकारों की नियुक्ति होने से इस
कानून के अनुपालन की गति बढ़ेगी। इस कानून से मिल सकने वाली राहत में रोड़े
अटकाने वाली प्रवृति के बावजूद इससे परेशान होने या इस कानून के उपयोग करने से
विमुख होने की जरूरत नहीं है। यह सब शुरूआती दौर में होना ही है। दरअसल सूचना
का अधिकार उस बड़ी लड़ाई का एक छोटा सा औजार है जिसके माध्यम से इस देश की
लोकतांत्रिक व्यवस्था को ज्यादा जनाभिमुख बनाने के लिए हम सबको लड़नी है। इस
कानून के उपयोग में हमारी आपकी भागीदारी और योगदान से ही सरकारें इसमें निरंतर
सुधार करने बाध्य होंगी और इसमें ऐसे संशोधनों पर विचार करने से परहेज करेंगी
जो इस कानून को पंगु बना सकते हैं।
रमेश वर्ल्यानी -
पूर्व विधायक,
छत्तीसगढ़ प्रदेश
कांग्रेस कमेटी के
प्रवक्ता और
महामंत्री हैं।
समसामयिक विषयों पर समाचार पत्रों में नियमित
लेखन।
संपर्क : सी-9 शैलेन्द्र नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)


