सूचनाधिकार की
फिसलन और शिखर का स्वप्न
.....................................................................................................
रमेश नैयर
सूचना
एक शास्त्र है, सूचना एक पहेली है और सूचना समाधान भी। कुल मिलाकर सूचना में
बड़ी शक्ति है, इसलिए उसे छिपाने का हरसंभव प्रयास किया जाता है। सही और त्वरित
सूचना अनेक रहस्यों को अनावृत कर सकती है । प्रायः हर प्रकार की पोशीदगी को
उजागर करने में सूचना का अधिकार कारगर हो सकता है। भ्रष्टाचार को पोशीदा रखने
की हरसंभव कोशिश की जाती है। इन कोशिशों को नाकाम करने के लिए सूचना के अधिकार
का शस्त्र देश के प्रत्येक नागरिक को कानूनन मुहैया कारया गया। यह कानून बने एक
वर्ष बीत गया। कुछ वातावरण तो बना, परंतु इस कानून ने अपेक्षित रफ्तार नहीं
पकड़ी। यह कानून दफ्तरों और फाइलों की परिक्रमा में ही एक वर्ष व्यतीत कर गया।
कहीं-कहीं कुछ हलचल अवश्य हुई, परंतु कुशासन की समाप्ति और सुशासन की स्थापना
में यह कोई बडा फासला तय नहीं कर पाया।
सूचनाधिकार के
कानून के प्रभावी ढंग से लागू हो पाने का संताप हर ओर अनुभव किया जा रहा।
स्वयं मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबी बुल्ला ने इस कानून के क्रियान्वयन की गति
पर असंतोष व्यक्त किया है । दिल्ली में न्यायपालिका, विधायिका और सूचना का
अधिकार-कानून पर एक संगोष्ठी में इसको लागू किए जाने में बरती जा रही कोताही पर
अफसोस जाहिर किया गया। मुख्य सूचना आयुक्त यह तो चाहते हैं कि सरकार तंत्र में
व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करके सुशासन लाने के लिए इस कानून का फायदा आम आदमी
तक पहुंचे लेकिन सरकारी तंत्र के मकड़जाल में इस कानून के उलझ जाने से वह आहत
हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि यह महत्वपूर्ण कानून बने एक वर्ष बीत
गया, लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारें संसाधनों की कमी का रोना रोकर इसे असरदार
ढंग से लागू करने मे विफल रही । उन्होंने सरकारों पर इस मामले में उदासीनता और
निष्क्रियता बरतने का आरोप लगाया।
सूचनाधिकार-कानून का प्रभाव क्षेत्र विस्तृत करके विधायिका एवं न्यायपालिका को
भी इसके दायरे में लाने की बात कही गई । ये सारे सुझाव स्वागत योग्य इसलिए भी
हैं कि सूचना का अधिकार जितना जागरूक होगा, लोकतंत्र देश में उतना ही मजबूत
होता । शासन-प्रशासन में अधिकाधिक पारदर्शिता लाने में भी सूचना का अधिकार
कारगर होगा । यह सही है कि अपने आप में अधिक से अधिक शक्ति केन्द्रित करने को
व्यग्र नौकरशाही ने कुल मिलाकर इस कानून को पसंद नहीं किया, इसका स्वागत करना
और इसे लागू करने की तत्परता दिखाना तो दूर की बात है। यह भी बड़ा कारण है कि
सूचना का अधिकार कानून बने एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई बड़ा परिवर्तन
शासन-प्रशासन के दृष्टिकोण तथा कामकाज की शैली में दिखाई नई दिया। भ्रष्टाचार
लगभग यथावत शासन-प्रशासन के रगरग में पसरा हुआ है। परंतु यह कह देना भी सत्य से
आंखें चुराना होगा कि सूचना का अधिकार कानून निरर्थक सिद्ध हुआ है। वस्तुतः
आवश्यकता है उसे और गतिशील करने और जनता के आसानी से अधिकाधिक सूचनाएं प्रार्त
कर सकने में सक्षम बनाने की । यदि सूचना का अधिकार लागू होने में व्यवधान आ रहे
हैं तो शताब्दियों से चले आ रहे ढर्रे को देखते हुए ऐसा होना स्वाभाविक ता।
अरविंद केजरीवाल और विष्णु राजगढ़िया द्वारा लिखित पुस्तक
“सूचनाधिकार,
नया लोकतंत्र, नयी पत्रकारिता”
की भूमिका में प्रभाव खबर दैनिक के प्रधान संपादक हरिवंश ने झारखंड के विकास
आयुक्त टी नंदकुमार की दो वाक्यों की इस टिप्पणी में नौकरशाही की मानसिकता को
उजागर कर दिया है, “सूचना
का अधिकार लागू करने में बाधा नहीं आती तो मुझे ताज्जुब होता। नौकरशाही अब तक
जिस गोपनीयता कानून के परदों में काम करती रही है, उसे भूल कर अचानक इतनी
पारदर्शिता कहां से लाए ?”
अंध
व्यावसायिकता के इस निर्मम दौर में भी हरिवंश उन चैतन्य पत्रकारों में से हैं
जो मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता करते हैं। अपने समाचार-पत्र को एक आंदोलन की
भांति चलाते हैं। उनका मानना है “भारतीय
लोकतंत्र एक नए प्रयोग, एक नए दौर गुजर रहा है। यह दौर है जब भारतीय राजस्व
सेवा का एक अधिकारी सारी ठसन भूल कर निश्चित भविष्य ठुकरा कर दिल्ली की
झुग्गियों में यह बताता घूमता है कि किसी काम के लिए रिश्वत मत दो, सूचना
मांगो।”
यह व्यक्ति हैं अरविंद केजरीवाल, जिन्हें पिछले दिनों मैग्सेसे पुरस्कार से
सम्मानित किया गया। देश के भविष्य को लेकर जो नयी उम्मीद बंध रही है वह अरविंद
केजरावाल जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय तेजस्वी भारतीयों तथा समाज की
दृष्टि में परिवर्तन ला रहे संवेदनशील संगठनों के कारण ही बंध रही हैं। ये सभी
व्यक्ति एवं संगठन सूचनाधिकार, को सबल बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हरिवंश का
आशावाद कहता है “सूचनाधिकार
के सफल प्रयोगों ने नौकरशाही और राजनेता सहित सार्वजनिक हित से जुड़े समस्त
हिस्सों को स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकसेवक, जनप्रतिनिधि की दायित्वपूर्ण
कुर्सियों पर बैठने वाले अब गोपनीयता के परदे में सार्वजनिक हितों से खिलवाड़
नहीं कर सकते । इस एहसास ने सूचनाधिकार को पंगु करने की अप्रत्यक्ष कोशिशो के
स्पष्ट संकेत दिए हैं। हम अपने इस अधिकार के प्रति तत्काल सचेत नहीं हुए तो इसे
संकुचित करने की प्रत्यक्ष कोशिशें संभव हैं, जबकि अभी वक्त है हम इस नये
अधिकार का समुचित उपयोग करते हुए भारतीय लोकतंत्र को एक नया विस्तार देने के
लिए शासन व प्रशासन तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को अनिवार्य बनाते हुए
नागरिकों की सक्रियता सुनिश्चित करें। सूचनाधिकार ने इसे किस तरह संभव किया है,
इसे जानना उन समस्त लोगों के लिए जरूरी है, जो इस या उस रास्ते देश और समाज में
किसी बदलाव की आकांक्षा रखते हैं।”
अरविंद
केजरीवाल और विष्णु राजगढ़िया की पुस्तक सूचनाधिकार की उपयोगिता, उसके
क्रियान्वयन की प्रगति और संभावनाओं का सम्यक विवेचन करती है। लेखक द्वय ने
अपने विवेचन के साथ ही इस विषय पर कुछ महान विभूतियों के विचारों को उद्धत करके
पुस्तक की उपयोगिता बढ़ा दी है। पूरी पुस्तक में सावधानी के संकेत तो हैं परंतु
इसकी अंतरधारा आशावाद की है। अब सूचनाधिकार भारतीय नागरिकों के हाथों में एक
जबरदस्त हथियार है। अगर कार्यपालिका के पास शासकीय गुप्त बात अधिनियम है,
विधायिका के पास संसदीय विशेषधिकार है, व्यायपालिका के पास न्यायालय की अवमानना
का अधिकार है तो नागरिकों के पास भी एक अचूक हथियार आ गया है। इसका विवेकपूर्ण
तथा कुशलता के साथ उपयोग किया जाए तो देश को सच्चे लोकतंत्र और सुशासन की दिशा
में जे जाने का रास्ता खुल सकता है।
प्रश्न उठता
है कि सच्चा और नया लोकतंत्र क्या है ?
जहां एक बार जनता विधायिका के लिए अपने प्रतिनिधि चुनकर अगले चुनावों तक
प्रतीक्षा करने को विवश हों वहां जनता के पास कौन सी प्रभावी शक्ति है
?
वह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को नियंत्रित कैसे करें
?
क्या यह व्यवस्था संभव है कि प्रत्येक विधानसभा तथा लोकसभा सत्र के दौरान कुछ
दिन ऐसे निश्चित किए जाएं जब जनता को वहां पहुंचकर अपने नुमाइंदों से सीधे
प्रश्न करने का अधिकार मिल सके ?
वर्तमान संविधान में तो ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी लेखक द्वय का मानना
है कि सूचनाधिकार ने नागरिक को जनप्रतिनिधियों से अधिक शक्ति दिलाई है। पुस्तक
में यह विश्वास भी व्यक्त किया गया है कि नागरिकों के पास आज यह ताकत
जनप्रतिनिधियों से अधिक है । कोई विधायक-सांसद सवाल पूछना चाहे तो कोई जरूरी
नहीं कि वह स्वीकृत हो जाए, हुआ भी तो यह जरूरी नहीं कि सदन में उस पर चर्चा
हो, हुई भी तो जरूरी नहीं कि जवाब मिले। एक बार मामला खत्म, तो फिर सत्र का
इंतजार । एक दिन में कोई संसाद, विधायक कितने सवाल पूछ सकेगा, इसकी भी सीमा है।
यह सूचनाधिकार
का एक अति आशावादी नजरिया कहा जा सकता है, परंतु जिन तथ्यों को इस पुस्तक में
संकलित किया गया है वे गवाही देते हैं कि एक सकारात्मक परिवर्तन समाज में शुरू
हो चुका है। लेखकों को इस परिवर्तन में नये लोकतंत्र की आमद की आहट सुनाई दे
रही है। सरकार और नौकरशाही की कमजोरियों को सूचनाधिकार के माध्यम से उजागर किए
जाने के अनेक दृष्टांत सामने रखे गए हैं। उम्मीद की जा रही है कि इससे मीडिया
का चरित्र भी प्रभावित होगा। प्रश्न उठाया गया है कि सूचनाधिकार कानून का ही
प्रभाव है कि “सरकारी
अधिकारियों को अब तक पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती थी। अब द्वितीय
प्रशासनिक आयोग की सिफारिश है कि उन्हें गोपनीयता नहीं, बल्कि पारदर्शिता की
शपथ दिलाई जाए, एकदम एक सौ अस्सी डिग्री उलटकर इस फर्क को समझ लेना नयी
पत्रकारिता का व्यापक आधार उपलब्ध कराता है।”
सूचनाधिकार के
उतार-चढ़ाव के बीच स्वप्न संजोया जा रहा है इससे प्रेरित ओर इसे पोषित करने को
कृतसंकल्प पत्रकारिता के नये शिखर रचने का । इस पुस्तक में दी गई राष्ट्रपति
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की इन पंक्तियों से इस आलेख का समापन करना चाहूंगा-
छोटे सपने
देखना अपराध है
ग्रासरूट
पत्रकारों का सपना एक अरब लोगों के
सरोकारों में
जुड़ा हो
मीडिया का
असली मिशन यह हो कि
जब खुशी के
आंसू हों तो सुखद संदेश देशभर में पहुंचाये
और जब कड़वे
आंसू हों तो आलोचनात्मक
ढंग से
विश्लेषण करके
संदेश को
संभावित हल के साथ फैलाये।
रमेश नैयर
: वरिष्ठ
पत्रकार एवं संपादक, दैनिक
भास्कर,
संडे आब्जर्वर (हिन्दी)
ट्रिब्यून सहित
कई पत्रों में महत्वपूर्ण
पदों पर
रहे। संप्रति छत्तीसगढ़ हिन्दी
ग्रंथ
अकादमी के संचालक हैं।
संपर्क : समता
कालोनी, रायपुर (छत्तीसगढ़)


