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मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

सूचना का आधिकार : भ्रष्टाचार पर प्रहार

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 राकेश शर्मा निशीथ

 

संविधान ने भारत के नागिरिकों को मौलिक आधिकार दिए परंतु थे सूचना के आधिकार के अभाव में अधिक कारगर नहीं हो पाए। पिछले पचास सालों में भारत के तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार तता समाज के विभिन्न वर्गों के लोक यह मांग करते आ रहे थे कि उन्हें सरकारी सूचना मिलने का आधिकार होना चाहिए। औपनिवेशिक विरासत में मिल सकरारी गोपनीयता कानून की जगह सूचना का आधिकार (राइट टू इन्फॉरिमेशन) पाने के लिए लगभग 50 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा। मोटे तौर पर देखें तो सूचना का आधिकार के लिए कभी कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ। हां, मजदूर किसान शक्ति संगठन एक चर्चा लगातार कर रहा था। इस संगठन के अंतर्गत मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरूणा रॉय राजस्थान के देवडूगरी इलाके में अपना आंदोलन चला रही थी। जिसका मूलमंत्र था जानकारी ही लोकतंत्र का आधार है। 19922-93 में सूचना पाने के लिए पहली सभा की गई। अप्रैल, 1996 में व्यावर में इसी मांग को लेकर चालीस दिन का धरना दिया गया, जिसने सारे देश का ध्यान इस तरफ खींचा। राजस्थान सरकार पर दबाव बढ़ता गया और वर्ष 2000 में राजस्थान में सूचना का अधिकार कानून बना । इसके बाद गोवा और तमिलनाडु में भी सूचना का अधिकार कानून बना और देखते ही देखते देश के अधिकांश राज्यों में सूचना का आधिकार कानून को लागू कर दिया गया।

 

आवश्यकता : शासन में भ्रष्टाचार पनपने की वजह वह गोपनीयता होती है, जो कई दफे गैर-जरूरी कारणों से बरती जाती है। देश की संप्रभुता, सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित तता विदेशों से रिश्तों के मद्देनजर कई बार सूचना छिपाना आवश्यक होता है, पर अनुभव यह किया जा रहा था कि गोपनीयता की आड़ में जहां प्रशासनिक कामकाज में बरती जा रही अनियमिताओं पर पर्दा डालने की कोशिश हुई। वहीं दूसरी ओर सूचना छिपाकर लोगों को उत्पीड़ित किया गया। इससे सरकारी तंत्र और जनता के भी खाई दिनों दिन चौड़ी होती जा रही थी। इस खाई को पाटने का काम सूचना का आधिकार करेगा, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

 

विकास का फायदा सभी वर्गों के लोगों तक पहुंचेगा, जहां तक हो सके भ्रष्टाचार का अंत होगा और यह कानून आम लोगों को शासन में भागीदारी दिलाएगा। भ्रष्टाचार को देशद्रोह के संदर्भ में देखा जाना चाहिए । देशद्रोह के विषय में सिसरो ने कहा ता कि कोई देश अपने मूर्खों के बावजूद बना सर सकता है, यहां तक कि महत्वाकांक्षियों के बावजूद भी; लेकिन वह भीतर के देशद्रोह को नहीं झेल सकता। दरवाजे पार खड़ा दुश्मन कम खतरनाक है, क्योंकि उसे पहचाना जा सकता है; लेकिन गद्दार तो दरवाजे के भीतर ही लोगों के बीच मौजूद होता है।

 

कानून से बाहर : कुछ लोग सूचना के आधिकार का गलत फायदा भी उठा सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सूचना का आधिकार कानून की धारा 24 के अनुच्छेद एक में राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े विभागों को जैसे खुफिया विभाग, संवेदनशील विभाग, वैज्ञानिक शोध विभाग, परमाणु एवं उपग्रह विभाग तथा ऐसे विभागों की सूचनाओं को, जिनसे देश को नुकसान हो सकता है; इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। इसके अंतर्गत आईबी, रॉ, एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट, असम राइफल्स, सीआईएसएफ और एनएसजी जैसी 18 खुफिया या सुरक्षा एजेसियों को छूट दी गई है। इस कानून की धारा 24 अनुच्छेद दो में सरकार को गजट घोषणा के जरिए इस सूची में फेरबदल का अधिकार दिया गया है।

 

प्रावधान : वर्ष 2002 में राजग सरकार ने भी सूचना की आजादी का एक विधेयक पारित करवाया था परंतु वह अधिसूचित न हो पाने के कारण कानून नहीं बन सका। नए सूचना के आधिकार में सूचना पाने का आधिकार हर नागरिक को दिया गया है, जबकि 2002 में आए विधेयक में सिर्फ सूचना लेने की स्वतंत्रता थी । मांगी गई सूचना आधिकारी देते हैं या नहीं यह उनके ऊपर ता परंतु इस कानून में यदि कोई आधिकारी सूचना देने में आना-कानी करता है तो उस पर 25,000 हजार रुपये जुर्माना और उसकी चरित्र पंजिका में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज हो जाएगी।

 

पृष्ठभूमि : अमरीका यह दावा करता है कि सूचना के आधिकार का विचार उसकी देन है। सच्चाई यह है कि स्वीडन की सरकार ने वर्ष 1766 में ही यह कानून पास कर दिया था। विश्व में भारत सहित 55 देशों में सूचना के आधिकार कानून बन चुका है। विभिन्न देशों द्वारा बनाए गए सूचना के आधिकार कानूनों का अध्ययन करके ही भारत में सूचना के आधिकार विधेयक तैयार किया गया था और इसमें भी 150 संशोधन हुए थे। इतने संशोधन सायद ही पहले किसी विधेयक में हुए होंगे। नये सूचना का अधिकार अधिनियम में मांगी गई सूचना देने में कोताही करने वाले अधिकारियों को कड़ा दंड देने, निश्चित समय में जानकारियां प्रदान करने, सूचना हासिल करने की प्रक्रिया को सस्ता व सरल बनाने तता एक केंद्रीय सूचना आयोग बनाने आदि का प्रावधान किया गया है।

 

लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों को पारदर्शी रूप से जानकारी देना जरूरी माना गया है। सूचना देने से न सिर्फ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा बल्कि सरकार और उसके तमाम घटकों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सूचना आयुक्त के रूप में एक संवैधानिक निकाय का गठन किया गया। जिस प्रकार चुनाव आयुक्त और सतर्कता आयुक्त स्वायत्तपूर्ण भूमिका निभाते हैं, ऐसी भूमिका सूचना आयुक्त की भी होगी। सूचना आयुक्त पर आरटीआई (राईट टू इन्फॉरमेशन) के प्रावधानों को कारगर बनाने की जिम्मेदारी तय की गई है। जम्मू-कश्मीर कैडर के 1968 बैच के आइएएस अधिकारी बजाहत हबीबुल्लाह पंचायती राज सचिव के पद से रिटायर होने के बाद वन गठित सूचना आयोग के पहले अध्यक्ष बनाए गए हैं। 

 

सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत आम व्यक्ति भी किसी भी मंत्री या अफसर की फाइलें, रिकार्ड, टिप्पणी, दस्तावेज, आदेश, स्मरण पत्र, विश्लेषण अनुबंध, लॉग बुक आदि को देख सकेगा और उनकी प्रमाणित प्रतिलिपि भी प्राप्त कर सकेगा । उसे केवल फोटोकॉपी आदि का खर्च देना होगा । जो व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे हैं, उन्हें सूचना पाने के लिए न्यूनतम खर्च भी नहीं देना होगा । यह व्यवस्था केंद्र, राज्य, जिला एवं पंचायत तक की समस्त सरकारी संस्थाओं को भी इसके घेरे में आना होगा जो सरकारी अनुदानों से चलती हैं । जो अधिकारी सूचना नहीं देगा या गलत सूचना देगा उस पर जुर्माना होगा ।

 

विधेयक में पहले सजा का प्रावधान ता अब उसे हटा दिया गया है । यदि जीवन-मृत्यु या  व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला हो तो सूचना 48 घंटे में ही देना होगी । मांगी गई सूचना ठीक तरह से दी जाएं और शीघ्र दी जाएं यह देखने के लिए केंद्र और राज्यों में सूचना आयोग बनाए जाएंगे । इस कानून का सबसे अधिक फायदा पत्रकारों को मिलेगा जो सूचना पाने के लिए दर-दर भटकते रहते थे । अब उन्हें आधिकारिक रुप से सूचना लेने का अधिकार प्राप्त हो गया है । इससे आम व्यक्ति किसी भी परियोजना में क्या हो रहा है, किस कंपनी को ठेका मिल रहा; किसको लाभ और किसको हानि हो रही है सब पता लगा लेगा । देश में अनेक एनजीओ बने हुए हैं जो  सरकार से अनुदान लेते हैं और फर्जी कागजों पर काम दिखाकर पैसा ऐंठ लेते हैं । अब इन एनजीओ को भी सरकार इस दायरे में ले आई है । किस एनजीओ में पैसा कैसे और वहां खर्च हो रहा है इसका हिसाब-किताब अब हर आदमी प्राप्त कर सकेगा ।

 

सुझावः सूचना का अधिकार कानून और भी सुधारा जाए । इसमें यह संशोधन किया जाए कि एक तयशुदा समय के बाद सभी सरकारी फाइलें जनता के लिए खोल दी जाएंगी । सरकारी सूचना को आम जनता तक पहुंचाने के लिए यह भी जरुरी हो गया है कि सारे सरकारी दफ्तरों का कंप्यूटरीकरण जितना जल्द हो सके किया जाए । इससे आसानी से सूचनाएं मुहैय्या कराई जा सकेंगी ।

 

सूचना नहीं देने, देरी करने या उसे नष्ट करने के एवज में उचित दंड की व्यवस्था नहीं की गई है । देरी करने पर प्रतिदिन 250 रुपये और ज्यादा से ज्यादा 25,000 रुपये की सजा रखी गई है । यह मामूली दंड है । इससे संबधित प्रावधानों में अभी भी संशोधन की गुंजाइश है । जनता को किस तरह सूचना दी जाये, इसे लेकर सरकारी कर्मचारी या अधिकारियों को किसी तरह का दिशा-निर्देश या प्रशिक्षण नहीं दिया गया है ।

 

 

सूचना का अधिकार से कैसे लाभ उठाया जाये इस संदर्भ में नागरिकों को कोई जानकारी नहीं दी गई है । इस कारण केंद्र ने राज्यों को तत्काल शैक्षणिक कार्यक्रम शुरु करने का निर्देश दिया है । सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के आदेश दिए गए हैं, ताकि जनता को समय पर सही सूचना दी जा सके । सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम, पता आदि प्रकाशित करना राज्य सरकारों के लिए अनिवार्य बनाया गया है ।

 

सूचना के अधिकार का कानून प्रशासन की गुप्त गतिविधियों और छल कपट में लिपटे फैसलों को उजागर करने का कारगर हथियार बन सकता है । जिन देशों में भी नागरिक को सूचना का अधिकार प्राप्त है वहां प्रशासन की गंदगी साफ करने में इसकी अहम भूमिका रही है । जान बुझकर पैदा किए जाने वाले कुंहासे पर सूचना का अधिकार कुछ प्रहार कर सकेगा, इसी कुछ आस तो अब बंधती नजर आ रही है ।

 

(लेखक पत्र सूचना कार्यालय, मुख्यालय में वैयक्तिक सहायक हैं)

 

 

 

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