Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

 

कानून से क्रांति असंभव

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रघु ठाकुर

 

सूचना  के अधिकार का कानून संसद में अभी कुछ समय पूर्व ही पारित हुआ। जब यह कानून पारित हुआ, तब यूपीए सरकार ने बहुत जोर-शोर से सूचना के अधिकार के कानून  को पारित कराने के अपने कदम की चर्चा की थी और यूपीए की चेयर पर्सन सोनिया गांधी का अभिनंदन करते हुए कहा गया था कि उन्होंने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किये गये अपने वायदे को पूरा कर दिया है।

 

बेशक सूचना के अधिकार कानून के पक्ष में वातावरण बनाने में श्रीमती अरूणा राय, कतिपय स्वयंसेवी संगठनों एवं सर्वोदयी संगठनों की प्रमुख भूमिका रही है। देश के पैमाने पर आम जनमत भले ही उस समय सूचना के अधिकार कानून का महत्व न समझा हो या उस तक इसकी जानकारी भी न पहुंची हो, पर इस सूचना के अधिकार अभियान में उस समय देश की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी की प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति हासिल करना भी एक भी महत्वपूर्ण काम था। इसी पृष्ठभूमि के कारण केन्द्र की एनडीए सरकार बदलने के कारण जब यूपीए की सरकार बनी तब बतौर कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने इस मुद्दे को यूपीए के कॉमन मिनीमम प्रोग्राम में शामिल कराने की ठोस पहल की और कालान्तर में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष के नाते उन्होंने भारत सरकार के स्तर पर भी कानून बनाने की पहल की । सूचना के अधिकार को कानून बनाते वक्त काफी गंभीरता से विचार किया गया था। इस कानून में एक ओर ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे एक आम अशिक्षित व्यक्ति भी इस कानून का इस्तेमाल कर सके तो दूसरी ओर गोपनीयता के नाम पर शासकीय अधिकारियों के निरंकुश और घमंडी सोच पर भी अंकुश लगाने का प्रावधान है। पहले प्रशासन तंत्र हर चीज को बंद कमरों तक सीमित रख अपने उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाथा था। मुझे ऐसी एक-दो घटनाएं याद हैं, जो प्रशासन तंत्र का निरंकुश चेहरा उजागर करती हैं।

 

पहली घटना है 1980 के दशक की, जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह थे। उन्होंने पिछड़े वर्ग के लोगों को आरश्रण और स्थितियों के संबंध में जांच कर रपट देने के संबंध में एक एक आयोग का गठन किया था। उस आयोग का नाम रामजी महाजन आयोग था। इस आयोग की रपट आने के बाद सरकार ने यद्यपि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को लागू किया, परंतु वह आरश्रण रपट में सुनाई गई प्रतिशत से कम थे तथा कतिपय अन्य भी ऐसी सिफारिशें आयोग की थी, जिन पर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाये थे।  बाद में मैं इस संबंध में समाज कल्याण मंत्रालय के उपसचिव से मिला और उनके सुझाव पर मैंने आयोग की रपट को प्राप्त करने के लिए तत्कालीन सचिव ओपी मेहरा (जो उस जमाने में वामंपथियों के बड़े प्रिय माने जाते थे) से मिला। उन्होंने मेरा पत्र लेकर मुझ आवश्वस्त किया कि वे मुझे आयोग की रपट उपलब्ध करा देंगे, परंतु कुछ दिनों बाद मुझे उनके कार्यालय से पत्र प्राप्त हुआ कि रपट उपलब्ध कराना संभव नहीं है क्योंकि वह गोपनीय है। मैंने उन्हें पत्र का उत्तर लिखकर कहा कि

 

1. आपने मुझसे बायदा किया था।

2. आयोग की रपट तैयार होने पर जनथा का पैसा खर्च हुआ है। इसका संबंध देश की सुरक्षा से नहीं है। फिर गोपनीयता क्यों ?

3. भारत सरकार ने पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए काका कालेलकर कमीशन बनाया था, जिसकी रपट को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया गया था। यद्यपि सरकार ने इस रपट को अस्वीकृत कर दिया था, परंतु भारत सरकार ने कम से कम काला कालेलकर कमीशन को गोपनीय नहीं किया था। इस प्रकार मंडल कमीशन 1978-79 में बना ता यद्यपि वह लगभग 11 वर्ष के बाद 1990 में जाकर लागू हुआ, परंतु मंडल कमीशन रिपोर्ट को भारत सरकार ने कुछ समय के बाद प्रकाशित किया था। उसे गोपनीय दस्तावेज नहीं माना गया। लेकिन, उस पत्र का कोई उत्तर श्री मेहरा ने नहीं दिया ।

 

एक अन्य घटना में मैंने सांसदों व विधायकों की पेंशन का सैद्धांतिक विरोध किया था और इस पेंशन के विरोध में न्यायपालिका में याचिका दायर की थी। इस संबंध में जन अभियान भी चलाया गया था । मैंने म.प्र. विधानसभा सचिवालय से प्रश्न पूछा कि पूर्व विधायकों की पेंशन पर और उनके यात्रा टिकटों पर कितना व्यय होना अनुमानित है ? उस पर से विधानसभा के सचिव महोदय ने मुझसे पूछा कि यह जानकारी आप क्यों चाहते हैं ? मैंने उन्हें उत्तर दिया कि मैं आम जनता को इस मुद्दे के संबंध में तथ्य परक जानकारी देना चाहता हूं, पूर्व विधायकों को जो पेंशन व रेलवे कूपन मिलता है, उसका विरोध करने के लिए यह जानकारी चाहता हूं। उसके बाद मुझे विधानसभा सचिवालय की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला।

 

सूचना के अधिकार के कानून में यह अच्छा प्रावधान यह है कि अधिकारी सूचना देने के लिए बाध्य है, वह भी एक निश्चित समय सीमा के अन्दर। उसे यह अधिकार नहीं है कि वह जानकारी मांगने वाले से जानकारी मांगने का कारण पूछ सके । सूचना के अधिकार के कानून में एक यह भी अच्छा प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति अपने प्रश्न को ठीक से नहीं उठा सकता, पर्याप्त शिक्षित नहीं है या जिस आधिकारी से जानकारी के लिए उसने सवाल भेजा है, वह आधिकारी सक्षम नहीं है तो उन अधिकारियों पर ही दायित्व डाला गया है कि संबंधित प्रश्नकर्ता को मार्गदर्शित करें और  वैधानिक जरूरतों  की पूर्ति करने में सहयोग करें । इस प्रावधानों से इस कानून का इस्तेमाल सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है। इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद नीचे के स्तर पर बहुत सारी छोटी-छोटी समस्याओं का हल निकालने को आधिकारी बाध्य हुए हैं तता सूचना और उत्तरदायित्व के इस बंधन में नीचे के भष्टाचार पर भी थोड़ा सा बंधन में नीचे के भ्रष्टाचार पर भी थोड़ा सा बंधन लगा है। यद्यपि मैं ऐसा नहीं मानता हूं कि इस कानून से कोई क्रांति हो जाएगी या सारा भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा क्योंकि क्रांति तो अंततः जनमानस के आमूल परिवर्तन से ही होगी। हां, गहरे अंधकार में फंसे व्यक्ति के लिए कम से कम एक हल्की सी रोशनी की किरण यह कानून तो जरूर है।

 

इस कानून में एक अच्छा प्रावधान फाइल नोटिंग की सूचना और प्रति पाने का भी आधिकार है। इससे जिम्मेवार आधिकारियों का दायित्व बोध होता है और प्रशासनिक दस्तावेजों में कहां गड़बड़ियां चली हैं, इसका भी खुलासा होता है। लेकिन इस प्रावधान से देश के निरंकुश नौकरशाह इतने बेचैन हैं कि इन्होंने फाइल नोटिंग की प्रतियां उपल्बध कराने के प्रावधान को हटाने के लिए प्रधानमंत्री और सरकार को लगभग तैयार ही कर लिया था, खबर यहां तक है कि सरकार की ओर से मंत्रिमंण्डल में कानून संशोधन का प्रस्ताव पेश होने की तैयारी में ता परन्तु इसी भी इसकी सूचना मिलने पर उन सभी लोगों ने सूचना के आधिकार के कानून के पक्ष में खड़े होकर देश में अभियान शुरू कर दिया गया है। यह प्रस्ताव देश के प्रथम नौकरशाह मनमोहन सिंह और उनके नौकरशाहों के दिमाग में दबा पड़ा है तता समय पाते ही सांप बिल से बाहर आ जाएगा। सो, जागरुक लोगों को बिल के छिद्रों को पूर्णतः बंद करना होगा तभी यह कानून बच सकेगा अन्यता खतरा अभी टला नहीं है।

 

(लेखक लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

 

 

 

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