जागरूकता से मिलेगी सार्थकता
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पवित्र श्रीवास्तव
भारतीय
संविधान ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफल बनाने के लिए हमें अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया है। गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुए देश के
लिए यह बात बहुत अधिक मायने रखती है क्योंकि व्यक्ति में पैदा हुई उदासीनता को
दूर करने में यह अधिकार एक महत्वपूर्ण अस्त्र रहा है। संविधान में हमें अपनी
बात रखने का अधिकार तो दे दिया परंतु यह आजादी तब तक बेमानी है जब हम आम नागरिक
को सब कुछ जानने का अधिकार न हो।
राष्टीय स्तर
पर सूचना अधिकार लागू करने वाला भारत 61 वां देश हो गया है। वर्ष 2002 में
सूचना का अधिकार संपूर्ण भारत में लागू करने का प्रयत्न किया गया ता, परंतु उस
समय इसे सफलता नहीं मिल पायी । मई, 2005 में इस पर विधेयक सदन में रोका गया जो
11 मई, 2005 को लोकसभा में व 13मई, 2005 राज्य में पारित हो गया । 16 जुलाई,
2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के पश्चात यह कानून बन गया और इसे 12 अक्टूबर
2005 से सारे देश में लागू कर दिया गया । इस कानून को लेकर देशव्यापी प्रसन्नता
की लहर चल पड़ी। हालांकि जम्मू कश्मीर राज्य व कुछ विभागों को इससे पृथक रखा
गया है। फिर भी इस कानून से आम नागरिक की व्यापक अधिकार व अवसर प्राप्त हुए है।
सूचना के अधिकार में शामिल विभागों के आवश्यक जानकारी पाप्त करने के लिए आवेदक
10 रुपये का साधारण शुल्क जमा कर विशेष कर्तव्यस्थ आधिकारी से 30 दिनों के भीतर
जानकारी प्राप्त कर सकता है। यदि कर्तव्यस्थ अधिकारी आवेदन को निरस्त करता है
तो आवेदक को पुनः 30 दिनों के भीतर अपील करने का अधिकार है। यहां से भी
संतोषप्रद उत्तर न मिलने की स्थिति में आवेदन 90 दिनों के भीतर सूचना आयोग में
अपील कर सकता है। आवेदन का निपटारा 30 दिन के भीतर न करने की स्थिति जिम्मेदार
आधिकारी को 250 रूपये प्रतिदिन से लेकर 25 हजार रूपये तक आर्थिक दण्ड दिया जा
सकता है। गरीभी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों को निःशुल्क आवेदन
का अधिकार प्रदान किया गया है।
सूचना के
अधिकार की उत्पत्ति के संबंध में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का ही एक हिस्सा है। संविधान के अनुच्छेद 19 में इसका विस्तारपूर्वक
उल्लेख किया गया है। लोकतात्रिक व्यवस्था में यदि कोई सरकार जनभागीदारी का दावा
करती है तो प्रत्येक नागरिक को यह हक है कि उसे जानकारी मिले । सरकार व इसके
निकाय अपना काम सफलतापूर्वक कर रहे हैं या नहीं, ऐसे मसलों पर आम आदमी अपनी
बेबाक राय तभी व्यक्त कर सकता है जब उसके पास इसके संबंध में सूचना व जानकारी
उपलब्ध हो । सूचना का अधिकार लागू करने की जो व्यवस्था बन रही है इससे व्यवस्था
या सेटअप स्तर पर सरकार से सेवानिवृत्त नौकरशाह शामिल हैं। नौकरशाही व्यवस्था
का भारतीय अनुभव यही रहा है कि इसमें महत्वपूर्ण कानून सिर्फ कागजी कानून बनकर
रह गये हैं, और आम आदमी इसके लाभ से वंचित रहा है। नौकरशाह अपने ढंग से काम
करते हैं और किसी भी चीज का जो ढांचा तैयार करते हैं वह जटिल होता है एवं उसमें
उन्हीं की पकड़ होती है। इस संबंध में एक पूर्व उदाहरण महत्वपूर्ण है कि पचास
के दशक में जब देश में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की बात हुई तो एक वेटेनरी कमीशन
बना दिया गया। इसका अध्यक्ष एक वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त हुआ। उसने अपने तरीके से
दुग्ध उत्पादन बढ़ाने का रास्ता निकाला, परंतु इसमें वर्गीस कुरियन के जुड़ने
से इस विचार को एक नया आयाम मिला । इसलिए ऐसा लगता है कि सूचना के अधिकार का
लाभ आम आदमी को तभी मिल पाएगा जब इसमें कुरियन व स्वामीनाथन जैसे लोगों को
जोड़ा जाए। सूचना का अधिकार लागू होने के पश्चात आम नागरिक को क्या मिला, उससे
इस कानून के लागू होने का कितना उत्साह है इसका कोई जवाब अभी हमारे पास नहीं
है। देश में शिक्षा की जो स्थिति है, आय की जो असमानता है, दो वक्त की रोटी के
लिए जो मशक्कत है, शायद इसने आम आदमी को इस अधिकार के बारे में सोचने का वक्त
ही नहीं दिया । ऐसा प्रतीत होता है कि सूचना के अधिकार से वर्तमान में तो उन
लोगों को एक ऐसा हथियार मिल गया है जिसके दम पर वे अपने हक में जानकारी निकलवा
सकते हैं या किसी की कुर्सी हिला सकते हैं । सूचना के अधिकार का उपयोग सामाजिक
परिवर्तन में या समग्र विकास के लिए ही, ऐसी कोई भी सकारात्मक सोच किसी के पास
नहीं है।
मध्यप्रदेश की
राजधानी भोपाल में सूचना के अधिकार की प्रभावशीलता का अध्ययन एक लघु शोध कार्य
के माध्यम से किया गया। सूचना का अधिकार लागू होने के 50 दिनों के पश्चात शहर
के प्रमुख शासकीय निकायों से यह जानकारी ली गई कि सूचना का अधिकार के तहत अब तक
कितने मामले विभागों में आये एवं उनके निपटान की स्थिति क्या है
?
सूचना का
अधिकार कानून के रूप में लागू होने के 50 दिनों के पश्चात (एक अध्ययन अनुसार)आम
नागरिक की उदासीनता ही बताती है। इस संबंध में पहला महत्वपूर्ण पहलू यह है कि
कानून के तहत जानकारी मांगने वालों में अधिकांश आवेदन उन लोगों ने दिए जो या तो
पहले से ही व्यवस्था से परेशान थे या वे कर्मचारी संघों, राजनैतिक कार्यकलापों
आदि से जुड़े थे। दूसरा पहलू यह है कि आम आदमी ने इस कानून पर भले ही उदासीनता
दिखाई हो परंतु सरकारी विभागों ने अपना काम तेजी से निपटाया। संभवतः यह अधिकार
के कानूनी रूप से लेने के कारण हुआ है। तीसरा पहलू यह है कि स्वास्थ्य एवं
शिक्षा जैसे मुद्दों पर मांगी गयी सूचनाओं की संख्या नगण्य है जबकि यह व्यक्ति
व समाज के लिए अनिवार्यता है।
इस स्थिति को
जान लेने के पश्चात ऐसा लगता है कि सूचना के अधिकार की अहमियत अभी आम आदमी के
लिए उतनी नहीं है जितनी दिखाई दे रही है। दिन प्रतिदिन की समस्याओं, बेरोजगारी,
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद की जड़े व्यक्ति के दिमाग में इतनी गहरी हो चली है कि
वह इस सच्चाई को मानने को ही तैयार नहीं है कि यह कानून व्यक्ति को तभी मिल
पाएगा जबकि सही मायनों में इसके लिए हरितक्रांति जैसे प्रयास हों।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता
विश्वविद्यालय,
भोपाल के जनसंपर्क विभाग में
प्रवक्ता हैं)


