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मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

उठते हैं अनेक सवाल

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बसंत कुमार तिवारी

 

सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति ने 15 जून 2005 को स्वीकृति प्रदान की और उसके बाद विभिन्न राज्यों ने अपने राज्य में सूचना के अधिकार आयोग का गठन किया।

 

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अनुसार अधिनियम का मूल मन्तव्य था, लोकतांत्रिक शासन में सरकार और शासकीय मशीनरी के क्रियाकलापों में पारर्शिता बने। अधिनियम के तरह ऐसी व्यवस्था की गई है कि कोई भी नागरिक लोक अधिकारी और प्रशासन के कार्यकलापों की जरूरी जानकारी पा सके। अधिनियम के प्रावधानों में प्रशासन और निर्वाचित सरकार के प्रति विश्वास और समाज की भागीदारी सुनिश्चित करना था।

 

सूचना के अधिकार के अधिनियम से प्रारंभ में यह लगा कि सरकार की मंशा सबको समान व्याय दिलाने, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन उपलब्ध कराना है। अब यह धारणा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी है। पहले तो इस कारण कि लगभग हर राज्य में आयोगों पर अफसरशाही काबिज हो चली है। सेवानिवृत हो रहे अधिकारियों ने अपने पूर्नवास का प्रबंध पूरा लिया और इस अधिकार का भी वहीं हश्र नजर आया, जो अन्य शासकीय विभागों का अनुभव रहा है। प्रावधान किया गया था कि इस संवैधानिक पद पर सार्वजनिक और न्यायायिक क्षेत्र के स्वच्छ छवि के लोगों की नियुक्ति की जाए पर ऐसा करने से राज्य सरकारों के सामने टकराव का संकट पैदा हो सकता ता। सरकार कितनी भी ईमानदार हो पर वह अपनी खामियों पर हमेशा परदा डाले रखना चाहती है।सेवानिवृत्त नौकरशाह किसी भी पद पर सरकार की वैसी ही सेवा करता है, जैसा अपने सेवाकाल में । उसका सेवाभाव ही उसके पुर्नवास का आधार बनता है।

 

धारणा समाप्त होने का दूसरा कारण डेढ़ वर्ष के अनुभव का यह रहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम में कई खामियां हैं। कोई व्यक्ति क्यों जानकारी चाहता है, यह स्पष्ट नहीं होने से इस अधिकार का दुरुपयोग शुरु से ही प्रारंभ हो गया। भ्रष्ट ठेकेदार, भ्रष्ट अफसर और सार्वजनिक जीवन के निहित स्वार्थ चाहने वाले लोगों ने इस अधिकार का उपयोग ब्लेकमेलिंग करने तक करना शुरू किया । अधिनियम बनाने वालों ने सोचा ही नहीं था कि सूचना देने में क्या कठिनाई आएगी और कितना आर्थिक भार पडे़गा प्रारंभ में ही छत्तीसगढ़ ने एक उदाहरण पेश किया। 

 

बस्तर के एक किसान ने धान खरीदी की पूरी जानकारी मांगी। संबंधित अधिकारी ने जब जानकारी के दस्तावेज तैयार किए तब फोटोकापी कराने पर एक लाख 82 हजार रुपये का खर्च आया। नियम के अनुसार आंशिक शुल्क देकर जानकारी प्राप्त की जा सकती थी। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि ये राशि कौन खर्च करे ? शासन ने हाथ खड़े कर लिये और आदेश जारी कियागया कि एक लाख 82 हजार रुपये आवेदन सरकारी खजाने में जमा कराए। यह सम्मन नहीं हुआ क्योंकि एक साधारण आदमी इतना व्यय करके क्या जानकारी पा लेगा ? क्या स्पष्ट  नहीं है कि इस व्यय को किसके खाते में डाला गया ? प्रावधान में संशोधन हुआ और आंशिक फीस की राशि 100 रुपये की गई और अवलोकन के लिए एक घंटे का समय दिया गया। एक घंटे के समय के बाद प्रति 15 मिनट पर 25 रुपये की दर पर राशि का प्रावधान किया गया। कह नहीं सकते कि इन प्रावधानों के अंर्तगत इससे लोग सूचना के अधिकार का उपयोग कर रहे हैं। यह भी स्पष्ट हो गया कि सूचना का अधिकार अधिनियम की सामान्य आदमी के लिए कोई उपयोगिता नहीं है। दरअसल इसकी जरूरत तो अन्याय और कुशासन के खिलाफ अपना हक मांगने के लिए थी पर इस कानून के सामने आम आदमी की स्थिति वैसी ही है, जैसी अन्य कानूनों के सामने । सूचना का अधिकार आयोग तभी सक्रिय होता है, जब उनसे कोई सूचना मांगे अन्यता अन्य शासकीय विभागों की तरह वे फाइलें बनाते रहते हैं। बताया जाता है कि आयोग हर नौकरशाह को समझा रहा है कि उसकी कानूनी जिम्मेदारी है कि वह लोगों की आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराए। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार विभाग कानून के प्रावधानों और उत्तरदायित्वों से कहीं जायादा अधिकारीगण अपने बचने के रास्तों का अध्ययन कर रहे हैं।

 

इस प्रावधान की अनेक समस्याएं है और उपरिहना भी है मगर परम्परागत स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था उसकी उपरिहना को स्थापित नहीं कर पा रही है।अधिनियम को प्रभावहीन बनाने यानी सूचना नहीं देने वाले अधिकारी को दंडित करने के मामले भी सामने आए हैं पर वे भी गोल-मटोल ही लगते हैं।

 

भारतीय संविधान में विधायिका को आवश्यकतानुसार नए कानून बनाने और आवश्यकता पड़ने पर संविधान संशोधन का अधिकार है। अब तक कई संशोधन हुए और कई नए कानून भी बने। विडंबना यह रही कि न्यायोचित शासन प्रणाली विकसित नहीं हो पाई। सार्वजनिक जीवन की शुद्धता भी खत्म होती जा रही है। सूचना के अधिकार कानून की मंशा सही और स्वच्छ है पर कठिनाई वह कि हमारी नीयत वैसी नहीं है। शोषित तो शोषित ही है, शोषणकर्त्ता सुखी और संपन्न हो रहा है। सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता से ही इस अधिकार का भविष्य निर्भर है।

 

बसंत कुमार तिवारी  छत्तीसगढ़ के वरिष्ठतम पत्रकारों  में से एक । देशबंधु के संपादक रहे । कई पुस्तकें प्रकाशित ।  इन  दोनों रायपुर में रहकर स्वतंत्र लेखन।  संपर्क : 93 विवेकानंद नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

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