Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

 

जागरुक नागरिक तैयार करने की जरुरत

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अशोक चतुर्वेदी

 

दारीकरण और वैश्वीकरण के इस नये दौर में जानकारी को लोग ताकत बनाने में जुटे  हुए हैं । इनका कहना है कि जो जितना सूचना-सम्पन्न है, वह उतना ही ताकतवर है । जनतंत्र में असल ताकत नागरिक या मतदाता के पास होनी चाहिए, जिससे वह सही नीतियों और  नेताओं को चुन सके । यही वजह है कि सूचना के अधिकार के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा थाः सरकार जानकारी की इस ताकत को कमजोरों के साथ बांटना चाहती है । अटल जी की इस सदिच्छा का सम्मान सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 को लागू करने के दो-ढाई बरस बीत जाने पर भी कहां तक हो पाया है, यह शोध का विषय है । बहरहाल एक बार फिर रेखांकित हो चुका है जो कानून पूरी तैयारी और संकल्प शक्ति के बिना लाए जाते हैं, उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिलना और उनके द्वारा अभीष्ट की पूर्ति कर पाना एकदम अलहदा है ।

 

स्वीडन जैसे देश में जहां जानने के अधिकार को स्वीकृति सन् 1810 में ही मिल गई थी,  वहां और हमारे यहां के इस अधिकार में मौलिक अंतर है । पश्चिमी लोकतंत्र की बुनियाद ही शक पर खड़ी है। वहां राजतंत्र को इसलिए नहीं खदेड़ा गया क्योंकि वह आम-आदमी पर ज्यादतियां करता था । बल्कि इसलिए कि नागरिक राजा की नेक नीयत के प्रति आश्वस्त नहीं थे । अनाश्वस्ति (डिसविलीव) की यह परिपाटी लोकतंत्र को अपनाने के साथ-साथ राजनीतिक और प्राशासनिक नेतृत्व के प्रति भी विरासत में मिली । लिहाजा आम जन पहले जानो, फिर मानो की उक्ति पर चलने लगा और सभी चीजों का हिसाब-किताब मांगने लगा। इसमें कोई बुरी बात नहीं बल्कि एक किस्म की जागरूकता ही है कि आप जिसे भंडार की चाबियां सौंपें, उससे भंडार में रखी चीजों का समय-समय पर ब्यौरा मांगते भी चलें। पश्चिम में नेतागण लोकप्रिय हुए पर महान और अलौकिक नहीं । अंधश्रद्धा तो छोड़ ही दें, वहां नेताओं की तरफ श्रद्धा से शीश झुकाने वाले अपवाद स्वरुप ही मिलेंगे । भारत में ऐसा नहीं हुआ। अच्छा या बुरा, राजा ईश्वर का अंश ता। पराधीन भारत में भी रानी विक्टोरिया की जैसी वंदना यहां के तत्कालीन समाज ने की; वैसी लुभावनी और समर्पण युक्तिस्तुति लौंग लिव देक किंग गाने वाले भी नहीं कर पाए। आजादी की लड़ाई के फौरन बाद का माहौल देखें तो लगता ही नहीं कि नेहरू, राजा जी, राधाकृष्णन, राजेंद्र बाबू सरदार पटेल जैसे लोग देबदूतों में कमतर थे । वो तो ठीक ता कि इनमें से कुछेक ने कृपा पूर्वक कुछ चुनाव लड़ लिए अन्यता नागरिक इनसे इनके कामों का हिसाब मांगते, यह सवाल ही बेकार है।

 

हमारे यहां विश्वास करना एकदम सहज रहा है। कुछ अर्थों में वह आज भी है। अधिकार देते समय हम औसत भारतीय, ठग लिए जाने की जोखिम पर भी जो कसौटी अपनाते हैं; उस पर गौर करें । हम काम को करने की क्षमता, योग्यता, इतिहास वगैरह का हिसाब-किताब बहुत नहीं देखते। उपलब्ध लोगों में से जो भी हमें आभासी तौर पर विश्वसनीय लगता है उस पर अपने छोटे-बड़े मामूली-असाधारण सभी दायित्वों को सौंपकर छुट्टी पा लेते हैं। आदमी ठीक है तो काम भी ठीक से कर ही लेगा, ऐसी हमारी सोच विकसित हो चुकी है। यही कारण है कि लोकतंत्र की आधी सदी बीत जाने के बावजूद सूचना के अधिकार को लेकर कोई प्रबल जन-आंदोलन इस देश में न हो सका और न ही किसी दल ने इसे मुद्दा बनाने की ही जहमत उठाई। देशी-विदेशी, गैर-सरकारी संगठनों और न्यायालयों की सक्रियता से ही जानकारी के अधिकार कानून पारित और लागू हो सका है। यह ठीक है क बहुतेरी बातें कानून बनाने से की जा सकती हैं पर जो कानून हम बनाते है, उसका पालन भी उसी ईमानदारी के साथ होना चाहिए। उदाहरण के लिए बाल विवाह देखें। बाल विवाह रोकने के लिए दशकों पहले से शारदा एक्ट लागू है और उसके बाद शादी के लिए न्यूनतम आयु मर्यादा का प्रवधान किया जा चुका है । आप बताएं, कितने  लोग शारदा एक्ट का अनुसरण कर रहे हैं ?

 

दहेज विरोधी कानून है । लेकिन किस दिन के अखबार में दहेज प्रताड़ना की खबर नहीं छपती ? राजा राम मोहनराय ने छुआछूत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए नाना यत्न किये पर हुआ क्या ? कालांतर में छुआछूत को दंड़नीय अपराध बना दिया गया पर यह बीमारी आज भी पूरी जवानी पर है । जमींदारी उन्मूलन और सीलिंग के क्रांतिकारी कानून बनाए गए पर बेनामी जोतों को खत्म करना लगता नहीं किसी के बूते की है । रोजगार गारंटी की तो बात ही कुछ और है । न्यूनतम मजदूरी के कानूनों का भी कितने राज्य अनुपालन सुनिश्चित करा सके हैं ? यही हाल बालश्रम रोकने, पर्यावरण प्रदूषण काबू करने, नशामुक्ति आदि के क्षेत्रों में बने कानूनों की पालना को लेकर है । आशय यही है कि महज कानून बना देने से, यहां तक कि उसके रस्मी तौर पर क्रियान्वय कर देने से भी कुछ खास हासिल होता नहीं । जब तक कानूनों के पीछे प्रबल जन-समर्थन और उन्हें लागू कराने वाले तंत्र में भेदभाव पूरे दौर पर खत्म न हो जाए, तब तक कानून कागजी कार्यवाई बनकर रह जाता है, ऐसा मेरा अनुभव है ।

 

 सूचना के अधिकार संबंधी कानून को राष्ट्रपति जी की अनुमति मिल जाने से उसे राजपत्र में प्रकाशित कर पाना भले ही संभव हो गया हो पर अभी इस पर जन स्वीकृति की अदृश्य मोहर लगना शेष है ।

 

इस पृष्ठभूमि में हम सूचना के अधिकार संबंधी कानून के क्रियान्वयन और उसके फलितार्थों पर यदि नजर डालेंगे तो सच्चाई बेहतर ढंग से सामने आ सकेगी। पहली बात तो यह कि सूचना के अधिकार के कारगर इस्तेमाल के लिए जमीन तैयार करने का काम अभी होना बाकी है। आम आदमी, जो छोटी-मोटी चोरियों, दुर्घटनाओं यहां तक कि अपराधों तक से पीड़ित हो लेने के बावजूद पुलिस रिपोर्ट करने तक में कतराता हो, वह सूचना के अधिकार का उपयोग करके जानकारी मांगेगा और प्राप्त जानकारी के आधार पर कार्यवाई करेगा यह बहुत आसान नहीं है। सब चलता है,  चलो देखेंगे, इससे कौन उलझे ? मुझे क्या फायदा ? सबका ठेका मैंने ही ले रखा है ? आदि अनेक जुमले हैं जो सूचना के अधिकार  की राह को दुर्गम बना रहे हैं। इनका कारगर समाधान करना जरूरी है। एक जिम्मेदार और जागरुक नागरिक तैयार करने में दुर्भाग्य से किसी की ज्यादा रुचि नहीं है।

 

 

हमारे नीतिकर्त्ता और धर्मगुरु स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास को लेकर तो जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हैं पर मौजूदा कानूनों की असरदार जानकारी बच्चों तक पहुंचाने के मामले में किंचित वे कम रूचि लेते हैं। संविधान तक के प्रावधानों और क्रियान्वयन को लेकर एक प्रकार की निपट निरक्षरता से ग्रस्त समाज में सूचना का अधिकार श्रृंगार प्रसाधन जैसा दिखाई पड़ता है। हालांकि सूचना के अधिकार के उपयोग से संबंधित आंकड़े अभी विशेषण के लिए उपलब्ध नहीं है। अनेक राज्यों में इसके प्रवर्तन के लिए कुर्सी-मेजें सज रही हैं। यानी सूचना आयोग आदि के गठन हो ही रहे हैं। फिर भी, इस अधिकार का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरु हो गया है। अधिकारियों का भयादोहन करने के लिए, कार्यवाईयों को विलंबित करने के लिए, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के लिए उद्देश्यपरक अध्ययनों के लिए और कुछ निठल्लों के कलम-कौशल मांजने के लिए सूचना के अधिकार विषयक अर्जियां धड़ाधड़ दी जा रही है। ठीक प्रशिक्षण और स्वयं इस कानून के प्रावधानों की जानकारी के अभाव में सरकारी कर्मियों में इसे लेकर खासी ले-दे मची है। एक ही तरह की जानकारी कहीं से मिल जाती है और कहीं से नहीं दी जाती । इसे लेकर केस-लॉ (वाद-निर्णय) अभी गिने-चुने हैं और कानूनविद, सूचना के अधिकार को व्याख्या मुफ्त में करें तो भी क्यों ? बिना सरकारी-असरकारी विज्ञापनों की चाशनी के मीडिया सूचना के अधिकार के विभिन्न पहलुओं को उजागर करे तो आखिर क्यों ? फिर बुद्धिजीवियों के पास क्या चिंतन और जुगाली के लिए पहले ही से रुका मुद्दे कम हैं जो वे सूचना के अधिकार पर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद करें लिहाजा सूचना का अधिरार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की वर्दी में टंकी शोभाकारी जरदोजी बनकर रह गया है।

 

सूचना अपने आप में ताकत नहीं है। वह शक्ति बनेगी या बोझ, यह निर्भर करता है कि वह कब और किसके पास है और उपयोगकर्ता उसे कैसे व्यवहार में लाता है। आपके पास विश्व की श्रेष्ठतम तकनीक है और उत्पादन के माकूल साधन और उत्पादों को लाभप्रद ढंग से बाजार में खपाने के संपर्क नहीं हैं तो क्या कर लेंगे ? लिहाजा सौ में से निन्यानबे संभावना ऐसी है कि सूचना को सुलभ बनाने के साथ-साथ सूचना ग्राह्यता को समर्थ बनाने से ही बात बनेगी। व्यापक लोक-शिक्षण, बढ़ी हुई सामाजिक जिम्मेदारियां, समस्याओं और लोगों के प्रति वस्तुनिष्ठ रवैय्या, एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना होगा। स्कूलो/कॉलेजों में पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग जिस दिन आगे आ जाएंगे उस दिन देश की ज्यादातर मुश्कलें छू-मंतर हो जाएंगी। अकेली जानकारी से कुछ नहीं होगा। जागृति के सोए हुए जिन के मुंह पर पानी के छोंटे मारने की जरुरत।

 

श्री अशोक चतुर्वेदीः हिंदी के पहले पोर्टल वेबदुनिया डॉट कॉम के संपादक एवं मध्यप्रदेश विधानसभा के सचिव रहे । इन दिनों मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ के संसदीय सलाहकार हैं । संपर्कः ई-9, ईएसी कॉलोनी, कचहरी के पीछे, रायपुर, छ.ग.

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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