Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 3, मार्च - मई, 2007)

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सूचना का अधिकार :

विचारार्थ

 

कैसी सूचना कैसा अधिकार

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अखिलेश अखिल

 

पिछले साल 2005 में भारतीय संसद ने देश की आम जनता पर कृपा करते हुए उसे सूचना का अधिकार दे दिया । यानी इस अधिकार के तहत अब देश की जनता सार्वजनिक क्षेत्रों में और देशहित में हो रहे कार्यों की जानकारी लेने के काबिल हो गए। लेकिन पिछले एक साल से ज्यादा समय से मिले इस सूचना अधिकार से जनता को क्या फायदे मिले है, कहना मुश्किल है। लगताहै कि यह सूचना  अधिकार लोकशक्ति के रूप में कम सरकारी पाखंड से ज्यादा कुछ नहीं है। संभव है कि आने वाले वर्षों में इस अधिकार का लाभ आम लोगों को मिल, लेकिन अभी तो नौकरशाहों, नेताओं के चक्रव्यूह में यह अधिकार सिसक ही रह रहा है। बहरहाल, इसकी वानगी फिर आगे भी की जा सकती है, इसके लिए पहले कुछ तथ्यों को सामने लाना जरूरी है।

 

मानवीय विकास के आधुनिक उपादानों मनुष्य को सामाजिक व्यवहार और सुविधाओं के भौतिक-अभौतिक चाहे जो भी उपकरण उपलब्ध कराए हों, लेकिन उसके साथ-साथ उसने मानवीय आचरण में एक ऐसी सर्वव्यापी पाखंड की पैठ करा दी है और उनकी वैधता के ऐसे तरीकें तैयार कर दिए है कि इस पाखंड की दुष्परिणतियां सहज ही समझ में नहीं आतीं। दूसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक जीवन में जो है, उसके होते हुए भी उसके न होने अथवा उसको स्वीकार करने के बहुत ही शिष्ट और बहुत ही विधान सम्मत तरीके सामान्य मानवीय व्यावहार के हिस्से बना दिए गए हैं।

 आधुनिक समाज में सबसे बड़ी दरार मनुष और मनुष्य के भी च संबंधों में नजर आती है। यह संबंध अन्य पाखंड से ज्यादा कुछ नहीं रह गया । अगर हम अपनी न्याय प्रक्रिया को ही ले जो इस समय लोक प्रसारित के केंद्र में है तो अद्भुत तमाशा देखने को मिलता है । एक हत्यारे, अपराधी का वकील अच्छी तरह जानता है कि उसके  मुवक्किल ने हत्या की है लेकिन वह एक  सशक्त झूठी तर्कवाही देकर हर वह कोशिश करेगा। जिससे कि उसका मुवक्किल निर्दोष साबित हो। उसका यह झूठ और झूठ की यह पैरोकारी उसके व्यावसायिक आचरण का वैध हिस्सा है। उसी तरह एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान मे काम करने वाले व्यक्ति को छिपाने और वास्तविकता के विरूद्ध झूठी मगर स्वच्छ छवि प्रस्तुत करने का प्रोफेशनल अधिकार प्राप्त है।

 

इसका और विस्तार करें तो समाज के हर वर्गों की व्यावसायिकता में झूठ का आडंबर दिखाकयी पड़ता है। अपने किसी एक उत्पाद की मार्केटिंग के लिए अग्रसर एक कंपनी जब अपने प्रचार विज्ञापन में एक बड़े स्टार अभिनेता-अभिनेत्री तो उस प्रोटक्ट का राजदूत घोषित करती है तो वह अच्ची तरह जानती है कि वह अभिनेता उसके प्रोडक्ट से कोई नाता रिश्ता नहीं रखता । वह अभिनेता या अभिनेत्री यह भी जानती है कि व्वय को जिस प्रोडक्ट का राजदूत घोषित कर रही है, वस्तुतः वह उस प्रोडक्ट का उपयोग नहीं करती, लेकिन वह अभिनेत्री अच्छी तरह जानती है कि उसने यह झूठ  अपने व्यावसायिक लाभ के लिए इसलिए प्रचारित किया है कि लोग उसके झूठ को सच समझे । उसका यह आचरण भी वैध है और इसे चुनौती देने का कोई  सामाजिक उपकरण उपलब्ध नहीं है।

 

इसी तरह कार्यपालिका के समूचे व्यवहार में एक छद्म विराजमान है। किसी भी बड़े अधिकारी को, बड़े नेता को, जनता के हित में ही वास्तविकता को दबाए रखने और छिपाए रखने का तथा उसके विरूद्ध झूठ प्रचारित करने का अधिकार है जे कथित रूप से वह जनता के हित में समझता है। दंगे की स्थिति में एक सच को इसलिए छिपाया जाता है कि उससे दंगे की स्थिति में एक सच को इसलिए छिपाया जाता है कि उससे दंगा और भड़क सकता है । सामान्य स्थिति में किसी अप्रिय सच को इसलिए छिपाया जाता है कि उससे स्थिति आसमानान्य हो सकती है। इस तरह पाखंडपूर्ण आचरण की वैधता ने मनुष्य केहित के नाम पर जो छाता खड़ा किया है उसमें सूचना का अधिकार मिलने के बाद भी वैध-अवैध का यह खएल आज भी जारी है और अधिकार मिलने के बावजूद जनता आज भी नौकरशाह या यूं कहें उस महामानव के सामने नतमस्तक है जो जनता की नजर में अपने को हाकिम कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। सूचना का अधिकार भले ही क्यों न लोगों को मिल गया हो, लेकिन क्या आम जनता वाकई में हाकिम के सामने खड़ा होने की जुर्रत करता है ? उन तत्वों का प्रवेश हर  कदम पर रोका गया है जो अपने निजी, अपने कुटील याअपने कुत्सित स्वार्थों के लिए इस वैधता का प्रयोग बहुत ही चालाकी से करते हैं। इस तरह समाज में विधायी और गैर विधायी, हर स्तर पर एक द्वंद विकसित हो गया है जहां वास्तविकता को छिपाना वैध और उसे उजागर करना अवैध है। जिस तरह छिपाए के लिए बैध तर्क है, उसी तरह जानने के लिए भी वैध तर्क है। लेकिन सबसे बड़ा संकट यह है कि वैध-अवैध का निस्तारण कौन करें। वरिष्ठ पत्रकार अपूर्व गांधी कहते है कि आज भले ही हम सूचना के अधिकार से लैस है, लेकिन सूचना तो लोगों को मिलती नहीं, आगे भी नहीं मिलेगी। जहां की आधी से थोड़ी कम ही आबाद निरक्षर है उसके लिए सूचना केक्या मायने है  ? गांव  के विकास  के लिए सबसे अधिक योजनाएं बन रही हैं और हर कोई जानता है कि इस विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर घपले होते हैं और ..............जी से लेकर सरकारी तंत्र भआरी माल कमाते हैं और हैं, इसकीसूचना मिल भी जाए तो क्या होने वाला है। दरअसल मामला केवल सूचना लेने भर का नहीं है मामला ये भी है कि दोषी लोगों को दंडित किया जाखए जो संभव नहीं है। कोई एक आदमी गलत करे तो उसे दंडित किया जा सकता है, लेकिन जब सारा तंत्र ही भ्रष्ट है तब दोषी किसे कहेंगे । संभव है कि सूचना के अधिकार का फआयदा आगे मिले और यह बीत ब संभव होगा जब नई सोच के लोग सूचना देने वाले होंगे। आज जो लोग कभी सूचना छिपाते थे वही लोग केंद्र से राज्यों तक में सूचना देवे वाले अधिकारी बने हुए हैं फिर कैसे उम्मीद की जाए कि बाघ ने अपनी हिंसक प्रवृत्ति छोड़ दिया है।

 

यह सच है कि जनता को सूचना का अधिकार मिल गया है, लेकिन यह अधिकार आज भीनक्करखाने मेंतूती की आवाज है। जरूरत है गोपनीयता पर सूचना की वरीयता की । व्यवहार में देखने को आता है कि हमें सूचना का अधिकार मिल हुआ है, लेकिन प्रयोग के स्तर पर कुछ भी नहीं या यों कहें कि समीमित स्तर पर लागू है। उदाहरण के लिए देश की सुरक्षा केलिए बहुत सी गतिविधियां सरकार छिपा कर रखती है और यह माना जाता है कि ऐसा ही किया जाना चाहिए । बहुत सारी अन्य निर्णय प्रतिक्रियाएं भी गुप्त रखी जाकी है और इस गोपनीयता को स्वीकृति प्राप्त है। सामान्यः यह  गोपनीयता एक समय सीमा तर प्रभावी रहती है जो 50 साल भी हो सकती है। वजट एक सार्वजनिक दस्तावेज है, किंतु संसद में पेश होने से पूर्व तक यह गोपनीय रहता है । खोजी पत्रकारिता की नैतिक वैधता सूचना के अधिकार पर टिकी है। ऐसा नहीं है कि गोपनीयता के अधिकार और सूचना के अधिकार की लड़ाई केवल राज्य बनाम नागरिक की ही रही है। बहुत सारे नागरिक जिन्होंने अपने क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की है अपनीतमाम निजी बातों को सूचना के अधिकार के तर्क पर सार्वजनिक होते हुए देखते हैं और अपने गोपनीयता के अधिकार के लिए लड़ते भी है। राजनेताओं की भी मारियों और उनके प्रेम प्रसंग उनके निजी मामले हैं किंतु लोगों की न केवल इनमें दिलचस्पी होती है बल्कि वे ऐसी जानकारी पाना और देना अपना अधिकार भी मानते हैं। यह कहा जा सकता है कि राजनेताओं को देश का हित या अहित कर सकने वाले निर्णय लेने पड़े हैं इसलिए उनको ऐसी जिम्मेदारी दी जाए या नहीं, यह तय करने के लिए लोगों को ऐसी लोगों को ऐसी जानकारी पाने का हक भी है।

 

अभी पिछले महीने एक गैर सरकारी संस्था ने सूचना के अधिकार के एक वर्ष की अवधि का लेखा-जोखा प्रतिष्ठित पत्रिका इकौनोमी इंडियामें पेश किया। इस सर्वे रपट को सही माने तो कई चौंकने वाले त्थ्य सामने आए।  सूचना का अधिकार के सेक्शन 4 में एक विशेष प्रावधान है कि प्रत्येक सरकारी संस्थाओं को 17 बिन्दुओं से संबंधित सूचनाएं स्वयं प्रकाशित करनी है और उसे आम लोगों के सामने रखनी है इसकेलिए लोगों को उन सरकारी संस्थाओं से सूचना लेने की जरूरत भी  नहीं है। लेकिन सर्व रपट की बात मानें तो कई राज्य में स्वतः प्रकाशित होने वाली सचूनाएं देने में भी  चोरी करते रहे हैं। कोई सात राज्यों आंध्रप्रदेश असम, विहार, गोवा, झारखंड, राजस्थान और सिक्किम ऐसे राज्य सामने आए जो सूचना को बिल्कुल ही प्रकाशित करने में पीछे रहे। एक सच्चाई ये भी सामने आयी कि बिहार, गोवा, झारखंड, दादर और नगर हवेली, लक्ष्यद्वीप तथा नागालैण्ड केंद्रीय सूचना का अधिकार पोर्टल पर आज तक सूचीबद्ध नहींहो पाया है। ऐसा नहीं है कि बाकी के राज्यों  ने बड़ी गंभीरता से सूचनाएं प्रकाशित की हो। अगर केरल, अरूणाचल प्रदेश, दादर नगर, हवेली, लक्ष्यद्वीप, पश्चिम बंगाल ,नागालैण्ड ,उत्तर प्रदेश, दमन और द्वीप, उड़ीसा ,तमिलनाडु मणिपुर और अंडमान निकोबार द्वीप की बात करें तो स्थिति और ही भयावह जान पड़ती है। जिन राज्यों कने कोई सूचनाएं नहीं प्रकाशित की माना जा सकता है कि उनकातंत्र या तो विकसित नहीं होगा या वे पूरी तरह चोरी में शामिल होंगे लेकिन उपर्युक्त राज्यों ने जो सूचनाएं दी है वे महज 0 से एक प्रतिशत के आसपास ही । इसका मतलब है कि ये राज्य पूरी सूचनाएं देने में सक्षम थे लेकिन अचानक लूटपाट और चोरी के कारण से सूचनाएं प्रकाशित करने से मुकर गए।

 

सूचना का अधिकार कानून 2005 के सेक्शन 4 (1) (भी ) में डिन 17 बिन्दुओं से संबंधित सूचनाएं स्वयं प्रकाशित करने का विधान है वे कोई भारी सूचनाएं नहीं है, लेकिन यदि येसूचनाएं प्रकाशित करने में भी राज्य सरकार चोरी करती है तो पता चलता है कि पिछले 60 साल की आजादी में देश क्या-क्या होता रहा है। ये 17 बिन्दुएँ निम्न है जो स्वतः प्रकाशित  होने के लिए बाध्य है :-

 

1.        संगठन, कार्य और तर्रव्य के विवरण

2.        इसके अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य और कर्तव्य

3.        निर्णय प्रक्रिया की औपचारिकताएं साथ ही पर्यवेक्षण और जवाबदेही का विभाजन।

4.        कार्य के बंटवारे में अपनाया जाने वाला तरीका।

5.        इसके कार्मचारियों द्वारा कार्य विभाजन हेतु उपयोग किकए जाने वाले कायदे कानून, निर्देश, मैन्युल्स तथा रिकार्ड

6.        इसके नियंत्रण में आने वाले दस्तावेजों पर एक अधिकारिक वक्तत्व।

7.        किसी व्यवस्था की विशिष्टियां, जो उसकीनीति की संरचना या उसके कार्यन्वयन के संबंध में जनता केसदस्यों से परामर्श के लिए या उनके द्वारा अभ्यावदेन के लिए विद्यमान है।

8.        कोई, काउंसिल की बैठक की सूचना

9.        इसके अधिकारियों की निर्देशिका।

10.     अधिकारी और कर्मचारी द्वाराप्राप्त किया जाने वाला वेतन तथा क्षतिपूर्ति की व्यवस्थासे संबंधित सूचना।

11.     एजेंसी को जारी कियाग या बजट, योजनाओं का विवरण तथा खर्चो का विवरण।

12.     सब्सिडी कार्यक्रमों का विवरणतथा लाभ बिलों की सूची।

13.     .....अनुमति और अधिकारियों को पाने वाला विवरम।

14.     उन सूचनाओं का विवरण जिसे इलेक्ट्रानिक रूप में दिया गया है।

15.     जन सूचना अधिकारी का नाम व पद का विवरण।

16.     ऐसी अन्य सूचनाएं

तो सूचना का अधिकार आज भले ही रमें मिल गया हो, प्रायोगित तौर पर इस अधिकार के अमल में अभी बहुत कुछ होना बाकी है। सच्चाई ये है कि लोग सूचना देना नहीं चाहते । उदाहरण के तौर पर इस पत्रकार ने पिछले महीने गृह मंत्रालय से आजादी के बाद बने जांच आयोग, उसके काल, उस पर हुए खर्च और उस जांच रपट की वस्तुस्थिति के बारे में सूचना लेने का प्रयास किया। एक महीने के बाद जो सचूना मिली वह आधी अधूरी थी। मात्र दर्जनभर से कम जांच आयोगों की सूची पकड़ा दी गई और कोई तीन-चार जांच आयोगों ने केवल धन की बर्बादी की थी। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री रंगनाथ मिश्र ने इस संवाददाता को बताया किजांच आयोगों पर जो खर्च होते हैं सब बेकार ही जाते हैं। क्योंकि उनरपटों पर बाद में कोई ध्यान नहीं दिया जाता । सिर्फ तात्कालिक स्थितियों से निपटने के लिए जांच आयोग बना दिया जाता । सिरफ तात्कालिक स्थितियोंसे निपटने के ले जांच आयोग बना दिए जाते हैं जिसमें जनता का पैसा बर्बाद होता है। आपको बता दें कि अभी कई जांच आयोग चल रहे हैं, उन देश का करोड़ों रूपये खर्च हुए इसीक जानकारी सिरिफ फाइलों में दभी  पड़ी है और रहेगी। इस जांच आयोगों पर हुए धन की बर्बादी की पोल खुल जाए तो आजाद भारत का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार सामने आ सकता है।

अब सवाल है कि आखिर सूचना को कौन और क्यों छिपाता है ? इससे किसे लाभ है ? सूचना का अधिकार मिलने के बावजूद यह खेल आज भी जारी है। आम किसी भी दफ्तर ें चले जाइए सबसे पहले तो सुरक्षा के नाम पर आप सीधे घूसने के लायक नहीं है।दफ्तर के भीतर बैठे लोगों की नजर में आप बौने है और शायद देशद्रोही भी । इसी सचूना के युग में अगर सबसे पहले सूचनाकिसी को मिलती है तो वह वर्ग है दलाल । दलालों को तमाम मंत्रालय, विभाग, सरकारी तंत्र सबसे पहले सूचना देता है ताकि उसका फौरी लाभ उठा सके। वही सचूना आम जनता तक आते-आते महीनों तल जारे हैं। वे मंत्री ,सासंद विधायक भी..सूचना का आदान प्रदान दलाल से ही करते  है, उनकी सूचनाआम लोगों के लिए नहीं होती । सूचना के अधिकार के नाम पर वे अपने क्षत्रों में केवल ऐलान करते हैं कि गांव वालों जाओ और सरकारी खर्चे की जानकारीलो, लेकिन वे यह नहीं बताना चाहते कि उनके फंड का उपयोग किस तरह से हो रहा है। उनके पास मुख्या से लेकर ठेकेदारों तक कैसे पहुंच रहे हैं। नौररशाह यह नहीं बताना चाहते कि अमुक फाइल को आगे बढ़ाने में उन्होंने कितने पैसे झटके। सूचना के अधिकार को लेकर देश में 1996 से ही बहस चली। कोई 10 वर्षों के बाद यह अधिकार लोगों  की मिला। कानून बनें, लेकिन कानून बनने के मात्र दो-चार महीने के भीतर ही उस अधिकार को संकुचित किया गया। इसका क्या कारण हो सकता है ? सरकारी तंत्र का कहना ता कि कई क्षेत्रों की सूचनाएं आम नहीं  की जा सकती । अससे देश का अहित होगा। संभव है ऐसा हो भी सकता है लेकिन आजादी के बादे का इतिहास देखें तो पता चलता है कि इस देश को खोखला करने में इस देश को गिरवी रखने में, इस देश को खुफिया, प्रशासनिक, सुरक्षा से संबंधत लोग ही आगे रहे हैं । बड़े-बड़े घोटालों में वहीं शरीक रहे हैं, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों  और नीच तबके के लोगों के हिस्से के नाम पर गए पैसों को खाने में वही लोग आगे रहे हैं, फिर जनता को सूचना से मरहूम करने का कौन का खेल है ? और वह कौन लोग है जो देश के साथ गद्दारी करने वाले हैं।

 

तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। सूचना के अधिकार को यदि सच जाननें के अधिकार से जोड़ा जाता है तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। किंतु यदि वह पत्रकारों में सक्रियतावाद का रुप लेता है तो न्यायिक सक्रियतावाद की तरह ही वह खतरनाक बन जाता है । इधर स्टिंग आपरेशन के नाम पर जो कुछ चभी हो रहा है उसमं मिशन कम बाजार ज्यादा प्रभावी है। ब्लैकमेल करने की प्रकृति बढ़ी है और ऐसे दर्जनों कथित पत्रकार सामने आ गए हैं जिनका पत्रकारीताकैरियर मात्र अल्पसमय के होने के बावजूद अकूत संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं।

 

यदि सूचना का अधिकार पवित्र हैं तो अखबारों ,टीवी द्वारा परोसी गई सूचनाओं को न लेने का अधिकार भी पवित्र होना चाहिए। अखबार-टीवी यदि पाठकों पर पूर्वाग्रह युक्त सूचनाएं थोपने लगे तो पाठकों के पास उन अखबार टीवी चैनलों के बहिष्कार का साधन भी होना चाहिए । अतः सूचना के अधिकार को भी मान्यता मिलनी चाहिए। पाठकों पर सूचनाएं बेतुकी है। पत्रकार आज एक अदृश्य सत्ता के खिलौने है।

 

सूचना का अधिकार जनता को सवाल बनाने में महत्वपूर्म है, लेकिन यह भी सत्य है कि विश्व बाजार व्यवस्था का संचालन करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मंशा सूचना क्रांति को विश्व स्तर पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए इस्तेमाल करने को है। सूचना के तमाम साधनों पर उनका एकाधिकारहै और ये इसी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सूचना का अधिकार उन्हीं का हिस्सा हुआ ? फरेब भरा नारा है जिसका उद्देश्य है तीसरी दुनिया के देशों में उनका प्रवेश बेरोकटोक है।

 

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अखिलेश अखिल विविध पत्र-पत्रिकाओं में समसायिक विषयों पर लेखन से विशिष्ट पहचान बनाई 

। इन दोनों दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन करते हैं।संपर्क : 295-ए, हनुमान गली, मंडावली, दिल्ली-92

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रवंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन-संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

 संपर्क- ए-2, अनमोल फ्लैट्स, अवंति विहार कॉलोनी. रायपुर, छत्तीसगढ़, दूरभाष-0771-2444107, ई-मेल- mediavimarshindia@yahoo.com

 

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