Media Vimarsh

मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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आवरण कथा

 

 

समय तय करेगा  सार्थकता

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डॉ. सालिकराम अग्रवाल

 

मस्जिद तो बना दी शब भर में,

       ईमान की हरारत वालों ने।

              ये दिल ही पुराना पापी है,

                     जो अब तक न नमाजी बन पाया।

 

सूचना का अधिकार अधिनियम क्रमांक 22, 2005 को पारित हुआ इस अधिनियम का उद्देश्य संक्षेप में भारत के संविधान के लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की दुहाई देते हुए भारत गणराज्य के 56 वें वर्ष में संसद द्वारा अधिनियमित हुआ । प्रकारांतर में जिस अधिनियम को भारतीय संविधान 1956 के साथ ही मूल अधिकारों के परिशिष्ट के रूप में सन 1956 में ही पारित करना ता, वह 56 वर्ष बाद संसद द्वारा पारित हुआ। जो कुंभकर्णी नींद को भी मात देता है। कितने शर्म की बात है कि जब लोक की चिंता 56 वर्ष बाद की जाती है, तब लोक कल्याण यदि 560 वर्षों में भी संभव हो जाए तो सुखद आश्चर्य होगा। पुनः इसी तारतम्य में लोकतंत्रात्मक आदर्श की प्रभुता की स्तुति भी की गई है जिस पर गालिब के शेर का मिसरा सानी, सांसदों    को समर्पित है-

 

काबा किस मुंह से जाओगे गालिब।

शर्म तुमको मगर नहीं आती।

 

बहरहाल, 56 वर्ष पश्चात सांसदों को एक रात अचानक स्वप्न आया कि भारतीयों को सूचना का अधिकार मिलना चाहिए और दूसरे सुप्रभात में लोक हित की मृग मरीचिका का मायाजाल सांसदों ने हमें दिखा दिया।

 

सूचना का अधिकार अधिनियम 31 धाराओं में परिव्याप्त लघुतर अधिनियम है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जितने भी अधिनियम बने हैं उनमें 90 प्रतिशत अधिनियम भारत की भीरूता को प्रमाणित करते हैं, जिनमें उल्लेखित है, कि इस अधिनियम को विस्तार जम्मू कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत में लागू होगा, यह सूचना के अधिकार का अधिनियम का भी मंगलाचरण है, या अमंगलाचरण है, धारा(1) पाठकों का ध्यान रचनाकार इस पर विशेषरूप से आकृष्ट करना चाहता है। धारा 2 में दी गई परिभाषाओं में सूचना का अधिकार की परिभाषा मह्त्वपूर्ण है।

 

सूचना से किसी रूप में कोई ऐसी सामग्री, जिसके अंतर्गत किसी इलेक्ट्रानिक रूप में धारित अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, ई-मेल सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लागबुक, संविदा, रिपोर्ट, कागजपत्र, नमूने, माडल, आंकड़ों संबंधी सामग्री और किसी प्राइवेट निकाय से संबंधित ऐसी सूचना सम्मिलित है, जिस तक तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच हो सकती है, अभिप्रेत है। धारा (4) एवं (5) में नौकरशाहों के पदों के संबंध में उल्लेख किया गया है। धारा (8) में प्रदेश योग्य सूचनाओं का सविस्तार वर्णन है। धारा (9) में कतिपय मामलों में अस्वीकृत करने के आधार वर्णित है। उल्लेखनीय है कि जिन सूचनाओं-दस्तावेजों को नहीं दिया जा सकता उसका उल्लेखनीय नहीं है जो इस अधिनियम की बहुत बड़ी खामी है। प्रथम एवं द्वितीय अपील का भी प्रावधान है। इसी प्रकार व्यवहार प्रक्रिया संहिता में भी दो अपीलों का प्रावधान है। इस सूचना के अधिनियम में पुनरावलोकन एवं रिविजन का प्रावधान भी है। इस प्रकार न्यायालय का हस्तपेक्ष हो सकना इस अधिनियम का बहुत बड़ी है जो इस अधिनियम से बनाने वाले की स्वेच्छाचारिता एवं चालाकी इंगित करती है।

 

सूचना इस अधिनियम का अध्याय 4 राज्य सूचना आयोग के गठन एवं लोकतांत्रिक तंत्र का वामाचार है। धारा (19) के अनुसार आवेदन द्वारा वांछित जानकारी दिए जाने बाबत अपील संबंधी प्रावधान वर्णित है। धारा (20) में सूचना न प्रदान कर सकने की दशा में नौकरशाहों को मौद्रिक दंड का प्रावधान उल्लेखित है। धारा(23) न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन स्पष्ट करता है जो सूचना आयोग को बेलगाम घोड़ा बना देता है।

 

इस अधिनियम के पूर्णता प्रदान करने हेतु दो अनुसूचियां भी दी है जिसकी दूसरी अनुसूची राष्ट्रीय सुरक्षा एवं राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा से संबंधित है, जो अभिनंदनीय है।

 

सूचना का अधिकार (फीस एवं लागत का विनिमियम)- निगम 2005 भी इस अधिनियम का मह्त्वपूर्ण अंश है। जिसके नियम 4के अनुसार रुपये 10/-मात्र जमा कर आवेदक सूचना प्राप्त कर सकता है। दस्तावेजों की फोटोकॉपी प्राप्त करने अलग से शुल्क है। सूचना प्रदान करना या न करना इसके लिए निर्धारित अवधि भी काफी लंबी  है।

 

 इस प्रकार सूचना के अधिकार अधिनियम की सार्थकता/ निर्थकता का निर्णय मैं प्रबुद्ध  पाठकों पर छोड़ता हूं।

 

आह को चाहिए इक उम्र असर होने को।

कौन जीता है, तेरे जुल्फ के सर होते तक।।

 

- डॉ. सालिकराम अग्रवाल  16, कैलाश रेसीडेंसी, शिव मंदिर के पास, मीरा दातार रोड,  शंकर नगर, रायपुर  (छत्तीसगढ़)

 

मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- संजय द्विवेदी, जयप्रकाश मानस

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