कितनी सूचना -
कितना अधिकार
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कृष्णचंद्र
मौलि
सूचना
का अधिकार अधिनियम-2005 की अपनी आरंभिक उद्घोषणा में सूचना के अधिकार को
परिभाषित करते हुए कहा गया है कि अब तक लोकहित की जिन सूचनाओं पर लोक
प्राधिकारों का नियंत्रण था उन सभी सूचनाओं तक आम आदमी की पहुंच बनाना और
सुनिश्चित करना ही सूचना का अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है। इससे अब लोक
प्राधिकारों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी संभव हो सकेगा। यहां
विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि देश के अनेक अन्य अधिनियमों की ही तरह यह अधिनियम
भी जम्मू कश्मीर राज्य में लागू नहीं होगा।
अधिनियम के
चेप्टर(दो) में यह निर्देशित किया गया है कि अधिनियम के प्रभावशील होने की
तारीख से यताशीघ्र प्रत्येक प्राधिकार अपने अभिलेखों, लोकहित की सूचनाओं और
संबंधित की सीमी में कंप्यूटरीकृत कर नेटवर्किंग प्रणाली के माध्यम से देश के
किसी भी कोने से सूचनाएं प्राप्त की जी सकने की व्यवस्था को सुनिश्चित करें।
इसी प्रकार
अधिनियम के प्रभाविशील होने के 120 दिन के अंदर प्रत्येक प्राधिकार द्वारा अपने
संगठन, उसकी कार्यप्रणाली, उसके द्वारा लोगों को दी जाने वाली सेवायें, शुल्क,
अधिकारी-कर्मचारियों के ओहदे और अधिकार, उनका कार्यक्रम, नियमावली, मेन्युअल,
बजट आदि प्रासंगिक अन्य जानकारी तथा अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त मुख्य सूचना
आयुक्तों, सूचना आयुक्तों, लोक सूचना अधिकारियों और एपीलेट अधिकारियों का नाम
कार्यालय, फोन, मोबाईल, ई-मेल उनके अधिकार जैसी जानकारी प्रकाशित किया जाना
अनिवार्य कर दिया गया है।
अधिनियम के
चेप्टर-2के ही खण्ड 8 सूचना के अधिकार के परिप्रेक्ष्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण
है। इस खण्ड में उन सूचनाओं का स्पष्ट कर उल्लेख है जो सूचना का अधिकार अधिनियम
के दायरे से बाहर हैं। यह सभी सूचनायें कमोवेश वही हैं जो इस अधिनियम के पूर्व
शासकीय गोपनीयता अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों से नियंत्रित होते थे। उदाहरण
के लिए वह सूचना जो देश की सार्वभौमिकता, एकता, सुरक्षा के लिए खतरे का सबब
बनती हो, वह सूचना जो देश के व्यूह रचनात्मक, सामरिक, आर्थिक हितों के साथ-साथ
अंतर्राष्ट्रीय हितों और संबंधों को हानि पहुंचाता हो और वह सूचना जो व्यापार
में भरोसा, व्यापार के राज और बौद्धिक सम्पदा को हानि पहुंचाती हों सूचना का
अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर कर दिये गये हैं। इसमें समस्या यह है
सार्वभौमिकता, एकता, अखंडता आदि अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट परिभाषित
नहीं होने के कारण अधिनियम के अंतर्गत सूचना देने के निए नियुक्त कोई भी
अधिकारी अपने विवेक में किसी सूचना को इस आधार पर देने से इंकार कर सकता है जो
हमेशा विवाद का विषय बना रहेगा । इसी प्रकार मंत्रिमंडल की बैठकों के कागजों के
बारे में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है । यह आम बात है कि मंत्रिमंडल की बेठकों में
ही अनेक अवैधानिक और कभी–कभी
षड़यंत्रकारी निर्णय लिये जाते हैं। अभी यह कागजात अधिनियम के दायरे से बाहर
हैं ।अभी यह कागजात अधिनियम के दायरे से बाहर हैं।
अधिनियम का
सबसे सुखद और संभवतः शक्तिशाली प्रावधान चेप्टर 2 खण्ड 8 (1) (एक) के लघु खण्ड
में है यहां यह कहा गया है कि जो सूचना संसद तथा विधान मंडलों को दिये जाने से
इंकार नहीं किया जा सकता वह सूचना किसी व्यक्ति को दिये जाने से भी इंकार नहीं
किया जा सकता । संभवतः सूचना का अधिकार अधिनियम की मूलभावना इसी प्रावधान में
निहित है।
परंतु क्या इन
मूल भावनाओं को अक्षुण्य रहने दिया जा रहा है। क्या कुछ अफसरशाही और राजनीतिज्ञ
इस मूल भावना को खंडित और कमजोर करने में लगे हुए प्रतीत नहीं होते हैं
?
फाइलों पर टीप-टिप्पणियों को लेकर जो विवाद हाल ही में चला ता, यदि वह कोई
संकेत है तो सूचना के अधिकार अधिनियम को कमजोर बनाने के लिए अफसरशाही तुली हुई
है और काफी हद तक उन्होंने मंत्रिमंडल को अधिनियम में संशोधन प्रस्तावित करने
के लिए सहमत करने में भी सफलता प्राप्त की है। वरना संसद में अधिनियम के संशोधन
के प्रारूप को प्रस्तुत करने की बात बहुत जोर-शोर से नहीं उठती । यह और बात है
कि बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों के द्वारा जबरदस्त विरोध के कारण ऐसा संशोधन
प्रस्तुत नहीं किया जा सका। विरोध करने वालों में प्रमुख रूप से प्रसिद्ध
समाजसेवी अन्ना हजारे, पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले और स्वयं केंद्रीय मुख्य
सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला भी हैं। राष्ट्रपति भवन के निकटस्थ सूत्र बताते
हैं कि ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी संशोधन की बात से खुश नहीं हैं। परंतु संशोधन
का विचार समाप्त नहीं हुआ, केवल टाल दिया गया है। हो सकता है कि लोगों के विरोध
में तीव्रता कम होने जाने पर खामोशी से संशोधन पारित कर दिया जाय । सुधारवादी
होने का दावा करने वाले नेता भी इस मामले में चुप हैं।
यद्यपि
अधिनियम मे संशोधन का विचार टाल दिया गया है परंतु यह जान लेना आवश्यक है कि
संशोधन के पक्षधर किन मुद्दों पर संशोधन लाना चाहते हैं ताकि विरोध की तीव्रता
शिथिल नहीं हो जाय और आंदोलन का मशाल तब तक जलती रहे जब तक संशोधन का विचार
समाप्त नहीं हो जाता। सूचनायें नहीं दिये जाने के लिए प्रस्तावित संशोधन
निम्नानुसार है। (1) फाइलों पर अंकित टिप्पणियां जिन का सरोकार सीधे समाज और
विकास के मुद्दों से नहीं जुड़े हों । अब यह निर्णय कौन करेगा
?
(2) दस्तावेज और सामग्री जिनके आधार पर मंत्रिमंडल द्वारा निर्णय लिये जाते
हैं। निर्णय लिये जा चुकने के बाद भी यह पाबंदी लागू रहेगी। (3) नियुक्तियों के
लिए आयोजित होने वाली सार्वजनिक परीक्षा प्रक्रिया से संबंधित कागजात। संशोधन
में यह नया प्रावधान जोड़ा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त को यह अधिकार होगा कि
वे सूचना के अधिकार को लोकप्रिय बनाने के लिए शोध कार्य और संगोष्ठियां आदि
आयोजित कर सकेंगे।
इधर जमीनी
सच्चाइयां सूचना के आधिकार की वस्तुस्थिति के बारे में कुछ और ही बयान करती
हैं। अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की भावना को अधिकारी तंत्र या तो समझ नहीं
पाया है या फिर वे अभी भी सूचनाओं को दबाये रखने और जनता को शासकीय कार्यकलापों
में भागीदार नहीं बनाने की अपनी पुरानी मानसिकता से उबर नहीं पाये हैं।
राजस्थान के माउन्ट आबू में प्रजापिता ब्रम्हकुमारीय ईश्वरीय विश्वविद्यालय के
तत्वावधान में सूचना के अधिकार पर आयोजित एक सत्र में स्वयं अनेक आंचलिक मीडिया
कर्मियों ने अपने-अपने अंचलों में सूचना अधिकार के विरोधाभास पर जम कर कोसते
रहे । सिरोही से आये एक पत्रकार ने कहा कि सूचना मांगने के प्रार्थनापत्र के
साथ देय शुल्क के बारे में अधिनियम में प्रावधान स्पष्ट नहीं है जिससे कुछ
अधिकृत प्राधिकार मनमानी शुल्क वसूलते हैं । सिद्धपुर (गुजरात) के एक गुजराती
पत्रकार का कहना ता कि किसी कंपनी में हो रहे भ्रष्टाचार और वहां के भ्रष्ट
अधिकारी तंत्र के बारे में सक्षम अधिकारी ने सूचना प्राप्त कर उपलब्ध करने में
असमर्थता व्यक्त की । रीवां (म.प्र.) से आये एक हिन्दी मीडिया कर्मी ने कहा कि
वह सूचना जो विधानसभा में दी जा चुकी है, वह सूचना उन्हें देने से मना कर दिया
गया जबकि ऐसी सूचनाओं के बारे में अधिनियम में यह स्पष्ट उल्लेख है । सूचना का
अधिकार अधिनिययम के विभिन्न प्रावधानों की भावना के अनुरुप लोक सूचना अधिकारों
के द्वारा काम नहीं करने की अनगिनत शिकायतें संपूर्ण देश के विभिन्न अंचलों से
आये मीडिया कर्मियों ने की । सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का
अफसरशाही द्वारा अभी भी गोपनीयता अधिनियम की तर्ज पर ही परिभाषित करने की
चेष्टा में लगे रहने की बात भी की गई है । लगता है अभी सूचना का अधिकार आम आदमी
की पहूंच से बहुत दूर है । शासन को, मुख्य रूप से, मुख्य सूचना आयुक्तों को इस
और विशेष ध्यान देना होगा ।
सूचना का
अधिकार अधिनियम लागू होने के पश्चात जहां-तहां छुटपुट सफलता की कहानियां सुनने
को मिली वहीं बड़े और प्रभावशाली कई मंत्रायलों एवं विभागों के द्वारा
प्रार्थियों को सूचना देने से इंकार करने की खबरें भी मिली । रेल मंत्रालय,
नगरीय विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, उपभोक्ता मामलों का
मंत्रालय, केंद्रीय आबकारी एवं कस्मट बोर्ड और यहां तक कि कार्मिक एवं
प्रशिक्षण मंत्रालय ने भी फाइलों पर टिप्पणियों की जानकारी देने से इंकार कर
दिया । ऐसा तब हो रहा है जब भारत सरकार के मुख्य सूचना आयुक्त जो सूचना का
अधिनियम के मामले में सर्वोच्च और अंतिम अपीलीय अधिकारी हैं, 31 जनवरी 2006 को
सत्यपाल प्रकरण में अपने एक फैसले में स्पष्ट कर दिया कि अधिनियम के सेक्शन 2
(एफ), (आई) और (जे) प्रार्थी को यह अधिकार देते हैं कि वह फाइल पर (नोटिंग)
(टीप) की जानकारी प्राप्त कर सकें ।
प्रधानमंत्री
के इस आश्वासन से कि उनकी सरकार सूचना का अधिकार अधिनियम को किसी भी प्रकार
कमजोर बनाने के बजाय और अधिक मजबूती प्रदान करने का प्रयास करेगी सिविल सोसायटी
और आम नागरिकों में सरकार की मंशा के प्रति विश्वास तो जगता है परंतु
मंत्रिमंडल के अनेक सदस्य और अफसरशाही द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम को
संशोधित करने के लिए जो दबाव बनाया जा रहा है, प्रधानमंत्री उस दबाव के समक्ष
कब तक अडिग रह पायेंगे इस पर लोग सशंकित हैं ।
इस भी च समाज
का एक वर्ग खासकर न्यायपालिका के कई लोग यह मांग करने लगे हैं कि जब सूचना का
अधिकार है तो लोगों को सूचनाएं बिन मांगे ही दी क्यों नहीं जाएं, मांगना क्यों
पड़े ?
इसके समर्थन में सब से मुखर होकर आगे आये आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के जस्टिस
ईश्वरय्या । देखना यह है कि आगे यह मांग क्या रंग लोयेगी ।
इसमें कोई
संदेह नहीं कि अभी भी सरकारें और प्रशासनतंत्र
“इन्फर्मेशन
इज पावर”
वाली थियोरी पर ही चलती हैं । इसलिए वे आसानी से क्योंकर आम लोगों तक सूचनाएं
पहुंचाना चाहेंगे ?
भले ही अधिनियम की मूलभावना यही क्यों न हो । प्रजातंत्र का तकाजा भी यही है कि
जो सूचना राजतंत्र के लिए ‘पावर’
बने । देखें कब तक हमारी सरकारें और अफसरशाही प्रजातंत्र के इस मूलमंत्र का न
केवल पाठ करेंगे बल्कि अनुकरण करेंगे । तब तक यह प्रश्न अपनी जगह अनुत्तरित
रहेगा कि “सूचना
का अधिकार-कितनी सूचना कितना अधिकार
कृष्णचंद्र
मौलि
अपर संचालक
जनसंपर्क तथ मप्र सरकार
में
संचार सलाहकार रहे। पब्लिक रिलेशन्स
सोसायटी
ऑफ इंडिया भोपाल चेप्टर के अध्यक्ष हैं तथा माखनलाल लतुर्वेदी
पत्रकारिता विवि में विजिटिंग फेकल्टी हैं।
संपर्क
: माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, भोपाल (म.प्र.)


