सामाजिक
सरोकारों से है जीवंत रिश्ता
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आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा
यह
अपने आप में एक सुखद समाचार है कि संस्कृत में भी दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित
हो रहे हैं । उत्तर प्रदेश के कानपुर से
‘नवप्रभातम्’
और दक्षिण में कर्णाटक के मैसूर से ‘सुधर्मा’
जैसे कुछ संस्कृत दैनिक नियमित रुप से निकल रहे हैं । वाराणसी आदि कुछ स्थानों
में ‘गाण्डीवम्’
आदि कुछ साप्ताहिक संस्कृत पत्र प्रकाशित हो रहे हैं । नागपुर से पाक्षिक
संस्कृत समाचार पत्र ‘भवितव्यम्’
अत्यंत लोकप्रिय है । बच्चों में लोकप्रिय पत्रिका
‘चंदामामा’
संस्कृत में भी इसी नाम से निकल रही है । दक्षिण से ही नकलने वाली मासिक
संस्कृत पत्रिका ‘सम्भाषण
संदेश’
सभी आयु वर्ग के संस्कृत पाठकों के लिए पठनीय है । सरलतम एवं व्यावहारिक
संस्कृत में प्रकाशित इसके लेख आदि सामग्री संस्कृत पाठकों के साथ
संस्कृतवार्तालापकों की संख्या बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभा रही है । एकदम
आधुनिक एवं समाज से सरोकार रखने वाले विषयों को पत्रिका में स्थान दिया जाता है
। पूरे देश की संस्कृत गतिविधियों पर सचित्र समाचार बहुतायत के साथ इसमें देखे
जा सकते हैं । इसके अतिरिक्त अनेक रोचक एवं ज्ञानवर्धक स्थायी-स्तंभ भी हैं ।
पूरे विश्व को
प्रथम संस्कृतभाषी ग्राम मुत्तूर (शिमोगा-जिला) देने वाली कर्नाटक भूमि से
निकलने वाली यह पत्रिका पूरे विश्व में संस्कृत सम्भाषण कराने के अभियान और
आंदोलन से जुड़ी इस पत्रिका के पाठक यूरोप और अमेरिका सहित शेष विश्व में भी
फैले हुए हैं । इसकी मातृसंस्था ‘संस्कृतभारती’
के अनेक प्रशिक्षक विदेशों में भी संस्कृत सम्भाषण के प्रशिक्षण तथा
प्रचार-प्रसार में पूरी तरह से जुटे हुए हैं । पत्रिका और संस्था के माध्यम से
मध्यप्रदेश और उड़ीसा आदि राज्यों में भी मोहद और राधिकापुरम् जैसे अनेक
संस्कृतभाषी गांव विकसित हुए हैं । छत्तीसगढ़ में भी इस और कदम बढ़ाये हैं ।
उड़ीसा की
लोकभाषा प्रचार समिति, पुरी एक नहीं तीन संस्कृत पत्रिकाएं-
‘लोकभाषा’,
‘सुश्री’
और ‘लोकप्रज्ञा’
के नाम से निकाल रही है । इस संस्था ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से इस मिथक
को तोड़ा है कि संस्कृत केवल देवभाषा अथवा परलोक भाषा है । वह जन-जन की भाषा
थी, है
और रहेगी । आम लोगों की भाषा होने के कारण डॉ. सदानंद जी दीक्षित और साथी इसे
‘लोकभाषा’
के नाम से लोकप्रिय कर चुके हैं ।
भारत
के साथ-साथ विदेशों
में भी इस
संस्कृत संस्था और पत्रिकाओं ने अच्छी लोकप्रियता अर्जित की है । सभी समसामयिक
विषयों को ये भी अपनी पत्रिकाओ सम्मिलित करते हैं ।
पुरी
से ही सदाशिव केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ से अनेक संस्कृत विद्वान मिलकर
संस्कृत द्वैमासिकी - ‘प्रियवाक्’
का प्रकाशन कर रहे हैं ।
उत्तर में देश
की राजधानी दिल्ली की देववाणी परिषद् संस्कृत को केवल प्राचीन भाषा मानने के
लिए कोई कतई तत्पर नहीं है । संस्कृत तो आज की भाषा है । वह अर्वाचीन भाषा है ।
संस्कृत-हिन्दी के महान् विद्वान एवं श्रेष्ठ कवि डॉ. रमाकांत जी शुक्ल ने जौ
त्रैमासिक पत्रिका प्रारंभ की और पत्रिका को नाम दिया गया
‘अर्वाचीन
संस्कृतम्’
और वास्तव में नाम सार्थक भी लगता है । कारगिल, कश्मीर, दहेज, नेता एवं उनके
चमचे, पुलिस एवं स्त्री जगत् आदि अनेक विषयों पर सामग्री उपलब्ध होती है इस
पत्रिका में गोस्वामी तुलसीदास जी आदि भारतीय महाकवियों की भांति शेक्सपियर
जैसे महान् यूरोपीय कवि की रचनाओं के संस्कृत अनुवाद के प्रकाशन की गौरवशाली
परम्परा का निर्वाह किया गया रहा है ।
‘संस्कृत
जगद्वार्ता’
के नाम से पूरे विश्व की संस्कृत गतिविधियों को विशेष स्थान संस्कृत की इस
पत्रिका में लगातार मिलता रहा है। इसके प्रधान सम्पादक जी की अमर रचना
‘भाति
में भारतम्’
दूरदर्शन पर आज भी हिट है । भारत के प्रायः हरेक प्रांत की राजधानी से संस्कृत
पत्रिकाएं निकल रही हैं । ललित लेख और सरस कविताओं के लिए म.प्र. की
‘दूर्वा’
अत्यंत लोकप्रिय हा । छत्तीसगढ़ संस्कृत बोर्ड द्वारा यह निर्णय लिया जा चुका
है कि यहां से भी ‘रत्नगर्भा’
नाम से एक पत्रिका शुभारंभ कर दिया जाए । ज्ञातव्य है कि अखिल भारतीय स्तर पर
एक ‘संस्कृत
पत्रकार संघ’
संगठित और सक्रिय है ।
यह सुखद सूचना
है कि साहित्य अकादमी नई दिल्ली भी संस्कृत कविता पर अभिकेंद्रित एवं
महत्वपूर्ण पत्रिका ‘संस्कृत-प्रतिभा’
नाम से प्रकाशित हो रही है । साहित्य के क्षेत्र में साहित्य अकादमी एक
सर्वमान्य संस्था है । यशस्वी कवि, लेखक और सम्पादक डॉ. भास्कराचार्य त्रिपाठी
मप्र संस्कृत अकादमी के सचिव पद का दायित्व तो वर्षों तक पूर्ण कौशल के साथ तो
निभाते ही रहे हैं, अंबिकापुर में रहते हुए रामगढ़ नाट्यशाला की अवधारणा और
मान्यता को सुस्थापित करने में भी उनकी अग्रणी भूमिका रही है । ऐसे
सुयोग्य सम्पादक को ‘संस्कृत
प्रतिभा’
का दायित्व देना संस्कृत पत्रकारिता के लिए वास्तव में शुभ लक्षण है।
दिल्ली से
संस्कृत के अनेकानेक पत्र-पत्रिकाएं निकलने का सिलसिला रहा है । दिल्ली संस्कृत
अकादमी की त्रैमासिक संस्कृत पत्रिका ‘मंजरी’
उनमें अन्यतम है । कविरत्न डॉ. श्रीकृष्ण जी सेमवाल के सम्पादकत्व में पत्रिका
ने विकास और उन्नति के नए लक्ष्यों को प्राप्त किया है । सामाजिक समस्याओं उनके
समाधानों और साहित्यिक विषयों के अतिरिक्त संस्कृत के साथ कृषि विज्ञान, भौतिक
शास्त्र, प्राणि विज्ञान, खगोल शास्त्र, वनस्पति विज्ञान,
गणित,
चिकित्सा शास्त्र, जल विज्ञान, सृष्टि प्रक्रिया, एनॉटॉमी और फिजियोलॉजी आदि के
तुलनात्मक अध्ययन पर भी लेख प्रकाशित किए जाते हैं । उत्कृष्ट और सुपस्पष्ट
छपाई एवं चित्र संयोजन इस पत्रिका की महती विशेषता है । अनेक आधुनिक एवं
वैज्ञानिक विषयों के साथ संस्कृत में उनकी मौजूदगी को रेखांकित कराते हुए अखिल
भारतीय सम्मेलन भी ‘पत्रिका’
प्रबंधन द्वारा पूर्ण सफलता के साथ कराए जा चुके हैं । यह सिलसिला जारी है ।
अनेक आयोजन अन्य प्रांतों के साथ संयुक्त रुप से भी दिल्ली राज्य शासन की
संस्कृत अकादमी के इस पत्रिका ने किए हैं ।
अनेक
शोध-पत्रिकाएं भी पूरे देश से और विदेशों में भी निकल रही हैं । दिल्ली के ही
श्रीलाल बहादुर शास्त्री केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित विश्वविद्यालय) से
भी ऐसी ही एक सत्रीय त्रैमासिक पत्रिका
‘शोध-प्रभा’
के नाम से निकल रही है । परंतु दिल्ली से ही निकलने वाली मासिक पत्रिका
‘संस्कृतामृतम्’
इसके यशःशेष सम्पादक पं.प्रभाकर रामरत्न जी शास्त्री के दिवंगत होने के साथ ही
बंद हो गई । शिमला से निकलने वाली मासिक सचित्र संस्कृत पत्रिका
‘दिव्यज्योति’
समसामयिक, शात्रीय लेखों धारावाहिकों के लिए प्रसिद्ध है । खास बात यह कि विषय
की दृष्टि से उच्च स्तरीय होते हुए भी ये पत्र-पत्रिकाएं मूल्य की दृष्टि के
बहुत सस्ती हैं । पंजाब के होशियारपुर का
‘विश्व
संस्कृतम्’
और महाराष्ट्र के अहमदनगर का ‘गुज्जारवः’
(दोनों त्रैमासिक) की वार्षिक सदस्यता 25 से 50 रुपए के अंदर है । लेखक ऐसे ही
अनेकानेक पत्रों का आजीवन सदस्य पाठक तथा लेखक भी हैं । कहना न होगा स्वतंत्रता
का जागरण किया । वह आज भी कम से कम मूल्य में भारतीय जीवन मूल्यों के संरक्षण,
संवर्धन के साथ भारतीय जन-मन की समस्याओं के समाधान में संलग्न है ।
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आचार्य डॉ.
महेशचंद्र शर्माः हिन्दी, संस्कृत और भाषा विज्ञान के
विद्वान प्रध्यापक । कई पुस्कतें
प्रकाशित । सामयिक विषयों पर भी
नियमित
लेखन । इन दिनों भिलाई में
रहते
हैं । संपर्कः 533/4,
स्मृति नगर, भिलाई, छत्तीसगढ़ - 490020
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