सूचना
युग से सामंजस्य की चुनौती
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डॉ. सुशील
त्रिवेदी
हम
जब अपने समय में जनसंपर्क की बात करते हैं तो सवाल उठता है कि आखिर जनसंपर्क है
क्या और जनसंपर्क क्या काम करता है ?
इन सवालों का जवाब आसान नहीं है। जनसंपर्क एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, जिसमें
परिस्थिति के अनुरूप उसका स्वरूप बदलता रहता है। परिस्थिति के अनुसार उसकी
प्राथमिकता, उसके साधन और उसके माध्यम बदल जाते हैं। जनसंपर्क व्यक्ति से शुरू
होकर परिवार, समूह और समुदाय के जरिए पूरी कौम तक विस्तारित होता है। यही वजह
है कि किसी भी दिये गये समय में किसी न किसी प्रक्रिया में जनसंपर्क के जरिए हर
व्यक्ति, हर परिवार, हर समूह और हर समुदाय संलग्न रहता है। कहा जाता है कि किसी
व्यक्ति के किसी स्थान पर पहुंचने से पहले उसकी प्रतिष्ठा संबंधी प्रतिकूल अथवा
अनुकूल धारणा पहले पहुंच जाती है। यह बात व्यक्ति से शुरू कर हर संगटन तक के
लिए प्रासंगिक है। एक बार यह बात हमारे ध्यान में आ जाती है तब यह स्पष्ट हो
जाता है कि जनसंपर्क का स्वरूप सर्वव्यापी और सार्वकालिक है।
गौर करने की
बात है कि जनसंपर्क के इतिहास के जो विवरण हैं, उनमें इतिहास कर्ताओं के
जनसंपर्क का विहंगम और अतिसरलीकृत विवरण दिया है जो एक रोचक कथा के रूप में
ज्यादा है। इन विवरणों में कुछ जनसंपर्क कर्मियों द्वारा सम्पादित अनूठे
कार्यों को और कुछ मनोहारी व्यक्तियों को प्रस्तुत किया गया है। अतः इन
ऐतिहासिक विवरणों से जनसंपर्क का वास्तविक स्वरूप नहीं उभरता । दरअसल, जनसंपर्क
एक ऐसी प्रक्रिया है जो अनंतकाल से चल रही है। हां जनसंपर्क के साधन, उसकी
विशिष्टता, उनके ज्ञान के विस्तार और जनसंपर्क के लिए किये जाने वाले प्रयासों
की सघनता हर समय में बदलती रहती है या यूं कहें कि इसमें विकासात्मक परिवर्तन
होता रहा । चाहे ग्रीस के दर्शन शास्त्री रहे हों, जिन्होंने अपने ग्रंथों में
‘जनता
की इच्छा’
के महत्व को प्रतिपादित किया हो, या फिर परवर्ती नागर संस्कृति को महत्व दिया
होः हम पाते हैं कि जनमत की हर समय में महत्व दिया जाता है।
नये युग की
पहचान के रूप में विकसित हो रहे बड़े व्यवसाय, बड़े उद्योग, बड़ी शासकीय
संस्थाओं और ऊंची शिक्षा के कारण जनमत पर प्रभाव डालने वाले व्यस्त हितों के
समूह भी बड़े हो गये हैं। ऐसे समय में मीडिया का स्वरूप और आकार भी बड़ा हो गया
है। छोटे समाचार पत्र, पत्रिकाओं और छोटे संचार समूहों के अस्तित्व और महत्व पर
सवालिया निशान लग रहा है। हर व्यक्ति और संगठन चाहता है। कि वह जिस पर्यावरण
में कार्य कर रहा है, उसमें सम्मिलित व्यक्तियों या अन्य संगठनों के बीच उसकी
प्रतिष्ठा बनी रहे। इस प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए या यूं कहें कि अपने मत
के लिए समर्थन पाने; अपने विरूद्ध मत को अपने अनुरूप बनाने और समान मत वालों के
साथ संबंधों को निरंतर अच्छा बनाये रखने की प्रक्रिया जनसंपर्क का मूल है।
जनसंपर्क
वास्तव में अच्छे कार्य और उत्तरदायित्वपूर्ण निष्पादन के आधार पर परस्पर
संतोषजनक संचार के जरिए जनमत को प्रभावित करता है। जनसंपर्क के लिए यह जरूरी
होता है कि पहले अच्छा कार्य किया जाये फिर श्रेय प्राप्त किया जाये। जनसंपर्क
के लिए ‘अच्छा
कार्य पहले फिर अच्छा शब्द’
जरूरी होते हैं और यहां आकर जनसंपर्क प्रोपेगैण्डा, पब्लिसिटी, विज्ञापन जैसी
एकांगी विधाओं से अलग होता है। हम सब जानते हैं कि प्रोपेगैण्डा, पब्लिसिटी,
विज्ञापन किस तरह भ्रामक हो सकते हैं यही वजह है कि विज्ञापनों पर भरोसा कम
होता है, प्रोपेगैण्डा कुछ समय के लिए होता है और पब्लिसिटी सीमित उद्देश्य के
लिए होता है।
पब्लिसिटी
वास्तव में जनसंपर्क का एक साधन है किंतु इस प्रकाशन या प्रचार के लिए यह जरूरी
है कि वह अच्छे उद्देश्यों वाला हो आर जनता
उसे
विश्वसनीय माने।
जनमत सिर्फ
शब्दों से नहीं बनता । उसके लिए वास्तविक घटना या कार्य जरूरी है । हमें
प्रकाशन या प्रचार को जनसंपर्क की समग्र संचार योजना के बड़े फलक के एक हिस्से
के रूप में लेना होगा । यदि हम कमजोर निष्पादन की भरपाई करने के लिए प्रचार को
अपनाते हैं तो वह प्रचार अपना उद्देश्य पूरा कर सकता । प्रचार को अच्छे कार्यों
को उबारा जाता है, कमजोरियों को दबाया जाता है। किंतु हमें मालूम है कि हमारे
सामने ऐसे दूसरे लोग भी होते हैं जो हमारी कमजोरियों को ज्यादा उभारते हैं।
प्रचार में बहुत शक्ति है पर वह सर्वशक्तिमान नहीं है। इसलिए प्रचार स्वयं होकर
किसी वस्तु, मत, अभियान को सफल नहीं बना सकता। हमारे सामने अनेक ऐसे उदाहरण हैं
जिनमें आभासी सफलता या क्षमताओं का बहुत ढिंढोरा पीटा गया किंतु जनता ने उसे
वास्तविक नहीं माना । इसलिए जनसंपर्क की मूल धारणा के अनुरूप जनमत को अपने पक्ष
में करने के लिए पब्लिसिटी या प्रचार ऐसा साधन है जिसका बहुत युक्तियुक्त
प्रयोग करना वांछनीय है। सूचना युग में गोपनीयता बनाए रखना बहुत कठिन है। हमारी
निजता पर टेक्रोलॉजी की कड़ी नजर है। हमारे समाज एवं संगठन में शिक्षा के कारण
आए परिवर्तन से अब यह संभव नहीं है कि तानाशाही ढंग से चीजों को दबा दिया जाये
। ऐसी परिस्थित में उपलब्धियों से रहित संगठन या व्यक्ति के लिए प्रचार को सफल
बनाना बहुत कठिन है। हम जिन मूल्यों और आदर्शों को अपनी दृष्टि से कभी ओझल न
करें। इसे यान में रखते हुए घटना के समाचार मूल्य को आंकना होगा। सूचना क्रांति
ने मीडिया को सर्वव्यापी बना दिया है। मीडिया की सर्वव्यापकता के कारण किसी
संगठन के लिए जनसंपर्क की योजना बनाते वक्त उसकी उपलब्धियों और कमजोरियों के
प्रति पूरी तौर पर सतर्क रहना अपरिहार्य है।
मैं इस बात को
रेखांकित करना चाहूंगा कि सभी विकासित देशों में जनसंपर्क के लिए आचार संहिता
बनी हुई है। यहां इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। किंतु यह संहिता वास्तव में
जनसंपर्ककर्मी का सच्चाई, यथार्थ, समता और जनता के प्रति उत्तारदायित्व के
प्रति समर्पण का शपथ पत्र है। केवल नेट और वर्ल्ड वाइल्ड लेब, सेटेलाइट आदि ने
संचार की तीव्रता और क्षमता को नए आयाम दिये हैं। इस वजह से जनसंपर्क अब
प्रयुक्त विज्ञान, परिष्कृत सामाजिक विज्ञान और परिपूर्ण प्रबंधन कला के समेकित
रूप में हमारे सामने हैं। हमें अपने अनुभव और अध्ययन को सूचना युग के अनुरूप
बनाना होगा। हम सूचना युग से ज्ञान युग की ओर बढ़ रहे हैं। यदि हमने सूचना
टेक्नोलॉजी द्वारा लाये ये विकास को नहीं अपनाया तो हम ज्ञान युग में प्रवेश
नहीं कर पायेंगे । जनसंपर्क को इस समय की टेक्नोलाजी द्वारा लगाये गये आर्थिक
सामाजिक परिवर्तनों से भी तालमेल बिठाना होगा अन्यथा हम पिछड़ जाएंगें ।
जनसंपर्क कर्मियों के लिए यही अवसर और यही चुनौती है।
डॉ.
सुशील त्रिवेदी :
पत्रकारिता एवं जनसंपर्क के
रास्ते प्रशासन के शीर्ष तक पहुंचने वाले डॉ.
त्रिवेदी ने तीनों ही
क्षेत्रों अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। संप्रति
छत्तीसगढ़ के राज्य
निर्वाचन आयुक्त हैं।
संपर्क : सी-2/2 शासकीय आवास,
देवेन्द्र नगर, रायपुर(छत्तीसगढ़)
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