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मीडिया विमर्श जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका  

(वर्ष 1, अंक - 2, दिस.06 - फर.07)

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विमर्श

 

 

 

भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में अंतरसंवाद

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अच्युतानंद मिश्र

 

 मकालीन भारतीय परिदृश्य में भारतीय भाषाओं के अंतरसंवाद की पड़ताल करना चाहें तो संवाद के  विद्यमान स्तर से हम आश्वस्त नहीं हो सकते । संवाद के इस तल पर चुनौतियां, जटिलताएं और संवादहीनता की खाइयां भी दिखती हैं । भाषाओं के परिवार में निंतर बढ़ती संवादहीनता, प्रश्नों को जन्म देती हैं । केंद्रीय प्रश्न यही उठता है कि स्वतंत्रता संग्राम में अंतर्भाषायी संवाद ने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष को जन-जन तक पहुंचाया था, पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं जिनमें यह अंतर्भाषायी संवाद, अवरोधों की चुनौतियों से निरंतर जूझता रहा है । प्रश्न यह भी उठता है कि भाषा नीति में ऐसे क्या तत्व रहे जिनसे अंतर्भाषी संवाद अपनी परिपक्व अवस्था प्राप्त नहीं कर पाये । प्रश्न यह है कि अंतर्भाषायी विमर्श उन्नत अवस्था में क्यों नहीं पहुंच पाया ? पत्रकारिता की भाषा आम नागरिक से जुड़ी रहती है, तो पत्रकारिता में भी अंतर्भाषायी अनुभवों को जोड़ने की साझा परंपरा व्यापक क्यों नहीं हो पायी ? प्रश्न यह भी है कि इन अवरोधों को दृष्टिगत रखते हुए हम चिंतन, विमर्श और सरोकारों के स्तर पर कल्पनाशीलता से सक्रिय वातावरण कैसे बनायें, जिनसे अंतर्भाषायी संवाद में विन्यस्त संभावनाएं साकार हो सकें ।

 

इन प्रश्नों पर विचार के लिए स्वतंत्रता का संघर्ष हमें ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि देता है और प्रेरणा भी । प्रमाणित है कि स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक संघर्ष को भारतीय भाषाओं की परस्पर साझेदारी ने सशक्त बनाकर अखिल भारतीय स्वरुप दिया था । विविध भारतीय भाषाओं में शिक्षित, भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत महापुरूषों ने विविधता में एकता के प्रतिमान स्थापित किया । राष्ट्रीयता के प्रसार में हिन्दी के महान योगदान को रेखांकित करते हुए संविधान सभा ने अनुच्चेद 343 में हिन्दी को राजभाषा की प्रतिष्ठा दी, पर उस अनुच्छेद में यह भी जोड़ दिया गया कि भारतीय गणतंत्र के शुरुआती पंद्रह बरसों में संघ शासन की राजभाषा अंग्रेजी रहेगी और हिन्दी को केंद्र की राजभाषा बनाने के लिए समीक्षा की जाएगी ।यह समीक्षा, राजनैतिक दलों की उदासीनता की शिकार बनी और हम आजतक राजनैतिक इच्छाशक्ति में हिन्दी के परिप्रेक्ष्य में संघ की भाषा बनाने की गंभीर पहल के अभाव को देखते हैं । स्पष्ट है, अंग्रेजों को बहिर्गमित करने के बाद, भारतवर्ष के पश्चिमोन्मुखी कुलीन वर्ग ने अंग्रेजी को स्थापित करने के लिए यह दुरभिसंधि की । केंद्र स्तर पर अगर हिन्दी राजभाषा  के रुप में स्थापित होती तो भारतीय भाषाओं में विचार विनिमय और साझेपन की परंपरा से अंतर-संवादों में हिन्दी संपर्क कड़ी की भूमिका निभा  पाती ।

 

समय के बदलावों के अनुरुप अपने को ढालने में भाषा की नियति समाज की आकांक्षाओं पर निर्भर करती है पर वह अन्य कारकों जैसे शासन वर्ग की नीति और बाजार तंत्र पर भी निर्भर करती है । जहां भाषायी परस्परता और संपूरकता ने औपनिवेशिकता से मुक्ति में ऐतिहासिक रुप से प्रभावशाली भूमिका निभाई, वहीं उत्तर औपनिवेशिकता, भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क भाषा के रुप में अंग्रेजी को स्थापित करने की पैरवी करने लगी । स्पष्ट है, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही अंग्रेजी को भारतीय संघ की राजभाषा के रुप में स्थापित करने की मनोवृत्ति उत्तर औपनिवेशिक मानस की ही उपज थी । पर यह भी सच है कि स्वायत्ता और विकास के आग्रहों से भारतीय भाषाओं की प्रगति की चुनौतियां मुखरित होने लगी थीं । इन चुनौतियों के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आयाम थे । इन भारतीय भाषाओं पर आधुनिक काल में हुए ज्ञान के विस्फोट के अनुसार ढलने के चौतरफा दबाव थे और विविध ज्ञानानुशासनों में रचे जा रहे ज्ञान को अपने शब्दों और कोटियों में ढालने की चुनौतियां भी ।

 

अंग्रेजी भाषा से तादाम्त्य करने वाले शासक वर्ग की नीतियों के फलस्वरुप कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने  लगा । इन शक्ति केंद्रों और सत्ता अभिकरणों की भाषा अंग्रेजी होने लगी । विडंबना यह हुई कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिन्दी भारतीय भाषाओं के मध्य प्रभावी संवाद सूत्र की तरह कार्य कर रही थी, हिन्दी के अपने पुरुषार्थ से अर्जित जगह अंग्रेजी को मिलने लगी ।

 

भारतीय भाषाएं अपनी प्रकृति में ही परस्पर निर्भर रही हैं और उनमें सांस्कृतिक संवाद की सदियों में विकसित परिपक्व परंपरा है । इसके बावजूद स्वतंत्र भारत वर्ष में यही भाषाएं अब अंग्रेजी की मध्यस्थता का मुंह जोह रही हैं । इस आरोपित और प्रत्यारोपित प्रवृत्ति का प्रतिरोध भी सशक्त और संगठित नहीं हो पाया है । इससे सांस्कृतिक अंतर्क्रिया भी प्रभावित हुई हैं ।

आज तकनीकी शब्दावली के अनुवादों में भी अंग्रेजी को प्रमाण मानने की बद्धमूल मानसिकता के कारण भाषाओं के सरकारी संस्करण व्यापक सार्वजनिक स्वीकार्यता प्राप्त नहीं कर पाये । स्पष्ट है, अंग्रेजी पर अवलंबित कर दी गई भाषाएं अपना सहज विस्तार नहीं कर पायी । इसके घातक प्रभावों में यह हुआ कि भाषाएं अपने विकास और विस्तार के लिए अंतर्भाषी संवाद से च्युत होकर, अंग्रेजी  के प्रभुत्व में एकांगी विकास करने लगीं । भौगोलिक निकटता और सांस्कृतिक आत्मीय साझेपन के बावजूद हम पाते हैं कि स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं का परंपरागत जीवंत संवाद कमतर होता गया और सामाजिक स्वेच्छा को  दरकिनार कर सरकारी अकादमियां उसकी दिशा तय करने लगीं । इन लगभग 6 दशकों में अंग्रेजी का राजभाषा के रुप में प्रभुत्व बढ़ गया  कि न केवल हिन्दी का विमर्श निर्बल हुआ कि राजभाषा बनाने की आकांक्षा अब शीर्ष स्तर पर विचारणीय भी नहीं रह गई है ।

 

अखिल भारतीयता की अवधारणा या राष्ट्रीय एकात्मता की संकल्पना व्यापक रुप से अंतर्भाषायी अंतर्क्रिया और संवाद पर ही निर्भर है और यही अवधारणा योरोपीय राष्ट्रवाद से भेद भी करती है । योरोपीय राष्ट्र जहां एक भाषा की संस्कृति पर निर्भर हैं, वहीं भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा भाषाओं की बहुलता, उनकी लोक संस्कृतियों के बीच परस्पर संवाद और अंतर्क्रिया पर निर्भर है । इसलिए आवश्यक है कि भाषाओं की विशिष्ट विरासत, ज्ञान और अनुभवों की उपलब्धियों का आदान-प्रदान बढे़ जिससे अंतर्भाषायी स्वतः स्फूर्त विमर्श भी विकसित हो ।

 

अंतर्भाषायी विमर्श को विकासमान बनाने के लिए आवश्यक होगा कि साहित्य के इतर अनुशासनों में भी परस्पर संवाद हो । अभी संवाद की परम्परा साहित्य मात्र में ही सक्रिय दिखती है और इसे भी अभी सहमति का आकार ग्रहण करना है । पत्रकारिता समाज में हो रहे परिवर्तनों, घटनाक्रमों को दर्ज और विश्लेषित करती है, पर उनकी समकालीनता समाज के विभिन्न स्तरों जैसे राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि को शक्ति केंद्रों के संदर्भ में घटित सूक्ष्म और स्थूल परिवर्तनों को भी रेखांकित करती है । इसलिए अंतर्भाषायी संवाद की अनिवार्यताओं में पत्रकारिता के विमर्श का आदान-प्रदान भी शामिल है । यह भाषायी विमर्श इसलिए भी महत्वपूर्ण है ताकि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से वैश्वीकरण ने जिन सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों को खड़ा किया है उसको पहचानते हुए प्रतिरोध की रणनीति बनाई जा सके ।

 

स्पष्ट है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति ने ही अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित करने की आधारशिला रखी और उत्तरोत्तर भारतीय भाषाओं को वर्नाक्यूलर के रुप में वर्गीकृत कर, उन्हें दोयम दर्जा दिये जाने की मनोवृत्ति को भी जन्म दिया । अंग्रेजी भाषा के संस्कारों में दीक्षित भारतीय कुलीन वर्ग ने ही सांस्कृतिक संवाद की निरंतरता को अवरुद्ध करते हुए अंग्रेजी को जन-मानस पर आरोपित किया । कुलीन वर्ग में निहित हीनताबोध ने ही अंग्रेजी को प्रभुत्व के स्तर पर पदस्थ किया ।

 

भारतीय भाषाओं में अंतरसंवाद को समझने के लिए भाषायी पत्रकारिता अच्छा संकेतक हो सकती है । स्वतंत्रता आंदोलन में भाषायी पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई है । भाषायी पत्रकारिता में संवाद भी बहुस्तरीय था । पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भाषायी पत्रकारिता में परस्परता की भावना और साझेपन को, पत्रकारिता प्रतिष्ठानों के नियंताओं ने उपेक्षित और हतोत्साहित किया । भाषायी पत्रकारिता में ही संभावना थी कि वह दूर ग्रामीण अंचलों से बसे आम आदमी के जीवन को और उसकी पीड़ा को अभिव्यक्त कर सकती थी। पर नगरीय बोध और विशेषकर महानगरीय मानसिकता के चलते, हिन्दी की समाचार एजेंसियां, अंग्रेजी के मुकाबले बहुत क दर पर मुहैया होने के बावजूद, नीतिगत उपेक्षा के कारण बंद होने को अभिशप्त हुई। समाचार पत्र संचालकों की नीति और मानसिकता के कारण अंग्रेजी समाचार एजेंसियां अपना प्रभुत्व जमाती गयीं और भाषायी पत्रकारिता में सेतु बनाने की जगह, सीधे अंग्रेजी से खबरों को लेने की प्रवृत्ति बढ़ी । अंग्रजी पत्रकारिता के नगरीय और विशिष्ट वर्ग आग्रह, भाषायी पत्रकारिता पर भी हावी लगा। कुछेक समाचारपत्र समूहों ने अपने हिन्दी समाचार पत्रों को अपने अंग्रेजी पत्रों का अनुवाद मात्र बनाने का दुस्साहस दिखलाया। जाहिर है, प्रतिरोध और बाजार की विफलता के चलते इस तरह की नीतियां सफल नहीं पायीं। स्पष्ट है कि सरकारी संस्कृति-नीतियों में भी, भाषिक संवाद को महत्व नहीं मिला। यदि भाषिक संवाद को पोषण-प्रोत्साहन मिलती तो भाषायी पत्रकारिता । अपनी संभावनाओं को साकार कर सकती थी।

 

 इसलिए जरूरत इस बात की है कि अंतर्भाषायी पत्रकारिता विमर्श विकसित हो, जिससे व्यापक स्तर पर सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संवाद हो सके। इससे राष्ट्रीय हित की समग्र दृष्टि और साझा संकल्पना विकसित हो सकेगी। खतरा भूमंडलीकरण का हो या राष्ट्रीय सुरक्षा का, भावी पीढ़ियों पर अंग्रेजी थोपने का हो या सांस्कृतिक बहुलता के नष्ट होने का, राष्ट्रीय चिंतन को झकझोरने वाले सवालों पर व्यापक संवाद हो सकेगा।

 

माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के लिए वह संतोष और प्रसन्नता की बात है कि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के बीच अंतरसंवाद की उसकी पहल को मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और जनसंपर्क संचालनालय का सहर्ष समर्थन और सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ। अब यह एक सामूहिक पहल है जो निम्न उद्देश्यों को प्राप्त करने की कोशिश करेगी ।

 

1.     अंतर्भाषायी पत्रकारिता  विमर्श की संभावनाओं को मूर्त रूप देना ।

2.     भाषायी पत्रकारिता  को अंग्रेजी पर निर्भरता से मुक्त करने के उपायों की खोज करना।

3.     विभिन्न भाषायी पत्राकारों के बीच संवाद और उनकी विशिष्ट उपलब्धियों से पूरे देश को अवगत कराना।

4.     भाषायी पत्रकारिता के विभिन्न शैक्षणिक केंद्रों में शोध और विमर्श की अंतर्क्रिया विकसित करने की संभावनाओं को आकार           देना।

 

(भोपाल में 14 सितंबर, 2006 को हिन्दी दिवस के अवसर पर आयोजित भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता  में अंतरसंवाद विषय पर प्रस्तुत किया गया आधार पत्र)

 

 

 

अच्युतानंद मिश्र : देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल के कुलपति हैं

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मानद सलाहकार संपादक-विश्वनाथ सचदेव संपादक-भूमिका द्विवेदी संपादक मंडल-श्रीकांत सिंह, गोपा बागची, पवित्र श्रीवास्तव

प्रबंध संपादक-चंदशेखर बघेल उपसंपादक-हेमंत पाणिग्राही वेब नियोजन- जयप्रकाश मानस

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