
चौहत्तर के उस अभूतपूर्व विवाद का असर यह हुआ कि अगले 36 बरस तक स्वीडी तो क्या किसी स्केंडेनेवियाई लेखक को भी नोबेल नहीं मिल पाया। लेकिन जिस एक स्वीडी लेखक को यह पुरस्कार मिल जाना पिछले लगभग दो दशकों से औपचारिकता भर रह गया था वे कवि टोमस ट्रांसट्रमर हैं। ट्रांसट्रमर पिछले कई बरसों से स्थायी उम्मीदवार रहे हैं, इस दौरान दो नोबेल सम्मानित कवि शीमस हीनी और डेरेक वॉल्कट उन्हें आधिकारिक रूप से नामांकित कर भी चुके थे।
उधर 1990 में हुए पक्षाघात के बाद न सिर्फ उनका जीवन उनके घर तक सीमित हो गया, उनकी बोलने की क्षमता भी काफी हद तक चली गयी। कुछ समय से यह माना जाने लगा था कि स्वीडिश अकादमी अपने ही देश और भाषा के महानतम जीवित कवि का सम्मान राजनैतिक संकोच के कारण नहीं कर पायेगी नहीं। ऐसे में ट्रांसट्रमर के घर कई बार बन चुके नोबेल पुरस्कार जीतने के माहौल को हकीकत बनाने वाला स्वीडिश अकादमी का इस बार का साहसी ‘पक्षपात’ पूरे संसार में कविता से उम्मीद रखने वाले अल्पसंख्यकों के लिये सुखद है।
तेईस बरस की उम्र में, 1954 में, पहली कविता पुस्तक प्रकाशित करने वाले इस विनम्र कवि को लगा कि कविता लिखकर अपना और परिवार का भरणपोषण कठिन होगा और उन्होंने एक ऐसा पेशा चुना जो कवि के रूप में उनके जीवन में सबस कम बाधा पहुंचाये। स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में धर्म, इतिहास और मनोविज्ञान पढ़ चुके कवि ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा युवा कैदियों, ड्रग एडिक्टों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के बीच मनोविज्ञानी के रूप में काम करते हुए बिताया है। इस काम में उन्हें ऐसे लोग तो नहीं मिलते थे जिनकी कोई दिलचस्पी उनकी कविता में हो, लेकिन इन अनुभवों ने उनके जीवन और भाषा के बारे में उनकी समझ को गहरे तक प्रभावित किया। काम के दौरान उनका सामना लगातार इस अनुभव से हुआ कि विलक्षण परिस्थितियों से गुजर चुके लोग अपने अनुभव को व्यक्त करने की कोशिश में भाषा की, वाक्य की संरचनात्मक जकड़ से बचने की कोशिश करते हैं। उन्हें अहसास हुआ कि भाषा पहले से किसी के आधिपत्य में होती है, अक्सर उनके जिनके हाथ में दंड देने की सत्ता होती है। उनके अपने शब्दों में, ‘भाषा सजा देने वालों के साथ कदमताल करती है। इसीलिये अपने लिये नयी भाषा पाना अनिवार्य है।’
ट्रांसट्रमर का भाषा के साथ संबंध एक स्तर पर अगर मनोविज्ञानी के रूप में उनके काम ने पारिभाषित किया है तो दूसरे स्तर पर संगीत ने। उम्रभर शौकिया पिआनोवादक रहे टोमस अब संसार से बात अगर कविता के अलावा अपनी पत्नी के मार्फत करते हैं तो खुद से बात शायद पिआनो के मार्फत। उनका सिर्फ बायाँ हाथ ठीक से काम करता है और उस बाँये हाथ की उंगलियों की पिआनो पर हरकत हो सकता है आने वाले समय में उनकी सबसे मार्मिक कविता, सबसे सुंदर छवि के रूप में अंकित हो जाये।
ट्रांसट्रमर की कविता इसलिये भी अकादमी के लिये एक मुश्किल चयन साबित हुई कि वह अगर ‘अराजनैतिक’ नहीं हैं तो सीधे-सीधे राजनैतिक भी नहीं हैं। प्रति, इतिहास, स्मृति और मृत्यु के बारे में रूपकों से रौशन भाषा में लिखने वाले इस कवि ने जीवन के किसी भी अभिप्राय को, उसके किसी भी अर्थ को जीवन की अपरिहार्य क्षुद्रता की संगति में पढ़ने की कोशिश की है। वे बहुत सारे समकालीनों की तरह मेटाफिजिक्स से दामन नहीं बचाते, लेकिन उनके पास कोई रहस्यमय, आविष्ट औदात्य भी नहीं है। वे हर इबारत को क्षुद्रता से इस तरह उत्तीर्ण करते हैं कि उनकी कविता पढ़ते हुए आपको लगता है एक मनुष्य के रूप में आपका कद थोड़ा ऊंचा हो गया है, आपका अंत:करण थोड़ा फैल गया है।
स्वीडन का सर्द, उदास भूदृश्य, बेरहम मौसम, जंग लगी पुरानी कारें, कारखाने, मशीनें इस कविता में पाया जाने वाला सामान है। उनकी कविता गहरे दबी चीजों और जगहों के पास, उनके बीच के अवकाशों में जाती है और उन्हें आत्मीय बना लेती है। खुद ट्रांसट्रमर अपनी कविताओं को ऐसी मिलनस्थली मानते हैं जहाँ अंतरंग और बहिरंग, अंधेरा और रोशनी इस तरह मिलते हैं कि वहाँ इतिहास संसार या मनुष्य के बारे में कोई नया औचक अर्थ-संकेत उपस्थित हो जाता है।
संगीत-सा लिखने की कोशिश में रची गयी उनकी महाकाव्यात्मक कविता ‘बाल्टिक्स’ का भूगोल बाल्टिक समुद्र, स्वीडी द्वीपसमूहों और गोटलैंट द्वीप को घेरता है। समंदर और सरजमीं के बीच के तनाव को यह कविता बीसवीं शताब्दी की तानाशाहियों और शीतयुद्धीय कूटनीति की स्क्रीन पर आरोपित कर देते हैं। शायद बाल्टिक एक काव्य-दस्तावेज के रूप में अधिक समय जीवित रहेगी, लेकिन विपुल के बजाय सघन लिखने वाले टोमस जिनका समूचा वांग्मय एक मोटी पॉकेट बुक में समा सकता है, शायद पैने बिम्बों और रूपकों से बुनी अपनी छोटी कविताओं के लिये ही सबसे ज्यादा याद किये जायेंगे। एक ऐसे समय में जब कविता रूपकों से अपसरण कर रही है, जब कवि अपने बिम्बों पर धीरज से किसी कारीगर की तरह काम करने का कौशल न सिर्फ भूलते जा रहे हैं बल्कि उसका मजाक भी उड़ा रहे हैं, इस बिम्ब-सघन, रूपक-दीप्त, बेचैन कविता का वृहत्तर पाठकों तक पहुंचने का रास्ता खुलना एक महत्वपूर्ण घटना है। यह रूपकों का ही नहीं, कविता के अपनी विधि से समाजनैतिक होने के पुराने आत्मविश्वास का भी सम्मान है।
(लेखक युवा कवि हैं। उनका यह आलेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है। वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया जा रहा है।)
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