संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक, आज इस दुनिया की आबादी सात अरब हो गई है। लेकिन यह ऐतिहासिक घटना हमें भारी चुनौतियों की भी याद दिलाती है। खासतौर पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उपजी उन चुनौतियों की, जिनकी पैदाइश ही धरती पर बेतहाशा बढ़ती आबादी की वजह से ही हुई है।
जनसंख्या वृद्धि से एक और रुझान सामने आया है- ग्रामीण आबादी का पलायन और शहरी आबादी का बढ़ना। वर्ष 1800 में दुनिया की तीन फीसदी से भी कम आबादी शहरों में रहती थी, जबकि वर्ष 2008 के अंत तक यह आबादी 50 फीसदी से भी ऊपर पहुंच चुकी थी। अब एक करोड़ या उससे ज्यादा की आबादी वाले 26 महानगर हो गए हैं। इसमें टोकियो, गुआनजाओ, सिओल, शंघाई, दिल्ली, मुंबई, मनीला, जाकार्ता, कराची, ओसाका, ढाका, कोलकाता और बीजिंग शामिल हैं।

महानगरों की आर्थिक कामयाबी के बावजूद दुनिया भर की सरकारें बुनियादी सवालों से हर स्तर पर दो-चार हो रही हैं। मसलन, क्या यह लगातार मुमकिन है कि भोजन, पानी और सेहत की जरूरतों को रोजाना पूरा किया जा सके? क्या जलवायु परिवर्तन से बिगड़े पर्यावरणीय माहौल को लेकर महानगरों की संवेदनशीलता से जूझना आसान है? चिंता की कई वजहें हैं। इस साल जापान में आए सुनामी ने टोकियो को मजबूर कर दिया है कि वह परमाणु ऊर्जा और शहरों की सुरक्षा के प्रति अपने नजरिये पर फिर से विचार करे। साल 2003 में पेरिस में लू का भयंकर प्रकोप रहा, क्योंकि समाज और प्रशासन, दोनों ने ही इस तरह के मौसम से लड़ने की तैयारी नहीं की थी। इस सदी के दौरान दुनिया भर में महानगरों की तादाद बढ़ेगी। उसी तरह, कई और शहरी आबादी में भी वृद्धि होगी। लाजिमी है कि इससे ऊर्जा की मांग ज्यादा होगी। खाद्य आपूर्ति, पानी, औद्योगिक संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ऊर्जा पर जोर रहेगा। परिवहन के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होगी। उधर, ग्लोबल वार्मिग की एक वजह कार्बन उत्सर्जन भी है। जलवायु से जुड़े खतरे हमारे सामने ही हैं। चीन में देहात से लोगों को पलायन करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। इस वजह से महज पांच वर्षो में वहां शहरों की तादाद दोगुनी हो गई है। शहरी इलाकों में हीट आइलैंड इफेक्ट भी बढ़ा है। हीट आइलैंड इफेक्ट का अर्थ किसी शहर का तापमान वैश्विक व राष्ट्रीय भूमि क्षेत्र के तापमान की वृद्धि दर से तिगुना हो जाना है।
समुद्र-नदी के किनारे बसे महानगरों के सामने अपने तटीय इलाकों को महफूज रखना सबसे बड़ी चुनौती है। समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है। नदियों का पानी भी बढ़ोतरी पर है। इसलिए बैंकॉक में बाढ़ ने जिस तरह की तबाही मचाई, उसकी पुनरावृत्ति कहीं भी हो सकती है। वैसे इस तरह के प्राकृतिक हादसे हमने पहले भी देखे हैं। छह साल पहले न्यू ओरलैंस में कैटरीना तूफान ने तटीय इलाकों को लील लिया था। उस वक्त न तो उचित सुरक्षा इंतजाम थे और न ही बाढ़ चेतावनी तंत्र। इस तरह के आसन्न संकटों वाले देश में शोधकर्ताओं की एक बड़ी जमात ऐसी समस्याओं से निपटने की तैयारी कर रही है। नीदरलैंड इसकी मिसाल है। वहां की डेल्ट यूनिवर्सिटी के हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की टीम एक ऐसी प्रणाली बनानी में जुटी है, जो हादसों की पूर्व चेतावनी जारी करे और निगरानी रख सके।
हमें यह जान लेना चाहिए कि जितना बड़ा शहरी इलाका होगा, प्राकृतिक आपदाओं से उतनी ही बड़ी तबाही होगी। अगर सही चेतावनी प्रणाली हो, तब भी जान-माल की तेजी से रक्षा नामुमकिन है। हाल ही में ह्यूस्टन में आए तूफान ने साफ किया कि आंधी और बाढ़ के संयुक्त खतरों से आगाह होने के बावजूद लोगों के पास काफी कम वक्त बचा था कि वे सुरक्षित इलाकों में शरण ले सकें। इसलिए भी शहरों पर यह दबाव बढ़ा है कि आपात स्थिति के लिए पनाहगाहों का निर्माण हो। इंग्लैंड का कैनवे द्वीप इसका बेहतरीन उदाहण है। इस द्वीप ने चारों तरफ से किलेबंदी कर ली है, ताकि वह 1953 की तर्ज पर आई बाढ़ का मुकाबला कर सके।
अधिकतर मामलों में शरणस्थल कामचलाऊ ही होते हैं। तभी तो, इंजीनियर और योजनाकार इस बात पर गहनता से विचार कर रहे हैं कि उन आपात केंद्रों को कैसे डिजाइन किया जाए। इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि इन्हें कैसे परिवहन समेत शहरी तंत्र से जोड़ा जाए। लोगों को इन केंद्रों के इस्तेमाल की ट्रेनिंग भी मिलनी चाहिए। इसी तरह के मिलते-जुलते शरणालयों ने बांग्लादेश की बड़ी आबादी को चक्रवात और बाढ़ से बचाया है।
हाल ही में दुनिया भर के महानगरों में कई विपदाएं आईं और वहां की सरकारें उनसे पार पाने में विफल रहीं। इसलिए अब सरकारें हरेक स्तर पर कई विपदाओं से लड़ने की योजना बना रही हैं। इसके अलावा पर्यावरणीय कारकों से निबटने के लिए भी रणनीति बनाई जा रही है। यहां तक कि कई शोध टीमें सिस्टम डायनेमिक्स के निर्माण में सहयोग कर रही हैं। इस तरह के मॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण, सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के क्रियान्वयन के लिए होंगे। इनमें वैश्विक जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी आर्थिक तरक्की के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम होंगे।
लंदन का महापौर कार्यालय भी कई योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रहा है, जो लंदन का सुरक्षित विस्तार दे सके। दूसरी ओर, कई दूसरे शहरों में वायु की गुणवत्ता को मापने के लिए जटिल यंत्रों का सहारा लिया जा रहा है। इसके जरिये जनता को जागरूक बनाया जा रहा है कि कैसे उनके शहर का पर्यावरण हर घंटे बदल रहा है। इन मॉडलों में सामाजिक-आर्थिक व पर्यावरणीय आंकड़ों की उपलब्धता हो, यह जरूरी है। यहां यह बताना जरूरी है कि कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, मसलन विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व मौसम विभाग और कई देशों की सरकारों को आपसी एकजुटता दिखानी होगी और आधुनिक मीडिया का अधिकतम इस्तेमाल करना होगा। नया मीडिया बेहतर तरीके से उन आंकड़ों को दिखाने में सक्षम है कि कैसे आम लोग दोनों तरह की विपदाओं को ङोल रहे हैं। एक तरफ, टॉरनेडो का खतरा तेजी से बढ़ा है। वहीं दूसरी तरफ खेतों में नमक की मौजूदगी और समुद्र का जल-स्तर बढ़ने से फसलों की बरबादी हो रही है। हालांकि यहां खतरा धीमा है, पर जानलेवा है। सौभाग्य से महानगरों के पास सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए वैश्विक संगठन हैं। इसका नाम सी-40 सिटीज है। आने वाले वक्त में मुख्य उद्देश्य यही होना चाहिए कि आसन्न खतरों से निपटने की योजना में अंतर-शहरी सहयोग को तरजीह मिले। इसके अलावा दुनिया भर की सरकारों पर अधिक दबाव डाला जाए, ताकि हादसों के दौरान कूटनीतिक व वित्तीय मदद प्रमुखता से उपलब्ध हों।
जनसंख्या वृद्धि से एक और रुझान सामने आया है- ग्रामीण आबादी का पलायन और शहरी आबादी का बढ़ना। वर्ष 1800 में दुनिया की तीन फीसदी से भी कम आबादी शहरों में रहती थी, जबकि वर्ष 2008 के अंत तक यह आबादी 50 फीसदी से भी ऊपर पहुंच चुकी थी। अब एक करोड़ या उससे ज्यादा की आबादी वाले 26 महानगर हो गए हैं। इसमें टोकियो, गुआनजाओ, सिओल, शंघाई, दिल्ली, मुंबई, मनीला, जाकार्ता, कराची, ओसाका, ढाका, कोलकाता और बीजिंग शामिल हैं।

महानगरों की आर्थिक कामयाबी के बावजूद दुनिया भर की सरकारें बुनियादी सवालों से हर स्तर पर दो-चार हो रही हैं। मसलन, क्या यह लगातार मुमकिन है कि भोजन, पानी और सेहत की जरूरतों को रोजाना पूरा किया जा सके? क्या जलवायु परिवर्तन से बिगड़े पर्यावरणीय माहौल को लेकर महानगरों की संवेदनशीलता से जूझना आसान है? चिंता की कई वजहें हैं। इस साल जापान में आए सुनामी ने टोकियो को मजबूर कर दिया है कि वह परमाणु ऊर्जा और शहरों की सुरक्षा के प्रति अपने नजरिये पर फिर से विचार करे। साल 2003 में पेरिस में लू का भयंकर प्रकोप रहा, क्योंकि समाज और प्रशासन, दोनों ने ही इस तरह के मौसम से लड़ने की तैयारी नहीं की थी। इस सदी के दौरान दुनिया भर में महानगरों की तादाद बढ़ेगी। उसी तरह, कई और शहरी आबादी में भी वृद्धि होगी। लाजिमी है कि इससे ऊर्जा की मांग ज्यादा होगी। खाद्य आपूर्ति, पानी, औद्योगिक संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ऊर्जा पर जोर रहेगा। परिवहन के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होगी। उधर, ग्लोबल वार्मिग की एक वजह कार्बन उत्सर्जन भी है। जलवायु से जुड़े खतरे हमारे सामने ही हैं। चीन में देहात से लोगों को पलायन करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। इस वजह से महज पांच वर्षो में वहां शहरों की तादाद दोगुनी हो गई है। शहरी इलाकों में हीट आइलैंड इफेक्ट भी बढ़ा है। हीट आइलैंड इफेक्ट का अर्थ किसी शहर का तापमान वैश्विक व राष्ट्रीय भूमि क्षेत्र के तापमान की वृद्धि दर से तिगुना हो जाना है।
समुद्र-नदी के किनारे बसे महानगरों के सामने अपने तटीय इलाकों को महफूज रखना सबसे बड़ी चुनौती है। समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है। नदियों का पानी भी बढ़ोतरी पर है। इसलिए बैंकॉक में बाढ़ ने जिस तरह की तबाही मचाई, उसकी पुनरावृत्ति कहीं भी हो सकती है। वैसे इस तरह के प्राकृतिक हादसे हमने पहले भी देखे हैं। छह साल पहले न्यू ओरलैंस में कैटरीना तूफान ने तटीय इलाकों को लील लिया था। उस वक्त न तो उचित सुरक्षा इंतजाम थे और न ही बाढ़ चेतावनी तंत्र। इस तरह के आसन्न संकटों वाले देश में शोधकर्ताओं की एक बड़ी जमात ऐसी समस्याओं से निपटने की तैयारी कर रही है। नीदरलैंड इसकी मिसाल है। वहां की डेल्ट यूनिवर्सिटी के हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की टीम एक ऐसी प्रणाली बनानी में जुटी है, जो हादसों की पूर्व चेतावनी जारी करे और निगरानी रख सके।
हमें यह जान लेना चाहिए कि जितना बड़ा शहरी इलाका होगा, प्राकृतिक आपदाओं से उतनी ही बड़ी तबाही होगी। अगर सही चेतावनी प्रणाली हो, तब भी जान-माल की तेजी से रक्षा नामुमकिन है। हाल ही में ह्यूस्टन में आए तूफान ने साफ किया कि आंधी और बाढ़ के संयुक्त खतरों से आगाह होने के बावजूद लोगों के पास काफी कम वक्त बचा था कि वे सुरक्षित इलाकों में शरण ले सकें। इसलिए भी शहरों पर यह दबाव बढ़ा है कि आपात स्थिति के लिए पनाहगाहों का निर्माण हो। इंग्लैंड का कैनवे द्वीप इसका बेहतरीन उदाहण है। इस द्वीप ने चारों तरफ से किलेबंदी कर ली है, ताकि वह 1953 की तर्ज पर आई बाढ़ का मुकाबला कर सके।
अधिकतर मामलों में शरणस्थल कामचलाऊ ही होते हैं। तभी तो, इंजीनियर और योजनाकार इस बात पर गहनता से विचार कर रहे हैं कि उन आपात केंद्रों को कैसे डिजाइन किया जाए। इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि इन्हें कैसे परिवहन समेत शहरी तंत्र से जोड़ा जाए। लोगों को इन केंद्रों के इस्तेमाल की ट्रेनिंग भी मिलनी चाहिए। इसी तरह के मिलते-जुलते शरणालयों ने बांग्लादेश की बड़ी आबादी को चक्रवात और बाढ़ से बचाया है।
हाल ही में दुनिया भर के महानगरों में कई विपदाएं आईं और वहां की सरकारें उनसे पार पाने में विफल रहीं। इसलिए अब सरकारें हरेक स्तर पर कई विपदाओं से लड़ने की योजना बना रही हैं। इसके अलावा पर्यावरणीय कारकों से निबटने के लिए भी रणनीति बनाई जा रही है। यहां तक कि कई शोध टीमें सिस्टम डायनेमिक्स के निर्माण में सहयोग कर रही हैं। इस तरह के मॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण, सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के क्रियान्वयन के लिए होंगे। इनमें वैश्विक जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी आर्थिक तरक्की के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम होंगे।
लंदन का महापौर कार्यालय भी कई योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रहा है, जो लंदन का सुरक्षित विस्तार दे सके। दूसरी ओर, कई दूसरे शहरों में वायु की गुणवत्ता को मापने के लिए जटिल यंत्रों का सहारा लिया जा रहा है। इसके जरिये जनता को जागरूक बनाया जा रहा है कि कैसे उनके शहर का पर्यावरण हर घंटे बदल रहा है। इन मॉडलों में सामाजिक-आर्थिक व पर्यावरणीय आंकड़ों की उपलब्धता हो, यह जरूरी है। यहां यह बताना जरूरी है कि कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, मसलन विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व मौसम विभाग और कई देशों की सरकारों को आपसी एकजुटता दिखानी होगी और आधुनिक मीडिया का अधिकतम इस्तेमाल करना होगा। नया मीडिया बेहतर तरीके से उन आंकड़ों को दिखाने में सक्षम है कि कैसे आम लोग दोनों तरह की विपदाओं को ङोल रहे हैं। एक तरफ, टॉरनेडो का खतरा तेजी से बढ़ा है। वहीं दूसरी तरफ खेतों में नमक की मौजूदगी और समुद्र का जल-स्तर बढ़ने से फसलों की बरबादी हो रही है। हालांकि यहां खतरा धीमा है, पर जानलेवा है। सौभाग्य से महानगरों के पास सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए वैश्विक संगठन हैं। इसका नाम सी-40 सिटीज है। आने वाले वक्त में मुख्य उद्देश्य यही होना चाहिए कि आसन्न खतरों से निपटने की योजना में अंतर-शहरी सहयोग को तरजीह मिले। इसके अलावा दुनिया भर की सरकारों पर अधिक दबाव डाला जाए, ताकि हादसों के दौरान कूटनीतिक व वित्तीय मदद प्रमुखता से उपलब्ध हों।
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