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 रथ आवाम से नहीं जोड़ता, जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परंपरा में रावण रथी है, और रघुवीर विरथ। फिर लालकृष्ण आडवाणी बिना घोड़ों के रथ पर सवार होने को क्यों आतुर हैं? आडवाणी जी ‘आदि रथयात्री’ हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं। आखिर क्यों वे संघ और भाजपा के तमाम शर्तों के बावजूद रथ पर सवार हो रहे हैं?

देश उस मुकाम पर है जहां से राजनीति के सूत्र युवाओं के हाथ जा रहे हैं। देश के 72 करोड़ 99 लाख मतदाताओं में 50 प्रतिशत युवा हैं। राहुल गांधी मुकाबले में हैं। युवा आगे देख रहा है। रथ पीछे ले जाता है। इसलिए आडवाणी की रथयात्रा युवावर्ग को लुभाती नहीं है। शायद इसी सोच से संघ और भाजपा अपना नेता बदलना चाहते हैं। वे दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपना चाहते हैं। दरअसल आडवाणी जी दो परिवारों के बीच फंसे हैं। एक उनका अपना परिवार है, जो उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है। उनकी दलील है कि मोरारजी तो 83 की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। फिर दादा की सेहत अच्छी है। दिमाग दुरुस्त है। दूसरा है संघ परिवार, जो किसी कीमत पर आडवाणी को अब मुख्यधारा में रहने देना नहीं चाहता। यही वजह है कि 11 अक्टूबर से निकलने वाली उनकी रथयात्रा इस बार कोई माहौल पैदा नहीं कर पा रही है। पार्टी के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने हाथ खींच लिए हैं। पार्टी का यह रुख देख आडवाणी जी ने रथयात्रा नीतीश कुमार के हवाले कर दी है।


लालकृष्ण आडवाणी ने निश्चित तौर पर भाजपा को सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ दिन दिखाए हैं। जनसंघ से भाजपा तक उनका योगदान बेजोड़ रहा है। उनकी पहली रथयात्रा ने पूरे देश में रामजान्मभूमि आंदोलन के लिए एक उफान पैदा किया था। आडवाणी की खुद की यात्रा भी कम रोचक नहीं है। पहले वह अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे। फिर उनके समकक्ष हुए। बाद में प्रतिद्वंद्वी बने। यह संयोग है कि वाजपेयी के प्रतिद्वंद्वी बनने के बावजूद आडवाणी तभी तक ताकतवर थे, जब तक वे वाजपेयी की छाया में थे। बाद में उन्हे लगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए अटल जैसा उदार चेहरा चाहिए। इसके लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा ले लिया। बस यहीं से गड़बड़ हुई। इसके बाद संघ ने उनसे राजनैतिक नेतृत्व जबरन दूसरी पीढ़ी को दिलवाया। फिर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छीनी।


अब आडवाणी क्या करें? एक- उन्हें चुनाव न लड़ने की घोषणा करनी चाहिए। दो- उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का ऐलान करना चाहिए। खुद को सत्ता की दौड़ से बाहर बताना चाहिए। दरअसल लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह तय करने का वक्त आ गया है कि वे राजनीति से सुनील गावस्कर की तरह शतक लगाकर रिटायर होंगे। या कपिलदेव की तरह रिटायर किए जाएंगें। फिलहाल, उनका रास्ता कपिलदेव की ओर जा रहा है।
(लेखक इंडिया टीवी के न्यूज डायरेक्टर हैं)
 
         
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