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ये मान्यताएं-परमपरांए उपस्थित उदाहरण राष्ट्रपति के लिए इच्छित या नामित शख्सियत की समाजसेवा के क्षेत्र में प्रेरणादायी लकरें खींचने और व्यक्तिगत मोह-माया से विरक्त होने की है। इस कसौटी पर अब तक राष्ट्रपति पद पर बैठी सभी शख्सियतें खरी उतरी हैं। पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद महान स्वस्तंत्रता सेनानी के साथ ही साथ विद्ववता के अतुलनीय उदाहरण थे। दूसरे राष्ट्रपति राधाकृष्णन भी विद्वान थे। राधाकृष्णन के जन्मदिन को ‘शिक्षक दिवस ‘ के रूप में देश मानाता है। डा शंकर दयाल शर्मा भी प्रंचड विद्वान थे। वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ रही हैं। राष्ट्रपति बनने के पहले प्रतिभा पाटील राजस्थान की राज्यपाल थी और अपने पूर्णकालिक राजनीतिक जीवन में कई राजनीतिक-संवैधानिक पदों का नेतृत्व कर चुकी हैं। चूंकि राजनीति समाजसेवा का सर्वोत्तम माध्यम है। इसलिए सिर्फ डा. एपीजे अव्दुल कलाम को छोड़कर राष्ट्रपति पद पर बैठने वाली सभी शख्सियतें या तो पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ थे या फिर स्वतंत्रता सेनानी। डा. अब्दुल कलाम गैर राजनीतिज्ञ जरूर थे पर वे व्यापारी कदापि नहीं थे और न ही उनका उद्देश्य जैसे-तैसे पैसा कमाकर झोली भरना था। डा. अब्दुल कलाम मिसाइल मैन हैं, जिनके योगदान से देश की सुरक्षा चाकचौबंद हुई है। राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी डा. अब्दुल कलाम आज भी प्रेरणादायी शख्सियत हैं और इनकी सक्रियता से दिन-प्रतिदिन नयी मान्यताएं-नयी लकीरें स्थापित हो रही हैं।
अब थोड़ा प्रकाश नारायणमूर्ति के व्यक्तित्व पर : नारायणमूर्ति की तुलना राष्ट्रपति पद पर बैठी अब तक की शख्सियतों की कसौटी पर होनी चाहिए? नारायणमूर्ति की जमा पूंजी की उन कारकों की चर्चा पहले, जिनसे उनकी नकारात्मक तस्वरें हमारे सामने होती हैं। ‘जन गण-मन हमारा राष्ट्रगान है। देश का प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रगान पर सिर नवाता है। राष्ट्रगान देश के मान-सम्मान और गौरव की थाथी होता है। जिस व्यक्ति या जिस संस्थान को अपने देश के राष्ट्रगान से नफरत हो या फिर उससे नुकसान होने की चिंता उसे सताती हो वैसे व्यक्ति को राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठने की इच्छा को क्या माना जाना चाहिए? राष्ट्रगान से हेट करने वाले और अपने व्यापारिक साम्राज्य के लिए हानि मानने वाले व्यापारी को क्या देश का नागरिक माना जाना चाहिए? सिर्फ कोई जन्म लेने मात्र के प्रमाण पत्र से देश का नागरिक नहीं हो जाता है। नागरिक होने का कर्तव्य भी निभाना होता है।
पूरा प्रकरण यह है कि देश के तत्कालीन राष्ट्रपति का एक बार कार्यक्रम नारायणमूर्ति के ग्लोबल साम्राज्य ‘इन्फोंसिस‘ के दफ्तर में होता है। राष्ट्रपति के आगमन पर इन्फोसिस के दफ्तर में राष्ट्रगान का कार्यक्रम नहीं हुआ। विवाद बढ़ने पर इन्हीं नारायण मूर्ति ने सीधेतौर पर कहा था कि राष्ट्रगान जन-गण-मन का कार्यक्रम नुकसानदेह था क्योंकि हमारा ‘इन्फोसिस‘ ग्लोबल ब्रांड है इस ग्लोबल ब्रांड में भारतीय ही नहीं विदेशी भी काम करते हैं। राष्ट्रगान के कार्यक्रम से इन्फोसिस में काम करने वाले विदेशियों की भावनाएं आहत होती और हमारा ग्लोबल छवि खराब होती। सौ प्रतिशत साफ है कि नारायणमूर्ति की राष्ट्रगान की कसौटी पर व्यापार था-लाभार्थ था। नारायण मूर्ति की व्यापारिक लाभ के सामने राष्ट्रगान की अस्मिता हार गयी थी। क्या आपने ब्रिटने-अमेरिका या अन्य देशों के व्यापारियों को अपने देश के राष्ट्रगान या गौरव के चिन्हों-कारकों से हेट करते हुए सुना है? क्या बिल गेट्स ने कभी कहा है कि वे अपने देश के गौरव चिन्हों से हेट है क्योंकि उनकी कंपनी माइक्रोसाफ्ट में विदेशी काम करते हैं?
व्यापार-व्यापारी का मूल उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। जहां लाभ अर्जित करने का मूल उद्देश्य हो वहां पर जरूरी सभी प्रकार की अहर्ताएं/मान-मार्यादाएं दम तोड़ती है। प्रेरणादायी श्रृखंलाओं को स्थापित होने की उम्मीद ही नहीं हो सकती है। नारायण मूर्ति अपने आईटी व्यापार को चमकाने और स्थापित करने के लिए कितनी अहर्ताएं तोड़ी होंगी और कितनी मान-मार्यादाएं दफन की होंगी? इनके साम्राज्य में इनकम-सेल टैक्स की कितनी कहानियां बनी-बिगड़ी होंगी? यह सब तो वही जानते होंगे। आज जितनी भी व्यापारिक मीनारें खड़ी हुई हैं उन सभी का काले कारनामे जनमानस में तैरतै रहे हैं। टाटा व्यापारिक घाराने को साफ-सुथरा और प्रेरक श्रृखंलाएं मानी जाती थी। नीरा राड़िया-रतन टाटा संवाद प्रणय ने टाटा की ईमानदारी और प्रेरणादायी श्रृखंलाएं होने की सारी गलतफहमियां तार-तार कर छोड़ा। आईटी का क्षेत्र नया था। पहले इस क्षेत्र में प्रतिद्वंद्विता भी तो नहीं थी। इसका परिणाम यह हुआ कि नारायण मूर्ति का आईटी का व्यापार दिन गुनी रात चौगुनी बढ़ता चला गया। इन्फोसिस सहित सभी भारतीय आईटी कंपनियों पर लालच-लोभ में गोपनीयता के हनन का आरोप भी लगे हैं। एक आईटी कंपनी ‘सत्यम‘ की कारस्तानी जगजाहिर है, जिसने फर्जी बैलेंसशीट से किस प्रकार से शेयर धारकों को चूना लगाया था। एक बात यह भी है कि आईटी क्षत्र में बूम का लाभ देश का सभ्रांत परिवारों ने उठाया है। गरीब के बच्चे की तकदीर कहां है कि लाखों खर्च कर खर्चीली आईटी की पढ़ाई कर सकें। क्या गरीब बच्चों को आईटी शिक्षा के लिए नारायण मूर्ति ने कोई झोली खोली है? कोई दरियादिली दिखायी है? गरीब और दलित-पिछड़ी जातियों के लिए निजी क्षेत्रों में आरक्षण की मांग होती रही है। नारायणमूर्ति ने क्या इस मुद्दे पर कोई पहल की इच्छा दिखायी है?
व्यापारियों, दलालों और अपराधियों की जमात से आने वाले लोगों का विधायिका सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं में घुसपैठ से हमारे लोकतंत्र की स्वस्थ्य कसौटियां और संवैधानिक मान्यताएं व परमपराएं कुचली जाती हैं। स्व. ललित सूरी का उदाहरण हमारे लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था को कलंकित करने वाला है। सूरी होटल व्यापारी थे। कई कोशिशों के बाद ललित सूरी विधायकों के ईमान खरीद कर राज्यसभा में पहुंचने में कामयाब हो गये थे। राज्य सभा में पहुंचने के बाद उन्होंने होटल व्यवसाय से जुड़ी नीतियों को प्रभावित करने की सिर्फ कोशिश ही नहीं की बल्कि होटल मालिकों के लाभ से संबंधित प्रश्न भी राज्यसभा में रखने शुरू कर दिये थे। राज्य सभा के तत्कालीन सभापति को ललित सूरी के इस कुकृत्य पर डांट पिलानी पड़ी थी। इतना ही नहीं बल्कि तत्कालीन सभापति ने यहां तक कह डाला था कि संसद व्यक्तिगत हित साधने की जगह नहीं है। ललित सूरी को मिली सबक और झिड़की न तो पहली थी और न ही आखिरी। हाल ही में केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि दर्जनों सांसद ऐसे हैं, जो औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी नीतियां प्रभावित करते हैं। क्या गारंटी है कि नारायण मूर्ति संवैधानिक पदों पर बैठने के बाद ललित सूरी की तरह अपने व्यक्तिगत हित में सरकारी-संवैधानिक नीतियां नहीं प्रभावित करेंगे।
दुनिया के नामी-गिरामी व्यापारियों- दौलतमंद लोगों के सामने नारायणमूर्ति की क्या बिसात है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और माइक्रोसाफ्ट के मालिक बिल गेट्स ने कंप्यूटर क्रांति लाकर अपार धन और यश कमाया है। बिल गेट ने अपनी संपत्ति की तीन चौथाई हिस्से धर्माथ दान कर दिया है। कंप्यूटर क्रांति में अग्रणी योगदान देने और अपनी संपत्ति की तीन-चौथाई हिस्सा सामाजिक-धार्मिक कार्यो के लिए दान करने के बाद भी कभी यह नहीं कहा कि वे अमेरिका का राष्ट्रपति बनना चाहते हैं और अमेरिकी नागरिक उन्हें राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठायें। नारायण मूर्ति ने अपनी कितनी संपत्ति सामाजिक कार्यों में लगायी है? मुझे नहीं मालूम है? नारायण मूर्ति जैसे व्यापारी अगर राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठता है तो यह लोकतंत्र की स्वस्थ्य स्थिति होगी नहीं। लोकतंत्र-संवैधानिक व्यवस्था ही कलंकित होगी। संविधान नारायण मूर्ति जैसे व्यक्तियों को संवैधानिक पदों पर पहुचंने में कोई बाधा नहीं बनता पर परम्पराएं और मान्यताएं जरूर सवाल उठाएंगी। असल में संविधान निर्माताओं को यह आशंका नहीं रही होगी कि नारायण मूर्ति जैसा व्यापारी भी राष्ट्रपति पद तक पहुंचने की इच्छा पाल सकता है। राष्ट्रपति पद पर पहुंचने वाले व्यक्ति को डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. राधाकृष्णन, डा. शंकर दयाल शर्मा, डा. अब्दुल कलाम की कसौटी से ही हमारा लोकतंत्र और संविधान गौरव हासिल कर सकता है। नारायण मूर्ति जैसों से कदापि हमारा लोकतंत्र और संविधान की अहर्ताएं गौरवशाली नहीं हो सकती है। आप समझ गये नारायण मूर्ति जी?
(लेखक विष्णु गुप्त हिंदी के वरिष्ठ एवं जनपक्षधर पत्रकार हैं)
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